Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
जब नोटबन्दी के पक्ष में भाजपा, जनता के बयान प्रस्तुत करने की कोशिश करती है, तब कांग्रेस, मनमोहन सिंह जी द्वारा जुटाए गए आँकड़े दिखाने लगती है और जब भाजपा ने एक विदेशी संस्था के आँकड़े दिखाकर देश की प्रगति की गवाही दी, तो कांग्रेस आम आदमी की व्यवहारिक समस्याओं का चित्र पेश करने लगी।
जब जीएसटी कांग्रेस की सरकार का प्रोजेक्ट था, तो भाजपा के नेता को उसके कारण होनेवाली समस्याएँ साफ दिखाई देती थीं, लेकिन अब भाजपा सरकार ने जीएसटी लागू किया तो उसका विरोध करनेवाले उन्हीं भाजपाइयों को बेईमान नज़र आने लगे।
कोई जालीवाली टोपी लगाकर ईद की मुबारकबाद दे, तो यह साम्प्रदायिक सद्भाव और कोई भगवा पहनकर कुर्सी पर बैठ जाए तो यह धर्म की राजनीति। कोई पूरे प्रदेश को हाथियों की मूर्ति से भर दे तो यह सत्ता का दुरुपयोग, और कोई पूरे प्रदेश को भगवा रंग से पुतवा दें तो यह विकास। कोई शहरों के नाम काशीराम, अम्बेडकर और खुद अपने नाम पर रख लें तो यह वर्गभेद को बढ़ावा लेकिन कोई चप्पे-चप्पे को हेडगेवार, गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, सावरकर, मुखर्जी और विवेकानंद के संज्ञापट्ट से सजा दे तो यह संस्कृति की रक्षा।
मनमोहन सिंह की चुप्पी पर चुटकुले सुनाते पकड़े जाएं तो यह मोदी जी का सहज हास्यबोध और बाकी पूरा देश मोदी जी से कोई सवाल भी पूछ लें तो यह राष्ट्रद्रोह!
और हम… हम भी इस सबसे इतने उदासीन हो चुके हैं कि समाचार बुलेटिन में चीखती ढिठाई से हम मनोरंजन जुटाने लगे हैं। हम इतिहास से छेड़छाड़ पर देश फूंक देंगे, रामरहीम की गिरफ्तारी के प्रश्न पर भारत को नेस्तोनाबूद करने के बयान बर्दाश्त कर लेंगे, ज़िम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा वोटों की राजनीति साधने के लिए क़ानून हाथ में लेने की वीडियो देखकर हँस लेंगे।
आसमान में ज़हर का बादल हर साँस के साथ हमें मौत के क़रीब लिए जाता है लेकिन हम इस बात पर गाली-गलौज करने लगते हैं कि हमारी दिवाली ही पटाखों के बिना क्यों मनेगी, उनके शब-ए-बारात पर या उनके गुरूपरब पर पटाखे पहले बन्द होने चाहिएँ। हम प्रदूषण से जलती अपने बच्चों की आँखे नहीं देख पाते लेकिन अरविंद केजरीवाल और एलजी की रस्साकशी पर तालियाँ ज़रूर पीटते हैं।
सात दशक की राजनीति में ग़रीबों के विकास का जुमला और ग़रीबों के लिए राजनीति की ढोंगी हमदर्दी से बड़ा मज़ाक़ इस लोकतंत्र में कुछ नहीं हुआ। कांग्रेसियों को चुनावों में दलित याद आते हैं। पाटीदारों के प्रति उनके हृदय में अचानक सौहार्द जाग जाता है। जिन सुशासन बाबू को मोदी जी फूटी आँख नहीं सुहाते थे वे ही सत्ता बचाने के लिए मोदी जी की प्रशंसा प्रारंभ कर देते हैं और हम इस बेशर्मी को पढ़कर अख़बार का पन्ना पलट देते हैं। आज लालू नीतीश के दुश्मन हैं, कल वे ही दोस्त हो जाएंगे।
नोएडा और नासिक में बिल्डरों की लूट पर कोई नहीं बोलता, क्योंकि हर बिल्डर राजनीति के गलियारों में सुविधाओं के पौधे लगाता है; दिल्ली मुम्बई के रेंगते ट्रैफिक पर किसी को इसलिए फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इनकी गाड़ियां बेरोकटोक दौड़ने की सुविधा इनके पास उपलब्ध है; पुलिसिया भ्रष्टाचार पर किसी की नज़र नहीं जाती क्योंकि पुलिस के जो जवान जनता से बदतमीज़ी की हदें लांघते हैं वे ही इनको सेल्यूट मारते हैं।
राजनीति की चूहा दौड़ में जनता की मूलभूत समस्याएं कितनी पीछे छूट गई हैं इसका अनुमान हम लगा नहीं पा रहे हैं। हमें राजनीति से उदासीन हो जाना शोभा नहीं देता लेकिन यह ज़रूर ध्यान रखना होगा राजनीति की ढिठाई पर खुश होकर तालियाँ पीटने की आदत हमें नपुंसक बनाती जा रही है।
✍️ चिराग़ जैन
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चौराहे पर खड़ा भिक्षुक दल हमारी गाड़ी के शीशे पर जी भर के ठुक-ठुक करता है। जब हम उसे भीख देने से इनकार करते हैं तो वह गाली बकने से लेकर, गाड़ी पर खरोंच मारने तक की प्रतिक्रिया देता है। दस-बीस मीटर दूर खड़ा ट्रैफिक पुलिस का जवान उसे कुछ नहीं कहता क्योंकि उसका काम गाड़ियों को रोकना है, भिखारियों को नहीं। लेकिन सरकार उस पुलिसवाले की तरह निष्ठुर नहीं है। वह जगह-जगह विज्ञापन करती है कि ‘भिक्षावृत्ति अपराध है।’ सरकार मानती है कि भिक्षावृत्ति में संलग्न लोग इस विज्ञापन को पढ़कर, अपनी ग़लती मानते हुए पश्चाताप की अग्नि में तपकर कुंदन बन जाएंगे और देश को दमकाने में सहयोग करने लगेंगे।
ट्रैफिक जाम में गाड़ी रुकती है तो किन्नर आपकी गाड़ी को घेर लेते हैं। गाली-गलौज से लेकर आपके परिवार के सामने अश्लीलता की सीमाएँ पार करने लगते हैं। पैसे देने से इनकार करने की स्थिति में ये लोग आपकी गाड़ी के आगे लेटने लगते हैं, अपने कपड़े उतारने लगते हैं, आपके परिवार से सामने आपके गुप्तांगों को छूने लगते हैं और अभद्र शब्दावली का स्तर बढ़ाने लगते हैं। आप विवश होकर अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए अपना पैसा लुटा देते हैं। सौ मीटर दूर खड़ी पुलिस की जिप्सी ऐसी घटनाओं से अनभिज्ञ रहती है। सरकार इस जिप्सी की तरह अज्ञानी भी नहीं है। वह ऐसे लुटेरों को सबक सिखाने के लिए विज्ञापन करती है- ”अच्छे नागरिक बनिये!“ विज्ञापन पढ़कर ये सभी अपराधी सुधर जाते हैं और मंदिरों के बाहर विकलांगो की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर देते हैं।
ट्रेन मुग़ल सराय जंक्शन पर तब तक खड़ी रहती है जब तक ट्रेन के यात्री भूख से व्याकुल होकर केटरिंग वेंडर्स का सारा सामान ख़रीद न लें। यात्री पूछता है कि उसकी यात्रा में हो रहे विलंब से उसे जो घाटा होगा उसके लिए रेल विभाग क्या मुआवज़ा देगा? तभी उद्घोषिका उसके मस्तिष्क में कौंध रहे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहती है- ‘आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है।’ उद्घोषणा सुनकर यात्री भावुक हो जाता है, वह लाउड स्पीकर के पास जाकर उसे सहलाता है और उसका कंधा थपथपाते हुए कहता है- ‘कोई बात नहीं बहन। तुम दिल छोटा न करो।’ सरकार रेल विभाग और यात्रियों के मध्य इस भावुक पल को देखकर द्रवित हो जाती है और मुग़ल सराय जंक्शन का नाम बदलकर ‘दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन’ रख देती है।
आपको देर रात घर लौटते समय कोई लूट लेता है। आप हज़ार बार ऊँच-नीच का विचार करके थाने जाते हैं। पुलिसवाला आपसे ऐसे बात करता है ज्यों आप ही ख़ुद को लूटकर आ रहे हों। आप उससे रपट लिखने के लिए रिरियाने लगते हैं। वह रपट लिखने की बजाय आपको धमकाने लगता है। फिर कुछ ले-दे के रपट लिखे बिना ही लुटेरे को फोन मिलाकर लूट के रुपयों में के साथ गए कागज़ात मंगवा लेता है। आप इतनी त्वरित सेवा से प्रभावित होकर गद्गद हो जाते हैं और ख़ुशी-ख़ुशी थाने से बाहर आते हैं। थाने के आंगन में बड़े-बड़े शब्दों में लिखा है- ‘पुलिस आपकी दोस्त है।’
आप सरकार से कहते हैं कि देश में महंगाई बढ़ रही है। सरकार जवाब देती है कि देश में सत्तर साल से कांग्रेस ने महंगाई बढ़ाई है। आप पूछते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था चरमरा क्यों रही है। सरकार कहती है कि देश को पूरी दुनिया में सम्मान मिल रहा है। आप पूछते हैं कि नोटबन्दी और जीएसटी के अपरिपक्व फैसले से ठप्प हुए व्यापार का उत्तरदायी कौन होगा। सरकार कहती है कि बेईमान और राष्ट्रद्रोही लोग, नोटबन्दी का विरोध कर रहे हैं। आप पूछते हैं कि कश्मीर में जवानों पर पत्थर फेंके जाने कब बन्द होंगे? सरकार ख़ुश होते हुए कहती है, ‘जनता हमारे साथ है, हम उत्तर प्रदेश जीत गए।’ आप पूछते हैं कि जिओ के सिवाय किसी अन्य मोबाइल का नेटवर्क क्यों नहीं आता? सरकार ठहाका लगाकर कहती है, ‘देखो हमने बिहार में भी सरकार बना ली।’ आप पूछते हैं कि कोई बैंक का पैसा लेकर कैसे भाग गया? सरकार कहती है कि ताजमहल का वास्तविक नाम तेजोमहालय है। आप पूछते हैं कि इतनी महंगाई में इतना सारा टैक्स कैसे चुकाएँ? सरकार चहककर नाचते हुए कहती है, ‘देखो, देखो हमारा देश फिर से सोने की चिड़िया बनने जा रहा है।’
✍️ चिराग़ जैन
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युग बीत गए साम्प्रदायिक सद्भाव की बातें करते हुए। धार्मिक कट्टरता की अग्नि में मानवीय मूल्यों के संरक्षण की संभावनाएँ भस्म हो जाती हैं। पुरानी पुस्तकों के सफ़हे पीले पड़कर झड़ने लगे हैं। उन्हें पुनर्मुद्रित न कराया गया तो उनका नामोनिशान भी न बचेगा। मंदिरों-मस्जिदों ने खंडहर में तब्दील होकर बताया है कि समय-समय पर जीर्णाेद्धार न किया जाए तो सब कुछ विलीन हो जाता है।
मूर्तियाँ खण्डित हो जाएँ तो उन्हें वेदी से हटाकर संग्रहालय में रख लेना आवश्यक हो जाता है। मुस्कुराहट मनुष्य का सहज स्वभाव है। जो संबंध मनुष्य के इस स्वभाव में विघ्न डालेगा; मानव उसे बिसार देगा।
किसी संत, मौलवी या धार्मिक व्यक्ति के कुकृत्य पर शर्मिंदा होने से बेहतर है कि मस्तिष्क और मन की खिड़कियों को खोलकर यह विचार करें कि आख़िर क्या कारण है कि त्याग और आत्म कल्याण के पथ पर बढ़ते साधक को भ्रष्ट होने की परिस्थितियाँ आकृष्ट कर लेती हैं। या फिर हमारी साधना की दिव्य वीथियों में धूर्त मस्तिष्कों के प्रवेश का कौन सा द्वार बन गया है; इसकी पड़ताल करनी होगी। किन्तु यह पड़ताल धर्म के अनुयायी होकर नहीं की जा सकती। इसके लिए धर्म का शुभचिंतक होना होगा।
‘राजनीति धर्म को भ्रष्ट करती है’ -यह वाक्य इस युग का सबसे बड़ा भ्रम है। मानव की आत्मा के विकास का कोई संस्थान राजनीति जैसी किसी क्षणिक बुद्धि से प्रभावित होकर अपने पथ से भटक जाए; इसका अर्थ जिसे आप धर्म कह रहे हैं, वह एक छल है। ध्यान रखना, जो डिग जाए वह धर्म नहीं है।
हम प्रत्येक युग की समाप्ति पर धर्म के परिष्करण हेतु महाकुम्भ का आयोजन करनेवाले भारतीय हैं। हम गुरु परंपरा की शुचिता बनाए रखने के लिए एक ग्रंथ को गुरु मान लेनेवाले भारतीय हैं। हम अपने ही शिष्य को अपने आसन पर विराजित कर उसके चरणों में बैठनेवाले भारतीय हैं। हम राष्ट्रधर्म पर मातृधर्म निछावर करनेवाले भारतीय हैं। हम कलिंग में रक्तस्नान करने के उपरांत धवल वस्त्र दीक्षा धारण करनेवाले भारतीय हैं। हम कुरुक्षेत्र में काल-पात्र-स्थान के अनुरूप क्षण-क्षण नियम बदलनेवाले भारतीय हैं। हम फ़क़ीरों की याद में फूलों की चादरें संजोनेवाले भारतीय हैं।
जिन लोगों को धर्म अपनाना था, वे मौन हो गए। उन्हें शब्द अनावश्यक लगने लगे। उन्हें बखान की ज़रूरत ही महसूस न हुई। लेकिन जिन्हें धर्म भुनाना था, उन्होंने शोर मचाना शुरू किया। नारे लगानेवाले और शोर-शराबा करनेवाले लोग धर्म को भुनानेवाले लोग हैं। किसी भी संप्रदाय के प्रवर्तक ने, किसी भी पंथ के उद्घोषक ने किसी को पकड़कर अपने मार्ग से नहीं जोड़ा। उसके आचरण में ऐसा चुम्बक बन गया कि लोग स्वतः ही खिंचे चले आए। महावीर, बुद्ध, नानक, राम, कृष्ण, पैगम्बर, जीसस, परमहंस और विवेकानंद जैसे लोगों ने मुनादी नहीं करवाई कि उनके पंथ पर चलो, उन्होंने तो बस स्वयं चलना शुरू कर दिया। फिर गाँव के गाँव उनके पीछे हो लिये। उन्होंने कोई पोस्टर नहीं छपवाया कि आज यहाँ प्रवचन होगा। वे तो बस, यकायक बोलने लगे होंगे, ख़ुद से बतियाने लगे होंगे। फिर यह होश ही कहाँ होगा कि हज़ारों लोग सुन रहे हैं या दस-बीस। उन्हें किसी को सुनाना ही न था। वे तो बस बतिया रहे थे स्वयं से। उन्होंने किसी को दिखाना थोड़े ही था, वे तो स्वयं को देखने में व्यस्त रहे।
धर्म का नाम लेने पर अधर खिल जाएँ, आँखें चमक उठें, सीना चौड़ा हो; यह तो ठीक है किंतु उसी नाम पर माथे में बल पड़ जाएँ, चेहरे पर चिंता उभर आए तो स्थिति शोचनीय है। अपने धर्म पर अभिमान करना आस्था है किन्तु अन्य धर्मों को अपमानित करना कट्टरता है। त्रिकूट पर्वत पर खच्चर चलाते मुल्ला जी का परिवार एक हिन्दू देवी की आस्था से पलता है। जिस चद्दर पर बिखरे मोती चुन-चुनकर राखियाँ बुनी जाती हैं उन पर कभी-कभी नमाज़ भी पढ़ी जाती है। जिन बगीचों में मज़ारों पर चढ़नेवाले फूल उगते हैं उन्हीं की कुछ क्यारियाँ रामजी की मूर्ति पर चढ़नेवाली मालाएँ भी उगाती हैं।
हैरत की बात ये है कि कर्बला में मुहम्मद का नवासा जिनसे लड़ रहा था, वे लोग हिन्दू नहीं थे और कुरुक्षेत्र में अभिमन्यु जिनसे जूझ रहा था, वे सातों महारथी मुस्लिम नहीं थे। जो पंचवटी से सीता को चुरा ले गया था, वह शैव ब्राह्मण था और जिन्होंने मीरा को विष का प्याला दिया था वे सब हिन्दू राजपूत थे।
सृष्टि के आदि से चलता आया सुर और असुर संग्राम; रामायण काल का शैव-वैष्णव युद्ध; महाभारत काल का कौरव-पाण्डव संग्राम; जैन-बौद्ध; ब्राह्मण-बौद्ध; मौर्य; चोल; मंगोल ये सब तो लगभग एक ही वृक्ष की शाखाएँ थीं। राजपूतों की आपसी लड़ाइयाँ, रजवाड़ों की निजी मुठभेड़ें; इन सबमें धर्म कहाँ और कब जुड़ गया यह बिंदु इतिहास से नदारद है। सेना में लड़नेवाले बेटे धर्म पूछ कर दुश्मन पर गोली नहीं चलाते।
हम यदि अपने सामाजिक व्यवहार को करुणा और मानवता की छलनी से छान लेंगे तो कोई राजनैतिक अवसरवादी हमें इमारतों की जाति के प्रश्न में उलझाकर थाली से नदारद हुई रोटियों के सवाल से विमुख न कर सकेगा।
✍️ चिराग़ जैन
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दिल्ली और मुम्बई जैसे शहरों को पूरे देश का सेम्पल मानने की चूक सही नीतियों के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है। जेएनयू, जामिया और डीयू में किसी लड़की को राह चलते परेशान करना या छेड़ना किसी मनचले के लिए महंगा पड़ सकता है लेकिन कानपुर, इलाहाबाद, पटना, बनारस, लखनऊ जैसे शहरों में स्थिति ऐसी नहीं है। इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वाली लड़कियाँ छोटे शहरों, कस्बों और गाँव से आती हैं जहाँ ‘आज भी’ जागरूकता का आलम यह है कि छेड़छाड़ के किसी मुआमले की नुक्कड़-सभाओं में लड़कियों को ही दोषी माना जाता है। यदि कहीं कानूनी प्रक्रिया लड़की का पक्ष ले भी ले तो बाद में सामाजिक कानाफूसी से उपजा जनविरोध लड़कियों के लिए किसी प्रताड़ना से कम नहीं होता। यही वह स्थिति है कि कई शताब्दियों तक ‘बदनामी’ से बचने के लिए लड़कियाँ ‘बलात्कार’ के बाद भी थाने जाने से कतराती रहीं।
दिल्ली जैसे जागरूक शहर में भी आज तक ऐसे मुआमलात खूब होते हैं कि छेड़छाड़ का विरोध करने से पहले लड़की हिचकिचाती है कि लोग उसके बारे में बातें बनानी शुरू न कर दें।
छोटे शहरों की लड़कियों के मस्तिष्क में उनके माहौल ने यह धारणा बना दी होती है कि वे बड़े शहर की लड़कियों जितनी आधुनिक नहीं हैं इसलिए न तो उनमें लड़कों से बात करने का आत्मविश्वास होता है न ही उनकी बदतमीजी का विरोध करने का। उत्तर प्रदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में पढ़ रही लड़कियों की स्थिति इतनी दयनीय है कि उन्हें अपने हॉस्टल से मेस तक जाने के लिए भी किसी साथिन की जरूरत होती है। बेंच पर दो-चार लड़के बैठे हों और लड़कियाँ वहाँ से गुजरें तो यह मुमकिन नहीं कि उन पर फब्ती न कसी जाए। यदि किसी लड़की का दुपट्टा पेड़ की झाड़ी में अटक जाए तो वह वहां रुक कर उसे निकालने में समय लगाते हुए अश्लील डायलॉग सुनने की अपेक्षा उसे त्याग कर आगे बढ़ जाना उचित समझती है। शाम के बाद तो सड़क पर किसी भी अकेली लड़की का रास्ता रोकने, हाथ पकड़ने, छातियाँ मसलने और किसी भी हद तक बढ़ जाने का अधिकार लड़कों को मिल जाता है।
इन परिस्थितियों में पढ़ना-लिखना तो दूर, साँस लेना तक कितना दूभर होता होगा इसकी कल्पना करने के लिए कुछ क्षण स्वयं को वहाँ खड़ा करना आवश्यक है। एक लड़का किसी लड़की को दबोच कर चूम ले और फिर रोज शाम अपने दोस्तों के साथ उसकी खामोश लाचारी का जुलूस निकालकर उस पर हँसता हुआ निकले तो कैसा लगता होगा इसका अनुमान लगाना जरूरी है। हॉस्टल के बाथरूम में नहाते हुए किसी लड़की की निगाह ऊपर के झरोखे से टकराए और वहाँ दो आँखें उसे बेशर्मी से टंगी हुई दिखाई दें तो कैसा एहसास होता होगा।
शिक्षाध्य्यन के समय इन संस्थानों की लड़कियों को यह पहेली भी बूझनी होती है कि इनके सामने से गुजरते हुए बेचारे लड़कों को अपने गुप्तांग खुजाने का नियम क्यों निभाना पड़ता है?
मैं हमेशा आश्चर्य करता था कि इस दमघोंटू माहौल में रहकर पढ़ना और फिर अपनी काबिलियत सिद्ध करके उन्नति करना कितना मुश्किल होता होगा। इन छोटे शहरों की लड़कियों का चेहरा अपने ध्यान में लाकर एक बार हम सबको यह प्रश्न स्वयं से करना चाहिए कि इन मासूम परियों को हमने कितनी मुसीबत में डाल दिया है? हमें सोचना चाहिए कि इतनी सारी जिल्लत सहकर भी मौन रहने की इनकी विवशता हमारी कौन सी परंपराओं और संस्कारों के सम्मिलन से जन्मी है?
पहली बार इन डरी हुई बच्चियों ने इस देश के प्रशासन को अभिभावक समझ कर इन हरकतों की शिकायत की है। इन्हें फटकार लगाकर चुप रहने को न कहें। इनके साथ वह सुलूक न करें जो अब तक इनके माता-पिता करते आए हैं। इनके साथ मारपीट न करें हुजूर, सच मानिए, इन्हें किसी लड़के ने छेड़ा इसमें इनका कोई कुसूर नहीं है।
बेटियों को बचाने की जिम्मेदारी प्रशासन उठा ले तो बेटियों को पढ़ाने में किसी परिवार में हिचक न होगी। एक बात और, ये सब लड़कियाँ किसी और मुल्क से भागकर आईं शरणार्थी नहीं हैं, ये हमारे आंगन में गूंजी वही किलकारियां हैं जिनका आकर्षण हमें दफ्तर से घर लौटने के लिए बेताब कर देता है।
✍️ चिराग़ जैन
वाराणसी विश्वविद्यालय में लड़कियों की सुरक्षा की मांग के संदर्भ में।
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सिचुएशन 1 : राधा कृष्ण से प्रेम करती थीं। कृष्ण भी उनसे प्रेम करते थे। दोनों अविवाहित थे किंतु इस प्रेम पर किसी को कोई आपत्ति नहीं। निष्कर्ष : परस्पर सहमति पर आधारित संबंध स्वीकार्य है।
सिचुएशन 2 : कर्ण को द्रौपदी के स्वयंवर में भाग नहीं लेने दिया गया। रावण सीता स्वयंवर में भाग नहीं ले पाए। कर्ण ने सुयोधन के बल पर स्वयंवर के अपमान का प्रतिशोध लेने का प्रयास किया। रावण ने सीता का अपहरण करके अपनी आसक्ति की तुष्टि का प्रयास किया। रावण, कर्ण, सुयोधन, सुशासन आदि सभी लोकनिंद्य होकर युद्ध में खेत हुए। निष्कर्ष : स्त्री को प्रतिशोध की अग्नि शांत करने का “सामान” समझना भयावह भूल है।
सिचुएशन 3 : शूर्पनखा लक्ष्मण पर आसक्त हुई और लक्ष्मण की असहमति के बावजूद उस पर दबाव बनाने का प्रयास किया। लक्ष्मण ने शूर्पनखा की नाक काट दी। निष्कर्ष : पुरुष की सहमति को महत्वहीन समझना स्त्री के अपमान का कारण हो सकता है।
सिचुएशन 4 : अहिल्या पर आसक्ति इंद्र का अपराध था। गौतम ऋषि को भ्रमित कर अहिल्या का बलात्कार करने की घटना में अहिल्या निर्दोष थी फिर भी गौतम ऋषि ने अहिल्या का परित्याग किया। राम ने स्वयं अहिल्या के साथ हुए अन्याय का निदान किया। निष्कर्ष : स्त्री के साथ हुए दुर्व्यवहार की उत्तरदायी स्त्री नहीं है। इस पोस्ट से हमें यह शिक्षा मिलती है कि शास्त्र पूजने की नहीं, पढ़ने की चीज़ हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
मीडिया “वाच डॉग” के रूप में जन्मा था लेकिन “पैट पप्पी” बन कर मर रहा है।
✍️ चिराग़ जैन