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तो क्या हुआ

तो क्या हुआ, अगर जीवन में थोड़ा-सा संत्रास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है

जिस काया में गर्भ विराजे उसकी रंगत खो जाती है
अन्न उपजना होता है तो धरती छलनी हो जाती है
जो डाली फलती है उसको बोझा भी ढोना पड़ता है
भोर अगर नम होती है, तो रातों को रोना पड़ता है
पत्ता-पत्ता झरना सीखा, तब जाकर मधुमास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है

फूल लदी डालों से जो तूफान भिड़े, वो महक उठे हैं
साजिंदे की उंगली से जो साज छिड़े, वो चहक उठे हैं
जिस राघव ने घर छोड़ा था, उसने पूरा युग जीता है
जिस रानी ने सुख मांगा था, उसका अंतर्मन रीता है
कैकेयी ने तो ख़ुद अपने ही जीवन में वनवास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है

खोने को तो पांचाली के पाँच सुतों ने जीवन खोया
लेकिन जो रण में जूझा था युग उसके ही शव पर रोया
काया वज्र बनानी है तो तय मानो, लोहा पीना है
उत्सव के हर इक कारण को एकाकी जीवन जीना है
शबरी ने जीवन भर आँसू भोगे, तब उल्लास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
✍️ चिराग़ जैन

लाचारी

उनको जाने क्या-क्या सहना पड़ता है
ख़ुद से आँख चुराकर रहना पड़ता है
हम तो केवल सच से काम चलाते हैं
उनको थोड़ा झूठ भी कहना पड़ता है
✍️ चिराग़ जैन

सृजन और आलोचना

जिनका कोई अर्थ नहीं है, उन पर क़लम चलाना छोड़ें
जो चर्चा को दूषित कर दें, उन सबको समझाना छोड़ें
हमें ओस के कण चुन-चुनकर, अपने सपने सच करने हैं
अपनी ओस बचाना सीखें, उनके पेड़ हिलाना छोड़ें
✍️ चिराग़ जैन

कविता बुन लेता हूँ

शोर-शराबे में भी दिल की धड़कन सुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ

इस दुनिया के छोटे-छोटे हिस्से घूम रहे हैं
लोग नहीं हैं, दो पैरों पर किस्से घूम रहे हैं
होंठों पर मुस्कान दिखी, मस्तक ग़मगीन दिखे हैं
हर चेहरे को पढ़कर देखो, कितने सीन लिखे हैं
इस सारी सामग्री में से मोती चुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ

देह भले ठहरी है लेकिन मन में चहल-पहल है
मौन धरा है अधरों पर और भीतर कोलाहल है
जिन आँखों में झाँका, उनमें ही संवाद भरा है
जो जितना चुप, उसमें उतना अनहद नाद भरा है
इस सरगम से मैं अपने गीतों की धुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ

मीठी यादों के तकिये पर सिर रखकर सोती है
मन पिघले तो दो आँखों की कोरों को धोती है
ठिठकी हुई खड़ी मिलती है किसी नदी के तीरे
कभी स्वयं ही चलकर आती, मुझ तक धीरे-धीरे
दो शब्दों के बीच जड़ी चुप्पी को सुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ
✍️ चिराग़ जैन

झाँसी की रानी

उन हाथों में बिजली की तेज़ी थी; तलवारों से पूछो
दुर्गा का साक्षात रूप थी; युग के हरकारों से पूछो
आँखों में अंगार, पीठ पर ममता लेकर ऊँचाई से
कैसे कूदी थी इक रानी; जाकर दीवारों से पूछो

हिम्मत की राहों में जब भी आईं तो चुक गयी दीवारें
कैसे कूदेगी अम्बर से रानी; उत्सुक भयी दीवारें
चण्डी स्वयं विराज रही थी उस दिन झाँसी की रानी में
रानी के तेवर देखे तो धरती तक झुक गयी दीवारें
✍️ चिराग़ जैन

अब उसकी कुछ आस नहीं है

सूखी हुई नदी के तट पर नौका लेकर आने वाले
जिस कलकल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है

चलते-चलते बहा पसीना, ठहर-ठहर कर नदिया सूखी
तू होता जाता था लथपथ, वो होती जाती थी रूखी
लहर-लहर लहरा-लहरा कर तुझको पास बुलाने वाले
जिस आँचल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है

माना तूने इन राहों पर, दर्द सहा है, चुभन सही है
लेकिन तुझको इंतज़ार की घड़ियों का एहसास नहीं है
अपनी उम्मीदों की नौका, मन्ज़िल तक पहुंचाने वाले
जिस समतल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है

हालातों से लड़ते-लड़ते कितनी नौकाएं टूटी हैं
उनका क्या चर्चा करना है, जिनसे धाराएँ रूठी हैं
इस क्षण का सारा सन्नाटा अपने भीतर पाने वाले
जिस हलचल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है

कौन सही है, कौन ग़लत है -अब इसमें कुछ सार नहीं है
यही अंत है इस किस्से का और अधिक विस्तार नहीं है
सही-ग़लत की उलझी-उलझी गुत्थी को सुलझाने वाले
तू जिस हल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है

इस तट पर जाने कितने ही प्राण पड़े हैं पत्थर होकर
तू भी वापिस ले जाएगा जग में अपनी काया ढोकर
जीवित होने के अभिनय से दुनिया को भरमाने वाले
जिस इक पल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है
✍️ चिराग़ जैन

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