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छूकर निकली है बेचैनी

अनुभूतियाँ ज्यों-ज्यों ऊँची उठती जाती हैं, त्यों-त्यों उनकी उड़ान सहज होने लगती है। और एक सीमा के बाद उन्हें पंख नहीं हिलाने पड़ते, वे स्वतः ही सृजन के आकाश में तैरने लगती हैं। फिर उड़ान, उड़ान न रहकर बहाव बन जाती है। बस यही बहाव गीत का प्राणतत्त्व है।
शिल्प की यान्त्रिकता पीछे रह जाये और अनुभूति स्वतः ही लयात्मक होकर अभिव्यक्त होने लगे तो इसे गीत का अवतरण कहा जा सकता है। इस प्रक्रिया में व्याकरण को अलग से साधना नहीं पड़ता, इस स्थिति में मात्राएँ गिननी नहीं पड़तीं, बल्कि आनन्द के किसी चरम पर यदि पंख प्रमादी भी होने लगें तो आनन्द का वेग परिन्दे को बहा ले जाता है। यहाँ केवल आनन्द शेष रह जाता है और प्रक्रिया गौण हो जाती है। फिर तिरना निश्चित हो जाता है। यह याद ही नहीं आता कि पंख भी हिलाने हैं। यह होश ही नहीं रहता कि उड़ने के मूलभूत नियम न पाले गये तो दुर्घटना घट सकती है।
यह किसी रचनाकार के अपनी अनुभूतियों से एकाकार हो जाने की अवस्था है। यह किसी पथिक के मार्ग में लीन हो जाने की अवस्था है। पानी में दूर तक यात्रा करनी है तो ख़ुद को पानी कर लेने से बेहतर कोई दूसरा उपाय नहीं है। आकाश में बहुत ऊँचे जाना हो तो हवा में घुल जाना ही श्रेयस्कर है।
भाव और भाषा के इसी एकाकार स्वरूप का नाम है गीत। लय की झंकृति के आकाश में तिरता अनुभूति का पाखी है गीत। पीड़ा, हर्ष, दर्शन, उत्साह अथवा अन्य किसी भी मनोदशा के चरम पर पहुँचकर रचनाकार को अनहद की जो ध्वनि सुनायी देती है, वही गीत है।
इसके लिये बहुत ज़ोर नहीं आज़माना पड़ता। ज़ोर आज़माकर गीत रचा ही नहीं जा सकता। बादलों को पत्थर मारने से बरसात नहीं होती। बादल तो स्वतः ही बरस पड़ता है …बेपरवाह …झमाझम। यदि अनुभूति लबालब भर गयी है तो गीत को छलकना ही होगा। उसको आमन्त्रित नहीं करना पड़ेगा। वह स्वतः आयेगा। आप मना करेंगे, तब भी आ जायेगा। फिर उसे रोकना नामुम्किन होगा।
मैंने कई बार गीत से झगड़ा किया है लेकिन उसने भी ढीठ दोस्त की तरह आने का क्रम जारी रखा। कई-कई दिन शक्ल नहीं देखी, लेकिन फिर जब मिला तो ऐसे मिला जैसे कभी बिछुड़ा ही न हो। गत दो-ढाई वर्ष में तो गीत मेरी अभिव्यक्ति का साया बन गया है। विचार का हाथ थामकर किसी भी राह पर चलूँ, लेकिन मंज़िल पर गीत खड़ा मिलता है।
‘छूकर निकली है बेचैनी’ ऐसी ही सृजन यात्राओं का प्राप्य है। संवेदना के अस्तित्व से जो कंपन मन के धरातल पर घटित होता है, उसकी तरंगों का लिप्यंतरण हैं ये गीत। इनमें प्रसव की पीर से लेकर विरक्ति की मनोदशा तक की अभिव्यक्ति है। इनमें वयष्टि के झरोखे से समष्टि का दर्शन करने का प्रयास है। पौराणिक संदर्भों के कॅनवास पर परिवेश का चित्र उकेरने की कोशिश है। हिन्दी गीत के वातायन में कणांश सरीखा अस्तित्व लिये यह संग्रह पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है। इसकी किसी भी पंक्ति से आपको अपने किसी अनुभव की गूंज सुनायी दे तो मेरी लेखनी को सहजता का आशीष दीजियेगा।

✍️ चिराग़ जैन

(“छूकर निकली है बेचैनी” की भूमिका)

दिल्ली भारत की राजधानी है

दिल्ली भारत की राजधानी है। देश के सभी प्रकार के कार्यों को करने के लिए बड़े-बड़े सरकारी दफ्तर इसी शहर में बनाए गए हैं। इस प्रयास में पूरा शहर एक दफ़्तर हो गया है और हर नागरिक एक फाइल। घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर के बीच घूमते-घूमते हर नागरिक के व्यक्तित्व पर इतनी खरोंचें पड़ गई हैं कि जब वह ख़ुद को तलाशने के लिए अपने आप पर हाथ फिराता है तो उसका वजूद किसी गली हुई फाइल के कागज़ात की तरह बिखर जाता है। यह देखकर नागरिक घबरा जाता है और उन पुर्ज़ों को जैसे तैसे फाइल कवर में ठूंसकर टेबल टू टेबल चक्कर लगाने लगता है।
एक फाइल सुबह गाड़ी में बैठकर ख़ुद को दफ़्तर की ओर धकेलती है तो रास्ते में साइकिल, ई रिक्शा, ठेले, स्कूटर, मोटर साइकिल और बसों में बैठी फाइलें उसके वक़्त की जेब में सेंध लगाती हैं। वह अपनी ज़िंदगी की पोटली से कुछ लम्हों की पूंजी उन पर ख़र्च करके कुछ गालियों का गुज़ारा भत्ता उनके मुँह पर मारकर आगे बढ़ जाता है।
इस लेनदेन में जब भी किसी एक फाइल की ईगो किसी दूसरी फाइल की ईगो से भिड़ जाती है तो पीछे लगी सभी फाइलें कई-कई घंटे जाम में फँसी रहती हैं। बाद में एक पुलिसिया बाबू उन दोनों से सहायता भत्ता लेकर उनके द्वारा एक दूसरे को दी जा रही गालियों का रुख़ अपनी ओर मोड़ लेता है और पीछे की सभी फाइलों का मार्ग क्लियर करवा देता है।
सरकार ने दिल्ली को स्वच्छ रखने के लिए सड़कों के किनारे कूड़ेदान रखवाए हैं। कूड़ेदान इतने ख़ूबसूरत हैं कि उनमें कचरा फेंकने का मन नहीं करता। इसलिए हम सड़कों पर कचरा फेंककर कूड़ेदान के सौंदर्य को बचा लेते हैं। वो तो भला हो सरकार का कि जनता की भारी मांग के बावजूद सड़कों की हालत सुधारने के निर्देश नहीं जारी किए, वरना हमें ज़रा सा कचरा फेंकने के लिए भी सरकारी दफ़्तरों की ओर दौड़ना पड़ता।
सरकारी दफ़्तरों में आप कहीं भी कचरा फेंक सकते हैं। यूँ भी दफ़्तरों को कचरे से ख़ास लगाव है। यही कारण है कि किसी फाइल के कचरा हो जाने तक कर्मचारी उस पर कार्रवाई नहीं करते। यह सरकारी कर्मचारियों की निष्ठा का ही प्रमाण है कि एक बार किसी आम नागरिक का काम किसी सरकारी दफ़्तर में अटक जाए, उसके बाद पूरी व्यवस्था उसे यह आभास कराने में जुट जाती है कि व्यवस्था के सम्मुख उसका वजूद कचरे से अधिक कुछ नहीं है।
पुराने ढर्रे की सड़ांध मारते इन दफ़्तरों में बैठे बाबुओं की शक्ल भी दिन-प्रतिदिन फाइलों की तरह बासी होती जा रही है। ऐसा लगता है कि ये सभी बाबू लोग स्वयं को व्यवस्था से एकरूप करने पर तुले हैं ताकि कोई दरख़्वास्त करनेवाला यह अंतर न कर पाएं की इस व्यवस्था में बाबू कहाँ शुरू होता है और व्यवस्था कहाँ ख़त्म।
अब दफ़्तरों की सड़ांध फाइलों में छुपकर घरों तक पहुँचने लगी है। घरों से बच्चों में और बच्चों से भविष्य तक यह सड़ांध फैल गई है। और हम नाक बंद किये चुपचाप देख रहे हैं कि हर फाइल दिन में दर्जनों बार बाबू बन जाती है और हर बाबू दिन में दर्जनों बार फाइल बन जाता है।
सरकार की ओर देखना हम छोड़ चुके हैं क्योंकि हम जानते हैं कि दिल्ली भारत की राजधानी है और हर काम को करने के लिए यहाँ बड़े-बड़े दफ़्तर सरकार ने ही बनवाए हैं। यहाँ सब लोग बड़े-बड़े काम ही करते हैं। या यूँ कहें कि यहाँ जो काम होता है वह बड़ा ही होता है। इसलिए आम जनता के छोटे-छोटे काम पीढ़ियों तक अधूरे ही पड़े रहते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

हंस की चाल

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कृष्ण, अर्जुन को लेकर बर्बरीक के पास गए और उनसे पूछा कि युद्ध का परिणाम क्या रहा? बर्बरीक ने उत्तर दिया कि पाण्डव परास्त हो गए। उत्तर सुनकर अर्जुन चकित हो गए और बोले- ‘सारा संसार जानता है कि युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो चुका है। सुयोधन वीरगति को प्राप्त हो चुका है। फिर आपको क्यों लगता है कि पाण्डव परास्त हो गए?’
बर्बरीक बोले- ‘कौरव तो प्रारम्भ से कौरव ही थे और अंत तक कौरव ही रहे। किन्तु पाण्डवों को युद्ध जीतने के लिए कई बार कौरव बनना पड़ा। और जो व्यक्ति अपना मूल स्वभाव छोड़ दे उसको परास्त ही माना जाता है।’
यह कथा भारतीय समाज के सांस्कृतिक मूल्यों पर भी अक्षरशः सही सिद्ध होती है। पाश्चात्य संस्कृति के आक्रमणों से घबराकर पिछड़ जाने के भय से हमने अपने परिवारों का मूल स्वभाव बिसरा दिया है। कट्टरता से भयभीय होकर हमने अपने धार्मिक परिवेश की सहजता को समाप्त कर डाला है। जिस मानसिक ग़ुलामी का रोना रोकर हम पश्चिमी परंपराओं को कोसते हैं उसके प्रथम अपराधी हम स्वयं हैं।
टेलिविज़न, मोबाइल, इंटरनेट या दूसरा कोई भी तकनीकी माध्यम हमारे सांस्कृतिक परिवेश को क्षति नहीं पहुँचा सकता था यदि हम भीतर से भयभीत न हुए होते। प्राप्त को सस्ता और अनुपलब्ध को महंगा समझने की हमारी प्रवृत्ति ने हमें अपने तूणीर में रखे अस्त्र चलाने की सामर्थ्य से वंचित कर दिया और हम प्रतिद्वंदी के चमकीले कमज़ोर तीरों से बिंधते चले गए।
भाषा से लेकर चाल-चलन तक हम अनवरत दूसरों की थाली के घी पर निगाहें गड़ाकर बैठे रहे और अपने पत्तल में रखे चूरमे की अनदेखी करते रहे। यदि हम इस स्थिति को सांस्कृतिक युद्ध मान लें तो यह भी स्वीकार करना होगा कि योद्धा का पहला अस्त्र उसका हौसला होता है। हम टूटी हुई हिम्मत लेकर रण में उतर तो गए किन्तु अपने देसी भाले को उनकी देखादेखी बंदूक की तरह चलाने के प्रयास में परास्त होते चले गए।
हम अपने विद्यालयों में भारतीय नागरिक तैयार करने चले किन्तु शिक्षा का माध्यम उनका अपना बैठे। हम यह भी न समझ सके कि थाली में परोसी गई खीर न तो रसना को तृप्त कर सकती है न क्षुधा ही शांत कर सकती है। खीर खानी है तो कटोरी ही उपयुक्त पात्र है।
यही व्यवहार हमने अपनी कलाओं के साथ भी किया। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित मण्डप पर भरोसा न कर सके और विदेश से आयातित ऑडिटोरियम बनाकर इतराते फिरे। स्वांग और नौटंकी की प्रस्तुति इन विदेशी सभागारों में समा न सकी और धीरे-धीरे इन सभागारों की कृत्रिमता हमारी कलाओं की सहजता को लील गई।
हम आधुनिक दिखने की होड़ में कविताओं के बिम्ब बदलने लगे। माखन-मिश्री और कुंजवन की किलोल के बिम्ब भारतीयता में रचे-पगे बिम्ब थे, जिन्हें हठपूर्वक चॉकलेट और साइबेरिया के जंगलों में बदलने की कोशिश में हम कविता की लोक-ग्राह्यता नष्ट कर बैठे।
कृष्ण और राम की कथाएँ पढ़नेवाले बच्चे कब शिनचैन और नोबिता के चरित्र बाँचने लगे, हमें पता ही न लगा। आर्दश चरित्रों की कथाओं में व्याप्त परिहास के रस को अपमान समझकर हमने अनजाने में उन चरित्रों से पीढ़ियों को विमुख कर दिया। हम भूल गए कि चौपालों के ठहाके और मेलों की ठिठोली में बसी भारतीय संस्कृति परिहास और चर्चा से आहत नहीं होती, अपितु बल पाती है।
जब यह सब कुछ घटित हो रहा था ठीक उसी समय हमारी संस्कृति पर एक और आक्रमण हुआ। इस बार हमारा सामना विज्ञापनों से था। व्यावसायिक हितों की अंधी होड़ में हमारे औद्यौगिक घरानों ने हमारी प्रचलित जीवनशैली को ‘पुराना’; ‘बासी’; ‘पिछड़ा’ और ‘घिसा-पिटा’ बोल-बोलकर अपने उत्पाद बेचे। दंतमंजन से लेकर डिटर्जेंट तक के विज्ञापनों ने भारतीय संस्कृति को अपमानित किया और हम चुपचाप देखते रहे। ‘अब आ गया नए ज़माने का….’ -इस एक जुमले ने भारतीय संस्कृति की जो छवि हमारे मानस पटल पर अंकित की, उसने हमारी सोच को प्रभावित किया। अब हम अपने बच्चों को अंग्रेजी न बोलने पर डाँटने लगे।
टेलिविज़न के इसी व्यामोह में हमने मुहल्ला संस्कृति का पूरी तरह पटाक्षेप कर डाला और अपने-अपने घरों की दीवारों में क़ैद हो गए। सिमटने का क्रम इस हद तक बढ़ा कि घर सिकुड़ कर कमरे बन गए और उत्सवधर्मी भारतीय मनुष्य एकाकी जीवन की चौखट पर नाक रगड़ने लगा।
इन छोटे-छोटे फ्लैट्स में न तो रंगोली के लिए देहरी की जगह बन सकी न ही तुलसी चौरा पूजने के लिए आंगन की। सुक़ून और संतुष्टि के महामंत्र भूलकर हम आपाधापी में इतने व्यस्त हुए कि संध्या वंदन के लिए गौधूलि वेला कब आकर गुज़र गई हमें संज्ञान ही न रहा।
गुडलने चलते बचपन को संस्कारों का ककहरा पढ़ानेवाला मातृत्व अर्थतंत्र की उहापोह में विलीन हो गया और हमने अपने नौनिहालों को क्रेच और प्ले स्कूल के भरोसे छोड़ दिया। शहरी जीवन की विवशताओं और स्त्री-सशक्तिकरण की मुहिम ने भारतीय परिवारों की वैज्ञानिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया और केवल आर्थिक स्वावलम्बन को नारी-मुक्ति का नाम दे दिया गया। समाज में स्त्री की भूमिका के महती योगदान को उजागर करने के स्थान पर हमने पाश्चात्य प्रचलन का अंधानुकरण किया और स्त्री के द्वारा पारिवारिक तथा सामाजिक स्तर पर निर्वाह किये जा रहे दायित्वों की उपेक्षा कर दी। भारतीय समाज में स्त्री की भूमिका के आधार पर संस्कारों की पाठशाला बन्द हो गईं और हमारी पीढ़ियाँ ट्यूशन या कॉन्वेंट में डिग्रियाँ बटोरने को शिक्षा समझने लगीं।
इसके अतिरिक्त सिनेमा, जो कि राजा हरिश्चन्द्र की कहानी लेकर भारत में प्रविष्ट हुआ था, उसने बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों को सर्वाेपरि मानकर अनैतिक यौन संबंधों और हिंसक अपराधी प्रवृत्तियों की वक़ालत शुरू कर दी। जुआरी, ठग, अपराधी, व्यसनी और स्मगलर्स फिल्मों के नायक बनने लगे। मुजरा और कैबरे फ़िल्म की सफलता की गारंटी बन गए और हमारे फ़िल्म निर्माताओं ने आइटम डांस के भड़कीले संगीत में भारतीय सुगम संगीत की सरगम ख़ामोश कर दी।
हमने संस्कृति को बचाने के लिए सरकार की ओर देखा तो सरकार ने योजनाओं का झुनझुना थमा दिया। संस्कृति के ठेकेदार उस झुनझुने के सहारे समय व्यतीत करते रहे और संस्कृति अपनी जर्जर होती देह को लुकाते-छिपाते समय काटती रही।
धागे से नाड़ी की गति मापनेवाला देश आँख फड़कने पर पेन किलर खाने लगा और जड़ी-बूटियों के रसायन विज्ञान से हमारा भरोसा उठ गया। लट्टू से खेलते बच्चे हमें आवारा लगने लगे और बेब्लेड चलाते बच्चे सभ्य।
भारतीय संस्कृति के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हम युद्ध जीतने के लिए कौरव बनते रहे और अपने मूल स्वभाव की उपेक्षा करते रहे। हमें यह समझना होगा कि ऊँट रेगिस्तान का जहाज है। उसे प्रकृति ने रेत पर दौड़ने की शक्ति दी है। यदि कोई कार उसे स्पर्धा के लिए ललकार बैठे तो उस कार को रेत में दौड़ने के लिए आमंत्रित करो, न कि स्वयं हाइवे पर जाकर कार की तरह दौड़ने की होड़ करो।

© चिराग़ जैन

विवेक तिवारी बनाम राजनीति

उत्तर प्रदेश का विवेक तिवारी मामला सुखिऱ्यों में आया और सियासत गरमा गई। चुनावी माहौल में इस तरह की घटना को भुनाने में कोई भी पीछे नहीं है। क़ानून व्यवस्था के लिए हमेशा कठघरे में रही समाजवादी पार्टी ने योगी से इस्तीफ़ा मांग लिया। कांग्रेस ने भी सरकार की विफलताओं का ढोल गले मे लटका लिया। दिल्ली की आम आदमी पार्टी ने भी कटाक्ष करते हुए हिन्दू-मुस्लिम कार्ड खेल दिया। योगी सरकार ने भी चौतरफा हमलों से बचने के प्रयास में आरोपी पुलिसकर्मियों की बर्ख़ास्तगी, गिरफ़्तारी और जाँच के आदेश दे दिए। पीड़ित परिवार को पच्चीस लाख रुपये के मुआवज़े का ऐलान कर दिया। मृतक के परिवारवालों ने मुख्यमंत्री के न आने की स्थिति में अंतिम संस्कार न करने की घोषणा कर दी। बाद में इसी परिवार ने एक करोड़ रुपये और सरकारी नौकरी की मांग की। और अब यही परिवार पच्चीस लाख और सरकारी नौकरी के आश्वासन पर अंतिम संस्कार के लिए तैयार हो गया।
घटना की चश्मदीद गवाह यह स्वीकार कर रही है कि रात को सुरक्षा जाँच के लिए रुकने को विवेक तिवारी तैयार नहीं थे। उन्होंने न केवल पुलिस के आदेश की अनदेखी की बल्कि भागने की कोशिश भी की। पुलिसकर्मियों का दावा है कि उन्होंने आत्मसुरक्षा में गोली चलाई। यदि कोई व्यक्ति बेरिकेड्स तोड़कर भागने की कोशिश करे तो वहाँ खड़े पुलिसवाले को यह कैसे पता चलेगा कि उसमें बैठा व्यक्ति अपराधी नहीं बल्कि ऐपल कम्पनी का एरिया मैनेजर है। जब सुरक्षा जाँच के लिए गाड़ी रोकनी होती है तो सामान्यतया पुलिसवाले गाड़ी के आगे खड़े होकर उसे हाथ के इशारे से रोकते हैं। गाड़ी के भीतर बैठी चश्मदीद यह स्वीकार कर रही है कि पुलिस के निर्देश पर विवेक ने गाड़ी नहीं रोकी और भागने की कोशिश की।
यदि कोई पुलिसवाला सड़क पर खड़े होकर एक गाड़ी को रोकने का प्रयास करे और वाहन चालक भागने का प्रयास करे तो इस बात की बहुत संभावना है कि वाहन चालक ने पुलिसकर्मी के ऊपर गाड़ी चढ़ाने से परहेज नहीं किया। इस परिस्थिति में पुलिसकर्मी उसकी प्रवृत्ति का आकलन करते हुए त्वरित कार्रवाई में गोली चला दे तो वह अपराधी कैसे हुआ? यदि इसी गाड़ी में विवेक तिवारी की जगह कोई अपराधी ही होता और इस घटना में पुलिसवाला गोली नहीं चलाता और वह थोड़ी दूर जाकर कोई दुर्घटना या अपराध कर देता तो यही मीडिया प्रश्न उठाता कि सुरक्षा जाँच पर खड़े पुलिसवाले क्या कर रहे थे?
क्या कोई चैनल या विरोधी दल इस बात पर ध्यान देना चाहेगा कि पुलिस के रोकने पर गाड़ी भगाने की क्या आवश्यकता थी। ऐसा क्या कारण था कि देर रात तक कम्पनी में काम करके अपनी सहकर्मी के साथ घर लौट रहे विवेक तिवारी के पास एक मिनिट सुरक्षा जाँच पर रुकने का समय नहीं था। सोशल मीडिया की ख़बरों और मीडिया की हेडलाइन्स से यह साफ़ है कि भावुकता में पूरा देश पुलिसवाले को अपराधी मान बैठा है। एसआईटी के गठन से पूर्व ही हम भावुक लोग फैसला दे चुके हैं कि जो बेचारा मर गया है वह ग़लत हो ही नहीं सकता। ऐसी जल्दबाज़ी ठीक नहीं है।
पुलिस और जनता के मध्य जो घृणा का सम्बंध क़ायम हो गया है उसका लाभ अपराधी उठाने लगेंगे तो स्थिति भयावह हो जाएगी। इस भयावह स्थिति के दर्शन हम घाटी में कर चुके है। जनता के मन में सेना के विरुद्ध विष घोलकर आतंकी चांदी कूट रहे हैं। यह स्थिति देश में न आए इसके लिए पुलिस को अपने व्यवहार, मीडिया को अपनी जल्दबाज़ी, जनता को अपनी विवेकशून्यता और राजनैतिक दलों को अपने आचरण पर नियंत्रण करना होगा। समाज व्यवस्था भंग हो गई तो कुछ भी शेष न रह सकेगा। चार वोट कम पड़े तो राजनीति को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, चार सेकेंड बाद ख़बर चल जाएगी तो चैनल की टीआरपी पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। गाँव में एक कहावत कही जाती है कि सात घर तो डायन भी छोड़ देती है।

✍️ चिराग़ जैन

स्त्री तुम कल आना

स्त्री की सामाजिक स्थिति पर एक प्रभावी कटाक्ष है, अमर कौशिक निर्देशित फिल्म “स्त्री”। नारी मुक्ति के तमाम चलताऊ नारों और मोर्चों से हटकर पुरुषवादी समाज की सोच का शानदार चलचित्र है “स्त्री”।
हालांकि फिल्म का प्रचार एक हॉरर-कॉमेडी की तरह किया जा रहा है, और फ़िल्म में ये दोनों रंग बख़ूबी भरे भी गए हैं, लेकिन फिल्मकार ने चुपके से स्त्री की वर्तमान परिस्थितियों का संदेश भी इन रंगों में मिला दिया है।
फ़िल्म में नायक राजकुमार राव ने एक संवाद बोला है- “हमारा सामना एक ऐसी चुड़ैल से है जो पढ़ी-लिखी है, और आज्ञाकारी भी है। हम अपनी पर आ जाएं तो इससे जो चाहे करा सकते हैं।” बस यही संवाद स्त्री की सामाजिक स्थिति का संपूर्ण ग्रंथ है। स्त्री की स्थिति आज भी ठीक पहले जैसी ही है। बस अंतर आया है तो सिर्फ़ इतना कि पहले जब वह पढ़ी लिखी नहीं थी तो पुरुष उसे मार-पीट कर अपनी मनमानी करता था और आज जब वह पढ़-लिख गई है तो हम सभ्यता से दीवार पर लिख देते हैं- “ओ स्त्री कल आना”; बस इसे पढ़कर सदियों से आज्ञाकारी रही स्त्री कल का इंतज़ार करने लगती है, और पुरुष उसे टरका कर अपने जश्न में मशगूल हो जाता है।
फ़िल्म के एक दृश्य में चौकीदार रात में पहरा देते हुए पुरुष प्रधान समाज पर एक और तीखा प्रहार करते हुए आवाज़ लगाता है -“ओ स्त्री, मत आना! इस शहर में कोई मर्द नहीं है।” यह एक वाक्य समाज की अंतरात्मा को झखझोरने वाला वाक्य है। पुरुष को मर्दानगी के वास्तविक मआनी बताने वाला महामंत्र है यह वाक्य। स्त्री की अपेक्षाओं के समक्ष पुरुष की दुर्बलता का तमाचा है यह एक वाक्य।
फ़िल्म में श्रद्धा कपूर स्त्री सशक्तिकरण के अभियानों पर व्यंग्य करते हुए कहती है कि- “स्त्री अपने घर में बहुत शक्तिशाली होती है, उसे घर से बाहर लाओ, फिर मारो।” अद्भुत कटाक्ष है यह। समाज में नारी को उसकी भूमिका निर्वाह करने से रोककर उसे अर्थोपार्जन की मशीन बना देने के कुत्सित षड्यंत्रों पर कुठाराघात किया है इस संवाद ने।
स्त्री के स्त्रीत्व को भी फिल्मकार ने बख़ूबी समाहित किया है। “स्त्री की शक्ति उसकी चोटी में है, चोटी काट दो तो वह मरेगी नहीं लेकिन कुछ कर नहीं पाएगी।” यह वाक्य स्त्री से उसका स्त्रीत्व छीन लेने की कहानी कहता है।
स्त्री के मन को स्वर देते हुए फ़िल्म कहती है कि “आज तक इस शहर ने उसे दो चीज़ें नहीं दी, एक प्यार और दूसरी इज़्ज़त। वह इन्हीं दो चीज़ों की भूखी है।” यह बात समझ कर फिल्मकार ने पुनः एक करारा कटाक्ष करते हुए दिखाया कि पुरुषों ने एक इबारत लिखकर आज की पढ़ी-लिखी स्त्री से अपनी मनमानी करवा ली और लिखवा दिया “ओ स्त्री रक्षा करो”। यहाँ यह फ़िल्म समाप्त हो जाती है क्योंकि समाज आश्वस्त है कि इस वाक्य को पढ़कर स्त्री समाज की रक्षा करने लगेगी।
फ़िल्म के निर्माता की सोच को प्रणाम करने का दिल करता है। साथ ही दर्शकों की समझ पर मन भर आता है कि जिन संवादों का ज़िक्र मैंने ऊपर किया था उन सब पर हॉल में ठहाके गूंज रहे थे।

✍️ चिराग़ जैन

अनूप जलोटा का निजी जीवन

रोज़गार की प्रवृत्ति से व्यक्ति की प्रवृत्ति का आकलन करना हमारी पुरानी आदत है। पूरी वर्ण-व्यवस्था इसी आदत की देन थी। इसी आदत के चलते हम कथावाचकों को संत मानने लगे। हम यह सोच ही न पाए कि किसी कहानी को रोचक ढंग से कहने के लिए क़िस्सागोई का अभ्यास किया जाता है, भक्ति का नहीं। इसी भ्रांति ने धर्म का सत्यानाश किया है। धर्मस्थलों की देखरेख के लिए नियुक्त केयरटेकर को हमने धर्म का ठेकेदार समझ लिया। धीरे-धीरे हम सन्त-फ़क़ीरों और धर्म में रोज़गार तलाशने वालों के मध्य भेद करने की क्षमता खो बैठे।
ठीक ऐसा ही हम अनूप जलोटा प्रकरण में कर रहे हैं। अनूप जलोटा एक श्रेष्ठ गायक हैं। उन्होंने ग़ज़ल गायकी में हाथ आजमाए लेकिन उनकी आवाज़ भजन के लिए अधिक उपयुक्त थी, इसलिए उन्होंने भजन गाना शुरू कर दिया। लेकिन हम उन्हें आध्यात्मिक पुरुष मान बैठे। जैसे हम जागरण में भजन गानेवाले आर्केस्ट्रा आर्टिस्ट को माता का भक्त मान बैठते हैं और भेंट चढ़ाकर उनसे आशीर्वाद की अपेक्षा करते हैं।
इस अंतर को समझना होगा। बिग बॉस में इस बार जोड़ी की एंट्री होनी थी। अनूप जी से भी जोड़ी से ही एंट्री मंगवाई गई होगी। एक भजन गायक की कम उम्र की प्रेमिका वह भी तीन असफल विवाह सम्बन्धों के बाद… इस परिस्थिति में बिगबॉस के निर्माताओं को रोचक तत्व दिखाई दिया। यही रोचकता तलाशकर टीआरपी का धंधा करना रिएलिटी शो बनानेवालों का रोज़गार है।
कोई व्यक्ति अपना रोज़गार कैसे करता है, कितनी ईमानदारी से करता है; इन्हीं प्रश्नों की चर्चा महत्वपूर्ण है। कोई अपने व्यक्तिगत जीवन में क्या करता है इससे उसके रोज़गार पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विश्व भर को चमत्कृत करनेवाले आइंस्टाइन को उनके परिवार ने एक बेहद ग़ैर-ज़िम्मेदार व्यक्ति घोषित किया था। किसी के व्यक्तिगत जीवन से उसकी प्रतिभा, उसके सामाजिक जीवन, उसके रोज़गार का आकलन करेंगे तो हम युगों के बहुत क़ीमती रत्न खो देंगे क्योंकि हर हीरा अपने निजी जीवन में केवल एक पत्थर होता है।

✍️ चिराग़ जैन

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