Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
यद्यपि उन गद्यांशों में मेरी कभी बहुत रुचि नहीं रही तथापि उनको सुनना मेरी विवशता है क्योंकि उनके वाचक मेरे पिताजी हैं, जो स्वयं को पूज्य बनाने की जुगत में समय की सूक्ष्मतम इकाई में भी मुझे प्रवचन पेलने से नहीं चूकते। गत 32 वर्ष में से प्रारम्भ के 4-5 वर्ष छोड़कर; जिनमें परमपिता परमात्मा की असीम अनुकम्पा से मुझे कुछ समझ नहीं आने की नैसर्गिक सुविधा प्राप्त थी; मैं यही समझने की कोशिश में लगा रहा हूँ कि आख़िर मुझ निर्दोष अर्जुन को अलग से बुलाकर बिना किसी कारण अष्टादश अध्यायी सुनाने का सिलसिला कब तक चलता रहेगा!
ये बातें मैं इतनी बार सुन चुका हूँ कि अब जब कभी इनकी पुनरावृत्ति होती है तो मैं उनका साहित्यिक और वैयाकरणिक अन्वेषण करने लगता हूँ। इस अन्वेषण के दौरान मुझे ज्ञात हुआ कि पिताजी की भाषा आश्चर्यजनक रूप से अलंकृत है।
बचपन में दो रुपये का नोट भी जब वे ये कहते हुए देते थे कि संभाल के रखियो कहीं खामाखा खो-खा न जाए; तब ख वर्ण की पुनरावृत्ति से अनुप्रास की छटा देखते ही बनती थी। कई बार तो मैं अनुप्रास की छटा देख ही रहा होता था कि पिताजी दो रूपये देने के अपने इरादे को पीठ दिखा देते थे।
दादाजी के खाना खाने बैठते समय दही लेने निकालना और आधी रोटी ख़त्म होने से पहले दही ले आने की घटना वे इतनी बार सुना चुके हैं कि पुनरूक्ति प्रकाश अलंकार का उदाहरण प्रस्तुत हो गया है। बाद में इसी घटना में दही वाले की दुकान को घर से डेढ़ किलोमीटर दूर बताकर वे लगे हाथ अतिशयोक्ति अलंकार भी चिपका देते हैं।
अकेले “नहीं” शब्द को वे इतने अलग-अलग बलाघात के साथ उच्चार लेते हैं कि यमक और श्लेष दोनों के अश्व उनके इस एक शब्द के अस्तबल में घास चरते बंधे रहते हैं। शब्द की प्रयोजनीयता का उनकी भाषा में ऐसा श्रेष्ठ उदाहरण मिलता है कि रसख़ान और कालिदास की रचनाएँ भी उकड़ू बैठ कर पिताजी का भाषाई कौशल देखती रह जाती हैं। मेरे घर में प्रवेश करते ही वे तीन शब्दों के एक युग्म का प्रयोग करते हैं। इस वाक्यांश से मुझे अनायास ही यह समझ आ जाता है कि आज डिनर करते समय कौन से उपनिषद का पाठ होगा।
“कहाँ गया था” या “घड़ी देखियो ज़रा”; इस प्रकार के वाक्यांश का अर्थ है कि स्थिति सामान्य है और भोजन के समय छुटपुट नीतिशतक से अधिक और कुछ नहीं सुनने को मिलेगा।
“आ गए हुज़ूर” अर्थात् मेरे अवतरण से कुछ पल पूर्व तक माँ के साथ मेरे भविष्य की चिंता को लेकर गरज के साथ छींटे पड़ चुके हैं और मुझे भोजन के समय श्रीमद्भागवत गीता का कर्मयोग सिखाया जायेगा जिसे स्थितप्रज्ञ होकर सह लेने में ही मेरा कल्याण है।
“आ जा बेटा” अथवा “लो आ गया” सुनते ही मैं समझ जाता हूँ कि आज गरुड़ पुराण से कम में पीछा नहीं छूटना। सही समय पर सही शब्द बरतने का यह कौशल उनकी भाषा को अन्य लोगों के पिताजियों की भाषा से विलग करता है। “हमने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये हैं” और “हम उड़ते पंछी के पर गिन लेते हैं” जैसे वाक्यों का प्रयोग कर वे सिद्ध करते हैं कि उनकी भाषा में मुहावरे और लोकोक्तियाँ सहज ही उतर आती हैं।
अपनी अभिव्यक्ति को अधिक समर्थ बनाने के लिए मेरे पिताजी संस्कृत के वैयाकरणिक सिद्धांतों का विलोमानुकरण करने में भी सिद्धहस्त हैं। जब वे मुझे संबोधित करते हुए मध्यम पुरुष एकवचन का हिंदी में प्रयोग करते हुए “तू/तेरा” आदि शब्द प्रयोग करते हैं तो वास्तव में मैं यथोचित सम्मान पा रहा होता हूँ किन्तु जैसे ही मेरे प्रति उनके सम्बोधन मध्यम पुरुष द्विवचन पर पहुँच कर “तुम/आप” आदि हो जाते हैं तो मेरे अपमान के प्रतिमान खड़े हो जाते हैं।
पिताजी के इस भाषाई कौशल में मेरी भंगिमा सदैव अवाक् और मेरे कंठ में घुँटा हुआ शब्द संस्कृत के सम्बोधन कारक का हिंदी अनुवाद ही होता है। लेकिन करत-करत अभ्यास के मेरी जड़मति इतनी सुजान अवश्य हो गई है कि जब वे पाणिनी होकर फलम् फले फलानि जपने लगते हैं तो मैं वरदराज बनकर अपने अंगूठे से फर्श की सिल पर पड़े निशान देखता रहता हूँ।
✍️ चिराग़ जैन
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देश में डिग्रियों का बोलबाला है। कोई प्रधानमंत्री से डिग्री मांग रहा है तो कोई डिग्री से प्रधानमंत्री। ऐसे में मैं स्पष्ट कर दूँ कि डिग्री देखने की ललक छोड़ कर काम की क्षमता पर ध्यान दो।
प्रोडक्टिविटी और केपेसिटी हो तो डॉक्टरेट की डिग्रियाँ पांचवी फेल डिग्रीलेस को सलाम बजाती हैं। अंगूठा छाप मिनिस्टर हो गए और प्रशासनिक सेवा परीक्षा का अव्वल छात्र उनका सचिव। सर्वाधिक पढ़े लिखे प्रधानमंत्री का अध्यादेश एक मंदबुद्धि बालक फाड़ देता है और कोई कुछ नहीं कर पाता।
दंतकथाओं पर विश्वास करें तो कालिदास से अधिक विद्वान् ‘विलोम’ भाग्यहीन रह गया और विद्योत्तमा का मूढ़ पति युग का महाकवि हो गया। राजनीति में कुछ ऐसे भी हैं जो अपनी असली डिग्री दिखा दें तो विश्वविद्यालय और शिक्षानीति दोनों की क्षमताएँ कठघरे में आ जाएंगी।
जिन गुणों से व्यक्ति महान बनता है उनकी शिक्षा डिग्रियों में नहीं लिखी होती। विजय जी माल्या को कला की कक्षा में नहीं पढ़ाया गया था कि कन्याओं के कितने कपडे उतरवाकर गले में हाथ डालोगे तो फोटो अच्छी आएगी। न ही उन्हें विज्ञान के अध्यापक ने बताया था कि बैंकों के पैसे में विटामिन होते हैं। और तो और फिज़िकल एजुकेशन में भी उन्हें यह पाठ नहीं पढ़ाया गया था कि संकट की स्थिति में किस देश की ओर दौड़ना उचित होगा। …फिर भी माल्या साहब महान बने कि नहीं।
श्री मान केजरीवाल जी से ही पूछ लेते हैं कि उन्होंने अन्ना जी को अधन्ना बनाकर खुद हज़ारी हो जाने का कौशल किस स्कूल में सीखा था? अपने गले में मफलर बाँध कर भाजपा और कांग्रेस का गला घोंटने का पाठ NCERT की किस पुस्तक में शामिल था। अपनी कमीज़ बाहर निकाल कर बाकियों को विधानसभा से बाहर निकालना किस अभ्यास पुस्तिका में लिखा था। फिर भी केजरीवाल जी महान बने कि नहीं।
मोदी जी की विश्वविद्यालय की डिग्री देख कर भी क्या कर लोगे। जो पढ़कर डिग्री हासिल की वो उन्होंने कभी किया ही नहीं। बचपन से पढ़ते आए थे कि बड़े-बुज़ुर्गों का सम्मान करो, उन्होंने किया क्या? बचपन से पढ़ते आए कि ‘अपना घर छोड़ कहीं और न जाया जाए’; वे माने क्या? बचपन से पढ़ते आए कि ‘तोल-मोल कर बोल’ …किस किस चीज़ की डिग्री देखोगे?
सन्नी द्योल ने दामिनी फ़िल्म में एक डायलॉग बोला था। उसी अंदाज़ में समझ लो – “सिसोदिया समझा इसे, काग़ज़ पर छपी हुई ये डिग्रियाँ जमुनापार में बहुत मिलती हैं, लेकिन इनसे कुर्सी पाने का जो मुक़द्दर है ना, वो दुनिया के किसी स्कूल में नहीं मिलता; नेहरू-गांधी खानदान उसे लेकर पैदा होता है। पुलिस की थर्ड डिग्री जब दिखती है ना, तो आदमी बोलता नाहीं …बोल जाता है।”
✍️ चिराग़ जैन
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दिल्ली के ऑटो-टैक्सी वालों ने सरकार को बताया है कि हम जो सदियों से जनता को लूटते रहे हैं, मीटर से चलने से इनकार करते रहे हैं, तीन-चार गुना से लेकर दस-बारह गुना तक किराया मांगते रहे हैं, मीटर से चलने की मांग करने वालों को गाली बकते रहे हैं, पुलिस का डर दिखाने वालों की खिल्ली उड़ाते रहे हैं; ये सारी परंपराएं ओला और ऊबर जैसे आधुनिक और पाश्चात्य सभ्यता से प्रेरित ऑपरेटर्स ने बंद करवा दी हैं। जो आम आदमी ऑटो तक को हाथ देने से डरता था वो अब झटाक से ऊबर-ओला कैब बुलाने लगा है। इनके कारण हमें नदिरेस्टे, पुदिरेस्टे, हनिमुरेस्टे और हवाई अड्डे पर थके हारे मुसाफिरों से मनमानी करने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। इस पाश्चात्य सेवा ने हमारी पुरातन परम्पराओं पर ताला डाल दिया है। हमारी खड़-खड़ करती नॉन एसी गाड़ियों के काले पीले रंग को चमचमाती नई एसी गाड़ियों ने कहीं का नहीं छोड़ा। जनता को लूट कर हम रोज़ शाम महफ़िल जमाते थे लेकिन अब दो वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही।
इस वेल मैनेज्ड सर्विस को तुरंत बंद नहीं किया गया तो हम हड़ताल कर देंगे।
सरकार बोली- लेकिन तुम तो बोल रहे हो कि तुम्हारे धंधे पर आलरेडी ताला पड़ गया है, फिर उसी कुंडे में हड़ताल वाला ताला कैसे डाला जा सकता है।
सुनकर यूनियन वाले रोने लगे। बोले सरकार आप इन सेवाओं को बंद करवा दो तो हम कानून का पालन करने को तैयार हैं।
सरकार बोली- लेकिन कानून तो पहले भी था जिसे तुम धड़ल्ले से चीथड़े करते रहे हो।
यूनियन बोली- तो आप जनता को कोई हेल्पलाइन दे दीजिये जिस पर हमारी मनमानी की कंप्लेंट की जा सके।
सरकार बोली- उस पर कंप्लेंट करने वालों को तुम पीटने लगते हो।
यूनियन बोली- अब नहीं पीटेंगे माई बाप।
सरकार फिर बोली- अगर तुम ईमानदारी से चलो तो तुम वैसे ही उबर ओला को पछाड़ दोगे, फिर इन्हें बंद क्यों किया जाए।
अब यूनियन वाले हँसते हुए बोले- हुकुम, आप तो जानते ही हो सवारी देखकर थोड़े पैसे कमाने का लालच जाग जाता है, आखिर हमारे भी बाल बच्चे हैं।
बाल बच्चों की बात पर सरकार भावुक हो गई। बोली चलो कल से उबर ओला की धरपकड़ शुरू करवा देंगे। तुम अपनी पुरानी टैक्सियों के मीटर की ओइलिंग करवा लो।
यूनियन वाले ख़ुशी ख़ुशी सचिवालय से बाहर आए। बाहर आते ही उस ओला को हिक़ारत से देखा जिस में बैठ कर सचिवालय आए थे। फिर एक कपडा निकाला और अपनी गाड़ी की धूल ओला की गाडी पर उड़ाते हुए जनपथ को रौंदते हुए दौड़ गए। ओला की गाडी फुटपाथ पर चिलम फूंकते “जनहित” नामक नागा के बराबर में खडी होकर अपना कलेजा जलाने लगी।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
सफलता के पथ पर एक प्रेत रहता है, जिसका नाम है अवसाद। इसकी पकड़ बहुत मज़बूत है। मुस्कुराहटों और खिलखिलाहटों की महफ़िल से छिटक कर अचानक एकाकी हो गए लोगों पर यह सामने से हमला करता है।
सफलता के पथ का पथिक जब व्यावसायिक सफलता और व्यक्तिगत चुनौतियों के बीच झूल रहा होता है तब न जाने किस बिंदु पर यह प्रेत उसे ऐसा अड़ंगा देता है कि यदि संभला न जाए तो प्राण संकट में पड़ जाएं। इसी बिंदु पर अक्सर मृत्यु के कष्ट, जीवन की चुनौती से सरल जान पड़ते होंगे। इसी आयाम पर मर जाना, जी लेने से सहज लगता होगा। यहीं आकर जिजीविषा के अस्त्र हताशा के पाश से परास्त हो जाते होंगे।
सृजन और कला से विभक्त होकर जब क्लेश और तनाव की अंधी खोह में गिरना पड़े तो चेतन मस्तिष्क शून्य हो जाता होगा। उस क्षण में दैहिक कष्ट की तुलना में मानसिक पीड़ा बड़ी हो जाती होगी।
प्रत्यूषा और ज़िया खान जैसी प्रतिभाएं ऐसे ही किसी क्षण पर अवसाद के प्रेत की शिकार हुई होंगी। उसकी सफलता और उसके भीतर के कलाकार के लिए क्लेश अथवा तनाव झेलना असंभव हो गया होगा। स्टूडियो की फोकस लाइट से निकल कर स्वयं के साथ अनावश्यक तनाव के गहन अँधेरे उसकी बर्दाश्त से बाहर हो गए होंगे।
कला और सृजन पारलौकिक विधाएँ हैं। इनसे जुड़े हर शख़्स में एक फ़क़ीर वास करता है। उस फकीर को दुनियादारी के अनावश्यक झगड़ों से दूर रखा जाना चाहिए। उसका समाज में रहने का तरीका अलग लेकिन उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। उसे उसके तरीके से दुनिया को बेहतरी की ओर ले जाने दिया जाना चाहिए। उसे सृजन से पृथक करना उसकी राह में काँटे बोने जैसा है।
प्रत्यूषा ने सही किया या ग़लत ये मैं नहीं जानता लेकिन एक कलाकार होने के नाते इतना अवश्य जानता हूँ कि उसकी परिस्थितियां उसके साथ सही नहीं कर रही थीं, वरना इतनी खूबसूरत ज़िन्दगी का ऐसा दर्दनाक अंत कौन कोमलहृदयी कर सकेगा!
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Suicide of Pratyusha Mukarji
Article, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Prose
“क्यों भैया, ये सरकार ने विजय माल्या को तभी क्यों नहीं पकड़ लिया जब वो भारत में था?”
डायलॉग- “हम तुम्हें पकड़ेंगे माल्या। लेकिन वो ज़मीन भी हमारी नहीं होगी, देश भी हमारा नहीं होगा और वक़्त भी हमारा नहीं होगा।”
“क्यों जी, ये बैंकों ने माल्या को इतना लोन कैसे दे दिया?”
डायलॉग- “कौन कम्बख़्त ज़माने के लिये बनाता है, हम तो बनाते हैं ताकि उसे पीकर बैंक वाले लोन का अमाउंट पढ़ न सकें।”
“ये श्री श्री रविशंकर पाँच करोड़ रुपये के लिये मुक़द्दमेबाज़ी करता अच्छा लगेगा?”
डायलॉग- “तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़ मिलती रहेगी, लेकिन इन्साफ़ नहीं मिलेगा। और जब तक इन्साफ़ मिलेगा तब तक हम जमुना के किनारे को साफ़ कर चुके होंगे मीलॉर्ड।”
“वर्ल्ड कल्चरल फ़ेस्टिवल में मोदी जी के लिये अलग मंच बनाने की क्या ज़रूरत?”
डायलॉग- “डाबर साहब, कुछ साल पहले हम लालकिले से भाषण देना चाहते थे, और हमने अपना मंच लालकिले जैसा बना लिया था। …मैं आज भी बने-बनाए मंच पर नहीं जाता।”
“केजरीवाल को कराची लिटरेचर फ़ेस्टिवल में जाने की इज़ाज़त मिलेगी या नहीं?”
डायलॉग- “एक काग़ज़ पर मुहर नहीं लगेगी तो का केजरी पाकिस्तान नहीं जाएगा? अरे चाहे सल्लू मियां की पद्दी पर लदकर जाना पड़े लेकिन उसे कराची जाकर अपना साहित्य प्रेम दिखाने से कोई सरहद, कोई ताक़त नहीं रोक सकती।”
“भैया पाकिस्तान की क्रिकेट टीम को सुरक्षा की लिखित गारंटी क्यों चाहिये?”
डायलॉग- “जिनके घर शीशे के होते हैं, वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते।”
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
आजकल दिल्ली का मौसम कुछ अजीब हो गया है। इस बार धूप गुलाबी होने से पहले ही चिलचिलाने लगी है। वसन्त की फुलवारी अभी ठीक से मुस्कुरा ही पाई थी कि आकाश में मंडराती चीलों की आवाज़ ने माहौल को एक मनहूस वीराने से ढाँप लिया। रंगों के नाम पर कुछ है तो बस पलाश, वो भी रह रहकर ऐसे टूट कर भूशायी होते हैं कि सौंदर्य की डोर पकड़ कर उभरता काम, क्षणभंगुरता के तथागत भाव से वनोन्मुखी हुआ जाता है। दिल्ली की सडकों पर निकलो तो पता चलता है कि पलाश के ही दो रंगों का सारा खेल चल रहा है। ज़्यादातर पेड़ों पर गहरा लाल रंग बड़बोला सा आसमान से बातें करता दिखाई देता है। कहीं-कहीं भगवा रंग भी है, लेकिन इस भगवा की ख़ूबसूरती लाल वाले दरख्तों की भीड़ में दब रही है। हाँ, हरे पत्ते दोनों ही से पूरी तरह नदारद हैं। कहीं किसी पेड़ पर दो-चार पत्ते बचे भी हैं, तो वे वृक्ष को फूलते देख उनके रंग पीले पड़ गए हैं। नीम, पीपल और जामुन के पुराने दरख़्त नए मौसम में उपेक्षित से खड़े हैं। बेपरवाह हवाओं ने उनके पास से गुज़रते हुए जो शरारत की है, उससे शर्मिंदा होकर वे ज़मीन में गड़े जा रहे हैं। ज़मीन अपने मूल से कटकर गिरे पत्तों की जर्जर देह से पट गई है। हवा का झोंका इन सूखे पत्तों को ज़रा सा छेड़ देता है तो ये एक दूसरे से टकराने लगते हैं। इससे एक खड़खड़ाहट की आवाज़ पैदा होती है। धरती ठहाका मार कर अपने जिस्म पर रेंगते इन कृतघ्नों पर हँसती है और हवाएँ मौसम की नमी सोखती हुईं दूर निकल जाती हैं।
✍️ चिराग़ जैन