मेहंदी
सावन की हरियाली
उतर आई है
हथेलियों पर
…महकने लगा है भाग्य!
✍️ चिराग़ जैन
सावन की हरियाली
उतर आई है
हथेलियों पर
…महकने लगा है भाग्य!
✍️ चिराग़ जैन
कैसे इस पर न्यौछावर हो अपना ख़ून-पसीना सीखें
वक़्त पड़े तो फौलादी साबित हो हर इक सीना, सीखें
शीश कटे तो उसका, जिसने भारत-भू पर आँख उठाई
हम इस पर मरना क्यों चाहें, इसकी ख़ातिर जीना सीखें
✍️ चिराग़ जैन
अगर इंसान बनकर आए तो इंसान बोलेगा
ज़ुबां मिसरी सरीखी मीर का दीवान बोलेगा
अगर हैवानियत लेकर इधर आए तो फिर सुन लो
शिवाजी की ज़ुबां में सारा हिंदुस्तान बोलेगा
✍️ चिराग़ जैन
जो प्रतीक्षा आँख में शबरी बसाए जी रही है
वह प्रतीक्षा राम के भी पाँव में निश्चित मिलेगी
धूप जैसी जिस विकलता को सुदामा ने जिया है
वह विकलता द्वारिका की छाँव में निश्चित मिलेगी
जो महल तक आ गयी होगी युगों का न्याय लेने
वह किसी वन में सिसकती इक शिला की आह होगी
जो युगों पहले घटे अन्याय के हित वन गयी है
वह किसी के मौन से पनपी कोई परवाह होगी
एक घटना जो नगर में कंकरी सी चुभ रही है
वह अहल्या के अछूते गाँव में निश्चित मिलेगी
द्रौपदी के चीर में बस द्रौपदी की लाज है क्या
उस अभागे वस्त्र के भीतर समूचा युग ढँका है
चीर लेकर जब स्वयं श्रीकृष्ण दौड़े हस्तिनापुर
तब मुरारी ने जगत् के ध्वंस पर अंकुश रखा है
जो घृणा सबको दिखाई दी सती के आँसुओं में
वह घृणा उस द्यूत के हर दाँव में निश्चित मिलेगी
हर कथानक में कथा का दूसरा आयाम भी है
सिर्फ़ राधा ही नहीं व्याकुल, विकल घनश्याम भी है
अपहृता होकर नहीं पीड़ित अकेली जानकी ही
प्रेम और दायित्व के घावों से पीड़ित राम भी है
धार का अस्तित्व जिस जल पर रहा निर्भर हमेशा
बस उसी जल पर पराश्रित नाव भी निश्चित मिलेगी
✍️ चिराग़ जैन
सबकी नज़र पीर से सूखी, मेरी नज़र ख़ुशी से नम है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है
क्या सोचा था, शाख कटेगी तो मैं माली को कोसूंगा
जो छिल-छिलकर क़लम बन गयी, मैं उस डाली को कोसूंगा
जिसके दम पर पूरा गुलशन स्वस्थ रहा है, पुष्ट रहा है
क्या सोचा था, इस गुलशन की उस रखवाली को कोसूंगा
कीचड़, मिट्टी, काँट-छँटाई -यह सब उपवन का अनुक्रम है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है
खुरपी का संयोग मिले तो पौधा कुछ कुम्हला जाता है
लेकिन खुरपी के ही हाथों मधुबन में यौवन आता है
जिसकी जड़ ने ज़ख़्म सहे हैं, उसकी फुनगी आली होगी
जो परती से प्रेम करेगा, उस पर क्या ख़ुशहाली होगी
जिस पौधे ने जितना झेला, वह उतना ही सुंदरतम है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है
‘इससे पहले’, ‘इसके पीछे’ – बस इस पल का खेल यही था
पीछे का सब सार यही था, आगे का सब मेल यही था
क्या मैं भी इस पल से डरकर माली पर कुछ प्रश्न उठाता
क्या मैं भी कण जैसा होकर, विधिना को कुछ ढंग सिखाता
आधा उगना, दुगुना उगना, यह सब कितना मनभावन है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है
✍️ चिराग़ जैन
ऐसा लगता था सब राहें
अब इसके आगे धूमिल हैं
जो भी है, जितनी भी है; बस
यह ही जीवन की मन्ज़िल है
लेकिन घबराकर हिम्मत की हत्या करना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
जाने कौन घड़ी, अगले पल जीवन को लाचार बना दे
जाने कौन घड़ी, पल भर में हर भय का उपचार बना दे
हर धड़कन रुक-कर चलती थी, हर आहट मन को छलती थी
दिल पिघला-पिघला जाता था, आँखें रह रहकर गलती थीं
पर जितने हालात डराएं, उतना डरना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
केवल दो राहें बाक़ी थीं, जूझें; या हथियार गिरा दें
या उम्मीदों को पोषण दें, या डरकर हर दीप बुझा दे
देहरी चढ़कर हार खड़ी थी, अपशकुनों की बरसातें थीं
मेरी और मेरे अपनों की हर धड़कन पर आघातें थीं
ऐसे समय किसी चेहरे का रंग उतरना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
यदि सब कुछ निर्धारित है, तो धड़कन बढ़ने से क्या होता
यदि सब बदला जा सकता है तो फिर डरने से क्या होता
अपना प्रसव स्वयं करना था, कोई और विकल्प नहीं था
हर इक नस में चीर-फाड़ थी, भय पल भर भी अल्प नहीं था
पीड़ा से अपने ही मन को विचलित करना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
✍️ चिराग़ जैन