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बहुत भयानक सपना था
साक्षात् बुद्ध सामने थे
…लहूलुहान।

उनके पीछे एक भीड़ थी
…पूरी भीड़।

हताश से महावीर
परास्त से गांधी
और शर्मिंदा से पैग़म्बर
किसी गहरे सदमे से सन्न राम
किसी आशंका से त्रस्त कृष्ण
और
ख़ुद से नज़रें चुराते अम्बेडकर।

सब थे
…पर बदहवास।

सबके जिस्म छलनी थे
ज़ख़्म ही ज़ख़्म
हाँ, बुद्ध के ज़ख़्म कुछ ताज़ा थे

भयंकर मंज़र था
साँस तक का शोर नहीं था
तभी सन्नाटे में
टप्प से टपकी
लहू की एक बूंद।

…बस सपना टूट गया
बाॅलकनी में
अख़बार आकर गिरा था
…टप्प से।

✍️ चिराग़ जैन

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