+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

मददगारों के नाम पाती

सद्भावना युक्त मित्रो!
कोरोना की इस महामारी में आपके प्रयास स्तुत्य हैं। आपकी नीयत पर भी कोई संदेह नहीं है, लेकिन किसी को भी मदद भेजने से पहले कृपया निम्न बातों का ध्यान रखें-
1) संकट में फँसे व्यक्ति को केवल वही जानकारी भेजें, जिसकी आपकी टीम ने पिछले 24 घण्टे के भीतर स्वयं पड़ताल की है।
2) सोशल मीडिया पर चल रहे किसी भी फॉरवर्ड सन्देश को अग्रेषित करने से बचें, क्योंकि इन्हीं संदेशों की वायरल क्षमता का लाभ उठाकर ठग और मुनाफाखोर अपना काम कर रहे हैं।
3) यदि हर व्यक्ति स्वयं वेरिफाई करेगा तो वह नम्बर रेस्पॉन्स करना बंद कर देगा इसलिए इसके लिए अपनी टीम में एक व्यक्ति नियुक्त करें।
4) मरीज़ के साथ जीवन के लिए जूझ रहे लोग घबराए हुए हो सकते हैं, ऐसे में अपने विवेक को बचाए रखना आपकी ज़िम्मेदारी है। उनके रुदन से द्रवित होकर उतावलेपन में उन्हें अपुष्ट जानकारी भेजने की ग़लती न करें। उन्हें कहें कि आप अपने प्रयास जारी रखें, कोई कन्फर्म लीड मिलते ही आप उन्हें कॉल करेंगे।
5) अगर किसी अस्पताल की वैकेंसी के बारे में आपको जानकारी नहीं है तो भी किसी को उस अस्पताल का विकल्प बताते समय यह अवश्य बताएँ कि वहाँ क्या-क्या सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
6) चिकित्सा करना आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, इसलिए किसी के लाख बार कहने पर भी किसी को कोई चिकित्सकीय सलाह न दें। बल्कि उसके लिए फोन पर कोई डॉक्टर उपलब्ध कराने का प्रयास करें।
7) सोशल मीडिया पर कोई लीड पोस्ट न करें। जिसे आवश्यकता हो उसे वेरिफाइड लीड इनबॉक्स में ही दें।
8) अपेक्षित सहायता पहुँचने के बाद अपने सोशल मीडिया हैंडल से उसकी अपील डिलीट करना न भूलें। यह बेहद आवश्यक है।
9) यदि आप किसी को कोई मदद करने की स्थिति में नहीं हैं तो उसको मना करना सीखें।
10) जो व्यक्ति आपको अपुष्ट फारवर्ड भेज रहा है उसे ऐसा करने के लिए मना करें।

बिना देखे, सौ मील का सफ़र तय करने से बेहतर है कि देखकर दस क़दम चला जाए।
✍️ चिराग़ जैन

मदद की गुहार

मनुष्यो!
हमारे साथ लगभग डेढ़-दो सौ युवा अनवरत गिलहरी की भूमिका में इस विपत्ति से लड़ रहे लोगों की सहायता का प्रयास कर रहे हैं। इन्हें न बदले में कोई धन्यवाद चाहिए न तमगा!
इनके प्रयासों ने विवशता के रेगिस्तान में खड़े कई प्यासे लोगों का गला तर भी किया है और कुछ तक बस एकाध बून्द ही पहुँचा सके हैं। कहीं-कहीं एक बून्द भी पहुँचाने में सफलता नहीं मिली है। लेकिन जिस भी दिशा से किसी मदद की गुहार आई, ये मरहम लेकर उस दिशा में दौड़े ज़रूर हैं।
मदद हो जाने के बाद हम उसके लिए पोस्ट की गई अपील भी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से डिलीट कर देते हैं ताकि अंधाधुंध फॉरवर्ड करनेवालों की टोकरी में वह संदेश न चला जाए।
यह जटायु का रावण से संग्राम है। यह जुगनू की अंधेरे से जंग है। इस युद्ध में जुटे योद्धाओं की ताक़त देश के सामान्य परिवारों में बसनेवाले वो सद्भाव हैं जो किसी न किसी तरह से किसी की मदद करना चाहते हैं लेकिन वास्तविक ज़रूरतमंद तक पहुँचने का ज़रिया उनके पास नहीं है।
पिछले 12-15 दिन के दौरान इन नन्हीं गिलहरियों ने काफी हद्द तक आँसू और ग्लीसरिन में अंतर करना सीख लिया है। आप यदि कोई मदद करने के इच्छुक हैं तो हमसे सम्पर्क कीजिये।
ज़रूरी नहीं कि आपको स्वयं ही कोई मदद करनी होगी। आप अपने आस-पड़ोस में उपलब्ध कोविड सम्बन्धी किसी सेवा की ‘बिल्कुल सटीक’ जानकारी भी भेज देंगे तो भी उससे अनेक लोगों का लाभ होगा।
कृपया व्हाट्सएप और फेसबुक पर चल रहे किसी भी संदेश को बिना वेरिफाई किये न भेजें। आप केवल उसी सेवा की सूचना भेजें जो स्वयं आपके द्वारा उपलब्ध कराई जा रही हो अथवा जिसके विषय में आपने पूरी आश्वस्ति कर ली हो।
आपकी सेवा किस शहर के लिए है, यह अवश्य लिखें।
किसी भी मददगार का नम्बर सार्वजनिक नहीं किया जाएगा और आपके पास सीधे मरीज़ के परिजन का ही फोन आएगा।
सोशल मीडिया पर सेवा का कई क्विंटल कचरा घूम रहा है। इस कचरे के ढेर में से असली सूत्र ढूंढने में हमारी मदद करें।
और हाँ, हमें आर्थिक मदद के लिए तभी सम्पर्क करें जब हम इसके लिए कोई अपील पोस्ट करें।
एक लास्ट रिक्वेस्ट, व्हाट्सएप पर केवल आवश्यक सूचना ही भेजें। प्रशंसा के सन्देश पढ़ने में जो समय नष्ट होता है उसका सदुपयोग कर हम कोई लीड ढूंढ़ लेंगे।
✍️ चिराग़ जैन

क्या मृत्यु भी प्रतिशोध का अवसर है?

मन की विकलता ने आँखों से नींद छीन ली है। यद्यपि कठिन था, लेकिन मानव की मृत्यु के समाचार सुन-सुनकर भी मैं किसी तरह ख़ुद को थामे हुए था। लेकिन आज मैंने अपनी आँखों से मानवता की मृत्यु का दृश्य देखा। इन चीत्कारों के बीच कुटिल मुस्कान और अट्टहास के वैभत्स्य ने आत्मा को छलनी कर दिया।
आह! ये किस समाज में श्वास ले रहे हैं हम लोग! किसी की मृत्यु भी उपालम्भ, उपहास अथवा प्रतिशोध-प्रदर्शन का ‘अवसर’ हो सकता है… यह अविश्वसनीय सत्य आज मेरी आँखों के सामने था। हालाँकि लगभग ऐसा ही नंगा नाच हम गौरी लंकेश, इरफान, सुशांत सिंह राजपूत, ऋषि कपूर और राहत इंदौरी के निधन पर भी देख चुके हैं। तब भी संवेदनाएँ इस कृत्य से आहत हुई थीं; लेकिन न जाने आज क्यों यह दृश्य कुछ अधिक ही विदीर्ण कर गया।
आज पूरे देश में मातम पसरा है। मृत्यु किसी बवंडर की तरह सबको अपने आगोश में समेटे लिए जा रही है। चिता, लाश, श्मशान, श्रद्धांजलि जैसे शब्दों के हम नियमित प्रयोक्ता बन गए हैं। इस स्थिति में भी समाज प्रतिशोध की ज्वाला बचाए रख पाया है और वह भी इतनी वीभत्स की जिसको सोचने भर से जी घृणा से भर जाता है।
यदि इन्हीं सब मनुष्यों के बीच रहना मानव जीवन की विवशता है तो मुझे उन लोगों से ईर्ष्या हो रही है जो यह सब देखने से पहले ही चिरनिद्रा में लीन हो गए।
इस दुनिया में इतने सारे वाद, इतनी सारी विचारधाराएँ, इतने सारे धर्म, इतने सारे सम्प्रदाय, इतनी सारी जातियाँ, इतने सारे पंथ और इतने सारे रंग भर गए हैं कि बेचारी मनुष्यता के लिए जगह ही कहाँ बची है।
लेकिन आज एक बात बिल्कुल साफ हो गयी कि जो भी व्यक्ति किसी वाद, विचारधारा या अन्य किसी भी शब्द के नाम पर अकड़ कर खड़ा है, उसके पैर उस लाश पर जमे हुए हैं, जिसमें कभी उसकी मनुष्यता श्वास लेती थी।
✍️ चिराग़ जैन

अंधेरे में रौशनी का अनुमान

यह समय अगर गुज़र भी गया तो इसके बाद दुनिया वैसी ही होगी जैसा नादिरशाह के आक्रमण के बाद दिल्ली का लालकिला था या जैसा महाभारत के युद्ध के बाद हस्तिनापुर था। जिनके होने से सब कुछ अच्छा लगता था, वो अपने इस दौर में हमसे दूर चले जा रहे हैं। हर आँख नम है, हर आंगन में मातम है; हर श्मशान भभक रहा है। इन सबके बिना दुनिया बची भी तो उंगलियों के बिना सितार का करेंगे क्या? अधर ही न रहेंगे तो वंशी से सुर नहीं, कराह निकलेगी।
राजनीति, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, कला, साहित्य, संगीत, अभिनय, अध्यात्म… कौन-सा ऐसा गलियारा है जहाँ से कोई जनाज़ा न निकला हो। अल्लाह के बंदे हों या राम के वंशज; महावीर के अनुयायी हों या नानक के प्यारे; सब अपनी-अपनी आस्था की देहरी पर घुटने टेक रहे हैं; लेकिन किसी आसमान से कोई मदद नहीं उतर रही।
वो रात-रात भर के जलसे; वो संगीत की लहरियाँ; वो ढोल-नगाड़े; वो शहनाइयाँ; वो उत्सव; वो रथयात्राएँ; वो प्रभात फेरियाँ, वो मॉर्निंग वॉक, वो ईवनिंग क्लब्स, वो किटी पार्टियाँ… यह सब कुछ दुनिया में फिर से लौट पाएगा या नहीं इसका सटीक उत्तर कोई नहीं दे पा रहा।
सबके मन में एक अजीब-सा भय घर कर रहा है। सब एक अनचाही आशंका को निश्चित मान चुके हैं; लेकिन विध्वंस के इस खौफ़नाक सन्नाटे में यदि जीवन का संगीत बजाने की कोशिश जारी रही तो एक दिन सन्नाटे को चहल-पहल के आगे आत्मसमर्पण करना ही होगा।
जो लोग छूट रहे हैं उनके अन्तिम क्षणों में हमारी जिजीविषा यह आश्वस्ति दर्ज करेगी कि यह संसार बचा रहेगा। उनकी लिखी कविताएँ, उनके बनाए राग, उनकी सजाई कलाकृतियाँ एक दिन फिर से इस संसार का सौंदर्य बढ़ाने के काम आएंगी।
इस सब सृजन को जीवित रखने के लिए हमें तब तक हिम्मत बनाए रखनी होगी जब तक इस संसार में जीवन की एक भी निशानी शेष है। हमें यह नहीं भूलना होगा कि उन रचनाकारों को श्रद्धांजलि देते हुए हमने बार-बार लिखा है कि दद्दा! आप अपनी रचनाओं में हमेशा जीवित रहोगे।
✍️ चिराग़ जैन

हम जड़ हो गए हैं

समय का जो चेहरा इस समय यह विश्व देख रहा है, उसकी मनुष्य ने कल्पना भी नहीं की होगी। लेकिन समय, मनुष्यता का जो आचरण इस समय देख रहा है, उसकी समय ने भी कभी कल्पना नहीं की होगी!
ऐसा लग रहा है कि कोई हाथ से सब कुछ छीने लिए जा रहा है। जिनके साथ रोज़-रोज़ यात्राएँ कीं, जिनके साथ रातें काली कीं, जिनको दद्दा कहा, जिनसे दद्दा सुना… वो यकायक हमसे किसी ने छीन लिये। और हम इतने लाचार की जिनकी अटैची उठाई उनको आखि़री बार कंधा भी न दे सके! हथेली में रेत की चमकीली चुभन भी पसीज कर पिघल चुकी है। देह का रोम-रोम शोकग्रस्त है। मन पथरा गया है। और मैं अपनी संवेदनाओं को मौन की शिला में दुबकाए अहल्या मुद्रा में यह सोच रहा हूँ कि मेरी नियति में यूँ ही लाचार खड़े होकर ख़ुद को ख़ाली होते देखना लिखा है अथवा मेरे भाग्य में इन तस्वीरों में शामिल होकर मुस्कुराना तय है। 3 अप्रेल को छत्तीसगढ़ में एक कवि-सम्मेलन में मुझे राजन जी के साथ जाना था, कोरोना के कारण वह कार्यक्रम कैंसिल हुआ तो राजन जी का फोन आया कि यह तो गया, लेकिन अपन जल्दी ही मिलेंगे। …दद्दा! झूठ बोल गए आप मुझसे। अब हम कभी नहीं मिलेंगे। उस दिन मैं बहुत देर तक रोता रहा था दद्दा! उस दिन मुझे दिन भी अंधियारा लगता रहा था। कमलेश द्विवेदी जी से बहुत अधिक संवाद नहीं था, लेकिन मेरी फेसबुक पोस्ट पर उनकी समीक्षात्मक टिप्पणी लगभग आती ही थी। यदा-कदा फोन करके भी समालोचना करके आशीर्वाद दे देते थे। आप भी चले गए यूँ ही…! आखि़री बार टोका भी नहीं, सराहा भी नहीं। समीक्षा विशाल जी का गीत ‘कविग्राम’ में छपा तो आपने साधुवाद का फोन किया था। अब न आप हैं, न समीक्षा जी…! और कुँअर दा आप…! अभी तो बता रहे थे कि ठीक हो रहा हूँ। निश्चिंत से हो गए थे हम सब। लेकिन दुनिया भर की चिंताओं पर प्यार के छींटे देकर कैसे चुपचाप चल दिये…! यह भी कोई व्यवहार हुआ! आप तो ऐसे न थे। आप तो सामाजिक व्यवहार में निष्णात थे। आप तो किसी कवि सम्मेलन से भी बिना बताए नहीं जाते थे। आप तो किसी के निःशुल्क निमंत्रण को भी इस संकोच में मना न कर पाते थे कि उसका दिल दुःखेगा…! आज क्या हो गया दद्दा! आज सबको रोता छोड़ गए। इस समय तो आपके इस कुनबे को आपकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी कुँअर दा! छोटे-छोटे फूल से बच्चे इस दिवंगत सूची में छापते हुए कलेजा दो टूक हो गया है। आह! इन सबसे तो अभी काफी व्यवहार करना था। लड़ना था, स्नेह करना था… कभी-कभी डाँटना भी था! कुछ न हो सका। मृत्यु के इस चक्रवात ने नन्हें-नन्हें फूलों को भी नहीं बख्शा! हमें चुप कराने मत आना… क्योंकि हम रो नहीं रहे हैं… हम जड़ हो गए हैं।
✍️ चिराग़ जैन

कोविड डायरी

अगर नल और नील सेतु-निर्माण में क्रेडिट-गेम खेलते रहे, तो सीता माता की प्रतीक्षा पथरा जाएगी!
जब सारी सेना थक जाये तब भी तलवार न छोड़नेवाला योद्धा ही याद रखा जाता है!
✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!