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ट्रैफिक सेंस

हमें पुलिसवाला न दिखे तो हम रेडलाइट जम्प करते हुए नहीं हिचकते। रॉंग साइड ड्राइव करते हुए हमें शर्म नहीं आती। सड़क किनारे गाड़ी लगाते हुए हम दूसरों की परेशानी की चिंता नहीं करते। हमें लालबत्ती पर दाएँ मुड़ना होगा तो भी हम सबसे बाईं लेन में सबका रास्ता रोककर खड़े होंगे। हम मोबाइल पर बात करते हुए सड़क पार करते हैं। बिना हेलमेट लगाए कान और कंधे के बीच मोबाइल फँसाए टेढ़ी गर्दन किये टेढ़ी-टेढ़ी बाइक चलाते हैं। कार ड्राइविंग के दौरान तो मोबाइल पर बात करना हमारा धर्म बन चुका है। हम ऑटो चलाते हैं, तो सारे नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। हम बस चलाते हैं तो ब्रेक और इंडिकेटर को अछूत समझने लगते हैं। नो एंट्री और टो-अवे जैसे शब्द तो हमने पढ़े ही नहीं हैं। हम रेडलाइट पर खड़ी गाड़ी को भी हॉर्न दे देते हैं। हम स्पीड लिमिट की परवाह नहीं करते।
हम पैदल चलते हैं, तो गाड़ीवालों को दुश्मन समझते हैं। हम गाड़ी चलाते हैं तो पैदलों को मूर्ख समझते हैं। हम फुटओवर ब्रिज के नीचे भी भागकर सड़क पार करते हैं। हम ज़ेबरा क्रॉसिंग को सडकों के सौंदर्य का प्रसाधन मात्र समझते हैं। हम स्टॉप लाइन को सड़कों के अंग्रेजीकरण का कारण मानकर उसे रौंद डालते हैं।
हमारे पुलिसवाले चालान काटने को ही धर्म समझते हैं। हमारे पुलिसवाले ऑफिस टाइम पर भारी ट्रैफिक के बीच बेरियर लगाकर चाय पीने चले जाते हैं। हमारे पुलिसवाले खुद रेड लाइट जम्प करते हैं। हमारे पुलिसवाले रॉंग साइड, रॉंग लेन, बिना हेलमेट, ओवरटेकिंग, रैश ड्राइव को ड्यूटी समझकर निभाते हैं।
मिलिट्री के ट्रक, शहरों के ट्रैफिक को कीड़े, और शहरों की जनता को चींटी समझकर चलते हैं। सेना या पुलिस की वर्दी पहननेवाला शख़्स कहीं भी, कैसे भी गाडी घुसेड़ सकता है। गाड़ी पर लॉयर लिखा हो, तो उसे क़ानून से खेलने का अधिकार मिल जाता है। गाड़ी पर प्रेस लिखा हो तो उसे पुलिस को छेड़ने का अधिकार मिल जाता है। गाडी पर विधायक या सांसद प्रतिनिधि लिखा हो तो उसे जनता से खेलने का अधिकार मिल जाता है।
अतिक्रमण के कैंसर से बची खुची सड़कें बरसात की फुंसियों से त्रस्त हैं। पैदल चलने के लिए बने फुटपाथ झुग्गियों, रेहड़ियों, खोखों, स्मैकियों और मूत्रदान के लिए समर्पित हो चुके हैं। पार्किंगवाला भैया आधी सड़क घेरकर बदमाशी के स्तर तक उतरकर वसूली करता है। रिक्शावाला भैया अकेले ही पूरे ट्रैफिक का बंटाधार करने में समर्थ है। फुटपाथ का कोई पत्थर अगर सड़क पर गिर जाए तो उसे हटाने की ज़रूरत कोई नहीं समझता। डिवाइडर की रेलिंग घातक होकर सड़क तक मुड़ जाए तो उसे ठीक करने का जिम्मा किसी विभाग का नहीं है।
…हम विकास के पथ पर अग्रसर हैं।

✍️ चिराग़ जैन

कला का मुँह काला कर दिया जाए

“कला का मुँह काला कर दिया जाए” -ये हुक्म अपने आप को दिया है कलयुग के कुकर्मियों ने। कोलाहल पर किलोल की विजय न हो जाए। अपनी महत्वाकांक्षाओं को मनोरंजन के सत्य भाषण से बचाने के लिए सियासत रोज़ नए पैंतरे खेल रही है। कोई मुज़फ्फरनगर के दंगों पर बोलने लगे तो उलेमाओं का फ़तवा उछाल दो, कोई पंजाब के सुट्टे पर बोले तो उसे सेंसर की देहरी पर रगड़ दो। कोई दिल्ली की समस्याओं पर कलम चलाए तो उसे मोदी का चापलूस कहकर अपमानित करो। कोई केंद्र सरकार की किसी नीति पर ऊँगली उठाए तो उसे “कांग्रेसी कुत्ता” कहो। कोई कांग्रेस की हरकतों पर लिखने की कोशिश करे तो उसे संघी कहकर प्रताड़ित करो। कोई फकीरों की मज़ार पर क़व्वाली गाने लगे तो उसे गोली मार दो।
ऑल इण्डिया बकचोद, बिग बॉस, ग्रैंड मस्ती और सनी लियोने जैसे प्रतिमानों की खिड़की से कला का आकलन करो ताकि कलाकार ख़ुद ब ख़ुद शर्मसार होकर ख़ुदकुशी कर ले। कला फिल्मों को आर्थिक विपन्नता से घोंट दो और फिर व्यावसायिक फिल्मों के उदाहरण प्रस्तुत कर फिल्मों की अनुपयोगिता का ढोल पीटो।
कोई हँसने-हँसाने की कोशिश में व्यंग्य के चौबारे में टहलने लगे तो उस पर मानहानि का मुक़द्दमा दर्ज कर दो। कोई न्यूज़ चैनलों से उत्तरदायित्वहीनता का कारण पूछ ले तो उसे चैनल पर दिखाना बंद कर दो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जुमला झूठे सर्वेक्षण और अश्लील विज्ञापनों के पक्ष में मुखर होना चाहिए। कला, कलाकार और सत्य… -इन सबको तो फांसी चढ़ा देना चाहिए।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Comedian got arrested for his sarcasm

मुहब्बत के पैगम्बरों के लिए सुकून

ख़ुद को ख़ुदा के बन्दे और जेहादी कहने वाले खूंखारों ने ख़ुदा की इबादत और ख़ुदा से मुहब्बत का पैग़ाम देने वाली एक बेहतरीन आवाज़ को ख़ामोश कर दिया। रूह से उठने वाला वो अलाप जो सुनने वालों को सीधे रूहानियत के गलियारों तक लिए जाता था, वो अलाप स्वयंभू जेहादियों पर एक धिक्कार के साथ हमेशा के लिए बंद हो गया।
दहशतगर्दी की दुनिया रूहानियत को नहीं समझ सकती, क्योंकि रूहानियत का तअल्लुक़ रूह से होता है। ईश्वर, अल्लाह, ख़ुदा या जो भी कोई पारलौकिक सत्ता इस सृष्टि के पीछे है; उसके कोप की इस समय आवश्यकता है। अब इस दुनिया को समझना होगा कि संसार में सिर्फ दो ही तरीके के लोग हैं- 1) दहशतगर्द और 2) इंसान।
दहशतगर्दी के खिलाफ इंसानियत को एक होकर लड़ना होगा; तभी मुहब्बत के पैगम्बरों के लिए सुकून मुहैया हो सकेगा।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Death of Amjad Farid Sabri

पिता

अब कवि सम्मेलन में आना-जाना मेरे लिए सामान्य हो चुका है। एक काम जैसा अनुभव रह गया है कवि सम्मेलनीय यात्राओं का। लेकिन आज भी मेरे घर लौटने पर मेरी अटैची से जब कोई प्रतीक चिन्ह मिलता है तो वे लपक कर उसे उठा लेते हैं और उसका एक एक अक्षर आद्योपान्त पढ़ जाते हैं। जब किसी निमंत्रण पत्र में छपता है मेरा नाम तो देर तक उसे निरखते रहते हैं। मुझे याद है, मेरी सातवीं किताब के प्रकाशन पर भी वे उतने ही ख़ुश थे जितना मैं अपनी पहली किताब के प्रकाशन पर था। कवि सम्मेलन में मिली मोतियों की मालाओं और दुशालों को आज भी वे सहेज कर उठाते हैं और जी भर निरखने के बाद हर बार बोलते हैं – “लो, इन्हें संभाल कर रख दो।” जब कभी मैं श्रृंखलाबद्ध यात्रा पर निकलता हूँ तो वे आह्लाद में सारे रूट मैप देखते हैं। मुझे कोई सम्मान मिलता है तो उनकी आँखों में वो चमक आती है जो शायद मेरी पहली किलकारी पर मेरी माँ की आँखों में आई होगी। …सच बताऊँ, मेरे पिता मेरी उपलब्धियों को भोगते हैं और मैं हर उपलब्धि पर उनके आह्लाद को।

✍️ चिराग़ जैन

सेंसर बोर्ड

पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष हैं; इस हेतु उन्हें अपने दायित्व के निर्वाह हेतु सख्त होना पड़ेगा ही। भारत के दर्शकों को अश्लीलता से बचाना, अन्धविश्वास से बचाना उनका दायित्व है और भारत के लोगों अथवा समूहों की भावनाएं आहत न हों; यह देखना उनका काम है। किन्तु चूँकि मैं फिल्मों का आलोचक अथवा विद्वान न होकर एक सामान्य दर्शक हूँ इसलिए “उड़ता पंजाब” जैसे विवाद के बाद कुछ सामान्य प्रश्न करने की हिम्मत कर पा रहा हूँ। ये सब प्रश्न मैं इसलिए भी पूछ सकता हूँ कि इन्हें यह कहकर ख़ारिज भी नहीं किया जा सकेगा कि प्रश्नकर्ता अमुक पार्टी का सदस्य है।
उड़ता पंजाब में कई दृश्य यह कहकर कटवाए जा रहे हैं कि उनमें द्विअर्थी संवाद हैं अथवा उनमें अभद्र भाषा का प्रयोग है। मैं इस तर्क का पक्षधर हूँ लेकिन इस आपत्ति पर यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या पहलाज जी उसी सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष हैं जिन्होंने निम्न फिल्मों को “ए” अथवा “यू/ए” प्रमाण पत्र के साथ पास किया था-

1) रागिनी एम एम एस (श्रृंखला)
2) मर्डर (श्रृंखला)
3) ग्रैंड मस्ती
4) रास्कल्स
5) द डर्टी पिक्चर
6) लेडीज़ वर्सिस रिकी बहल
7) विक्की डोनर
8) लाइफ की तो लग गई
9) गैंग्स ऑफ़ वासेपुर
10) जिस्म (श्रृंखला)
11) राज़
12) हीरोइन
13) अइया
14) फुकरे
15) लुटेरा
16) बी ए पास
17) बजाते रहो
18) नशा
19) शुद्ध देसी रोमांस
20) बूम
21) ऊप्स
22) गोलियों की रासलीला रामलीला
23) डेढ़ इश्किया
24) मस्तराम
25) हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया
26) मर्दानी
27) नो वन किल्ड जेसिका
28) सुलेमानी कीड़ा
29) गुड्डू रंगीला
30) प्यार का पंचनामा

इसके अतिरिक्त भी एक लंबी श्रृंखला है जिसमें द्विअर्थी संवादों औरअश्लीलता के शानदार उदाहरण देखने लो मिलते हैं। “लग गई”; “ले ली”; “फट जाएगी” और “दे रही है” जैसे संवादों को सामान्य मानने वाला बोर्ड किन संवादों को द्विअर्थी कह रहा है यह समझ से परे है। “तेरी कह के लूंगा” जैसे वाक्यांश फ़िल्मी पोस्टर की टैगलाइन हो सकती है तो बाकी सब में क्या समस्या है।
अभी टीवी पर ‘डॉलर’ का एक विज्ञापन आता है जिसमें अक्षय कुमार एकलकड़ी के फट्टे से खलनायक पर वार करते हैं। फट्टा खलनायक के गुप्तांग परलगता है और फिर घायल खलनायक अपने गुप्तांग पर हाथ रखकर संवाद बोलता है – “मेरे अखरोट भिंच गए”।
इन संवादों को द्विअर्थी माना जाए या नहीं।द्विअर्थी तो छोड़ो, अब तो ऐसे ऐसे संवाद आम हो चले हैं जिनमें दूसरा अर्थ खोजा ही नहीं जा सकता।
नो वन किल्ड जेसिका के प्रारंभ में ही रानी मुखर्जी ने दो बार स्पष्ट रूप से संवाद बोला है – “*** फट जाती है।”
सुलेमनी कीड़ा में काव्य पाठ के दौरान नायक कविता पढता है जिसका शीर्षक है – “मेरी *** में कीड़ा है।”
डेढ़ इश्किया में अरशद वारसी और नसीरुद्दीन शाह में “चूतियापा” शब्द को बारबार प्रयोग किया है। इसी फ़िल्म में अरशद का संवाद है – “समझ नहीं पा रिया हूँ कि लेकर आ रिया हूँ कि देकर आ रिया हूँ।”
फ़िल्म “फुकरे” में एक पात्र का नाम ही “चूचा” है। जिसके एकमात्र अर्थ को फ़िल्म में बार बार स्पष्ट किया गया है।
अरशद ही गुड्डू रंगीला फ़िल्म में नायिका से पूछते पाए गए हैं- “लेगी?” बाद में इसी संवाद को वे बदल कर बोलते हैं- “देगी?”
संवादों की अश्लीलता के नाम पर अगर सेंसर बोर्ड “बुरा न सुनो” का सिद्धांतपालन करने वाला बन्दर बन जाए तो इससे आगे बढ़कर हम उन फिल्मों पर आते हैंजिनके पोस्टर से क्लाइमेक्स तक सिवाय अश्लीलता कुछ ढूंढे नहीं मिलता।
यदि याददाश्त पर सरकारी बेरियर न लगा हो तो उस पोस्टर का संज्ञान ले लें जिसके पोस्टर पर भीगे बदन की नायिका नग्न केवल एक झीनी चद्दर ओढ़कर लेती हुईथी। उसके स्तनों का स्पष्ट प्रदर्शन फ़िल्म की सफलता की सीढ़ी बन गई थी।पीके में सिर्फ रेडियो की आड़ में छुपे आमिर खान पोस्टर पर आए तो वह बॉलीवुडकी विकसगाथा का अध्याय समझा गया।
बीए पास में शिल्पा शुक्ला और अन्यअभिनेत्रियों के साथ पूरे सम्भोग दृश्य अगर अश्लील नहीं थे तो फिर नैतिकताके शास्त्रों पर गुमराह करने का मुक़द्दमा चलाया जाना चाहिए। सनी लियोने, विद्या बालन, राखी सावंत, मल्लिका शेरावत जैसी अभिनेत्रियों के अभिनय ने जबअश्लीलता और अभद्रता की परिभाषाएँ बदलीं तब सेंसर बोर्ड की आँखें कौन सेसपने देखने में व्यस्त थीं। द डर्टी पिक्चर, बूम, ग्रैंड मस्ती, मर्डर, जिस्म, राज, रागिनी एम् एम् एस, शुद्ध देसी रोमांस और मस्तराम बनाने के बादजब हमारे सामने अश्लीलता के प्रश्न उठते हैं तो ऐसा लगता है कि विजयमाल्या लालकिले से राष्ट्र को ईमानदारी और संस्कारों का उपदेश दे रहे हों।
किस सीन पर प्रश्न उठाने वाले बोर्ड को आँखों की पट्टी हटाकर राजाहिंदुस्तानी, मुहब्बतें, कील दिल, 2 स्टेट्स, हंसी तो फँसी, हीरोपंती, पुरानी जीन्स, रिवॉल्वर रानी, बैंग बैंग, यारियां, फाइंडिंग फैनी, हेटस्टोरी 2, बेवकूफियां, धूम 3, हम्पटी शर्मा की दुल्हनिया, रागिनी एम एम एस, एक विलेन, क्वीन, राजा नटवरलाल, ढिशक्याउँ, तेज़ाब, मानसून वेडिंग, ज़िद, दट्रेन, रास्कल्स और राज़ जैसी फ़िल्में दोबारा देखनी चाहियें।
उड़ता पंजाब पर दर्ज आपत्तियों में एक आपत्ति यह भी थी कि फ़िल्म के शीर्षक में “पंजाब”का नाम आने से पंजाब के लोगों की भावनाएं आहत होंगी। श्रीमान कृपया निम्न सूची पर भी नज़र डाल लें-

1) ज़िला ग़ाज़ियाबाद
2) मुम्बई मस्त कलंदर
3) पटियाला हाउस
4) चलो दिल्ली
5) दिल्ली बैली
6) मम्मी पंजाबी
7) गैंग्स ऑफ़ वासेपुर
8) दिल्ली सफारी
9) देहरादून डायरी
10) मुम्बई मिरर
11) बोम्बे टॉकीज़
12) गो गोआ गोन
13) बोम्बे टू गोआ
14) लव इन बोम्बे
15) चेन्नई एक्सप्रेस
16) वन्स अपॉन अ टाइम इन मुम्बई
17) वन्स अपॉन अ टाइम इन बिहार
18) चांदनी चौंक टू चाइना
19) मद्रास कैफे
20) वेक अप इण्डिया
21) चक डे इण्डिया
22) अहमदाबाद जंक्शन
23) परांठे वाली गली
24) मिड समर मिड नाईट मुम्बई
25) मुम्बई कनेक्शन
26) मुम्बई 125 केएम
27) पीपली लाइव
28) मुम्बई कैन डांस साला
29) मुम्बई दिल्ली मुम्बई
30) एनएच 10
31) एनएच 8 (रोड टू निधिवन)
32) बोम्बे वेलवेट
33) एंग्री इंडियन गॉडेस
34) लखनवी इश्क़

इस सूची को और भी लम्बा किया जा सकता है। “ज़रा हट के, ज़रा बच के ये है मुम्बई मेरी जान” जैसे गीतों ने किसी की भावनाएं आहत नहीं की।
इन सब सन्दर्भों के परिप्रेक्ष्य में मेरा प्रश्न केवल यह है कि किसी भीव्यक्ति अथवा विचारधारा अथवा दल अथवा संस्थान के चश्मे लगाकर बैठे लोग क्यावास्तव में किसी का हित कर सकते हैं।
निहलानी जी एक बार इस एहसास कोजी लें कि फ़िल्म उद्योग को निरंकुश होने से रोकने के लिए जब सेंसर बोर्ड कागठन किया गया था तब इस बोर्ड के प्रतिष्ठापकों की आँखों में सपना रहा होगाकि यह संस्था निष्पक्ष रहकर कार्य करेगी।

✍️ चिराग़ जैन

ख़बर का असर

जेब में दस का नोट लेकर भीखू छोले-कुल्चे के ठेले पर पहुँचा और बोला- “दस रुपये के छोले कुल्चे दे दो।”
ठेले वाला मुस्कुराकर बोला – “दस रुपये में छोले कुल्चे नहीं आते।”
भीखू उदास होकर पान की दुकान तक आया और टीवी पर चल रहा न्यूज़ बुलेटिन देखने लगा। पत्रकार बता रहा था कि भारत की विदेशमंत्री तीन दिन के दौरे पर जापान जा रहे हैं। ख़बर पढ़ते हुए समाचार वाचक के चेहरे पर जो ख़ुशी थी उससे भीखू को लगा कि अब शायद बात बन जाएगी। वह दौड़कर खोमचे पर पहुँचा और बोला – “लो भैया, विदेश मंत्री देश के विकास पर चर्चा करने जापान गई हैं, अब तो दस रुपये के छोले-कुल्चे आ जाएंगे?”
“अबे पगला गया है क्या?” …खोमचे वाला झल्ला उठा। …”उसके जापान जाने से मेरे ठेले का क्या लेना देना?”
भीखू अपना सा मुंह लिए वापस बुलेटिन देखने लगा। एक संवाददाता चीख-चीख कर उत्तेजना में बोल रहा था कि फलाने मंत्री के बयान पर विपक्ष ने दो दिन संसद का कामकाज नहीं होने दिया, लेकिन अभी-अभी ख़बर मिली है कि उस मंत्री ने अपने बयान पर खेद प्रकट कर दिया है और विपक्ष ने संसद चलने देने का आश्वासन दिया है।”
भीखू ख़ुश होकर फिर से ठेले तक पहुँचा और दुखी होते हुए फिर से वापस लौट आया।
बुलेटिन अभी भी चालू था। काफ़ी कुछ हुआ उस बुलेटिन में। एक नई फ़िल्म का ट्रेलर रिलीज़ हुआ; एक निजी चैनल के सर्वे से ये पता चला कि केंद्र सरकार की लोकप्रियता बढ़ रही है; यह भी पता चला कि रामायण युग की किष्किन्धा में आज भी सुग्रीव और बाली के सिंहासन सुरक्षित रखे हैं; एक अभिनेता को कोर्ट ने बरी भी कर दिया; एक समुदाय को सामूहिक रूप से अपना त्यौहार मनाने की इजाज़त भी मिल गई; एक विधायक ने रिजॉर्ट में प्राणायाम भी किया; एक संत को राममंदिर के शिलान्यास में शामिल होने का न्यौता भी मिल गया और एकाध अफ़सरों के तबादले भी हो गए।
इतना सब कुछ होने के बावजूद भीखू की जेब में पड़े दस के नोट की पहुँच में भूखा पेट भरने की जुगत न आ सकी। शाम हो गई। भूख ने भीखू की ऊर्जा पचा ली। अंतड़ियां सिकुड़ गईं। दिमाग़ थक गया।
छोले कुल्चे वाला अपना खोमचा समेट कर जा चुका था। भीखू ने सड़क किनारे पड़ा अख़बार का एक टुकड़ा उठाया और खा गया। मैंने उसे अख़बार चबाते देखा और पूछा – “क्यों भई, अख़बार में भी कोई स्वाद है क्या?”
भीखू अख़बार पर लिसड़ा हुआ मसाला दिखाते हुए बोला – “अख़बार तो बेस्वाद है भाईसाहब, लेकिन मसाले में मज़ा आ गया।”
जो अख़बार भीखू खा रहा था उसी के तीन दिन बाद के संस्करण में छोटा सा समाचार छपा था – “राजधानी दिल्ली के अमुक इलाके में एक चालीस-बयालीस वर्ष के विकलांग की लावारिस लाश मिली है। उसकी जेब में दस रुपये का एक नोट बरामद हुआ है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में इस शख़्स की मौत की वजह भूख बताई गई है।”
जब पुलिस भीखू का पंचनामा कर रही थी तब पनवाड़ी की दुकान पर रखे टीवी पर समाचार चल रहा था कि विदेश मंत्री ने जापान के साथ अनेक महत्वपूर्ण डील्स पर हस्ताक्षर किये।

✍️ चिराग़ जैन

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