शबरी
नित्य सजाती रही अंगना, प्रभु राम के दर्श की आस में शबरी
आस की ऐसी निशंक तपस्या से दर्ज हुई इतिहास में शबरी
सीता वियोग से व्याकुल थे, तब घुल गयी राम की प्यास में शबरी
राम को भक्ति का स्वाद चखा गयी बेर की जूठी मिठास में शबरी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Purushottam
नित्य सजाती रही अंगना, प्रभु राम के दर्श की आस में शबरी
आस की ऐसी निशंक तपस्या से दर्ज हुई इतिहास में शबरी
सीता वियोग से व्याकुल थे, तब घुल गयी राम की प्यास में शबरी
राम को भक्ति का स्वाद चखा गयी बेर की जूठी मिठास में शबरी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
क्यों भला भाती नहीं शीतल नदी की धार
यूँ समझ लो आप अपनी प्यास को भूले हुए हो
ख़ुश हुए तो भूल बैठे दर्द का उपकार
रो पड़े तो प्राण के उल्लास को भूले हुए हो
आज से पीछा छुड़ाकर भागते हो
एक कोरे ख़्वाब के संग जागते हो
क्यों हज़ारों ख़्वाहिशों का ढो रहे हो भार
आप शायद वक़्त के इतिहास को भूले हुए हो
कब समय किसकी बना दे कौन सूरत
आँसुओं में भीग जाएँ, शुभ मुहूरत
कुंडली में दिख रहा आंगन खड़ा त्योहार
आप शायद राम के वनवास को भूले हुए हो
पाल भी बांधो, हवा भी है ज़रूरी
भीगकर ही नापती है नाव दूरी~
पार कर पाती नहीं नौका, कोई पतवार
तो यक़ीनन आप इक अरदास को भूले हुए हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Purushottam
साँस न थी पर आस की डोर पे जीवित थी दुखियारी अहल्या
शाप के ताप को, स्वर्ग के पाप को झेल रही थी बेचारी अहल्या
देखने में बस पाहन थी, मन में धरती से थी भारी अहल्या
देखो शिला में भी प्राण बहे जब राम ने छूकर तारी अहल्या
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
ऐ गये साल
तुझे मैं न भूल पाऊंगा
तू मेरे कितने ही ख़्वाबों को सच बना के गया
तू मेरी ज़िन्दगी में ख़ुशनसीबी ला के गया
मैं क्या गिनाऊँ, तेरे पहले क्या न था मुझमें
मैं क्या बताऊँ, तूने क्या सुक़ूं भरा मुझमें
जो तुझसे पहले मिला था, वो कुछ छिना भी है
मेरे वजूद मेें ‘कुछ’ ख़ैर के बिना भी है
जो साँस आयी, उसका जाना तय हुआ समझूँ
जो मिल रहा है उसी को फ़क़त दुआ समझूँ
ये खेल ज़िन्दगी का अपने हाथ है ही नहीं
है कौन, जिसके मुक़द्दर में रात है ही नहीं
हरेक रात के बाद आई सुब्ह, क्या कम है
बहुत ख़ुशी है ज़िन्दगी में, ज़रा-सा ग़म है
ये ग़म भी याद की लज़्ज़त बढ़ाये जाता है
ख़ुशी की ख़ुश्कियों को नम बनाये जाता है
जो लम्हा बीत रहा है, उसे सलाम करूँ
बस इस तरह मैं ज़िन्दगी का एहतराम करूँ
मैं नये साल में तुझसे न मुँह चुराऊंगा
ऐ गये साल
तुझे मैं न भूल पाऊंगा
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
केवल दूरियाँ तय करते हैं
समतल रास्ते
ऊँचाइयाँ हासिल करने के लिए
चलना ही नहीं
चढ़ना भी पड़ता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
हर तरफ़ तन्हाइयों का बोलबाला हो गया
सर्दियों में रात का मुँह और काला हो गया
कर दिया डर के हवाले जब अंधेरे ने मुझे
मैंने अपना डर जलाया और उजाला हो गया
✍️ चिराग़ जैन