Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
नसीहतें अनसुनी रहेंगी, यही रवायत पनप रही है
पुरानी आफ़त तो टल गई पर नई मुसीबत पनप रही है
कहीं तिज़ारत, कहीं ज़रूरत, कहीं पे वहशत पनप रही है
अमां हटाओ भी दौरे-नौ में कहाँ शराफ़त पनप रही है
इधर मेरे घर में एक नन्हीं, हसीं नज़ाक़त पनप रही है
उधर मेरे मन में सुर्ख़ियों की तमाम दहशत पनप रही है
किसी की मजबूरियों के घुटने कभी टिकें तो ये याद रखना
जहाँ दबाया था हसरतों को वहीं बग़ावत पनप रही है
वो एक हिंदू, ये एक मुस्लिम, वो इसका दुश्मन, ये उसका दुश्मन
इसी तरह के फ़िज़ूल जुमलों पे अब सियासत पनप रही है
हरेक सच को बयान कर दें, पलट के रख दें हरेक बाज़ी
तुम्हारी मजबूरियों के दम पर, हमारी हिम्मत पनप रही है
जो एक आदत-सी हो गई है, तुम्हें हमारी ख़ुशामदों की
तुम्हारी आदत की आड़ लेकर, हमारी चाहत पनप रही है
बहुत दिनों तक संभाले रखी, तो ये मरासिम को लील लेगी
अभी मिटा दो दिमाग़ो-दिल से, अगर शिक़ायत पनप रही है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
बहुत भयानक सपना था
साक्षात् बुद्ध सामने थे
…लहूलुहान।
उनके पीछे एक भीड़ थी
…पूरी भीड़।
हताश से महावीर
परास्त से गांधी
और शर्मिंदा से पैग़म्बर
किसी गहरे सदमे से सन्न राम
किसी आशंका से त्रस्त कृष्ण
और
ख़ुद से नज़रें चुराते अम्बेडकर।
सब थे
…पर बदहवास।
सबके जिस्म छलनी थे
ज़ख़्म ही ज़ख़्म
हाँ, बुद्ध के ज़ख़्म कुछ ताज़ा थे
भयंकर मंज़र था
साँस तक का शोर नहीं था
तभी सन्नाटे में
टप्प से टपकी
लहू की एक बूंद।
…बस सपना टूट गया
बाॅलकनी में
अख़बार आकर गिरा था
…टप्प से।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Unpublished
भारत की आज तस्वीर जो बनी हुई है
उसमें पुरानी हर रीत का भी रंग है
हल्दीघाटी वाली एक हार की कसक भी है
पोरस की स्वाभिमानी जीत का भी रंग है
चंद्रगुप्त मौर्य वाले साहस का नूर भी है
चाणक्य शिखा की कूटनीति का भी रंग है
झाँसी वाले शौर्य की कहानी तलवार पे है
पीठ पर ममता की प्रीत का भी रंग है
भारत की वीणा पे जो सरगम गूंजती है
उसमें वीणा के हर तार का भी योग है
क्रांति के बारूदों के धमाकों की धमक भी है
शांति का व मान-मनुहार का भी योग है
तलहट में छिपे खज़ानों की खनक भी है
अभिशाप झेलते बिहार का भी योग है
काम की प्रभावना की अजंता-एलोरा भी है
राम-कृष्ण योग के विचार का भी योग है
बरखा में नृत्यमग्न मोर अनिवार्य है तो
मोर की नमी से भरी कोर भी ज़रूरी है
तुंग हिमगिरि की विशालता आवश्यक है
सागर की गर्जना का रोर भी ज़रूरी है
अवध की सुरमई शाम अनिवार्य है तो
काशी के किनारों वाली भोर भी ज़रूरी है
देश की अखण्डता को पूर्ण करने के लिए
भारती का एक-एक पोर भी ज़रूरी है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
हम फैलाना चाहते हैं
बाइबल को
गीता को
क़ुरआन को
जातक को
आगम को।
लेकिन समेट लेना चाहते हैं
अपने ईसा
अपने कृष्ण
अपने पैग़म्बर
अपने बुद्ध
और अपने महावीर।
हमने शास्त्र बना दिया है
किताबों को
विस्तृत करके।
और पुरखा बना दिया है
भगवान को
संकुचित करके।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
सिर्फ़ मतलब के लिए हर चाल चलना पाप है
हर दफ़ा दर देखकर मजहब बदलना पाप है
शाइरी, दीवानगी, नेकी, इबादत, मयक़शी
और राहे-इश्क़ में गिर कर संभलना पाप है
काश बच्चों की तरह हालात भी ये जान लें
ख़्वाहिशों की तितलियों के पर मसलना पाप है
दौर इक ऐसा भी था, जब झूठ कहना मौत था
और अब ये हाल, सच की राह चलना पाप है
किस डरौने दौर में हम जी रहे हैं या ख़ुदा
घर में रहना ऐब है, घर से निकलना पाप है
पाप का दिल से निकल हरक़त में आना ज़ुर्म है
ज़ुर्म का भीतर ही भीतर दिल में पलना पाप है
✍️ चिराग़ जैन