Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
ग़ज़ब है
हर बार ढूंढ़ लाती है
कोई न कोई बहाना
इनकार के लिए।
वही पुरानी बातें
वही पुराने बहाने
वही पुराने हाव-भाव
वही पुराने तौर
और तो और
झेंप, शर्म
और आँखें चुराना भी
जस का तस।
…ये सब तो मैं
फिल्मों में भी
देख चुका हूँ
सैंकड़ों बार।
इतनी बड़ी हो गई
इत्ती-सी बात समझ नहीं आती!
“अरे यार!
मैं प्यार करता हूँ तुझसे
…प्यार।”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
कहाँ अचानक मिले हैं हम-तुम, यहाँ के मौसम में शायरी है
जवान रुत, मदभरी हवाएँ, ये शाम जैसे ठहर गई है
महकती रुत उनके सुर्ख़ नाज़ुक लबों को छूकर बहक रही है
सनम के भीगे बदन की लरजिश हमारे लहजे में आ गई है
जो सोच की हद में आ गया हो, वो चाहे जो भी हो आदमी है
किसी तरह भी समझने से जो, समझ न आए, ख़ुदा वही है
शराब पीकर बहकने वालों को उस नशे की ख़बर नहीं है
वो उम्र भर फिर सँभल न पाया, रसूल की जिसने मय चखी है
नज़र में शोख़ी, ज़ुबां में नरमी, बदन में मस्ती, लबों पे सुर्ख़ी
ये हुस्ने-जाना है या ख़ुदा ने, कोई सरापा ग़ज़ल कही है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Doha, Poetry
घन, पंछी, बरखा करें, गर्जन, कलरव, सोर
हृदय मयूरा झूमिहै, ज्यों सावन में मोर
जब मेघन का नेह जल, बरसत है चहुँ ओर
इस प्रेमी मन भीगता, उत बिरहन की कोर
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
हमारा दिल था बहुत बेक़रार बरसों तक
किसी ख़ुशी का रहा इंतज़ार बरसों तक
जो एक पल तमाम दर्द को भुला देगा
उसी की आस पे थे ख़ुशगवार बरसों तक
वो मुझसे रू-ब-रू हैं, जिनका मुंतज़िर था मैं
ये पल करेगा मुझे अश्क़बार बरसों तक
तमाम मयक़दों का सारा नशा बेमानी
वो देख लें तो न उतरे ख़ुमार बरसों तक
ये क्या तिलिस्म किया तुमने इक दफ़ा छूकर
ख़याले-वस्ल रहा बरक़रार बरसों तक
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
आप संग गुज़रे लम्हे, पीड़ा अजानी हो गये
प्यार के रंगीन पल, क़िस्से-कहानी हो गये
हर किसी के ख़्वाब जब से आसमानी हो गये
पाप के और पुण्य के तब्दील मआनी हो गये
एक दीवाने से झोंके ने उन्हें छू भर लिया
और उनकी चूनरी के रंग धानी हो गये
सर्द था मौसम तो बहती धार भी जम-सी गयी
धूप पड़ते ही मरासिम पानी-पानी हो गये
वक़्त की हल्की-सी करवट का तमाशा देखिये
ये सड़क के लोग कितनी खानदानी हो गये
मुफ़लिसी में जिनकी बातें गालियाँ बनकर चुभीं
दौलतें बरसीं तो उनके और मआनी हो गये
आपसे मिलकर हमारे दिन हुए गुलदाउदी
आपको छूकर तसब्बुर रातरानी हो गये
जब उचककर आपने तोड़ी निम्बोली; उस घड़ी
नीम के पत्ते भी सारे ज़ाफ़रानी हो गये
✍️ चिराग़ जैन