Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
कुछ पुरानी बहसें देख रहा था यूट्यूब पर। चुनावी माहौल में मुँह में तिनके दबाये कई भेड़िये रंगे सियारों के समर्थन से स्वयं को महान सिद्ध करते नज़र आये। “जनता”, “लोकतंत्र”, “ईमानदारी”, “राष्ट्रहित”, “जनसेवा” और “भारत माता” जैसे शब्दों को बोलकर अपना वाक्युद्ध जीतने पर जब वे कुटिल मुस्कान मुस्काते थे तो ऐसा जान पड़ता था कि जिस्म का धंधा करने वाली कोई त्रिया, सावित्री और अनुसूया से अपनी तुलना कर पावनता के मुख पर तमाचे मार रही हो।
मैं लोगों के मुख पर मुस्कान पिरोने वाला एक अदना सा कलाकार हूँ। सामान्य स्थितियों से हास्य जुटाना मेरा काम है। शब्दजाल बुनना और वाक्पटुता से सम्मोहन करने की कला मुझे और मेरे सहकर्मियों को माँ सरस्वती ने जन्म के समय सौगात में दे दी थी। ऐसे में किसी प्रकार की लच्छेदारी में से झाँक रही रंगदारी को पहचानना मेरे लिये कठिन कार्य न था।
हर चैनल की हर बहस में अनवरत एक-दूसरे की कुत्ता-फजीहत और खिखियाती हँसी का जब बहावानुवाद किया तो ये स्वर सुनाई पड़े- “तुम सब मूर्ख हो सालो! हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे। हम ऐसे ही चैनलों पर टाइम पास करके चले जायेंगे और तुम अपने-अपने टीवी के सामने बैठे ये देखकर ख़ुश होते रहना कि फ़लां ने फ़लां को बढ़िया जवाब दे दिया। ये न्यूज़ चैनल भी हमारे ही चमचे हैं।”
वे जानते हैं कि हम इस बात से कोई सरोकार नहीं रखते कि जिन सवालों के जवाब इन बहसों में तलाशने का ढोंग किया जा रहा है, वे दरअसल हमारे हैं ही नहीं। वे ये भी जानते हैं कि इन बहसों को जनता ऐसे ही सुनती है जैसे बालिका वधु देख रही हो। सास-बहू पर विज्ञापन आ गये तो एनडीटीवी लगा लिया, थोड़ा मज़ा रवीश का ले लिया, फिर वहाँ विज्ञापन आये तो डिस्कवरी लगा लिया, तेंदुए और तेंदुई का संभोग देख लिया, वहाँ से कहीं और, और वहाँ से कहीं और।
हम रिमोट पर उंगलियाँ टिकाये लगातार अपने आप को बेवक़ूफ़ बनाये जा रहे हैं। हर पार्टी के अपने स्पोक्सपर्सन हैं, ये वो लोग हैं जो बहस बहुत अच्छी कर लेते हैं। ये वो टेस्ट खिलाड़ी हैं जो हारे हुए मैच को ड्रॉ की ओर ले जाने का हुनर जानते हैं। ये वो लोग हैं जो बहुत कम, य बहुत ज़्यादा बोल कर बहस का टाइम पास करना जानते हैं। ये वो लोग हैं जिनके किसी भी बयान को “उनकी निजी सोच” बताकर पार्टी अपना पल्ला झाड़ सकती है। यदि देश सेवा का हित है तो प्रवक्ताओं की क्या ज़रूरत? (मेरी इस बात पर कुछ लोग मेरा राजनैतिक बचकानापन कहकर खिल्ली उड़ासकते हैं) लेकिन उनको मैं पहले ही बता दूँ कि संगीन राजनैतिक अपराधों के इस दौर में राजनीति इसी बात का लाभ उठा रही है कि उन्होंने जनता को आपस में लड़ना सिखा दिया है।
किसी ने कोई बयान दे दिया, किसी ने उसका खंडन कर दिया, किसी ने स्याही फेंक दी, किसी ने चप्पल फेंक दी… हम देश की राजधानी में जीवन यापन कर रहे हैं। राजनीति जहाँ श्वास लेती है उस वातावरण से हम भी सिंचित हो रहे हैं। देश भर को प्रभावित करने वाली बौद्धिक तरंगें जब उद्घटित होती हैं तो सर्वप्रथम हमसे टकराती हैं। जब इस दौर से इतिहास प्रश्न करने खड़ा होगा तो उस समय दिल्ली की आम जनता से भी यह पूछा जायेगा कि तुमने क्यों इन सपोलियों को अपने आस-पास पनपने दिया। मैं जानता हूँ कि आप कहेंगे कि हम क्या कर सकते हैं? प्रश्न ये नहीं है कि हम क्या कर सकते हैं; प्रश्न ये है कि हमारी कुछ करने की इच्छाशक्ति कहाँ चली गयी।
चुनाव हो चुका है, 4 दिसम्बर से पहले मैं ये बातें करता तो लोग इसमें किसी पार्टी की महक ढूंढने लगते। इंदिराजी ने सबसे पहले मीडीया की ताक़त को समझा और आपातकाल के दौरान सर्वप्रथम मीडिया को पंगु बना दिया गया। सरकारी मीडिया आज तक उन सरकारी इंगितों का उल्लंघन करने का साहस नहीं जुटा पाया। तब से आज तक टीवी हमें बेवक़ूफ़ बनाता जा रहा है। अब तो राजनैतिक पार्टियों ने बाक़ायदा मीडिया प्रबंधन के लिये प्रकोष्ठ बना दिये हैं। साइबर मैनेजमेंट के लिये कार्यालय खोल दिये हैं। ठीक चुनाव के दिन जबकि चुनाव प्रचार बंद हो चुका है, सुबह-सुबह आपके घर पर एक अख़बार आता है और उसका मुखप्पृष्ठ एक पार्टी विशेष का विज्ञापन कर रहा होता है।
मैं ये नहीं कहता कि इन सब बातों को पढ़कर क्रांति की मशाल उठा लो। इस दौर में क्रांति के लिये घर-बार फूँकना कदाचित् कठिन न हो, लेकिन एक काम तो हम कर ही सकते हैं कि जब इस प्रकार के ढोंगी चैनलों पर राजनेताओं को बिठाकर एक-एक घंटे के बुलेटिन बनाये जा रहे हों तो उस वक़्त अपना चैनल बदल दो। जिस टीआरपी के दम पर ये लोग हमको बेचे जा रहे हैं, उसी टीआरपी को अपनी ताक़त बनाओ। जब इस तरह की बहसों की टीआरपी घटेगी तो कम से कम इन चैनल्स से मिलने वाली फ़ुटेज के दम पर राजनीति करने वाले लोग तो कम होंगे।
किसने क्या बयान दिया, या दिल्ली में किसकी सरकार आयेगी इस पर किस नेता की क्या राय है… इस प्रकार की बहसों से अगर हमने चैनल बदलना सीख लिया तो कम से कम लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की दरारों को भरने में हम कुछ कर सकेंगे।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
दिल्ली विश्वविद्यालय में नये पाठ्यक्रम लागू हो गये हैं। चार साल वाला। कल स्नातक स्तर की हिंदी की पाठ्य पुस्तक से मुठभेड़ हो गयी। कहने लगी मैं साहित्य की पुस्तक हूँ। सुनकर मेरे भीतर के साहित्यिक ने कनखियों से एकाध पृष्ठ उघाड़ दिये। ये इत्तेफ़ाक़ ही था कि जो पृष्ठ खुला उस पर शाहरुख़ ख़ान का चित्र था, रा-वन वाला। मेरे साहित्यकार को कुछ शंका सी हुई। अगला पृष्ठ खोला, तो वो बोला- बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी तो सीधी-सादी लड़की शराबी हो गयी। …मैंने चारों तरफ़ नज़र घुमाई, शायद कहीं तारांकित लिखा हो- ‘शराब पीना सेहत के लिये हानिकारक है, इस पुस्तक में सम्मिलित कोई भी कवि शराब का सेवन या उसका प्रचार नहीं करता।’ …लेकिन अफ़सोस ऐसा कुछ नहीं दिखा। मेरा साहित्यकार आगे बढ़ा -‘जींस पहन के जो मैंने मारे ठुमके, तो लट्टू पड़ोसन की भाभी हो गयी। साहित्यकार कल्पना के कक्ष में खो गया। एक प्रोफ़ेसर काले गॉगल्स लगाये, मिनि स्कर्ट और शॉर्ट टॉप पहनकर ईअरफोन कान में लगाये विवेकानंद स्टेच्यू के आगे से गुज़रते हुए हिंदी विभाग में प्रवेश करती है।
40 लड़कों की कक्षा में प्रवेश करते ही हर विद्यार्थी से कड़ाई से पूछती है, आप में से जिसके पड़ोस में कोई पड़ोसन न हो बाहर हो जाओ। 10 लड़के बाहर चले जाते हैं। फिर पूछती है जिसकी पड़ोसन की भाभी न हो वो बाहर चला जाये। 20 विद्यार्थी फिर बाहर चले गये। 10 शेष बचे। अध्यापिका ने प्रत्येक छात्र से पड़ोसन के अंगोपांग की जानकारियां जुटानी शुरू ही की थी कि टोकने की आदत से मजबूर एक विद्यार्थी ने प्रश्न किया- मैडम ये बलम पिचकारी क्या होती है। मैडम ने साहित्य के सम्मान के लिये तुरंत बलम और पिचकारी के मध्य अल्पविराम लगाया। घर जाकर अध्यापिका अल्पविराम को राखी बांधेगी। यदि अल्पविराम समय पर न आता तो वह छात्र समास रूपी दुश्शासन का प्रयोग कर अध्यापिका का चीर, कोष्ठक में मिनी स्कर्ट, हरण कर लेता।
अभी एक संकट टला ही था कि दूसरा प्रश्न आ गया, मैडम प्रस्तुत पाठ में पड़ोसन की भाभी ही लट्टू क्यों हो रही है, पड़ोसन क्यों नहीं। क्या कवि अपनी प्रेयसी की भाभी पर फ्लैट है? क्या कवि शादीशुदा महिलाओं पर अधिक रीझता है।
अध्यापिका प्रश्न का उत्तर तलाशती इससे पूर्व ही एक और प्रश्न उछला- मैडम, यदि यह कविता किसी कवयित्री द्वारा रचित है तो इसमें लट्टू होने का कर्म पड़ोसन के भैया को करना चाहिये, भाभी को नहीं। और अगर ये कविता कोई कवि लिख रहा है तो बलम की पिचकारी से आहत होकर वह उन्मादी क्यों हुआ जाता है। क्या यह कविता समलैंगिकता का समर्थन करती है?
कक्षा के प्रश्नों से घबराकर अध्यापिका कक्षा से और साहित्यकार कल्पना से बाहर आ गये। पलटते-पलटते एक पृष्ठ पर तुलसी, कबीर दिखाई दिये। आरक्षित से। उपेक्षित से। साहित्यकार ने क्षोभ में भरकर कहा- ये पुस्तक साहित्य की नहीं है। पुस्तक ने इतराते हुए प्रेमचंद का निबंध दिखाया… चुप रहो। इसमें प्रेमचंद हैं, जो प्रेमचंद के साथ छप गया, वो सब साहित्य है।
जाओ अपना रास्ता नापो। मत मानो मुझे साहित्य। छात्र तो मानेंगे ही, 75 में से 55 नम्बर मास्टर की दया पर मिलेंगे। नहीं मानेंगे तो फैल करवा दूंगी चारों सालों कू!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Prose, Quotation, Unpublished
पुरखों ने उदाहरण प्रस्तुत किया कि युद्ध के माहौल में भी धर्म की चर्चा की जा सकती है, हमने उदाहरण प्रस्तुत किया कि धर्म की चर्चा में भी युद्ध किये जा सकते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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फेसबुक की सूर्यरेखा अहर्निश गहराती जा रही है। लोगों के जीवन में फेसबुक ने इतना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है कि कुछ लोगों ने तो हर श्वास और हर उच्छ्वास की सूचना देना शुरू कर दिया है।
बहुत जल्द ही ईश्वर भी मनुष्य के जीवन की अवधि मापने के लिए श्वास, वर्ष अथवा ऋतुओं जैसी पुरातन इकाइयों के स्थान पर फेसबुक लाइक्स की गणना करेगा। फिर ये चार दिन की ज़िंदगानी सौ लाइक्स की ज़िन्दगी बन जाएगी। धर्मगुरु प्रवचनों में कहेंगे कि ईश्वर ने इस फेसबुक स्टेटस अपडेट करने के लिए ये ज़िन्दगी दी है, ऑफ़लाइन रहकर इस अनमोल जीवन को नष्ट न करो। धर्मशास्त्रों में लिखा जाएगा कि जो प्राणी दूसरों के स्टेटस पर लाइकदान नहीं करेगा उसे अगले जन्म में फेसबुक पर लॉगिन करने की सुविधा नहीं मिलेगी। दान तब भी चार प्रकार का ही रहेगा- लाइकदान, कमेंट दान, स्माइली दान और शेयर दान।
गूगलदृष्टा ऋषि हमें बताएंगे कि जो प्राणी दूसरों की अपडेट को लगातार इग्नोर करता है, उसे टैगिंग जैसे महान कष्ट को भोगना पड़ेगा। इस ख्याति से आकृष्ट हो देवतागण भी फेसबुक आई डी बना लेंगे। उदाहरण के लिए सूर्यदेव की फेसबुक प्रोफाइल पर रोज सुबह अपडेट होगा – ‘राइज़िंग फ्राॅम द ईस्ट’। इस स्टेटस के साथ सूर्यदेव अख़बार के ‘सूर्योदय समय’ की फोटो डालेंगे। चिड़िया इस स्टेटस पर ‘चीं-चीं’ कमेंट करेंगी। फूल इसके नीचे स्माइली पोस्ट करके लिखेंगे ‘खिल रहे हैं।’ दोपहर में सूर्यदेव फिर स्टेटस डालेंगे – ‘फीलिंग हॉट’। उसके नीचे पसीने का कमेंट होगा- ‘बह रहा हूँ।’
कुत्तों को रात में चिल्लाना नहीं पड़ेगा, वे आधी रात को ‘क्राइंग’ की स्माइली पोस्ट करके आराम से सो जाएंगे। चैकीदार हर एक घंटे बाद लिख देंगे- ‘जागते रहो।’ चोर उस स्टेटस को पढ़कर सावधानी पूर्वक चोरी का स्टेटस डालेंगे।
सब कुछ कितना आसान हो जाएगा। हिन्दू मुस्लिम दंगे ट्विटर-फेसबुक दंगों में तब्दील हो जाएंगे। किसी बात पर चार ट्विटरिये चार फेसबुकियों की प्रोफाइल पर पोर्न पोस्ट कर देंगे। इसके जवाब में फेसबुकिये ट्विटरियों की प्रोफाइल पर वायरस छोड़ देंगे। भयंकर दंगा होगा। ख़ूनख़राबे की जगह ब्लॉक-बवेला होने लगेगा।
सूर्य रोज़ निकलेगा लेकिन फेसबुक पर। हवा बहेगी लेकिन फेसबुक पर। चांद उगेगा लेकिन फेसबुक पर। फूल खिलेंगे लेकिन फेसबुक पर। बच्चा पैदा भी फेसबुक पर होगा, वह अपनी पहली किलकारी गले से नहीं कीबोर्ड से लिखेगा। वो रोज़ स्कूल जाने का स्टेटस डालेगा। फेसबुक पर ही शादी, वहीं बच्चे, वहीं बुढ़ापा और वहीं मौत। फेसबुक पर ही शव यात्रा होगी और वहीं दाह संस्कार।
कोई यूजर ट्विटर की प्रोफाइल डिलीट करके फेसबुक पर साइन अप करेगा तो उसे पुनर्जन्म कहा जाएगा। प्राणी इस चक्र से छुटकारा पाने के लिए धर्म की शरण में जाएगा तो धर्म उसे बताएगा कि ‘ये सब सोशल साइट्स मिथ्या हैं, इनसे मोह न रखो। इनमें तुम्हारा समय और जीवन नष्ट हो जाएगा। हमारी एप्प डाउनलोड करो। वहां अनेक यूजर्स हैं जो इन सब चक्करों से मुक्त हो अपने नेटपैक को धर्म पर व्यय कर रहे हैं। जल्दी साइन अप करो प्राणी। तुम्हारा कल्याण होगा।’
✍️ चिराग़ जैन
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बजट का मौसम आ गया है। बजट एक वार्षिक कार्यक्रम है, वार्षिक इसलिये कि यह हर वर्ष बनाया जाता है। और कार्यक्रम इसलिये कि इसके सभी कार्य एक क्रम में होते हैं। देश में एक रेलमंत्री होता है, जो मंत्री बनने के बाद रेल से यात्रा करना अमूमन छोड़ देता है, इसलिये जब कभी वह रेल से सफ़र करता है तो उसकी तस्वीर अख़बार में प्रकाशित की जाती है। अक्सर यह तस्वीर रेल से उतरते हुए खींची जाती है। इस तस्वीर को देखकर देश समझ लेता है कि जब वे रेल से उतर रहे हैं तो रेल में चढ़े भी ज़रूर होंगे। हालाँकि चढ़ने के लिये उतरना और उतरने के लिये चढ़ना कतई ज़रूरी नहीं है। जैसे रेल के किराये। इनका उतरते हुए चित्र कभी नहीं खींचा गया।
ख़ैर, हम बजट के कार्य के क्रम की बात के सफ़र पर थे, लेकिन बीच में जं़ंजीर खींच कर फालतू जंक्शन पर टहलने लग गए थे। आइये वापस ट्रेन में सवार होते हैं। तो जी एक रेलमंत्री नाम का आदमी देश में होता है, वो आम बजट से पहले रेल का ख़ास बजट लेकर संसद नामक स्थान पर जाता है। यह ठीक ऐसा होता है जैसे मिनिस्टर की मर्सिडीज़ के आगे बुलैरो में सिक्योरिटी वाले चलते हैं, मरेंगे तो वो मरेंगे और वित्तमंत्री नामक मर्सिडीज़ बच जाएगी।
जब ये रेलमंत्री नाम का व्यक्ति रेल बजट नाम का एक दस्तावेज़ लेकर संसद नामक स्थान पर जैसे ही पहुँचता है तो संसद में कार्रवाई नामक कोई चीज़ शुरू हो जाती है। इस कार्रवाई नामक चीज़ को सुचारु रूप से चलाने के लिये ज़रूरी होता है कि रेलमंत्री धीमे स्वर में बजट बोलना शुरू करते रहें, पक्ष वाले लोग मुस्कुराते हुए बैठे रहें, विपक्ष वाले विरोध करते रहें और लगे हाथ संसद के फ़र्नीचर की गुणवत्ता भी ठोक-बजा कर परखते रहें। अध्यक्ष शोर मचाने वालों को मुस्कुराते हुए डाँटते रहें और विपक्ष वाले मुस्कुराते हुए डँटते रहें।
दिन भर में कई बार इस क्रिया को दोहराने के बाद जब विपक्ष इस बात से आश्वस्त हो जाता है कि अंग्रेजों के ज़माने में भी फ़र्नीचर की क्वालिटी को लेकर कोई समझौता नहीं किया जाता था, और अध्यक्ष इस बात से आश्वस्त हो जाते हैं कि उनके जुमलों का समुचित रियाज़ द्रुतविलंबित से तीव्र तक हर प्रकार से हो चुका है तब सब मुस्कुराते हुए सदन से बाहर आ जाते हैं और बजट नामक मसौदा पास हो चुका होता है।
इसके बाद विपक्ष क्रम से इसको जन-विरोधी बजट बताते हुए सरकार को धिक्कारता है, सरकार विपक्ष की हरक़त को नासमझी बताते हुए विपक्ष को फटकारती है। मीडिया रात के प्राइम टाइम में वेल्ले लोगों के साथ बैठ कर बजट पर चर्चा करता है, जिसका अमूमन यही परिणाम निकलता है कि कोई परिणाम नहीं निकलता।
इस बार रेलमंत्री ने किराए नहीं बढ़ाए, क्योंकि किराए तो बजट से पहले ही बढ़ा दिए थे, लेकिन सरचार्ज बढ़ा दिए, क्योंकि सरचार्ज बजट से पहले नहीं बढ़ाए गए थे। रेलमंत्री ने फ़्यूल चार्ज बढ़ा दिया है क्योंकि डीजल महंगा हो रहा है। अब वित्तमंत्री डीजल के रेट बढ़ा देंगे क्योंकि रेल का किराया महंगा हो रहा है। जनता एक बार वित्तमंत्री की ओर देखती है, फिर रेलमंत्री की ओर। बार बार ऐसा करने के कारण जनता की गर्दन दर्द करने लगती है और उसमें झटका आ जाता है। जनता बजट का पंगा छोड़ कर बाम ढूंढने चली जाती है। बाम वाला बताता है कि वित्तमंत्री ने बजट में जिन चीज़ों के दाम बढ़ाए हैं, उनमें बाम भी शामिल है। सुनकर जनता बिना बाम लगाए योगा करने लगती है। योगा करते देख उसको बाबा रामदेव पकड़ लेते हैं। वहाँ से भागती जनता छुपती फिरती है, क्योंकि इस देश की जनता को बोलना तो सिखाया जाता है, लेकिन ये नहीं बताया जाता कि कब बोलना है। हम प्रतीक्षारत हैं कि कभी तो कोई बताएगा कि अब बोलो। इसी प्रतीक्षा में इसी प्रकार बजट बनते रहेंगे और हम बिना बाम लगाए चोरी-चोरी चुपके-चुपके योगा करके ख़ुश होते रहेंगे कि हमने बाबा रामदेव को बेवकूफ़ बना दिया।
✍️ चिराग़ जैन
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प्रश्न ये उठा है कि सीएजी क्या केवल ऑडिटर ही है? प्रश्न सुनकर देश भर में हंगामा खड़ा हो गया। कांग्रेस विनोद राय के विरोध में बयान देने लगी और विपक्ष कांग्रेस के विरोध में। सूचना प्रसारण मंत्री ने राय साहब की राय सुनकर अपनी राय दी। उन्होंने कहा कि आप विदेश में जाकर ऐसी बात मत कहिये। ऐसा लगा कि वे कह रहे हों कि चूंकि आप सरकारी आदमी हैं, इसलिये विदेश में जाकर सरकार को चोर मत कहो। यदि ऐसा कहना बहुत आवश्यक हो तो दिल्ली आकर कहो, मुम्बई में कहो, गोआ में कहो …पूरा देश पड़ा है। यहाँ हमें कोई चोर कहे तो चलेगा, लेकिन विदेश में ऐसा कहना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
उधर दिग्विजय जी ने विनोद राय साहब से उल्टा सवाल कर लिया- ‘अरे भाई! तुम ऑडिटर हो तो ऑडिट ही करोगे, और क्या प्राइम मिनिस्टर बनोगे?’ अरे बाप रे! ये क्या कह बैठे दिग्विजय जी। प्राइम मिनिस्टर बनने के लिये तो चुप रहना होता है, बोलने वाला आदमी प्राइम मिनिस्टर कैसे बन सकता है।
बहरहाल, मुझे लगता है कि राय साहब के सवाल को ये देश समझ ही नहीं पाया। वे शायद पूछ रहे हों कि इस देश में जिसको प्रधानमंत्री बनाया जाता है, वो केंद्र से देश को खाना शुरू करता है। जिसको कॉमनवेल्थ की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है, वो खेल के बहाने खाता है। जो जहाँ का ज़िम्मेदार है वो वहाँ ज़िम्मेदारी से सफ़ाई कर रहा है। कोयला मंत्री कोयला साफ़ कर गए, कानून मंत्री कानून चाट गये। एचआरडी वाले जनाब यूनिवर्सिटी की खा रहे हैं। जिसको जो स्थान दिया गया है, वो उस स्थान को चाटने में लगा है। जिसको चाटने के लिये कोई उपयुक्त स्थान नहीं दिया गया है वो लोगों के तलवे चाट रहा है।
ऐसे में बेचारे सीएजी क्या यही देखते रहेंगे कि किसने कैसे, कितना और क्या चाटा? क्या उनके भाग्य में चाटने का मौक़ा कभी नहीं आयेगा। वे दरअस्ल यही पूछना चाह रहे हैं कि क्या सीएजी का काम ‘केवल’ ऑडिट करना है?
सरकार को चाहिये कि उनकी उम्र का लिहाज करते हुए उनके लिये भी कोई स्थान निश्चित करे, जहाँ वे जम कर चाट सकें। ऑडिट-वॉडिट का क्या है, वो तो हमेशा ही फ़ाइलों में धूल चाटता रहेगा।
✍️ चिराग़ जैन