अहल्या
साँस न थी पर आस की डोर पे जीवित थी दुखियारी अहल्या
शाप के ताप को, स्वर्ग के पाप को झेल रही थी बेचारी अहल्या
देखने में बस पाहन थी, मन में धरती से थी भारी अहल्या
देखो शिला में भी प्राण बहे जब राम ने छूकर तारी अहल्या
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Purushottam
साँस न थी पर आस की डोर पे जीवित थी दुखियारी अहल्या
शाप के ताप को, स्वर्ग के पाप को झेल रही थी बेचारी अहल्या
देखने में बस पाहन थी, मन में धरती से थी भारी अहल्या
देखो शिला में भी प्राण बहे जब राम ने छूकर तारी अहल्या
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
ऐ गये साल
तुझे मैं न भूल पाऊंगा
तू मेरे कितने ही ख़्वाबों को सच बना के गया
तू मेरी ज़िन्दगी में ख़ुशनसीबी ला के गया
मैं क्या गिनाऊँ, तेरे पहले क्या न था मुझमें
मैं क्या बताऊँ, तूने क्या सुक़ूं भरा मुझमें
जो तुझसे पहले मिला था, वो कुछ छिना भी है
मेरे वजूद मेें ‘कुछ’ ख़ैर के बिना भी है
जो साँस आयी, उसका जाना तय हुआ समझूँ
जो मिल रहा है उसी को फ़क़त दुआ समझूँ
ये खेल ज़िन्दगी का अपने हाथ है ही नहीं
है कौन, जिसके मुक़द्दर में रात है ही नहीं
हरेक रात के बाद आई सुब्ह, क्या कम है
बहुत ख़ुशी है ज़िन्दगी में, ज़रा-सा ग़म है
ये ग़म भी याद की लज़्ज़त बढ़ाये जाता है
ख़ुशी की ख़ुश्कियों को नम बनाये जाता है
जो लम्हा बीत रहा है, उसे सलाम करूँ
बस इस तरह मैं ज़िन्दगी का एहतराम करूँ
मैं नये साल में तुझसे न मुँह चुराऊंगा
ऐ गये साल
तुझे मैं न भूल पाऊंगा
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
केवल दूरियाँ तय करते हैं
समतल रास्ते
ऊँचाइयाँ हासिल करने के लिए
चलना ही नहीं
चढ़ना भी पड़ता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
हर तरफ़ तन्हाइयों का बोलबाला हो गया
सर्दियों में रात का मुँह और काला हो गया
कर दिया डर के हवाले जब अंधेरे ने मुझे
मैंने अपना डर जलाया और उजाला हो गया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
नदी मीठी नहीं लगती तुम्हें अब
तुम्हारी प्यास जूठी हो गई है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
राज्य, वैभव और निज पहचान तक से हाथ धोकर
चल दिये पाण्डव स्वयं के शौर्य से अज्ञात होकर
वीरता के उपकरण को गौण रहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
भाग्य ने क्या खेल खेला है विवशता के पलों में
सूख जाने की अनोखी खलबली है बादलों में
शस्त्र, जिनको प्राप्त करने के लिए काया गलाई
अब उन्हीं सबको छुपाते फिर रहे हैं जंगलों में
प्राण के बिन, देह को चुपचाप दहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
देख लो, राजा युधिष्ठिर कंक बनकर जी रहे हैं
द्यूतगृह में दांव हारे, रंक बनकर जी रहे हैं
विश्व जिनकी वीरता को देखकर इतरा रहा था
वे स्वयं के शौर्य का आतंक बनकर जी रहे हैं
पार्थ ने गांडीव तज, शृंगार पहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
द्रौपदी को साज और सिंगार की अनुमति नहीं है
भीम को निज जीभ के सत्कार की अनुमति नहीं है
वीरता भयभीत है, कोई उसे पहचान ना ले
अब अनुज को अग्रजों के प्यार की अनुमति नहीं है
आह, हर इक चाह का अवसाद गहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
शौर्य के हर चिह्न से परहेज करना पड़ रहा है
धैर्य की भी धड़कनों को तेज़ करना पड़ रहा है
यश बढ़ाने का हर इक आशीष अब अभिशाप सा है
हाय अपने आपको निस्तेज करना पड़ रहा है
रक्त तक को धमनियों में शांत बहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
इस पराभव का जनक क्या द्यूत का षडयंत्र बल है
कर्म के अनुरूप फल होगा, नियम ये भी अटल है
दांव पर थी लाज और भुजदण्ड में कंपन नहीं था
यह विवशता उस नपुंसक शौर्य से उत्पन्न फल है
इक घड़ी का मौन अब दिन-रात सहना है
शक्ति को अब होंठ सीकर मौन रहना है
✍️ चिराग़ जैन
संपर्क करें