Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
जाटों के उपद्रव को ‘आंदोलन’ कहकर मिडिया भी कम नुक़सान नहीं कर रहा। मैं सरकार से गुर्जरों, जाटों और पटेलों को नौकरियों में आरक्षण देने की मांग करते हुए अपेक्षा करता हूँ कि इनसे तब तक “बिना वेतन नौकरी” करवाई जाए जब तक इनके उपद्रवों से हुए नुक़सान की भरपाई न हो जाए।
जेएनयू में कुछ लोगों ने भारत की बर्बादी के नारे लगाए। हरियाणा में कुछ लोगों ने जनता की संपत्ति को बर्बाद किया। पम्पोर में आतंकियों से निपटने को सेना सक्रिय। हरियाणा में जाट उपद्रवियों से निपटने के लिए सेना सक्रिय। क्या इन ख़बरों में कुछ साम्य है? क्या राष्ट्रद्रोह और आतंकवाद जैसे शब्दों की पुनर्व्याख्या नहीं होनी चाहिए? हिंसा और अराजकता किसी भी स्थिति में किसी भी तंत्र के सुचारू रहने में सहायक नहीं हो सकती।
मांग क्या है, इससे ज़्यादा बड़ा प्रश्न यह हो गया है कि मांगने का तरीका क्या है। पीने का पानी रोकने जैसी घटना ने बर्बरता का वह अमानवीय चेहरा प्रस्तुत किया है जिससे कम से कम अपनत्व तो महसूस नहीं किया जा सकता।
आरक्षण का कटोरा उठाकर अधिकारों की बात करने वाली जातियों के भीतर की ग्रन्थियां स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। यदि अपनी जायज़/नाजायज़ मांगें मनवाने के लिए अराजक हो जाना तर्कसंगत होता तो मानवीय समाज में सभ्यता और शांति कीआकांक्षा रखने वाले पुरखे अपराधी हो गए होते।
जातीय विभेद और बाहुबल की दुहाइयाँ देकर लाठी भांजने की परम्पराओं ने कई सद्दामों और गद्दाफियों को धूल चटाई है। संविधान के अधिकारों की माला जपने वाले यह न भूलें किसंविधान में कर्तव्यों का भी ज़िक्र है। स्वार्थों की जठराग्नि यदि राष्ट्रबोध और बहुजनहिताय के संस्कारों को पचाने में सक्षम हो जाए तो आपके अस्तित्व को लीलने में भी वह संकोच न करेगी।
✍️ चिराग़ जैन
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सुर-असुर; शैव-वैष्णव; कौरव-पाण्डव; आर्य-द्रविड़, बौद्ध-वैष्णव, जैन-बौद्ध, हिन्दू-मुस्लिम, भारतीय-अंग्रेज, ऊँच-नीच और अमीर-ग़रीब का परस्पर संघर्ष तो समझ लिया हमने! लेकिन रजवाड़े आपस में क्यों लड़े, मराठा-पेशवाओं में आपसी संघर्ष क्यों था, मुग़ल आपस में क्यों एक न हुए, मौर्यो में भितरघात कैसे हुआ, और तो और कांग्रेसी एक क्यों न रह सके, जनता दल क्यों विभक्त हुआ, तेलंगाना का संघर्ष क्यों हुआ, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा क्यों बना, शिवसेना दुफाड़ क्यों हो गई, वरुण गांधी और राहुल गांधी में क्यों नहीं बनी, प्रमोद महाजन और प्रवीण महाजन का अंत कैसे हुआ, आडवाणी जी और मोदी जी में दूरी क्यों है, केजरीवाल और अन्ना और योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण और किरण बेदी अलग-अलग क्यों हो गए। -इन सब प्रश्नों का अलग अलग उत्तर तलाशने की आवश्यकता नहीं है। सीधा सा मतलब है बंधु। किसी भी वर्ग को इस देश की समस्याओं का दोषी ठहराना बंद होना चाहिए। यदि सारे हिंदुओं को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा तो मुसलमान शीया-सुन्नी होकर लड़ेंगे। सारे मुसलमानों को बाहर निकाल दिया गया तो हिन्दू ब्राह्मण-बनिए-क्षत्रिय-शूद्र होकर सिर फोड़ेंगे। सबसे अहिंसक जैनियों को अकेला छोड़ दो तो वे श्वेताम्बर-दिगंबर-तेरापंथी-बीसपंथी-मूर्तिपूजक और न जाने क्या क्या होकर लड़ने लगेंगे। और शांति के प्रतिमान समझे जाने वाले बौद्धों को अकेला छोड़ दो तो उनके पास भी ढेर संभावनाएँ शेष हैं। गोत्र, वंश, कुल, भाषा, शिक्षा, पंथ किसी भी भेद पर लड़ना जब तय ही है तो किसी भी वर्ग को बाहर निकाल कर लड़ाई की संभावनाएं कम न करो। ऐसा करोगे तो लड़ाई हो जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
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भैये यो दलित दलित का होत है।
कछु नाय होत भाई। ई सब नेता-ऊता पहिले चुनाब-चुनाब की कुश्ती खेलत हैं, फिर हिन्दू-मुसलमान की कबड्डी। अऊर जब सबन से उकता जइहैं तब दलित-उलित का सलीमा लगा लई हैं।
✍️ चिराग़ जैन