Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
अक्ल समय पर आ जाती, चिड़िया खेत न चुग के जाती
हाथ बँटाते सब साथी, चिड़िया खेत न चुग के जाती
जनता की चिंता से पहले ही झोली भर लेते
आज किया है जो गठबंधन वो पहले कर लेते
तो ये आफत ना आती, चिड़िया खेत न चुग के जाती
चाचा और भतीजा है गए, ईगो वाले रोगी
गैया पाली अखिलेशों ने, दूध पी गए योगी
बूआ चौकस हो जाती, चिड़िया खेत न चुग के जाती
तोप दिखी तो एक हो गए, हँसिया, तीर, कटारे
बच कर रहना आपस में ही लड़ ना बैठें सारे
इनमें पहले बन जाती, चिड़िया खेत न चुग के जाती
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
लल्ला का है गो कैराने में
जल गई काठ की हांडी
वोटर नाय आयो बहकाने में
जल गई काठ की हांडी
रोड बनाकर जाल बिछायो
ख़ूब सड़क को शोर मचायो
योगी ने भी ज्ञान पिलायो
सबने पूरा जोर लगायो
साबुन गिर गी बीच नहाने में
जल गई काठ की हांडी
फिर कीकर पे आम न आए
वोट दिलाने राम न आए
क्यों जुमलों के दाम न आए
जिन्ना भी कछु काम न आए
जमकर वोट पड़ी धौलाने में
जल गई काठ की हांडी
गन्ना सूखा आशा टूटी
कब तक चाटें सूखी बूटी
भरे कुएँ में डोरी छूटी
याय लिए जे जनता रूठी
कछु नाय रखौ खलिश इतराने में
जल गई काठ की हांडी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
रौशनी पर तो किसी का भी इख़्तियार नहीं
जिस जगह रास्ता देखेगी, चली आएगी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
आदमी की ज़िन्दगी ईवेंट मेनेजमेंट है
मौत उसकी ज़िन्दगी का आख़िरी ईवेंट है
जिस्म इक होटल है जिसमें रूह इक टेनेंट है
साँस इस होटल में रहने के लिए बस रेंट है
साँस रहने तक जियोगे, ये तो एग्रीमेंट है
किस तरह जीना है अब ये आपका टैलेंट है
हर बशर इक चमचमाती कार जैसा है हुज़ूर
कुछ के इंजन में ख़राबी, कुछ के ऊपर डेंट है
जो मिले, जैसा मिले, जब भी मिले, स्वीकार कर
टेंपरेरी ज़िन्दगी में कौन परमानेंट है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
कल तक हुजूर दिखते थे सादे, बदल गए
हालात बदलते ही इरादे बदल गए
शतरंज की बिसात पर जो तेज़ चले थे
देखो वज़ीर में वही प्यादे बदल गए
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
कब तक झुलसोगे इन झूठी सुविधाओं के अंगारों में
गर्म थपेड़े ठंडे होंगे अमराई के दरबारों में
जेठ तपा तो गर्म दुपहरी जब तन झुलसाने लगती है
तब गुमटी वाली इक अम्मा प्याऊ बैठाने लगती है
मिट्टी के मटके का पानी, तांबे के लोटे में भरती
ओक बनाकर, होंठ भिंगोकर, अंतर्मन तक शीतल करती
अंतर्मन नत हो जाता है उस बुढ़िया के आभारों में
गर्म थपेड़े ठंडे होंगे अमराई के दरबारों में
पेड़ तले इक खाट बिछी है, थकन मिटानी हो तो आओ
डाल पके आमों की रुत है, जितना मन हो उतना खाओ
उन बागों में मोबाइल का टॉवर गायब हो जाता है
माथे पर जो शोर मचा है, पल भर में ही खो जाता है
इस सुख का कोई विज्ञापन कब छपता है अखबारों में
गर्म थपेड़े ठंडे होंगे अमराई के दरबारों में
✍️ चिराग़ जैन