Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
आने वाली पीढ़ियों को
मेहनत करने से बचाएं
आओ, एक नया धर्म रचाएं!
धर्म रचने के लिए चाहिए
एक अदद इंसान
जो किसी भी सूरत में इंसान न हो।
जिसे भगवान बनाया जा सके
जिसके हर काम को
महान बताया जा सके
और जिसकी हर मूर्खता को
उसकी लीला कहकर भुनाया जा सके।
धर्म रचने के लिए चाहिए
ठाली लोगों का एक कोर ग्रुप
जो उस आम इंसान के चमत्कारों की
माउथ टू माउथ मार्केटिंग करे
पहली बार आने वाले हर शिकार को
स्पेशल फील कराने की सेटिंग करे
और सोशल मीडिया पर
नवजात भगवान की
सस्पेक्टिंग शिष्याओं से चैटिंग करे।
ये कोर ग्रुप तिनके को भी
बांस की तरह तना देता है
और पड़ोसी के झगड़े को भी
देवासुर-संग्राम बना देता है।
ये ठाली कोर ग्रुप
मार्किट में खड़ा होके
’आइए भैनजी’ की आवाज़ लगाता है
और कोई साड़ी मांगे या सूट
उसे धर्म के शोरूम तक ले आता है
शोरूम तक लाने का जिम्मा क़द्रदान का है
और आगे का काम भगवान का है।
ख़ुद पर यक़ीन न करने वाले लोग
ऐसे भगवानों पर
आसानी से यक़ीन कर लेते हैं
और आश्रमों को धनवान बनाने के लिए
ख़ुद को दीन-हीन कर लेते हैं।
जैसे जैसे बढ़ने लगता है ग्रेड
वैसे वैसे मिलने लगती है एड
जैसे जैसे चमकने लगता है धंधा
वैसे वैसे बरसने लगता है चंदा
जब मंत्री से लेकर संतरी तक
आश्रम में पैर फेरने लगते हैं
तब भगवान धर्मोत्थान के लिए
सरकारी ज़मीनें घेरने लगते हैं
जब ठीक से बजने लगता है
भगवान का डंका
पूरी तरह सेटल हो जाती है
रावण की लंका
तब भक्तों को बना लिया जाता है हथियार
चुनाव से लेकर
घेराव तक का किया जाता है व्यापार
भक्तों के पास दो ही काम होते हैं
भगवान की रक्षा के लिए लड़ना
और भगवान की भक्ति करना
जो भक्त भगवान की शरण में आए थे
वे ही भगवान की रक्षा करने लगते हैं
मादा भक्त भगवान पर मरती फिरती हैं
और नर भक्त भगवान के लिए मरने लगते हैं
और भगवान के मर जाने के बाद
आश्रम में रह जाते हैं भगवान के आदमक़द चित्र
अब धर्म धारण करता है अपना असली चरित्र
शरीर मिट गया रह गई छाया
जैसे काजू के फल से काजू निकल आया
अब भगवान वह सब कुछ कर सकता है
जो जीते जी नहीं कर पाया
जो भक्त अब भी भगवान पर विश्वास करता है
भगवान उन भक्तों के बच्चों को पास करता है
ऑफिस में प्रमोशन दिलाता है
कन्याओं की शादी कराता है
भक्ति में डूबने वालों को मज़ा देता है
धर्म के विरोधियों को सज़ा देता है
भक्तों के सारे काम करता है
और रात रात भर सपनों में विचरता है
बुद्धि के तर्क बेकार जाते हैं
नियम-क़ानून हार जाते हैं
आस्था जीत जाती है
और भगवान की भक्ति में
कई पीढ़ियों की ज़िंदगी बीत जाती है।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जब दिवाकर की तपिश के दाह से भयभीत होंगे
तब अंधेरे तिलमिलाकर रश्मियों से वैर लेंगे
जो भरी बरसात में भीगे हुए ठिठुरे फिरेंगे
वे अधम भोली बया की बस्तियों से वैर लेंगे
मंत्र-जप की साधना का सत्व जब संभव न होगा
तब करेंगे ढोंग इक पाखण्ड का चोगा पहन कर
जो जला बैठे स्वयं के हाथ समिधा चोरने में
प्रश्न लेकर वे खड़े हैं भक्ति के पावन हवन पर
मृत्यु के प्रख्यात सच को जब नहीं झुठला सकेंगे
तब अघोरी बेसहारा अरथियों से वैर लेंगे
कृष्ण जब षड्यंत्र के आमंत्रणों को भाँप लेंगे
तब विदुर के साग में कमियाँ निकालेगा सुयोधन
जब समर में जीतने की शक्ति पर संदेह होगा
रात में सोते हुओं को फूँक डालेगा सुयोधन
जो सुदर्शन से पराजित हो गए हर एक रण में
वे मधुर सरगम सुनाती वंशियों से वैर लेंगे
वृक्ष के तन पर नहीं चल पाएगा वश कोई जिसका
वो हवा सूखे हुए पत्ते हिलाकर ख़ुश रहेगी
योग्यता जिसमें न हो अट्टालिकाओं के परस की
वो लपट कुछ फूस के छप्पर जलाकर ख़ुश रहेगी
जो झखोरे सामधेनी को नहीं धमका सकेंगे
वे किन्हीं जलदीपकों की बातियों से वैर लेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
उमंग, शौर्य, शक्ति का अनन्त नित्यकोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
त्रिभुज, स्वरद, पणव सुसज्ज झल्लरी की गूंज है
सुरों की दिव्य देह ताल वल्लरी की मूँज है
महोत्सवों में बाँसुरी की तान का विधान है
समर समय में शंख के स्वरों का शौर्यगान है
समर्पणों को तूर्य की ध्वनि का पारितोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
नागांग, घोषदण्ड और आनकों का लास्य है
मृदङ्ग का वितान और गोमुखों का भाष्य है
हृदय धरा पे भूप, सोनभद्र का प्रवाह है
तिलंग-उदय-अजेय से शिथिल क्षणों का दाह है
अमर, अकंप, अप्रतिम, अथक, अजर, अदोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
ये श्रीनिवास सुब्बु के करों का घोषदण्ड है
ये दाते, बापुराव का प्रचण्ड शक्ति खण्ड है
किरण, तिलक-कामोद सम सृजन का दिव्य क्षेत्र है
ये केशवः की तर्जनी है शंकरः का नेत्र है
ये मेघ घोष, ब्रह्म घोष और सिंह घोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
सूरज आग उगलता हो
सिर पर मेघ मचलता हो
भीषण कोहरा पड़ता हो
अम्बर दिन भर जलता हो
हर मुश्किल को झेल गए हम मेहनत की तलवार से
हमें कष्ट होता है केवल शासन के व्यवहार से
मिट्टी सख्त हुई तो हम भी कंधे पर हल धर लाए
नाखूनों से नहर काट कर खेतों तक कलकल लाए
ओले बरसे नहीं हटे
पारा उछला वहीं डटे
आंधी आई अड़े रहे
जमा हुए हम नहीं घटे
हम हरदम बढ़कर जूझे है हर इक पारावार से
हमें कष्ट होता है केवल शासन के व्यवहार से
सूखी रोटी खाकर भी हम रह लेते खुशहाली में
कई पीढियां बीत गई हैं ऐसी ही कंगाली में
भीतर कितने शूल गए
जीवन का सुख भूल गए
बिटिया बिन ब्याही बैठी
बापू फाँसी झूल गए
दर्द हमारा आकर देखो, मत पूछो अखबार से
हमें कष्ट होता है केवल शासन के व्यवहार से
यही एक उम्मीद रखी है संसद के रखवालों से
बाजारों को मुक्त करा दो, चोरों और दलालों से
शासन सुख से सोता है
लहसुन धीरज खोता है
गन्ना सूखे खड़े-खड़े
प्याज आँख भर रोता है
श्रम को उसका मोल मिलेय इतना मांगा सरकार से
हमें कष्ट होता है केवल शासन के व्यवहार से
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
सबसे पहले नोट बन्द हुए
फिर आई जीएसटी
फिर भी यदि परमात्मा ने
किसी के मन में
कमाने-खाने की हिम्मत भर दी
तो हमने उसकी दुकान सील कर दी।
दुकान बंद पड़ी है
काम चौपट है
ऐसे में पेट्रोल तिजोरी में भरेगा क्या
जब घर से निकलना ही नहीं है
तो गाड़ी में तेल डलवाकर करेगा क्या?
केंद्र में विपक्ष नहीं
राज्यों में कांग्रेस नहीं
फेसबुक लायक फेस नहीं
पीएम लायक बेस नहीं
जिसके समर्थन में सभा कर दे
वह भारी मतों से हार जाता है
सभा कांग्रेस की होती है
और भाजपाई बाज़ी मार जाता है
अब घास फूस जैसी बची कांग्रेस को भी
घूम घूम कर चरेगा क्या
जब घर से निकलना ही नहीं है
तो गाड़ी में तेल डलवाकर करेगा क्या?
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
देश को सँवारने के क़ीमती ये दिन-रात
आप क्यों विपक्ष की नकेल में लुटा रहे
जनता के हाथों में से छीन के पुराने नोट
नए-नए नोट अब तेल में लुटा रहे
पार्टी को अरबों का दान जो मिला हुज़ूर
हाय उसे खच्चरों की सेल में लुटा रहे
थोक के व्यापार में कमाई हुई साख काहे
हर दो महीने में रिटेल में लुटा रहे
गाड़ी में नहीं है तेल, रोड पे नहीं है गाड़ी
इसलिए अब रोडरेज कम हो गया
लूटपाट की भी ख़बरों में कमी आ गई है
लॉन्ग ड्राइविंग वाला क्रेज कम हो गया
सड़कों के जाम से मुहाल था सफ़र अब
तेल के हुए जो दाम तेज, कम हो गया
बहुओं को फूंकने की हैसियत ही नहीं है
इसलिए ब्याह में दहेज कम हो गया
✍️ चिराग़ जैन