Chirag Jain Writings, Diary, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry, Prose
कविता मेरे अस्तित्व का आधार है। यदि मुझसे मेरी कविताओं को श्रेणीबद्ध करने को कहा जाए तो मैं अपनी तमाम रचनाओं को दो वर्गों में रखूंगा- एक ‘मंच की कविता’ और दूसरी ‘मन की कविता’। ‘मंच की कविता’ रोज़ रात को कवि-सम्मेलनों में तालियाँ और वाह-वाही लूटती फिरती है। लेकिन ‘मन की कविता’ ऐसा नहीं कर पाती। वह किंचित संकोची है, मेरी तरह। वह मेरे नितान्त एकाकी क्षणों में मेरे चारों ओर लास्य करके संतोष प्राप्त कर लेती है।
यात्राओं से थका-हारा जब बिस्तरानुगामी होता हूँ तो हौले से आकर मेरे सिरहाने बैठ जाती है, कभी नयन कोर पर आ ठहरती है, तो कभी अधरों पर एक मुस्कान का चुंबन जड़ जाती है। इसे शोर-शराबा, हो-हल्ला और भीड़-भाड़ कतई पसंद नहीं। यह तो बेहद सरल शब्दों का चोगा पहने मुहल्ले की उस अनपढ़ गृहिणी सी मेरे साथ चलती है, जिसकी उपस्थिति को तो मैं अनदेखा कर सकता हूँ लेकिन उसकी अनुपस्थिति की ख़लिश को नहीं।
इन कविताओं ने कभी मुझसे झगड़ा नहीं किया, कभी रूठी भी नहीं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से एक ख़्वाहिश करने लगी थीं। एक ज़िद्द सी कर रही थीं। मैं इस ज़िद्द से परेशान न हुआ। बल्कि मुझे ऐसा लगा जैसे कोई छोटी सी बच्ची मेरे वक़्त के बटुए में से चार-आठ आने की मांग कर रही हो। तेज़ भागती ज़िन्दगी के बीच भी मुझे यह मांग नाजायज़ न लगी।
बस, यकायक धारणा की कि नया संग्रह प्रकाशित होना है। बेतरतीब सफ़हों पर बिखरा ख़ज़ाना देखते ही देखते किताब की शक़्ल में ढल गया। पुस्तक प्रकाशन के निश्चय से अब तक की यात्रा स्वतः एक कविता में उतर आई है-
आजकल
अपनी ही लिखी हुई
कविताओं से बतियाता हूँ।
सहेजता हूँ उनको
एक-एक कर।
…कई दिन से ज़िद्द किये बैठी थीं
कहती थीं-
“हमें जिल्द में बांधों।”
आख़िर माननी ही पड़ी
उनकी बात।
अब इस पर झगड़ा है
कि पहले कौन?
लड़ाकी हो गई हैं
सारी की सारी।
सोने देती हैं
न बैठने।
…लगाए रखती हैं
हिल्ले से।
सचमुच!
बेटी ब्याहने जैसा काम है
किताब बनाना।
✍️ चिराग़ जैन
# “मन तो गोमुख है” संग्रह की भूमिका
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छाप-छूप कर अख़बार
एक सनसनीबाज़ पत्रकार
रात तीन बजे घर आया
तकिये में मुँह छुपाया
और चादार तान के सो गया,
इतनी देर में उसका अख़बार
जनता के हवाले हो गया।
इधर पत्रकार चैन से
खर्राटे भर रहा था,
उधर उसका अख़बार
दुनिया की नाक में दम कर रहा था।
दोपहर की पावन बेला में
जब बिस्तर ने पत्रकार से निज़ात पाई,
तब तक पत्रकार को भूख लग आई।
पत्नी थाली लेकर आई,
तो पत्रकार ने उस पर अपनी खोजी दृष्टि घुमाई।
सबसे पहले उसने माथे से लगाई दाल,
और बड़बड़ाते हुए बोला- “धन्यवाद तरुण तेजपाल”।
फिर रोटी को करते हुए प्रणाम,
नमस्कार की मुद्रा में बोला- “जय हो बाबा आसाराम”।
देख कर थाली में वेज पुलाव,
आकाश की ओर सिर उठाकर बोला-
“धन्य हैं इस देश का साम्प्रदायिक तनाव”।
किसी ने कोई विवादास्पाद बात कही,
इसलिये थाली में शामिल हुआ दही।
फिर से बढ़ने लगा है कोई चुनावी विवाद,
तभी थाली को नसीब हुई है सलाद।
अब बस पाकिस्तान जी थोड़ी सी हैल्प कर दें,
तो बरसों से प्यासा गिलास
व्हिस्की की ख़ुश्बू से भर दें।
कुल मिलाकर
थाली में देश के सारे मुद्दे शामिल थे,
कुछ त्रासदी थे
कुछ अत्याचारी थे
और कुछ क़ातिल थे।
लेकिन पत्रकार
देखते ही देखते
सब कुछ पचा गया,
और शाम होते होते
अगले दिन की थाली सजाने
अख़बार के दफ़्तर में आ गया।
✍️ चिराग़ जैन
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“ओहो!
कितना कूड़ा हो गया।
आग लगे इस मौसम में।
मार आंधी-तूफ़ान…
सारे आंगन में कीचड़ हो गई।
देखियो,
उधर सारी अंबियाँ झड़ गईं।
कैसी हरी डाल टूट गई नीम की!
…इस रामजी को भी चैन ना है!
कै तो पसीना चुआवै
कै ऐसा तूफान मचावै।”
अपने आपसे बतियाती हुई
पानी सूँत रही है नानी।
और
हौले से सूरज चमका कर
हैल्प कर रहे हैं
शर्मिंदा रामजी!
✍️ चिराग़ जैन
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युग बीत गये हैं अब
प्रकृति, बरखा
या दर्द
सहायक सामग्री
नहीं है अब
कविता के लिये!
…अब नहीं जन्मती कविता
वियोग या संयोग से!
आजकल
फ़ेसबुकिये हो गये हैं
वाल्मीकि और तुलसीदास!
“ब्लॉगर होगा पहला कवि
पोस्ट से उपजा होगा गान!”
✍️ चिराग़ जैन
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दिल की ज़मीन पर जो इक बीज पड़ गया है
हर हाल में फलेगा, ये सृष्टि का नियम है
कोई विचार मन में, आकर ठहर गया तो
जन्मों-जनम पलेगा, ये सृष्टि का नियम है
सुख-दुख के चंद पल हैं, जीवन जिसे हैं कहते
युग-युग के चक्करों में, बिन बात फँसते रहते
अज्ञानवश जो अपना गुलशन उजड़ गया है
वो ध्यान से खिलेगा, ये सृष्टि का नियम है
अन्तस् में हो गया जब, विश्वास का उजाला
अमृत बना दिया था, मीरा ने विष का प्याला
वरदान में न रखना, संकोच और शंका
विश्वास से मिलेगा, ये सृष्टि का नियम है
ये स्वर्ग-नर्क की सब, चर्चा उधार की है
जिस पर जहाँ टिका है, ताक़त विचार की है
मस्तिष्क में उपज कर, जो सोच में पला है
सच में वही घटेगा, ये सृष्टि का नियम है
✍️ चिराग़ जैन
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जाने ये कैसा बदरा है
बदरा के भीतर मदिरा है
जब छलकी तो सब झूम उठे
जैसे मृदंग से धूम उठे
पीपल ने छेड़ी तान अलग
बूंदों ने गाया गान अलग
पुरवा ने ऐसा रास रचा
बिजुरी ने जी भर नाच नचा
पंछी कलरव करते डोले
कच्चे स्वप्नों ने पर खोले
बचपन बौराया तब भू पर
हाथों से बूंदें छू-छू कर
ऐसा मेघों में रोर हुआ
इक उत्सव-सा हर ओर हुआ
धुल गई धरा, खुल गई पवन
पावन पावन है अंतर्मन
श्वासों में शीतलता आई
नयनों में चंचलता छाई
सब कष्ट ग्रीष्म के भूल गए
बागों में झूले झूल गए
जिस क्षण जल से संलिप्त हुई
वसुधा की तृष्णा तृप्त हुई
ऐसा मौसम का ज्वर आया
प्यासों में पानी भर आया
जाने ऐसा क्या कृत्य करा
सब कुछ लगता है हरा-हरा
✍️ चिराग़ जैन