Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
एक ज़रा-सा झोंका आया
नैया ने खाये हिचकोले
जिन लहरों पर तैर रही थी
उन लहरों पर डगमग डोले
बस इतने भर से इस पल में हम पूरे मुस्तैद हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये
बदले-वदले भूल चुके हैं, सपने-वपने याद न आए
जैसे भी हो इन लहरों से नैया पार लगा ली जाए
जिनको हल करना है इस पल
कब वो प्रश्न बहुत गहरे हैं
इक नदिया है, इक नैया है
इक हम हैं और कुछ लहरें हैं
इस क्षण कहीं और देखा तो समझो हम नापैद हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये
जितनी जटिल समस्या होगी, उतना बड़ा सबक लाएगी
सुख में तो कुछ तिनके डाली पर कोयल भी रख आएगी
लेकिन जब आंधी आएगी
जब डाली से बौर झड़ेगा
तब अपने जीवन की रक्षा
पेड़ आम का स्वयं करेगा
वो क्या सोचे सावन-भादो, जिसके दूभर चैत हो गये
अगला-पिछला सब बिसराकर वर्तमान में क़ैद हो गये
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
उनकी अदालतें आपकी ज़िन्दगी घिस देंगी
फिर भी वे सामाजिक न्याय पर इतराएँगे
उनके थाने आपको नोच डालेंगे
फिर भी वे आंतरिक सुरक्षा पर फ़ख़्र करेंगे
देश के कुछ हिस्सों में संविधान लागू नहीं होगा
फिर भी वे प्रभुसत्ता सम्पन्न होने का दम्भ भरेंगे
वे अतिक्रमण करने वालों के हाथ जोड़ेंगे
वे समय पर टैक्स देने वालों की कमर तोड़ेंगे
पर हम यह सब चुपचाप देखते रहेंगे
क्योंकि हमें दिन-रात पिस-पिसकर
वो टैक्स का पैसा जुटाना है
जिसका हिसाब मांगने का अधिकार
हमें नहीं दिया जाएगा
लोकतंत्रात्मक गणराज्य के
इस फूहड़ नाटक से
पर्दा या प्रश्न उठाने वाले को
राष्ट्रद्रोह, न्यायालय की अवमानना और
संसद के विशेषाधिकार उल्लंघन का
दोषी मान लिया जाएगा।
राष्ट्रवादियों की सरकार हो
और मैंने आवाज़ उठाई
तो मुझे वामपंथी कहकर
नकार दिया जाएगा।
सेक्युलरों की सरकार हो
और मैंने बोलना चाहा
तो मुझे साम्प्रदायिक कहकर
मेरा तिरस्कार किया जाएगा!
वामपंथी सरकार हो और मैं बोला
तो मुझे पूंजीपति मान लिया जाएगा।
हर दल ने
अपने ऊपर उठने वाले प्रश्नों से
बचने के लिए
कोई न कोई शब्द गढ़ रखा है
ताकि जनता के सवालों से
उलझे बिना
आगे बढ़ा जा सके
ताकि जब कोई ‘नागरिक’
सवाल पूछे ‘अपनी सरकार से’
तो उसकी ज़ुबान पर
उस एक शब्द का ताला जड़ा जा सके।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
बेतरतीबी से लगाया जाये
तो गुलाबी रंग से भी आदमी पागल हो जाता है
और सलीके से लगाया जाये
तो काला रंग भी काजल हो जाता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
बाहर से जीते-जीते हैं, भीतर से हारे-हारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
अपने सिर पर ओट रखी है, सारी दुनिया की सिरदर्दी
इनकी दिनचर्या लगती है, घर भर को आवारागर्दी
सामाजिक जीवन जीने की चाहत ने सब कुछ छीना है
जो सबको जीवित रख पाये, वो जीवन इनको जीना है
ये बेचारे, केवल अपनी नींदों के ही हत्यारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
लगने को लगता है, लेकिन इनका दिल भी सख्त नहीं है
आँसू इनको भी आते हैं, पर रोने का वक़्त नहीं है
सबका सुख-दुःख ढोते फिरते, सबकी नाराज़ी सहते हैं
सबके साथ खड़े होते पर, जीवन भर तन्हा रहते हैं
इनकी तन्हाई से पूछो, इनके भी आँसू खारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
सीधा-सादा जीवन जीकर, ये भी उम्र बिता सकते थे
मुट्ठी भर आमदनी करके, रूखी-सूखी खा सकते थे
लेकिन इन लोगों ने अपने सपनों का सम्मान किया है
अपना जीवन मुश्किल करके, दुनिया का आसान किया है
थोड़े इनमें अवगुण हैं पर, गुण भी तो कितने सारे हैं
पल भर इनको रुककर देखो, ये सब लोग बहुत प्यारे हैं
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
हर एक मुहूरत का जग में सत्कार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
बर्तन की खनखन चौके में
पायल की रुनझुन आंगन में
मेरे होंठो पर सजती है
गीतों की गुनगुन सावन में
जीवन के सोलह सपनों का सिंगार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
हर रोज़ सुबह की रंगोली
होली, दीवाली मुझसे है
रिश्तों की शोभा मुझसे है
घर की ख़ुशहाली मुझसे है
जीवन की पहली कोशिश का सत्कार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
बचपन में माँ का नाम हूँ मैं
यौवन की मीठी शाम हूँ मैं
अस्वस्थ बुढापे की ख़ातिर
हर इक पीड़ा पर बाम हूँ मैं
जीवन की हर इक दुविधा का उपचार मुझी से सम्भव है
बाक़ी सब कुछ सम्भव है पर परिवार मुझी से सम्भव है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
इस दुनिया में प्यार रहे तो
भावों का सत्कार रहे तो
कितना प्यारा होगा ये संसार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
किस्सा सुनकर मन सबका कहता है इसमें भूल हुई है
बिन मतलब की दुनियादारी पाँखुरियों में शूल हुई है
जो रांझे के साथ हुई थी हम वो भूल सुधारेंगे कब
अपने मन से बिन मतलब की दुनियादारी मारेंगे कब
इनको सुख से जीने दें इस बार; समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
नज़रें टकराने पर जो आवाज़ हुई, वो शोर नहीं है
मन ही मन सब कह लेता है, पर फिर भी मुँहजोर नहीं है
अपनी इच्छाएं बिसरा कर उसकी मुस्कानें बोते हैं
इक-दूजे की ख़्वाहिश पूरी करके दुगने ख़ुश होते हैं
शुद्ध मुनाफे का ऐसा व्यापार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
दुनिया को मन में फूले सब फूल दिखाई दे जाते हैं
आँखों-आँखों चलने वाले शब्द सुनाई दे जाते हैं
चेहरे का कब, क्यों, कैसा था रंग समझ में आ जाता है
पलकों के झुकने का हर इक ढंग समझ में आ जाता है
तो फिर इस दुनिया की ख़ातिर प्यार समझना मुश्किल क्यों है
प्यार समूचे जीवन का है सार; समझना मुश्किल क्यों है
✍️ चिराग़ जैन