Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Poetry, Purushottam
बल के घमण्ड में नियम किये खण्ड-खण्ड
यही बल यश की कुदाल सिद्ध हो गया
जिसको समझकर तुच्छ पूँछ फूँक दी थी
वह भी भयानक कराल सिद्ध हो गया
जिसने भी टोका उसे घर से निकाल दिया
यही आचरण विकराल सिद्ध हो गया
जिसको दशानन समझता था शक्तिहीन
रक्षकुल के लिए वो काल सिद्ध हो गया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
आज फिर एकांत की उंगली पकड़कर
सोच को अपनत्व की बाँहों में भरकर
कोई बोला प्राण का संगीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं
अक्षरों के वस्त्र ओढ़े हैं बदन पर
भंगिमा में भाव का विस्तार देखो
शब्द के आभूषणों से हूँ अलंकृत
नयन में रस की अलौकिक धार देखो
मैं सुदामा की झिझकती पोटली हूँ
कृष्ण बनकर भोगिये, नवनीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं
अन्तरे तुमसे अभी रूठे हुए हैं
त्रस्त हैं मुखड़े तुम्हारी बेरुख़ी से
पंक्तियाँ करके प्रतीक्षा थक चुकी हैं
कथ्य गुमसुम मौन फिरते हैं दुःखी से
आओ, इन सबकी उदासी दूर कर दो
मर न जाए मन, बहुत भयभीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं
व्यस्तता की ओट में भूले सृजन को
जन्म के सौभाग्य का अपमान है ये
कंकड़ों की चाह में मोती न छोड़ो
शौक मत समझो इसे, वरदान है ये
ताक पर रख दो जगत् के मानकों को
हार के उस पार हासिल जीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं
छोड़कर वर्चस्व की हर होड़, आओ
जान लो, अस्तित्व मुझसे ही बचेगा
जीत हो या हार हो या हो उदासी
देखना एकांत मुझको ही रचेगा
लोग सुख में साथ, दुःख में दूर होंगे
इस प्रथा से एकदम विपरीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं
एक दिन जब चेतना भी गौण होगी
तब तुम्हारा चिह्न बनकर मैं रहूंगा
कण्ठ, स्वर, वाणी, अधर सब लुप्त होंगे
तब तुम्हारी बात जग से मैं कहूंगा
सौंपकर अपना समूचा सत्य मुझको
पाइए अमरत्व, कालातीत हूँ मैं
ठीक से पहचानिए ना, गीत हूँ मैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
प्यार का मतलब नहीं है प्यार केवल
प्यार का आधार है परवाह उसकी
मेघ से ऊबे तो इक सूरज बुलाया
सूर्य दहका, देह ने बरसात कर दी
रात से उकता गए तो दिन उगाया
थक गए दिन से तो फिर से रात कर दी
जो हमारे पास है उससे दु:खी हैं
जो हमारा है नहीं है चाह उसकी
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
प्रेम से ऊबे घृणा का हाथ थामा
वैर नस-नस में भरा तो दिल निचोड़ा
भोग से ऊबे, तो ये संसार त्यागा
और फिर संन्यास में जंजाल जोड़ा
ऊब जाने से नहीं ऊबा कभी मन
ऊब जाने की नहीं है थाह उसकी
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
राह में ही भोग लो संबंध सारे
द्वार के उस पार उच्चाटन मिलेगा
प्रेम है जिससे उसे दुर्लभ बना लो
प्राप्ति के पश्चात भारी मन मिलेगा
कल्पना ने आज आलिंगन भरा है
सत्य में चुभने लगेंगी बाँह उसकी
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
क्या कहा, तुम सच कहोगे
और ज़िंदा भी रहोगे
झूठ का चाबुक तुम्हारी खाल खींचेगा समझ लो
और फिर सारा ज़माना आँख मीचेगा समझ लो
ख़ुद नदी ने इस तरह के दाँव सारे रख दिए हैं
नाव जैसे दिख रहे पत्थर किनारे रख दिए हैं
पेड़, जिसकी छाँह के दम पर भिड़े हो धूप से तुम
धूप ने उस पेड़ की जड़ में अंगारे रख दिए हैं
क्या कहा, सच का सहारा
ये महज भ्रम है तुम्हारा
हर सहारा फेर कर मुँह, होंठ भींचेगा समझ लो
और फिर सारा ज़माना आँख मीचेगा समझ लो
दिन दहाड़े हो नहीं सकता भला अंधेर कैसे
मौत पहले आ गई क्यों, न्याय में है देर कैसे
जो सभी की थालियों से, ले गया रोटी उठाकर
सब उसी को दे रहे हैं तोहफ़ों के ढेर कैसे
क्या कहा, दिल की सुनोगे
एक दिन तुम सिर धुनोगे
दिल उम्मीदों का ज़खीरा भी उलीचेगा समझ लो
और फिर सारा ज़माना आँख मीचेगा समझ लो
लूट के हर दृश्य में हम मूकदर्शक हो गए हैं
झूठ की हर कामयाबी के प्रशंसक हो गए हैं
कोई अत्याचार सुनकर दिल दहलता ही नहीं है
आत्माएँ हैं दिवंगत, मन नपुंसक हो गए हैं
क्या कहा विश्वास रखें
आसमां से आस रखें
आसमां ख़ुद तो न बंजर खेत सींचेगा समझ लो
और फिर सारा ज़माना आँख मीचेगा समझ लो
✍️ चिराग़ जैन
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सभी का मन सशंकित हो रहा था
बहुत दिन से कहीं कुछ खो रहा था
जुड़े सब हाथ ढीले पड़ गए थे
पनीले नेत्र पीले पड़ गए थे
तपस्या चरम तक आने लगी थी
ये भौतिक चर्म कुम्हलाने लगी थी
व्रतों पर नूर इतना चढ़ गया था
कि तन का रंग फीका पड़ गया था
हुई जर्जर तपस्यायुक्त काया
तो यम सल्लेखना का व्रत उठाया
किया आचार्य के पद से किनारा
व्रती ने मृत्यु तक का मौन धारा
सुना जिसने, वही थम-सा गया था
गला सूखा, हलक जम-सा गया था
ख़बर ये फैलती थी आग बनकर
हृदय छलका सहज अनुराग बनकर
श्रमण सब बढ़ चले विश्वास लेकर
तपस्वी के दरस की आस लेकर
दिगम्बर साधुओं के संघ दौड़े
हृदय के संग सारे अंग दौड़े
व्रती अंतिम तपस्या कर रहा था
अभागा तन विरह से डर रहा था
हठी तप में जुटा था मौन साधे
खड़ी थी मृत्यु दोनों हाथ बांधे
धरा पर भाग्य जागा था मरण का
उसे अवसर मिला गुरु के वरण का
बिताए तीन दिन यूँ ही ठहर कर
मगर फिर रात के तीजे पहर पर
अचानक साँस की ज़ंजीर तोड़ी
वियोगी ने ये नश्वर काय छोड़ी
चले, त्रैलोक्य तक विस्तार करके
गए ज्यों राम सरयू पार करके
दिगम्बर साधना का बिंदु खोया
व्रतों का चंद्रगिरि में इंदु खोया
धरा से त्याग का प्रतिरूप लेकर
चली हो सांझ जैसे धूप लेकर
पिपासा से अमिय का कूप लेकर
चली है मौत जग का भूप लेकर
प्रजा जागी तो बस माटी बची थी
प्रयोजन गौण, परिपाटी बची थी
चिता में जल रहा दिनमान देखा
सभी ने सूर्य का अवसान देखा
धरा का धैर्य दूभर कर गया है
धरा से स्वयं विद्याधर गया है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Purushottam
राजवैभव की नहीं है चाह कोई
कीर्ति की, यश की नहीं परवाह कोई
जय-पराजय की घड़ी में मन सहज हो
शोक हो, भय हो, न हो उत्साह कोई
राम, मुझको दो भले मत आवरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
जग जिसे पाषाण माने, देख लूँ मैं साँस उसकी
जो नदी-तट पर खड़ा हो, जान पाऊँ प्यास उसकी
याचना से जो पिता को धर्मसंकट में फँसाए
मैं स्वयं को दांव पर रखकर, सुनूँ अरदास उसकी
हर कठिन क्षण का करूँ वातावरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
प्रेम की जूठन नहीं, केवल समर्पण-भाव देखूँ
वृद्ध पक्षी की पराजय भूल, उसके घाव देखूँ
मित्रता में मित्र का जीवन सुलझना प्राथमिक हो
तब कहीं निज भाग्यरेखा का कोई उलझाव देखूँ
धीर के शृंगार से अंतःकरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
जब चयन का प्रश्न आए, साधना का पथ चुनूँ मैं
कथ्य की इति हो जहाँ पर, उस जगह से अथ चुनूँ मैं
जब परिस्थितियाँ कई चेहरे बनाकर सामने हों
तब समर में जूझने को आत्मबल का रथ चुनूँ मैं
हर समय, हर भाव का हो व्याकरण श्रीराम जैसा
दे सको तो, दो मुझे बस आचरण श्रीराम जैसा
✍️ चिराग़ जैन