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ओ माधो जी!

ओ माधो जी!
कल मैंने बाज़ार में देखी रूह तुम्हारी
काफ़ी सजी-धजी लगती थी
यूँ लगता है
तुमने उसको नहलाने में
अपनी आँखों का सब पानी
ख़र्च कर दिया!

वो जो गै़रत वाला जोड़ा
तुम हरदम पहने रहते थे
कल मैंने उस ही जोड़े में
रूह तुम्हारी लिपटी देखी

आँखें झुकी हुई थी उसकी
गर्दन नीचे गड़ी हुई थी
आँखों का पानी
माथे पर
बूंदेें बनकर छलक रहा था
‘दो रोटी’ क़ीमत लिखी थी
साथ लिखा था-
‘दिल, ज़मीर, इज़्ज़त और ग़ैरत
मुफ़्त मिलेंगी’!

क्यों माधो जी!
रूह बेचकर माधो से तुम
‘मैडी’ हो गए!

✍️ चिराग़ जैन

संबंधों की परिभाषा

जग सीमित करना चाहे, सम्बन्धों को परिभाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

क्या बतलाऊँ मीरा संग मुरारी का क्या नाता है
शबरी के आंगन से अवध बिहारी का क्या नाता है
क्यों धरती के तपने पर अम्बर बादल बन झरता है
क्यों दीपक का तेल स्वयं बाती केे बदले जरता है
क्यों प्यासा रहता चातक पावस-जल की अभिलाषा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

क्या ये थोथे शब्द सुमन की गन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्या वीणा से सरगम का अनुबन्ध बयाँ कर सकते हैं
क्यों बौछारों से पहले मौसम पर धुरवा छाती है
क्यों कोयल का स्वर सुन आमों में मिसरी घुल जाती है
कल-कल-कल-कल बहती सरिता किस पावन जिज्ञासा में
कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में

✍️ चिराग़ जैन

निस्पृह प्रेम

चाहता हूँ उन्हें ये अलग बात है
वो मिलें ना मिलें ये अलग बात है
एक अहसास से दिल महकने लगा
गुल खिलें ना खिलें ये अलग बात है

हम मिलें और मिलते रहें हर जनम
ज़िन्दगी भर का नाता बने ना बने
मन समर्पण के सद्भाव से पूर्ण हों
तन भले ही प्रदाता बने ना बने
बात दिल की दिलों तक पहुँचती रहें
लब हिलें ना हिलें ये अलग बात है

शब्द पावन हवन की महक से भरे
मुस्कुराहट में है यक्ष का अवतरण
आँख में झिलमिलाती चमक दीप की
अश्रु हैं दिव्य पंचामृती आचमन
नित्य श्रद्धा निवेदित करूँ मैं उन्हें
वर मिलें ना मिलें ये अलग बात है

✍️ चिराग़ जैन

मुझे तुम भूल सकते थे

फ़ज़ाई रक्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे
तुम्हारा अक्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे
तुम्हारी चाह हूँ, आदत, इबादत हूँ, मुहब्बत हूँ
महज इक शख़्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे

✍️ चिराग़ जैन

दिल के अरमान हैं

लफ़्ज़ आँखों के किनारों पे ठहर जाते हैं
अश्क़ होठों पे हँसी बन के बिखर जाते हैं
ये ज़माना जिन्हें अशआर कहा करता है
दिल के अरमान हैं काग़ज़ पे उतर जाते हैं

✍️ चिराग़ जैन

गीत लिखते वक़्त

इक दफ़ा पलकों को अश्क़ों में भिगो लेते हैं हम
और फिर अधरों पे इक मुस्कान बो लेते हैं हम
गीत गाते वक्त रुंध ना जाए स्वर इसके लिए
गीत लिखते वक्त ही जी भर के रो लेते हैं हम

✍️ चिराग़ जैन

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