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चरित्र निर्माण के विवेकहीन पाठ्यक्रम

बचपन में हमें जो कहानियाँ पढ़ाई गयी हैं; उनके झोलझाल को समझने में पूरी ज़िन्दगी कन्फ्यूज़ हो गयी है। कबूतर और बहेलिये की कहानी ने हमारे दिमाग़ में भरा कि हमें सबकी मदद करनी चाहिए। तो सारस और केकड़े वाली कहानी ने बताया कि जिसकी मदद करोगे, वही तुम्हें मार डालेगा।
बन्दर और मगरमच्छ की कहानी पढ़कर हम समझ गए कि जिसे हम मीठे जामुन खिलाएंगे, वही दोस्त एक दिन हमारा कलेजा खाने के षड्यंत्र में शामिल होगा। यह सोचकर हम दोस्तों को संदेह की दृष्टि से देखने लगे तो अध्यापक ने शेर और चूहे की कहानी पढ़ाकर बताया कि इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि हमें अपने दोस्तों का भला करेंगे तो दोस्त भी हमारा भला करेंगे।
लोमड़ी और सारस की कहानी पढ़कर हमने ‘जैसे को तैसा’ सरीखा महान वाक्य सीख लिया तो ‘साधु और बिच्छू’ की कहानी ने बताया कि यदि बिच्छू अपनी बुराई नहीं छोड़ रहा तो साधु अपनी अच्छाई क्यों छोड़े।
इन विरोधाभासी कहानियों को पढ़कर जो पीढ़ी तैयार हुई उसके सामने यह मुसीबत हमेशा बनी रही कि वह साधु की तरह बिच्छू के डंक को इग्नोर करके उसे बचाए या फिर लोमड़ी की तरह सुराही का बदला लेने के लिए थाली में खीर परोसकर सारस के सामने रख दे।
हम यह बूझते ही रह जाते हैं कि सूई चुभोनेवाले दर्जी पर कीचड़ फेंकने वाला हाथी बनना है या फिर राजा की उंगली कटने पर ‘ईश्वर जो करता है अच्छे के लिए करता है’ कहने वाला मंत्री बनना है।
हमारे पाठ्यक्रम निर्माताओं ने सम्भवतः यह विचार ही नहीं किया कि वे वास्तव में बच्चों को बताना क्या चाहते हैं। उन्हें यह समझ ही नहीं आया कि लकड़हारे की जिस कहानी से बच्चों को ‘संगठन में शक्ति है’ का पाठ पढ़ा रहे थे, उसी कहानी से कुछ बच्चे ‘फूट डालो शासन करो’ का गुर सीख बैठे।
उन्हें यह भान ही न रहा कुल्हाड़ी और जलपरी वाली जिस कहानी से ईमानदारी की शिक्षा देने निकले थे उसी कहानी का अंत होते-होते वे ईमानदारी के साथ लालच का स्वाद चखा बैठे।
यदि इन कहानियों का व्यक्तित्व के निर्माण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता तो फिर इन भालू, बन्दर, खरगोश और कछुओं की अनावश्यक गल्प को पढ़ाने में बचपन का क़ीमती समय क्यों नष्ट किया गया? और यदि इन्हीं कहानियों के आधार पर बच्चों का चरित्र निर्माण होता है, तो फिर इनमें इतना विरोधाभास क्यों देखने को मिला? इस विषय को इतना ग़ैर-ज़िम्मेदार रवैये से कैसे देखा जा सकता है?
एक ओर ‘हार की जीत’ जैसी कहानी पढ़ाकर हमें यह बताया गया कि यदि बाबा भारती अपने आचरण को संयत कर लें तो खड़गसिंह जैसे डाकू का भी हृदय परिवर्तन हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ़ हमें यह भी बताया गया कि चींटी ने हाथी की सूंड में घुसकर उसके अहंकार को चकनाचूर कर दिया। अब जब भी अपने अहंकार के मद में चूर होकर मेरी सुख-शांति में सेंध लगाता है तो मैं समझ नहीं पाता कि मुझे बाबा भारती जैसा आचरण करना है या फिर उस अहंकारी की सूंड में घुसकर उसे काट लेना है।
इन कहानियों ने हमारी बौद्धिक क्षमताओं को इतना कुंद कर दिया है कि हम सही और ग़लत का विवेक भूलकर कहानी के एक पक्ष को पकड़कर उसके पीछे चल पड़ते हैं।
इन्हीं कहानियों की बदौलत हम एक पूरी पीढ़ी को ऐसे मस्तिष्क की सौगात दे बैठे हैं, जो एक बार जिसे नायक मान ले, फिर उसकी सब बातें उसे सही लगने लगती हैं।
इसी कन्फ्यूज़न की वजह से हमें ‘दीवार’ फ़िल्म में स्मगलर बना अमिताभ जस्टिफाइड लगता है और ‘ज़ंजीर’ फ़िल्म में पुलिसवाला बना अमिताभ जस्टिफाइड लगता है। इसी अविवेक की वजह से हम शहंशाह फ़िल्म में क़ानून अपने हाथ में लेनेवाला अमिताभ भी पसंद है और शोले फ़िल्म में गब्बर की सुपारी लेनेवाला अमिताभ भी पसंद है।
हम दरअस्ल कहानी को समझते ही नहीं हैं। बल्कि हम तो नायक की पूँछ पकड़कर कथानक और अन्य पात्रों का आकलन करते हैं।
बचपन मे अध्यापक ने जिसकी ओर इंगित करके बता दिया कि यह नायक है, हमने उसके दृष्टिकोण से कहानियों को समझने में बचपन बिता दिया।
डायरेक्टर ने इशारे से जिसको नायक के रूप में प्रस्तुत कर दिया, उसकी नशाखोरी और आपराधिक कृत्यों को भी हमने स्टाइल कहकर जस्टिफाई कर लिया।
राजनीति ने जिसे नायक बनाकर प्रस्तुत कर दिया, उसके षड्यंत्र को भी हमने यह कहकर प्रचारित किया कि देखो अपने विरोधियों को क्या मज़ा चखाया है।
इन नायकों को महान मानने में हमारे देश का नुक़सान हुआ तो हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, हमारे समाज का बेड़ा ग़र्क हुआ तो भी हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा और हमारे चरित्र में अविवेक की दीमक लग गयी तो भी हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।

✍️ चिराग़ जैन

दो साल बाद कवि सम्मेलन

दो साल के घनघोर निठल्लेपन के बाद मुझे कवि-सम्मेलन का आमंत्रण मिला तो मैं फूला नहीं समा रहा था। सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल न होता तो उस दिन मेरा आयतन दो गज की सीमा को पार कर गया होता। जिस मोबाइल की घण्टी से भी रेमडिसिवर की बदबू आने लगी थी, उससे फिर से होटल से उठाए हुए शैम्पू और साबुन की ख़ुशबू आने लगी।
कोविड के भयावह दौर से गुज़र कर जो धड़कन विरक्ति की झपताल में चलने लगे गयी थी उसने यकायक द्रुत गति की कहरवा का रुख़ कर लिया।
पुराने मकान की दीवार पर गड़ी हुई कील में युगों से लटक रहे रस्सी के टुकड़े जैसी बेकार मेरी उंगलियाँ अचानक हाईटेंशन वायर की तरह फड़फड़ाने लगीं। मैनें मोबाइल में पड़ी ट्रेवल एप को इन फड़फड़ाती उंगलियों से छुआ तो उस एप्प ने मुझे उसी दृष्टि से देखा जिस दृष्टि से कभी देवकी माई ने कंस को मारकर आए कन्हैया को देखा होगा।
‘डिपार्चर’; ‘अराइवल’; ‘ट्रेवल डेट’ और ‘पैसेंजर डिटेल’ जैसे शब्दों को पढ़कर मेरी आँखें भर आईं। भीगी पलकों से बुक हुई टिकट को देखा तो उसका एक-एक शब्द अजंता की किसी अप्रतिम पेंटिंग की तरह मन पर छप गया। जिस एयरलाइंस के लोगो को भी कभी नज़र उठाकर नहीं देखा था, उसके लोगो की एक-एक लकीर को आँखों में बसा लिया। पीएनआर ऐसे रट गया, ज्यों साधनारत किसी तपस्वी को मंत्र रट जाता है।
टिकट बुकिंग का अलौकिक आनन्द उठाने के पश्चात मेरी गर्दन ने घूमकर कमरे के उस कोने पर दृष्टिपात किया, जहाँ चार-चार पहियों की स्वामिनी एक अटैची दो वर्ष से जड़वत खड़ी थी। ज्यों ही मैंने उसे छुआ तो ऐसा महसूस हुआ कि बरसों से पाषाण की तरह जी रही किसी अहल्या में प्राण संचरित हो गये हों। मेरे हाथ लगाते ही वह अपने चारों पहियों पर एक साथ नृत्य कर उठी। हैंडल पकड़कर मैंने उस पर नियंत्रण न किया होता तो वह उसी क्षण दौड़कर हवाई अड्डे पहुँच गयी होती।
मैंने बड़े प्यार से अटैची को बिस्तर पर लिटाया। फिर सलीक़े से उसकी ज़िप को टटोल कर रनर को पकड़ा। अटैची की ज़िप खुलने की आवाज़ सुनने को व्याकुल कान उत्साह में आँख के करीब झुक चुके थे। रनर एक निश्चित दिशा में चलने लगा और अटैची की सीत्कार जैसी आवाज़ ने पूरे माहौल को रोमांचित कर दिया। दोनों रनर बौराए हुए तीतरों की भाँति अलग-अलग दिशा में दौड़ गये और मेरे बाएँ हाथ ने आगे बढ़कर लगभग इस अंदाज़ में अटैची के दोनों फलक खोल दिये ज्यों अलीबाबा सिमसिम के भीतर कोई ख़ज़ाने का बक्सा खोल रहा हो। अटैची खुलते ही मेरी आँखें अटैची से होड़ करने लगीं। हालाँकि यह मुझे पहले से पता था कि अटैची ख़ाली होगी लेकिन फिर भी मैं आँख फाड़-फाड़कर उस ख़ालीपन को अपनी आँखों में भर लेना चाहता था।
अटैची में सजाने को जब मैंने कपड़ों की अलमारी खोली तो अलमारी के कब्ज़ों ने चूँ की आवाज़ करके मुझे सूचना दे दी कि कपड़े काफ़ी नाराज़ हैं, ज़्यादा चू-चपड़ मत करना। मैंने शर्मिंदगी से भरकर कलफ़ लगे कपड़ों की ओर देखा तो उन्होंने मुझे उसी हिकारत से देखा जैसे द्रौपदी ने चीरहरण के बाद युधिष्ठिर को देखा था। किंतु ढीठ होकर मैंने भी हैंगर पकड़कर एक जोड़ी पैंट-शर्ट को ठीक वैसे उतार लिया जैसे कीचक की अभद्रता के बाद भी कंक ने सैरन्ध्री को समझाने-बुझाने की हिम्मत जुटा ली थी।
लेकिन इस बार कपड़े मुझसे ज़्यादा ढीठ निकले। हैंगर से उतरने के बाद भी उनके माथे पर एक सिलवट पड़ी रह ही गयी थी। मैं समझ गया कि इस बार नरमी से काम न चलेगा। इतने दिन एक ही आसन में टँके-टँके कपड़ों ने अकड़ना सीख लिया है, सो मैंने भी इस्तरी लेकर उन्हें गर्मी दिखाई तब जाकर मुआमला शान्त हो सका।
एक-एक सामान को समझा-बुझाकर अटैची में जमाने के बाद अटैची के दोनों रनर्स को पुनः क़रीब लाया गया और महीनों से ख़ाली खड़ी बेचारी अटैची को तृप्त करके एक ओर खड़ा कर दिया गया। भीतर से भरे व्यक्तित्व की तरह अटैची का आत्मविश्वास भी देखने लायक था। पहले छूने भर से बौरा जाने वाली अटैची अब हिलाने पर भी ठहरकर पाँव बढ़ा रही थी।
मैं पूरी तैयारी करके मोबाइल में सुबह चार बजे का अलार्म लगाने लगा तो मोबाइल की घड़ी ने टोका – ‘इतने फॉर्मल क्यों हो रहा है बे, दो साल बाद कार्यक्रम का आमंत्रण मिला है। दस तो बज ही गए हैं… चार-छह घण्टे इस आमंत्रण का प्रचार कर… इस क्षण को एन्जॉय कर…!’
मुझे अपने टुच्चेपन पर शर्मिंदगी हुई। भरा हुआ कवि भी भला सोता है! यही तो समय है आत्मविश्वास के साथ बाक़ी कवियों को फोन कर-करके यह कहने का- ‘चलो, अब मैं सोता हूँ, सुबह जल्दी उठना है, छह बजे एयरपोर्ट पहुँचना है ना!’

✍️ चिराग़ जैन

अनुवाद : परिकल्पना और वस्तुस्थिति

चूँकि उड़ने के लिए पंख फैलाने आवश्यक होते हैं, इसलिए उड़ते हुए पक्षी का आकार, बैठे हुए पक्षी के आकार से बड़ा हो जाता है। भाषा का आकार विस्तृत करके उसे सुदूर यात्रा के योग्य बनाने के लिए ‘अनुवाद’ पंखों की भूमिका निर्वाह करता है। अनुवाद, भाषा के ज्ञानकोष को समृद्ध करता है। अनुवाद के पंख लगाकर ही एक भाषा की रचना अन्यान्य भाषा-भाषियों तक यात्रा करती है।
अनुवाद के महत्त्व को हम यूँ समझ सकते हैं कि रूसी साहित्य के फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की की रचना ‘अपराध और दण्ड’ को हिन्दी के पाठकों तक पहुँचाना अनुवाद के बिना सम्भव नहीं था। इसी प्रकार रबीन्द्रनाथ टैगोर, शेक्सपियर, वर्ड्सवर्थ, लियो टॉलस्टॉय, जेन ऑस्टेन, वर्जीनिया वूल्फ, मार्क ट्वेन, व्लादिमीर नामोकोव, जॉर्ज इलियट, होमर, जॉन मिल्टन, मुंशी प्रेमचंद और कुर्रतुल-ऐन-हैदर समेत सैंकड़ों रचनाकार अनुवाद के जादुई कालीन पर बैठकर ही समूचे विश्व में लोकप्रिय हो सके हैं।
एक अनुवादक का दायित्व कई अर्थों में मूल लेखक से अधिक हो जाता है। वह केवल शब्दों का ही अनुवाद नहीं करता बल्कि स्रोत भाषा के सांस्कृतिक परिवेश तथा लक्ष्य भाषा के सांस्कृतिक परिवेश के मध्य भी सामंजस्य स्थापित करने का दायित्व निर्वाह करता है। साहित्यिक अनुवाद में तो यह दायित्व-बोध सामान्य अनुवाद की तुलना में कई गुना अधिक हो जाता है।
उदाहरण के लिए, यदि अंग्रेजी की किसी कहानी का अनुवाद हिन्दी भाषा में किया जाए तो अनुवादक को इंग्लैंड के परिवेश तथा भारत के परिवेश का व्यवहारिक ज्ञान होना आवश्यक है। चूँकि इंग्लैंड में ठण्ड अधिक पड़ती है इसलिए ग्रीष्म ऋतु उनके लिए सुहावनी होती है। लेकिन भारत में यदि यह लिखा जाए कि ‘गर्मी की सुहानी ऋतु थी’ तो पाठक को यह हास्यास्पद जान पड़ेगा। इसी प्रकार हिन्दी में ‘गुलाब’ पुल्लिंग है और अंग्रेजी में ‘रोज़’ स्त्रीलिंग है। कोरा शब्दानुवाद किसी कृति की भावभूमि का मर्म स्पर्श करने की बजाय उसे बेढंग का बनाकर छोड़ देता है।
इसमें भी हिन्दी कविता के अनुवाद के सम्मुख एक कठिनाई इसकी छन्दबद्धता भी है। अनेक हिन्दी कविताएँ ऐसी हैं जिनमें कथ्य से अधिक आनन्द उनके शिल्पपक्ष का है। बुनावट के इस आनन्द को लक्ष्य भाषा तक ले जाना लगभग असंभव है।

हरि गरज्यो, हरि बरस्यो, हरि आयो हरि पास।
पर जब हरि, हरि में गया, तब हरि भयो उदास।।

इस दोहे में रचनाकार ने ‘हरि’ शब्द के विभिन्न अर्थों का प्रयोग करके श्लेष अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है, किन्तु इसको यदि किसी अन्य भाषा में अनूदित किया जाएगा तो यह दोहा तीसरी-चौथी कक्षा के पाठ्यक्रम की एक बेहद सामान्य उक्ति से अधिक कोई अर्थ न संजो सकेगा।
रीतिकाल की रचनाओं में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जो यदि किसी अन्य भाषा में अनूदित कर दिए जाएँ तो गूगल उन्हें ‘इनएप्रोप्रिएट कन्टेन्ट’ समझकर अमान्य कर देगा। किन्तु हिन्दी में वे ही रचनाएँ श्रेष्ठ सौंदर्य तथा काव्य-शिल्प के लिए रेखांकित की जाती हैं।
ग़ज़ल के रदीफ़-काफ़िये उसके सौंदर्य का आधार बन जाते हैं। उन्हें अनुवाद के माध्यम से किसी अन्य भाषा तक साध लेना लगभग असंभव है।

यूँ उठे आह उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है

इस शेर में प्रयुक्त लफ़्ज़ ‘आह’ को ठीक इसी भाव के साथ किसी भी अन्य भाषा तक ले जाना सम्भव नहीं है, और इस लफ़्ज़ की इस प्रयोजनीयता के आभाव में इस शेर की प्रभावोत्पादकता भंग हो जाती है।
यही कारण है कि हिन्दी की छंदबद्ध कविताएँ या तो अनुवादकों की वरीयता पर नहीं आ पातीं या फिर अनुवाद के बाद उनकी रस-निष्पत्ति लगभग शून्य हो जाती हैं।
ऐसा माना जाता है कि एक अच्छे अनुवादक को स्रोत भाषा की सामान्य तथा लक्ष्य भाषा की विशेष जानकारी होनी चाहिए। जबकि मेरा मानना है कि एक अच्छे अनुवादक को स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा दोनों की विशेष जानकारी के साथ-साथ दोनों भाषाओं के मुहावरे की भी जानकारी होनी चाहिये। एक साहित्यिक अनुवादक को दोनों भाषाओं के सांस्कृतिक, सामाजिक तथा पौराणिक परिवेश की भी अच्छी जानकारी होनी चाहिए। तथा कविता का अनुवाद करनेवाले व्यक्ति को दोनों भाषाओं की सामाजिक संवेदना का भी गहरा ज्ञान होना चाहिए।
इस गुण के अभाव में किसी कविता का अनुवाद तो किया जा सकता है किंतु उस अनूदित कृति को ‘कविता’ नहीं कहा जा सकता।
इधर कुछ समय से हिन्दी के अनुवादकों ने अपना पूरा ध्यान कार्यालयी अनुवाद पर केंद्रित कर लिया है। राजभाषा विभाग में नौकरी प्राप्त कर लेना उनके अनुवाद कर्म का अंतिम लक्ष्य है। मैं यह बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि वर्तमान में अधिकतर राजभाषा विभागों में लिप्यन्तरण को अनुवाद समझा जा रहा है। यही कारण है कि सरकारी प्रपत्रों तथा दस्तावेज़ों में या तो अंग्रेजी अथवा अरबी के शब्दों को यथावत देवनागरी में लिख दिया जाता है या फिर उसको इतना क्लिष्ट संस्कृतनिष्ठ रूप दे दिया जाता है कि वह भाषा के उपहास का कारण बन जाते हैं।
मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि भाषा को जटिल बनाकर उसकी हँसी उड़वाने से बेहतर है कि उसे सहिष्णु बनाकर उसका सरलीकरण कर दिया जाए। कार्यालयी अनुवाद तथा वैज्ञानिक व तकनीकी अनुवाद में हमें यह बात स्वीकार करनी होगी कि विज्ञान, तकनीक तथा कार्यालयी व्यवस्थाओं का जो स्वरूप हमने वर्तमान में अंगीकार किया है, उसका उद्गम संस्कृत से न होकर अंग्रेजी अथवा अरबी से होता है। इस हेतु कम्प्यूटर को ‘संगणक’ कहने की ज़िद्द ठानने से बेहतर है कि हम उसे देवनागरी में ‘कम्प्यूटर’ लिखकर संतोष कर लें।
शब्द आयात करने में भाषा की कोई हानि नहीं होती, जबकि व्याकरण को अनदेखा कर देने से भाषा अपंग हो जाती है। कार्यालयी कामकाज में कई बार ऐसा फूहड़ अनुवाद किया जाता है कि हिन्दी के दस्तावेज़ में भी अंग्रेजी का व्याकरण शेष रह जाता है। इन काग़ज़ात को पढ़कर ऐसा लगता ही नहीं कि आप हिन्दी भाषा पढ़ रहे हैं। जिन लोगों ने कभी अदालती दस्तावेज़ पढ़े हैं या निविदा आदि की सूचनाएँ पढ़ी हैं, वे मेरी बात से जल्दी सहमत हो सकेंगे।
गूगल ट्रांसलेशन की सुविधा से इस प्रदूषण में दिन दूनी, रात चौगुनी प्रगति हुई है। अंग्रेजी के पत्र को गूगल ट्रांसलेशन से हिंदी में कन्वर्ट करके कार्यालय की दृष्टि में हिंदी को और अधिक अनुपयोगी बनाने में कर्मठ राजभाषा कार्मिकों ने महती भूमिका निभाई है।
राजभाषा विभागों की प्रतिष्ठापना करनेवालों ने स्वप्न यह देखा था कि एक दिन सभी सरकारी दस्तावेज़ मूल रूप से हिंदी में होंगे और विभाषीय क्षेत्रों में पत्राचार करने के लिए उनको अंग्रेजी भाषा में अनूदित करके प्रेषित किया जाएगा। किन्तु अनुवाद की लापरवाही के कारण वस्तुस्थिति यह है कि आज दफ़्तरों में प्रत्येक पत्र मूलतः अंग्रेजी में है और राजभाषा के आँकड़े पूरे करने के लिए उनका अल्लम-गल्लम देवनागरी रूपांतरण करके उन्हें आवश्यक औपचारिकता के रूप में द्विभाषी बनाकर संलग्न कर दिया जाता है। इस अनूदित काग़ज़ की क्षमता तथा उपयोगिता का अनुमान स्वयं कार्यालय को भी होता है, इसी कारण अक्सर द्विभाषी दस्तावेज़ों पर यह डिस्क्लेमर दिया जाता है कि किसी विवाद की स्थिति में अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत नियमावली को प्रमाण माना जाएगा।
अनुवाद को उत्तरदायित्व के स्थान पर औपचारिकता बनाने का ही एक दुष्परिणाम यह है कि गणित, तकनीक तथा विज्ञान जैसे विषयों के हिन्दी अनुवाद केवल ख़ानापूर्ति के लिए प्रकाशित किये जाते हैं। उनकी उपादेयता के विषय में न तो अनुवादक गम्भीर दिखाई देते हैं, न ही प्रकाशक। हाँ, विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करनेवाले मंत्रालय तथा विभाग अपने राजभाषा विभाग के आँकड़े पूरे करने के लिए इस प्रकार के फूहड़ अनुवादों को पुरस्कृत करके हिन्दी के प्रति गाम्भीर्य का अभिनय अवश्य कर लेते हैं।
अर्थशास्त्र तथा सांख्यिकी जैसे विषयों के अनुवादकों ने इतना सहयोग अवश्य किया है कि उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों में इन विषयों की उच्च शिक्षा का माध्यम हिन्दी रखना सम्भव हो सका। अभियांत्रिकी तथा चिकित्सा जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र इस सुख से भी या तो वंचित हैं या फिर कोरी औपचारिकता के निर्वहन से धीरज धरे बैठे हैं।
अनुवादक यदि ठान लें तो वे बहुत कम समय में हिंदी की प्रयोजनमूलकता में इतनी वृद्धि कर सकते हैं कि राजभाषा का स्वप्न देखनेवाली आँखों की पथराई पुतलियाँ चमकने लग जाएँ। विश्व साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों की सूची में हिंदी की भी कुछ रचनाएँ सम्मिलित हो सकें। यदि अनुवादक थोड़े गम्भीर हो जाएँ, तो हिन्दी क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में पढ़कर बड़े हुए बालकों को यह उलाहना नहीं सुनना होगा- ‘अबे, मेडिकल का फॉर्म तो भर रहा है, इंग्लिश मीडियम से पढ़ना पड़ेगा।’

✍️ चिराग़ जैन

सावधान! कहीं आप अपने धर्म का विरोध तो नहीं कर रहे?

आचरण को आवरण से अधिक महत्व देने का नाम है जैनत्व! जैन आगम में प्रथमानुयोग का अध्ययन करें तो ऐसे सैंकड़ों चरित्र मिल जाएंगे, जिन्होंने अपने चारित्रिक बल से अनीति को हतोत्साहित किया है। तीर्थंकर पार्श्वनाथ पर उपसर्ग करनेवाले कमठ से लेकर मुनि मानतुंग को कारागृह में बन्द कर देने की घटना तक संहनन तथा आत्मबल ही नायकत्व का निर्धारण करता रहा है।
यही क्षमा, यही धैर्य, यही संहनन, यही अहिंसा यदि हम वर्तमान में भी बचा ले गए, तो यह अपने जैनत्व के प्रति हमारा सबसे बड़ा योगदान होगा। किन्तु हम उद्वेग के प्रवाह में उलटबांसी करके अपने आधार को ही ध्वस्त करने पर आमादा हुए जा रहे हैं। हम नपुंसक से अहिंसक की तुक मिलाकर बड़े गर्व से कहते हैं कि जैनी अहिंसक हैं, नपुंसक नहीं! मुट्ठी और जबड़े भींचकर जब कोई यह जुमला बोलता है, तो मुझे लगता है कि वह अपनी परम्परा के मस्तक पर मुष्ठी प्रहार करके गौरव मान रहा है। ऐसी अनुभूति होती है कि हिंसा के प्रतिकार में हिंसक हो जाने की बजाय अहिंसा तथा क्षमा का रास्ता अपनाकर सामनेवाले के चरित्र को प्रभावित करनेवालों को नपुंसक कहा जा रहा है।
श्रीमद रायचंद्र और महात्मा गांधी ने जैन धर्म के जिस आत्मबल को आत्मसात करके एक गाल पर थप्पड़ मारने पर दूसरा गाल आगे करने की बात कही, उसकी खिल्ली उड़ती दिखाई देती है।
तीर्थंकर नेमिनाथ को जब ज्ञात हुआ कि उनके विवाहोत्सव में अतिथि सत्कार के लिए पशुओं की बलि दी जानी है तो इस हिंसा का प्रतिकार करने के लिए उन्होंने तलवार नहीं खींची थी। बल्कि अपने आचरण से उस कृत्य में संलग्न लोगों को शर्मिंदा करने का उपक्रम किया था। उन्होंने तो यह नहीं कहा कि हमें आप नपुंसक न समझ लें, इसलिए हम अहिंसा को तिलांजलि दे देकर पशुओं की हत्या करनेवालों की हत्या कर देंगे।
सेठ सुदर्शन, राजा श्रीपाल, मुनि सुखमाल, मुनि समन्तभद्र और न जाने कितने श्रावक-श्रमणों ने धर्म तथा निजी सुखों की रक्षार्थ ‘विरोधी हिंसा’ की ओट लेकर हिंसक बन जाने के स्थान पर अपने आत्मबल तथा साधना के बल पर धर्म की रक्षा की।
धर्म की रक्षा उसके अनुयाइयों को जीवित रखकर नहीं बल्कि उसके आदर्शों को जीवित रखकर की जा सकती है। किसी ने हमारे धर्म का अपमान किया और हम उसकी गर्दन उतारने दौड़ पड़े तो समझ लीजिए कि विरोधी ने तो केवल धर्म की देह को पत्थर मारे थे, लेकिन अनुयाइयों ने उसकी आत्मा खरोंच दी। जिन्होंने सिर पर सिगड़ी रखे जाने के बावजूद उपसर्गी का प्रतिकार न किया, उन्हें क्या हम नपुंसक कहने लगेंगे?
जैनत्व के इतिहास में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलेगा कि जहाँ युद्ध करनेवाले अथवा युद्ध जीतनेवाले को उसके दैहिक बल के कारण पूजा गया हो। हमने युद्ध में संलग्न बाहुबली को नहीं पूजा, हमने तो सर्वस्व त्यागनेवाले बाहुबली को पूजा है। हमने चक्रवर्ती भरत को नहीं पूजा, हमने तो मुनि भरत को पूजा है।
धर्म को सीढ़ी बनाकर उद्वेग पर सवारी करनेवाले लोग इस धर्म की आत्मा के लिए सर्वाधिक ख़तरनाक लोग हैं। जिस पर पत्थर फेंका गया, उसे शांत रखना कठिन कार्य है। यह कार्य मुनियों ने किया। यह कार्य पुरखों ने किया। और इसी कठिन कार्य को करते हुए जैनत्व की आत्मा को अक्षुण्ण रखा है हमारे पूर्वजों ने। किन्तु उद्वेग को अराजक बना देना सरल कार्य है। इस सरल कार्य को करके जैन धर्म के पाले में खड़े होकर जिनत्व की मूल भावना को चोट पहुँचा रहे हैं कुछ लोग। उनके बहकावे में आने से बचें। क्योंकि आगम की रक्षा हेतु मुट्ठी भींच लेने की बात से अधिक हास्यास्पद कुछ नहीं हो सकता!
✍️ चिराग़ जैन

रक्षाबंधन

‘बंधन भी सुख का कारण हो सकता है’ – इस अद्भुत सत्य का अनोखा उदाहरण है रक्षाबंधन! यद्यपि मैं जानता हूँ कि ईश्वर ने सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को आत्मरक्षा हेतु आत्मनिर्भर बनाया है तथापि मुझे इस बात का एहसास है कि नाड़ी पर एक धागा बांधकर मन में अपनत्व की जिस अपेक्षा को गतिमान किया जाता है; वह संवेदना के स्नायु तंत्र को आनन्दित कर देती है।
कोई हम पर इतना अधिकार रखे कि हमें अपनी रक्षा का दायित्व सौंप दे… अहा! इस अनुभूति से मन कितना बलिष्ठ हो उठता है।
सम्भवतः हम इस त्यौहार की इस अलौकिक ख़ुशी को सही से समझ ही नहीं सके हैं। इसीलिए हमने इसको किन्हीं अर्थों में परिहास बना डाला है। यदि किसी लड़की को अहसास हो जाए कि अमुक परिचित लड़का उसके प्रति प्रेम का भाव रखता है, अथवा उसे प्रपोज़ करनेवाला है तो वह लड़की उसको राखी बांधने निकल पड़ती है! उधर लड़के को अनुमान हो जाए कि जिससे वह प्रेम करता है, वह उसे राखी बांधने की जुगत में है तो लड़का राखी से बचने का उपाय खोजने लगता है!
इस परिस्थिति के दोनों ही पात्र बचकानी हरकतें कर रहे हैं। जिसकी नीयत में तुम्हें खोट दिखाई दे रहा है, उसको राखी जैसे सम्मान से सम्मानित कैसे किया जा सकता है? और जिसकी तुम राखी से भयभीत हो, उससे तुम कम से कम प्रेम तो कभी नहीं कर सकते!
राखी एक पदक है। राखी एक सम्मान है। यदि कोई स्त्री किसी पुरुष को इस सम्मान के योग्य समझती है तो यह उस पुरुष के लिए गौरव का विषय है। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के इस युग में जब स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को भौंडा करके परोसने के सभी द्वार खुले हैं ऐसे में राखी का एक धागा संवेदनाशून्य होते सम्बन्धों पर संवेदना के काँचुकीय की भूमिका निर्वाह करता है।
✍️ चिराग़ जैन

जैन आगम की प्रासंगिकता

धर्म आत्मबल में वृद्धि करने का साधन है। साधना संहनन को सुदृढ़ करने का अभ्यास है। विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को संयत रखने का उपाय ही व्रत है।
जैन आगम का प्रथमानुयोग, जीव के इसी नैतिक विकास का आधार तैयार करता है। प्रथमानुयोग हमें संकट के समय संयत रहने के अवलम्बन प्रदान करता है। जब हम विपत्ति से घिरे हों तब उस विपत्ति का कोई एक उदाहरण मस्तिष्क में कौंध जाए तो विपत्ति छोटी लगने लगती है। यही प्रेरणा मनुष्य के जीवन में कथाओं को उपयोगी बनाती है। यह प्रेरणा न हो तो तमाम कथाएँ राजा-रानी की कहानी की तरह बालक का मन बहलाने का उपकरण मात्र सिद्ध होंगी।
यदि थोड़ा सा विवेक जागृत कर लिया जावे तो शास्त्रों में पढ़ी गईं अनेक कहानियां हमें हमारे परिवेश में साकार होती दिखाई देंगी। जैन आगम की इन कथाओं को जब कभी अपने या अपनों के जीवन में घटित होते देखता हूँ तब-तब मुझे लगता है कि महावीर की प्रासंगिकता सिद्ध हो गयी।
ऐसा अनेक बार होता है कि जब हमारा कोई अपना लोभवश हमसे छल करके हमारा आर्थिक अहित कर रहा होता है। ऐसी स्थिति को जानने के बाद यदि हम उस सम्पत्ति से निर्मोह होकर चल देते हैं तो उस क्षण हम भरत को राज्य सौंप कर वन को जाते हुए बाहुबली सदृश हो जाते हैं।
ऐसा अनेक बार हुआ है कि यदि हमें ज्ञात हो जावे कि हमारी उपस्थिति से किसी महफ़िल का माहौल असहज हो जाएगा तो हम उस अवांछित परिस्थिति को टालने के लिए स्वयं को उस उत्सव से विलग कर लेते हैं। जब हम ऐसा करते हैं तब हम अपने अवचेतन में विद्यमान नेमिनाथ से प्रेरणा प्राप्त कर रहे होते हैं जिन्होंने स्वयं को हिंसा का कारण बनते देख उस उत्सव का ही परित्याग कर दिया जो उनके लिए संयोजित किया गया था।
कोई हमें परेशान किये जा रहा है और हम उसके उपद्रव पर ध्यान न देकर अपने कार्य में एकाग्रचित्त रह पाएं तो उस समय हमारा व्यक्तित्व कमठ का उपसर्ग झेलते पार्श्वनाथ से प्रेरणा पा रहा होता है। हमें मिली ख़राब चीज़ को भी यदि हम सँवार कर उपयोगी बना लेने का हौसला रखते हैं तो हम मैनासुन्दरी के किरदार को जीवंत कर देते हैं।
सेठ सुदर्शन, मुनि मानतुंग, मुनि सुखमाल, अंजनबाला, राजुल, अकलंक, निकलंक, सुकौशल मुनि, सनतकुमार मुनि, अकम्पनाचार्य और श्रीपाल जैसे दर्जनों चरित्र हमारे अवचेतन में विद्यमान हैं। जिन परिस्थितियों में ये सब उल्लेखनीय बन गए, उन्हीं परिस्थितियों में ये सब सामान्य भी सिद्ध हो सकते थे। ये सब कथाएँ हमें यह प्रेरणा प्रदान करती हैं कि अनुकूल परिस्थितियों में धर्म पालन करने से कोई विशेष नहीं होता। आपका उल्लेख तब किया जाता है जब आप प्रतिकूल परिस्थितियों में धर्म का पालन कर सकें।
हाल ही में मुझे शल्य चिकित्सा की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ा। जब मुझे ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था उस समय मुझे यह विचार आया कि घर पर हर रोज़ समाधि मरण और बारह भावना की ऑडियो सीडी बजती है। यदि इस क्षण मैंने इन दोनों काव्यकृतियों में वर्णित उदाहरणों का चिंतन नहीं किया, यदि इस क्षण में मैं विकल हो गया तो बरसों से सुनी जा रही इन महनीय रचनाओं की महत्ता खण्डित होगी। फिर इनका श्रवण मधुर संगीत से अधिक उपयोगी सिद्ध न हो सकेगा। …जब तक एनेस्थीसिया ने मुझे पूर्णतया अवचेत न कर दिया तब तक मैं अनेक उदाहरण देते हुए लगातार स्वयं से यह प्रश्न पूछ रहा था कि – “तुमरे जिये कौन दुःख है?”
इस एक प्रश्न ने मेरे मन को उस भय से बचाए रखा, जो ऑपरेशन से पूर्व किसी को हो सकता है। यूँ भी देह और विदेह के पृथकत्व के लिए वह क्षण सर्वाधिक उपयुक्त है, जब आप स्वयं उस बिंदु पर खड़े हों। अन्यथा धर्म चर्चा परानुभूति के प्रवचन से अधिक कुछ नहीं है।
मैं पग-पग पर इन चरित्रों से प्रेरणा प्राप्त करता हूँ। सर्दी लगी तो दिगम्बरत्व का ध्यान कर लिया। गर्मी लगी तो सिर पर जलती सिगड़ी को भूलकर साधनारत रहे मुनि का स्मरण हो आया। परिवेश के व्यवधान किसी कार्य में विघ्न बनने लगे तो ध्यानमग्न बाहुबली के हाथ-पैरों पर लिपटी लताएँ ध्यान आ गयीं। अपने भाग्य पर क्रोध आया तो बेड़ियों में बंधी चंदनबाला ने हौसला दिया।
कुल मिलाकर जीवन की स्लेट पर अनुभव ने जो इबारत लिखी है उसमें उन सब कथाओं का उजाला है, जो बचपन से लेकर अब तक आगम के प्रथम सोपान पर पढ़ी-सुनी हैं। कुल मिलाकर हम सबके जीवन में धर्म बार-बार अवसर लेकर आता है कि हमें उल्लेखनीय बनाया जा सके। कुल मिलाकर आत्मबल और विवेक के अभाव में हम उल्लेखनीय हो जाने के प्रत्येक अवसर पर सामान्य हो जाना सरल समझते हैं। कुल मिलाकर परिस्थितियों से जूझने में आगम को स्मरण रखने वाले लोग, आगम को नियमित रूपेण पूजने वाले लोगों से अधिक सम्यकदृष्टि हैं।

✍️ चिराग़ जैन

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