+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

कैराना उपचुनाव

अक्ल समय पर आ जाती, चिड़िया खेत न चुग के जाती
हाथ बँटाते सब साथी, चिड़िया खेत न चुग के जाती

जनता की चिंता से पहले ही झोली भर लेते
आज किया है जो गठबंधन वो पहले कर लेते
तो ये आफत ना आती, चिड़िया खेत न चुग के जाती

चाचा और भतीजा है गए, ईगो वाले रोगी
गैया पाली अखिलेशों ने, दूध पी गए योगी
बूआ चौकस हो जाती, चिड़िया खेत न चुग के जाती

तोप दिखी तो एक हो गए, हँसिया, तीर, कटारे
बच कर रहना आपस में ही लड़ ना बैठें सारे
इनमें पहले बन जाती, चिड़िया खेत न चुग के जाती

✍️ चिराग़ जैन

कैराना उपचुनाव

लल्ला का है गो कैराने में
जल गई काठ की हांडी
वोटर नाय आयो बहकाने में
जल गई काठ की हांडी

रोड बनाकर जाल बिछायो
ख़ूब सड़क को शोर मचायो
योगी ने भी ज्ञान पिलायो
सबने पूरा जोर लगायो
साबुन गिर गी बीच नहाने में
जल गई काठ की हांडी

फिर कीकर पे आम न आए
वोट दिलाने राम न आए
क्यों जुमलों के दाम न आए
जिन्ना भी कछु काम न आए
जमकर वोट पड़ी धौलाने में
जल गई काठ की हांडी

गन्ना सूखा आशा टूटी
कब तक चाटें सूखी बूटी
भरे कुएँ में डोरी छूटी
याय लिए जे जनता रूठी
कछु नाय रखौ खलिश इतराने में
जल गई काठ की हांडी

✍️ चिराग़ जैन

ज़िन्दगी का आख़िरी ईवेंट

आदमी की ज़िन्दगी ईवेंट मेनेजमेंट है
मौत उसकी ज़िन्दगी का आख़िरी ईवेंट है

जिस्म इक होटल है जिसमें रूह इक टेनेंट है
साँस इस होटल में रहने के लिए बस रेंट है

साँस रहने तक जियोगे, ये तो एग्रीमेंट है
किस तरह जीना है अब ये आपका टैलेंट है

हर बशर इक चमचमाती कार जैसा है हुज़ूर
कुछ के इंजन में ख़राबी, कुछ के ऊपर डेंट है

जो मिले, जैसा मिले, जब भी मिले, स्वीकार कर
टेंपरेरी ज़िन्दगी में कौन परमानेंट है

✍️ चिराग़ जैन

प्यादे बदल गए

कल तक हुजूर दिखते थे सादे, बदल गए
हालात बदलते ही इरादे बदल गए
शतरंज की बिसात पर जो तेज़ चले थे
देखो वज़ीर में वही प्यादे बदल गए

✍️ चिराग़ जैन

अमराई के दरबारों में

कब तक झुलसोगे इन झूठी सुविधाओं के अंगारों में
गर्म थपेड़े ठंडे होंगे अमराई के दरबारों में

जेठ तपा तो गर्म दुपहरी जब तन झुलसाने लगती है
तब गुमटी वाली इक अम्मा प्याऊ बैठाने लगती है
मिट्टी के मटके का पानी, तांबे के लोटे में भरती
ओक बनाकर, होंठ भिंगोकर, अंतर्मन तक शीतल करती
अंतर्मन नत हो जाता है उस बुढ़िया के आभारों में
गर्म थपेड़े ठंडे होंगे अमराई के दरबारों में

पेड़ तले इक खाट बिछी है, थकन मिटानी हो तो आओ
डाल पके आमों की रुत है, जितना मन हो उतना खाओ
उन बागों में मोबाइल का टॉवर गायब हो जाता है
माथे पर जो शोर मचा है, पल भर में ही खो जाता है
इस सुख का कोई विज्ञापन कब छपता है अखबारों में
गर्म थपेड़े ठंडे होंगे अमराई के दरबारों में

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!