Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सामने आ गए आज फिर हम
आज फिर से संभलना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा
आँख से तुम बरसने न दो बदलियाँ
काँपकर सब बयां कर न दें उंगलियाँ
चल न आना मेरी ओर सब भूलकर
बोलने लग न जाएँ कहीं पुतलियाँ
नेह को कब दिखी कोई सीमा
देह को ही समझना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा
उस घड़ी किस तरह से जिया जाएगा
तुमको परिचय हमारा दिया जाएगा
साँस की चाल कैसे रहेगी सहज
होंठ को किस तरह से सिया जाएगा
जब संभाले न संभलेंगे आँसू
उस घड़ी खूब हँसना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा
अपनी चाहत से नज़रें चुराते हुए
जी रहे थे स्वयं को भुलाते हुए
भाग्य, जिसने हमें तब अलग कर दिया
आज हिचका न हमको मिलाते हुए
तब बिछड़कर सिसकते थे हम-तुम
आज मिलकर सिहरना पड़ेगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Poetry, Purushottam
Chirag Jain Writings, Poetry, Purushottam
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जब सब पंछी मौन हो गए
कलरव के स्वर गौण हो गए
जीवन की रफ़्तार सो गई
दिन पर रात सवार हो गई
ऐसा एकाकी पल पाकर मन हमको झकझोर उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा
कितनी इच्छाएँ प्यासी थीं, कितने काम अधूरे निकले
डुगडुगियों पर नाच रहे थे, हम तो एक जमूरे निकले
कर को कमल, पदों को पंकज मान रही थी दुनिया लेकिन
हमने अपनी शाख टटोली, उस पर सिर्फ़ धतूरे निकले
जब सारे पाखण्ड सो गए, तब भीतर का चोर उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा
पिण्डलियों ने ताने मारे, रीढ़ दुखी, सिसकी-सी आई
ऐंठे-ऐंठे कन्धे देखे, अकड़ी-अकड़ी गर्दन पाई
आँखों में अंगार भरे थे, पलकों पर पर्वत लटके थे
माथे की नस ने भी उस पल शायद कोई गारी गाई
तन की अनदेखी का किस्सा होकर कुछ मुँहज़ोर, उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा
दिन में फिर भी छिप सकते हैं, रातों में कुछ ओट नहीं है
रातें जिसको देख न पायें, ऐसा कोई खोट नहीं है
आँसू से आँखें धुल जायें तो शायद आराम मिले कुछ
वरना अंतर्मन के शब्दों से बढ़कर तो चोट नहीं है
मन हल्का होकर सोया तो, लेकर नयी हिलोर उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
आंधी के आघात सहे हैं
ये शाखों के साथ बहे हैं
सूखे हुए पड़े जो भू पर
इनके कोमल गात रहे हैं
हर मौसम से जूझे हैं ये, जूझे हैं, फिर टूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं
तूफानों का वेग सहा है, अब झोंकों से डरते हैं ये
अपनी पूरी देह कँपाकर, उपवन में स्वर भरते हैं ये
मिट्टी में मिलकर भी अपना, कण-कण उपवन को देते हैं
कोंपल को भोजन मिल पाए, इस कोशिश में मरते हैं ये
जिनको धूर्त समझते हो तुम
ये कल तक भोले-भाले थे
जो सूखे बदरंग हुए हैं
कल तक ये भी हरियाले थे
शुष्क हवा के हाथों छलकर, अब ये ख़ुद से रूठ गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं
जिनको पग-पग खोट मिला हो, वे जन खरे नहीं रह पाते
जो पत्ते अंधड़ से जूझे, फिर वो हरे नहीं रह पाते
आदर्शों के सपने छोड़ो, कड़वी मगर हकीकत ये है
जिनसे सबने प्यास बुझाई, वे घट भरे नहीं रह पाते
इतनी काली रात नहीं थी
ऐसी कठिन बिसात नहीं थी
डाली ने उकसाया वरना
आंधी की औकात नहीं थी
अंधड़ आया, डाली लचकी, ठूठ मुनाफा लूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं
साथी अवसरवादी निकले, बीच युद्ध में बात बदल ली
अड़ने की आदत थी उनकी, वह आदत उस रात बदल ली
तेज़ हवा ने वार किया तो डाली झूम-झूमकर नाची
तनकर खड़े तने ने झुककर, पल में अपनी जात बदल जी
जिसकी देह पड़ी धरती पर
उसने प्रण को पूजा होगा
लेकिन इतना तो निश्चित है
जो हारा, वो जूझा होगा
जिसने केवल जान बचाई, उसके दर्पण टूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
मैंने काँच से सीखा है
कि
दुनिया को
सच दिखाने के लिए
छोड़ना ही पड़ता है
पारदर्शी स्वभाव
✍️ चिराग़ जैन