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चिराग़ों के घर नहीं होते

सदा तो सँग तलक दर-ब-दर नहीं होते
कहा ये किसने चिराग़ों के घर नहीं होते

अभी असर न दिखा हो तो इंतज़ार करो
हैं ऐसे दांव भी जो बेअसर नहीं होते

ग़मों की धूप में नाज़ुक बदन मुफ़ीद नहीं
गुलों के जिस्म नरम, सूखकर नहीं होते

खुद अपना बोझ उठाने में कोई हर्ज़ नहीं
पराये पाँव बहुत मोतबर नहीं होते

✍️ चिराग़ जैन

नए घर में

नए फ्लैट की दीवारों पर
धीरे-धीरे उभर रहा है
हमारा घर

माॅड्यूलर किचन के खोपचों से
आँख बचाकर
एक कोने में पालथी मारकर बैठ गया है
सरसों के तेल का पीपा

सभी नए कंटेनरों के बीच
चुपके से जा छुपी है
युगों पुरानी हींग की डिब्बी!

बरसों से इकट्ठे हुए शो-पीस
चहक कर जा बैठे हैं
इस-उस टीवी पैनल पर

पापा के लिए बनी
स्पेशल अलमारी ने
सबको संजो लिया है थोड़ा-थोड़ा;
थोड़े-थोड़े हम सब
पसरने लगे हैं
माँ के कमरे तक

‘कोई फ़ालतू सामान नए घर में नहीं जाएगा’
के संकल्प ने
‘ये तो रख लो, ज़रूरत पड़ती रहती है’
के अनुरोध से
हार मान ली है

नपे-तुले घर में
सहेज लिए गए हैं कुछ एक्स्ट्रा बिस्तर
ताकि तीनों बहनों के
एक साथ आने पर भी
छोटा न लगे
हमारा नया घर

मेरे व्यवस्थित ऑफिस की एक दराज़ में
दर्ज हो गई हैं मेरी अव्यवस्थित पर्चियाँ;
मेरे बैडरूम की ड्रेसिंग का शीशा
सज गया है
एक छोटी लाल बिंदी से;
एकदम नए दरवाज़ों के पीछे
उभर आई हैं खूँटियाँ

चमचमाते हुए मंदिर में
विराज चुकी है
साठ-सत्तर साल पुरानी तस्वीरें

नए स्टाइल की डिजाइनर लाइब्रेरी में
कतार बांधकर खड़ी हो चुकी हैं
मेरी ‘सारी’ किताबें
जो बहुत देर तक छाँटने के बावजूद
एक भी कम नहीं हुई

हाइड्रोलिक डबल बैड के
स्टोरेज बॉक्स में बैठकर
लगाया जा रहा है सामान

ख़ूबसूरत बालकनी की जाली में
लटक गई है
काली पुती हुई हांडी

माँ की शादी में मिली
सिलाई मशीन
माँ के बिस्तर से दो हाथ दूर बैठी
सी रही है
नए घर में
पुरानी यादें

पैकिंग के सारे कार्टन
विदा कर दिए गए हैं
और उनके भीतर से निकलकर
हम सब
पूरी शिद्दत से
बसे जा रहे हैं
घर के रोम-रोम में!

✍️ चिराग़ जैन

अस्तित्व का मूल्य

हाँ, जगत् में एक कण के अंश-सा अस्तित्व हूँ मैं
पर मेरा व्यक्तित्व इस कण की चमक दुगुनी करेगा
हाँ, समय में एक क्षण के अंश-सा अस्तित्व हूँ मैं
पर मेरा व्यक्तित्व इस क्षण की दमक दुगुनी करेगा

साँस है बस दास प्राणों की किसी आह्लाद के बिन
हर इमारत ताश का घर है महज; बुनियाद के बिन
वक़्त पर बोला नहीं जो, क्या भला जीवन जिया वो
ज्यों कहानी में कोई किरदार हो संवाद के बिन
हाँ, समर में मात्र रण के अंश सा अस्तित्व हूँ मैं
पर मेरा व्यक्तित्व इस रण की धमक दुगुनी करेगा

कृष्ण जिसका छत्र धारें, मैं वो गोवर्धन नहीं हूँ
देव जिस पर पर पुष्प वारें, कालिया मर्दन नहीं हूँ
बाँसुरी की तान, माखन, मोरपंखी, भी नहीं मैं
चक्र का नर्तन नहीं हूँ, शंख का गुंजन नहीं हूँ
कुंजवन में एक तृण के अंश सा अस्तित्व हूँ मैं
पर मेरा व्यक्तित्व इस वन की गमक दुगुनी करेगा

मैं पराजित गिद्ध जैसा पात्र हूँ, सीताहरण में
मैं हूँ बूढ़े रीछ का प्रेरक वचन, लंकादहन में
देखने में गौण हूँ फिर भी कथा का भार मुझ पर
मैं किसी रथचक्र-सा बेमोल, अभिमन्यु मरण में
कर्ण के किस्से में बिच्छू दंश-सा अस्तित्व हूँ मैं
पर मेरा होना, किसी प्रण की रमक दुगुनी करेगा
✍️ चिराग़ जैन

आँख भर आई

रास्ता दूभर बहुत था
हारने का डर बहुत था
राह की धरती नहीं थी
चाह का अम्बर बहुत था
जूझने में व्यस्त थे, सुबकी नहीं आई
जीतने पर आँख भर आई

ज़िन्दगी की नाव की पतवार का एहसास भी था
साथ ही इस अनकहे से प्यार का आभास भी था
यूँ समझ लो, द्वार पर शिशुपाल भी था, कंस भी था
और मन के कुंजवन में अनवरत इक रास भी था
और उस पर रीतियों का बोझ हरजाई
जीतने पर आँख भर आई

देह के संवाद पर सब दोस्त-यारों की नज़र थी
और मन के हाल पर बस चांद-तारों की नज़र थी
हम निरंतर शुष्क होती कोंपलों से काँपते थे
पर हमारी डालियों पर भी बहारों की नज़र थी
एक दिन ख़ुद ही समूची डाल हरियाई
जीतने पर आँख भर आई

एक दिन पाया बिवाई में महावर भर गया है
एक दिन देखा हर इक निःशब्द में स्वर भर गया है
पीस की हर टीस सहकर अब हथेली रच उठी है
और इक सौभाग्य का क्षण मांग आकर भर गया है
हर पुरानी याद मुस्काई
जीतने पर आँख भर आई
✍️ चिराग़ जैन

इमारत और झोंपड़ी

झोंपड़ी को यह नहीं भूलना चाहिए
कि बड़ी इमारत का मलबा भी
झोंपड़ी से ऊँचा होता है।

और मलबे को भी
यह नहीं भूलना चाहिए
कि मलबा
कितना भी ऊँचा हो जाए,
उसे इमारत नहीं कहा जा सकता।

इमारत ध्यान रखे
कि चाटनेवाले दीमक कहलाते हैं
और
मरम्मत की आवाज़ें
शोर होती हैं, संगीत नहीं!

झोंपड़ी ध्यान रखे
कि इमारत पर कीचड़ फेंकेगी
तो ओछी कहलाएगी
और अपना आंगन लीपती रहेगी
तो मज़बूत भी बनी रहेगी
और सुन्दर भी!

✍️ चिराग़ जैन

आराम का एक दिन

रात काटें जागकर हम
दिन बिताते भागकर हम
व्यस्तता से घिर रहे हैं
क्यों उनींदे फिर रहे हैं
इस थकन के भाग्य में आराम कुछ घोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

एक दिन ऐसा जुटा लें, जब कोई भी काम ना हो
आँख में ख्वाहिश नहीं हो, श्वास में संग्राम ना हो
व्यस्तता के ढेर से बस एक दिन ऐसा चुरा लें
काश बेपरवाह होकर आँख मूंदें, मुस्कुरा लें
याद की कुछ गठरियाँ खोलें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

पिंडलियों में नींद के अन्याय की पीड़ा भरी है
भृकुटियों पर एक मुद्दत से बहुत चिंता धरी है
भीड़ के जंजाल से हटकर कभी एकांत बुन लें
शांत हों इतने कि अपनी देह की आवाज़ सुन लें
एक दिन ख़ुद के लिए रो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

विश्व का हमने कोई कर्जा नहीं खाया हुआ है
किसलिए मुस्कान का ये झूठ चिपकाया हुआ है
एक दिन बस एक दिन की ज़िंदगी का लुत्फ़ ले लें
जीतने और हारने से दूर होकर खेल खेलें
ज़िंदगी में ज़िन्दगी बो लें
आओ कुछ पल चैन से सो लें

✍️ चिराग़ जैन

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