Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
माँ के आँचल में था महफ़ूज़ हमारा बचपन
आ के दुनिया में कहीं खो गया प्यारा बचपन
इस ज़माने की हर इक चाल से हारा बचपन
कैसे जी पाएगा ऐसे में बेचारा बचपन
देखकर डर गया दुनिया का नज़ारा बचपन
फिर कभी लौट के आया न दुबारा बचपन
जिस घड़ी हो गए हालात ज़ेह्न पर क़ाबिज़
उस घड़ी आँसुओं में बह गया सारा बचपन
‘हम भी जल्दी से बड़े हों तो मज़ा आ जाए’
-ऐसे मासूम ख़यालात ने मारा बचपन
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
अगर कुछ शोख़ियों की ओर उसका मन नहीं जाता
तो फिर इंसान के मन से कभी बचपन नहीं जाता
कोई कितना भी ख़ुद को सख्त दिल कहता रहे लेकिन
कभी यादों से पहले प्यार का सावन नहीं जाता
भले ही मिट गया दीवार का नामो-निशां भी अब
मगर मेरे ज़ेह्न से वो बँटा आंगन नहीं जाता
चुभन ही क्यों बहुत लम्बे समय तक याद रहती है
मिरे मन से वो इक पल का परायापन नहीं जाता
किसी के रूठ जाने पर जो पीछे छूट जाते हैं
बहुत दिन तक उन अपनों का अकेलापन नहीं जाता
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
सिर्फ़ मतलब के लिए हर चाल चलना पाप है
हर दफ़ा दर देखकर मजहब बदलना पाप है
शाइरी, दीवानगी, नेकी, इबादत, मयक़शी
और राहे-इश्क़ में गिर कर संभलना पाप है
काश बच्चों की तरह हालात भी ये जान लें
ख़्वाहिशों की तितलियों के पर मसलना पाप है
दौर इक ऐसा भी था, जब झूठ कहना मौत था
और अब ये हाल, सच की राह चलना पाप है
किस डरौने दौर में हम जी रहे हैं या ख़ुदा
घर में रहना ऐब है, घर से निकलना पाप है
पाप का दिल से निकल हरक़त में आना ज़ुर्म है
ज़ुर्म का भीतर ही भीतर दिल में पलना पाप है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
ग़रीबों के बच्चों की
भूखी आँखों में पलते कोरे स्वप्न
अनायास ही मिट जाते हैं
सागर-तट पर फैली रेत पर लिखे
नाम की तरह।
रेतीली चित्रकारी को मिटाने आयी लहर
हर बार दे जाती है
एक नया चित्र
सागर के तट को
ताकि
व्यर्थ न हो
यात्रा
भविष्य में आनेवाली लहर की!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
हँसी-ख़ुशी के वो लमहे हज़ार बचपन के
कभी तो लौटते दिन एक बार बचपन के
नहीं, दिमाग़ न थे होशियार बचपन के
तभी तो दिन थे बहुत ख़ुशगवार बचपन के
बड़े हुए तो बहुत लोग मिल गए लेकिन
बिछड़ चुके हैं सभी दोस्त-यार बचपन के
जो जिस्म को नहीं दिल को सुक़ून देते थे
बहुत अजीब थे वो रोज़गार बचपन के
लड़े जो सुब्ह तो फिर शाम साथ खेल लिए
कभी रहे नहीं मन में ग़ुबार बचपन के
सभी को चुपके से हर राज़ बता देते थे
सभी तो हो गए थे राज़दार बचपन के
ढले जो शाम तो गलियों में खेलने निकलें
बड़े हसीन थे वो इन्तज़ार बचपन के
बड़ों पे ज़िद रही, छोटों पे इक रुआब रहा
कहाँ बचे हैं वो अब इख़्तियार बचपन के
ज़ेह्न में कौंध के होठों पे बिखर जाते हैं
वो वाक़यात हैं जो बेशुमार बचपन के
✍️ चिराग़ जैन