Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
बीज ने वृक्ष से कहा-
“तुम महान हो”
वृक्ष ने उत्तर दिया-
“वृक्ष होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था”
…सुनकर
बीज धरती में गड़ गया
मिट्टी का एक आवरण उस पर चढ़ गया
फिर एक दिन
उसकी सीमाओं का खोल टूटा
उसमें से एक कोमल अंकुर फूटा
धूप-पानी पाकर
धीरे-धीरे वो अंकुर बड़ा हो गया
और एक दिन
मुस्कुराते हुए
वृक्ष के समकक्ष खड़ा हो गया
मनुष्य ने ईश्वर से कहा-
“तुम महान हो”
ईश्वर ने उत्तर दिया-
“ईश्वर होने से पहले
मैं भी तुम जैसा ही था
जैसे तुम अब हो
मैं भी पहले ऐसा ही था”
…सुनकर
मनुष्य इस सीधी-सादी बात के
गूढ़ अर्थ बूझने लगा
और जब कुछ नहीं सूझा
तो ईश्वर को पूजने लगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
तू तिल है, ताड़ सा है तेरा बाप डार्लिंग
ससुरा कबाड़-सा है तेरा बाप डार्लिंग
हर वक्त चर्र-चर्र, चपड़-चैं, चुकर-चुकर
टूटे किवाड़ सा है तेरा बाप डार्लिंग
यूँ तू तो किसी कुश्ती के मैडल की तरह है
धोबी पछाड़ सा है तेरा बाप डार्लिंग
हर एक दाँत का है अलग रंग, अलग शेड
पूरा जुगाड़ सा है तेरा बाप डार्लिंग
रेखा जी की आवाज़ में बच्चन के डायलॉग
ऐसी दहाड़ सा है तेरा बाप डार्लिंग
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Jainism, Muktak, Poetry
गर्भ में आने से पूर्व कुबेर नगर भर में बहुरत्न लुटावे
जन्म समय धर नेत्र हज़ार निहारे तउ सुर पार न पावे
जा की उठाने को पालकी देव मनुष्य न होने का सोग मनावे
ताहि सती इक बेड़िन में बंधी कारा में सूखा आहार करावे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Jainism, Muktak, Poetry
जो क़ामयाब हो जाए ज़रा, वो बदगुमान हो जाता है
जो फूल गया सत्तामद में, मूरख समान हो जाता है
जो लक्ष्मी के पीछे भागे, वो अर्थवान हो जाता है
लक्ष्मी जिसके पीछे भागे वो वर्द्धमान हो जाता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
अब तो अपने ही उसूलों से लड़ना पड़ता है
सच को बाज़ार में नीलाम करना पड़ता है
अब नहीं बहते हैं आँसू किसी जनाज़े पर
हालतन मर्सिया हर रोज़ पढ़ना पड़ता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
हूक सीने के आस-पास अभी बाक़ी है
उनके आने की कोई आस अभी बाक़ी है
शामो-शब सहरो-सुबह देख चुका हूँ लेकिन
और कुछ देखने की प्यास अभी बाक़ी है
✍️ चिराग़ जैन