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इक अदद इन्सान

मैंने कब चाहा कि सिर पर ताज होना चाहिए
बस मिरे माथे पे माँ का इक दिठोना चाहिए

दिल में बेशक़ इक बड़ा अरमां संजोना चाहिए
चंद क़तरे ऑंख में पानी भी होना चाहिए

घर में ख़ुशियों के लिए कालीन या मखमल नहीं
एक छोटा-सा मुहब्बत का बिछोना चाहिए

ऑंसुओं की मूक भाषा को समझने के लिए
हर बशर में इक अदद इन्सान होना चाहिए

प्यार से इनक़ार भी कर दो तो ख़ुश हो जाएगा
कौन कहता है कि बचपन को खिलोना चाहिए

ज़िन्दगी बेशक़ ज़माने को अता कीजे मगर
दो घड़ी ख़ुद के लिए भी वक्त होना चाहिए

ज़िन्दगी को मंच कहते हो तो फिर इस मंच पर
आपका भी तो कोई किरदार होना चाहिए

महफ़िलें केवल ठहाकों के लिए तय हैं यहाँ
ऑंसुओं का जश्न ख़ुद के साथ होना चाहिए

बिन कलम बिन रोशनाई भी ग़ज़ल हो जाएगी
सिर्फ दिल में दर्द का सैलाब होना चाहिए

अश्क़ जब ऑंखों की हद को लांघ जाएँ तो ‘चिराग़’
अपनी बाँहों में सिमट जी भर के रोना चाहिए

✍️ चिराग़ जैन

संबंधों की साँस उखड़ने लगती है

जब बेटी की उम्र ज़रा रफ़्तार पकड़ने लगती है
तब माँ हर आते-जाते की नज़रें पढ़ने लगती है

जब मन की कच्ची मिट्टी कुछ सपने गढ़ने लगती है
तब ज़िम्मेदारी की भारी बारिश पड़ने लगती है

यूँ तो वो अपनी हर ज़िद्द मनवा ही लेता है मुझसे
लेकिन मेरे भीतर-भीतर नफ़रत बढ़ने लगती है

प्यार अगर सच्चा हो तो हल हो जाती है हर मुश्क़िल
ख़ुदगर्ज़ी से संबंधों की साँस उखड़ने लगती है

मजबूरी भी बिल्कुल ज़िद्दी बच्चों जैसी होती है
ज़्यादा अगर तवज़्ज़ो दो तो सिर पर चढ़ने लगती है

पहले तो वो मुझसे केवल ख़ुशियाँ बाँटा करती थी
अब अपनी हर ग़लती भी मेरे सर मँढ़ने लगती है

महफ़िल में वो आती है तो मुझे ढूंढती है पहले
और फिर अपने मोबाइल के मैसिज पढ़ने लगती है

✍️ चिराग़ जैन

आदमी बौना अच्छा

जिनको लगता न हो धरती का बिछौना अच्छा
ऐसे शिखरों से तो फिर आदमी बौना अच्छा

मैंने ये देख के मेले में लुटा दी दौलत
मुर्दा दौलत से तो बच्चों का खिलौना अच्छा

मेरे होते हुए भी कोई मेरा घर लूटे
फिर तो मुझसे मेरे खेतों का डरौना अच्छा

राम ख़ुद से भी पराए हुए राजा बनकर
ऐसे महलों से था जंगल का बिछौना अच्छा

उसकी ममता से मेरा मन भी सँवर उठता था
अब के सिंगार से अम्मा का दिठौना अच्छा

✍️ चिराग़ जैन

आख़िर क्यों माँ?

माँ
दुनिया तुझको अक्सर
ममता की इक मूरत कहती है
मैं भी तेरे त्याग, नेह और वात्सल्य का
क़द्रदान हूँ।

लेकिन माँ
इतना बतला दे
तब वो सारी नेह-दिग्धता
भीतर का सारा वात्सल्य
कहाँ दफ़्न कर दिया था तूने
जब तूने
इक सच्चे दिल से
दोनों हाथ बलैयाँ लेकर
अपने रब से दुआ करी थी
इक बचपन के मर जाने की…

जब तूने चाहा था
तेरा राजा बेटा
जल्दी-जल्दी बड़ा हो जाए

कहाँ मर गई थी
तब
तेरी सारी ममता?

✍️ चिराग़ जैन

वक़्त का हिण्डोला

घर के मुख्य द्वार की
देहलीज पर बैठकर
दफ़्तर से लौटते पापा की
राह तकतीं
नन्हीं-नन्हीं आँखें
रोज़ शाम
आशावादी दृष्टिकोण से
निहारती थीं
सड़क की ओर
…कि पापा
लेकर आएंगे कुछ न कुछ चिज्जी
हमारे लिए।

लेकिन लुप्त हो रही है
ये स्नेहिल परंपरा
पिछले कुछ वर्षों से
बच नहीं पाती अब
वह चिल्लड़
जिसे ख़नकाकर
चिज्जी ख़रीदते थे पापा
हर शाम
दफ़्तर से लौटते वक़्त
अपने बच्चों के लिए!

ख़र्च हो गई है
सारी रेज़गारी
रोज़गार की तलाश में
और मोटी-मोटी किताबों के बीच
ग़ुम हो गया है
वक़्त का वह हिण्डोला
जिसमें बैठकर
राह तकते थे बच्चे
दफ़्तर से लौटते पापा की।

✍️ चिराग़ जैन

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