Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
कब उगेगा दिन, तुम्हारे आगमन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
कब कोई आकार होगा इस सपन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
मैं युगों से रोज़ लिख-लिखकर संदेशे
बादलों के हाथ भेजे जा रहा हूँ
शुद्धतम जल से चरण धोऊँ तुम्हारे
आँसुओं को भी सहेजे जा रहा हूँ
कब मुझे अवसर मिलेगा आचमन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
‘भोर की पहली किरण पर आओगे तुम’
-रात से हर रात ये ही कह रहा हूँ
सूर्य का उत्साह ठण्डा पड़ रहा है
और मैं भीतर ही भीतर दह रहा हूँ
हँस रहा मुझ पर हर इक तारा गगन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
चौखटों का नूर बुझने लग गया है
देहरी की आँख पथराने लगी है
बेर की हर डाल चुभने लग गयी है
मालती की देह कुम्हलाने लगी है
हो रहा नीरस निरंतर स्वर सृजन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
कौन जाने एक दिन मेरी कथा का
अंत, शबरी की कथा जैसा रहेगा
या निरन्तर बढ़ रही इस पीर का पथ
सिर्फ़ राधा की व्यथा जैसा रहेगा
बेर हूँ मैं या सुमन हूँ कुंजवन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
विचारों के भाजी बाज़ार से दूर,
मस्तिष्क के
पिछवाड़े वाले तहख़ाने में
भरे पड़े हैं
ऐसे हज़ारों बिम्ब
जिन्हें आँखों ने
चित्त के शिकंजे से बचाकर
यहाँ छिपा दिया था।
जब कभी
सहजता की सवारी करके
प्रिविष्ट हुआ हूँ
इस तहख़ाने में
बस तभी
बटोर लाया हूँ
…ढेर सारे बिम्ब
…ढेर सारी कविताएँ!
आपके भीतर भी होगा
ऐसा ही इक तहख़ाना;
बस इसमें
कभी मुखौटा लगाकर
मत जाना!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Lapete Mein Netaji, Poetry
कौन कहता है कि गंगा में लाशें बह रही हैं
अब तो लाशों में गंगा बह रही है।
कौन कहता है कि प्रशासन
साम्प्रदायिक भेदभाव करता है
प्रशासन तो सब लाशों से
एक जैसा बर्ताव करता है।
कौन कहता है
नदी किनारे मानव सभ्यता पनपती है
अब तो नदी तट पर
मानवता की रूह दहलती है।
साहेब!
एक बात बताओगे
अगर हर घाट पर मुर्दे दफ़्न होंगे
तो अगली दिवाली पर
दीये कहाँ जलाओगे?
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
सत्य के आधार पर खड़े
चार-चार शेर भी
झूठ बोलनेवालों को
कुछ नहीं कहते।
देश की हर सरकारी मुहर पर
एक झूठ लिखा है –
‘सत्यमेव जयते’।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
हर दिन बढ़ता ही जाता है मेरे आंगन का वीराना
और अकेला कर जाता है हर दिन कोई यार मुझे
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
रेगिस्तान की दोपहर में
पानी को तरस रहा एक प्यासा
तपती हुई रेत में पड़ा था;
ऊपर से सूरज का भी रुख कड़ा था।
उसको पानी देने के लिए
केंद्र सरकार ने बिल पास किया;
राज्य सरकार ने भी
उसका स्वतः संज्ञान लिया।
लेकिन ज्यों ही
राज्य सरकार का कारिंदा
मदद लेकर प्यासे की ओर बढ़ा,
उसके सद्भाव को लगा
एक जोरदार झटका;
क्योंकि पीछे केंद्र सरकार
लेकर आ रही थी
पानी से भरा मटका।
उधर केंद्र सरकार की नज़र भी
राज्य सरकार की मदद योजना पर पड़ी
तो उसके मटके की
आँखें हो गयी बड़ी।
अब प्यासा हो गया था गौण
दोनों एक-दूसरे से पूछने लगे-
“तू कौन? तू कौन?”
दोनों ही मदद करने के
मूल लक्ष्य से भटक गए
और एक-दूसरे से ऐसे भिड़े
कि दोनों के मटके चटक गये।
फिर राज्य सरकार ने भरी हुंकार
और प्यासे की विरुद्ध दर्ज की
नामज़द एफआईआर।
“कि राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए
प्यासा व्यक्ति
नाटक कर रहा है
और जनता में
राज्य की व्यवस्था के विरुद्ध
घृणा भर रहा है।”
केंद्र सरकार ने
इस एफआईआर की
पूरी ही पैमाइश कर दी
और प्यासे की प्यास की
सीबीआई जाँच की फरमाइश कर दी।
घंटों तक चलता रहा यह ड्रामा
मीडिया से लेकर
अदालतों तक पसर गया हंगामा
आस के मटके फूट चुके थे
समाधान का पानी बिखर चुका था
और प्यासा, दो घूँट पानी के इंतज़ार में
रहनुमाओं की ओर देखते-देखते
कबका मर चुका था!
✍️ चिराग़ जैन