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बामियान के घाव

बहुत भयानक सपना था
साक्षात् बुद्ध सामने थे
…लहूलुहान।

उनके पीछे एक भीड़ थी
…पूरी भीड़।

हताश से महावीर
परास्त से गांधी
और शर्मिंदा से पैग़म्बर
किसी गहरे सदमे से सन्न राम
किसी आशंका से त्रस्त कृष्ण
और
ख़ुद से नज़रें चुराते अम्बेडकर।

सब थे
…पर बदहवास।

सबके जिस्म छलनी थे
ज़ख़्म ही ज़ख़्म
हाँ, बुद्ध के ज़ख़्म कुछ ताज़ा थे

भयंकर मंज़र था
साँस तक का शोर नहीं था
तभी सन्नाटे में
टप्प से टपकी
लहू की एक बूंद।

…बस सपना टूट गया
बाॅलकनी में
अख़बार आकर गिरा था
…टप्प से।

✍️ चिराग़ जैन

विकास की बाढ़

बहुत दिन बीते
शहर ने डुबो दी थी
एक नदी
विकास की बाढ़ में।

आज जमुना किनारे आया
तो लगा
कि उतर गई है
विकास की बाढ़

फिर से
बाहर निकल आई है
आदमियों में डूबी
…जमुना।

✍️ चिराग़ जैन

राॅयल्टी

प्रेम
जीवन का याचक नहीं
ख़ुशियों का सौदागर है।

मुनाफ़ाख़ोर नहीं है प्रेम
एक पल की
ख़ुशी के बदले
एक ही पल लेगा
हमारे जीवन से

फिर हम
जीवन भर
प्रसन्न रहें
उस पल की
स्मृतियों में।

प्रेम
कभी नहीं आएगा
स्मृतियों की
राॅयल्टी मांगने।

✍️ चिराग़ जैन

सिलवटें कसमसाती रहीं

हम तरसते रहे रेशमी भोर को
रात भर सिलवटें कसमसाती रहीं
इक सुक़ूं के लम्हे की तमन्ना लिए
साँस आती रही साँस जाती रही

आँख में इक समंदर सँजोए हुए
घाट का रोज़ अपमान करती चली
प्यास की कोर पर अश्रु ठहरा रहा
पर नदी सिर्फ़ मद में अकड़ती चली
चाल भारी हुई, देह खारी हुई
डूब कर देर तक थरथराती रही

बालपन कट गया यौवनी आस में
और यौवन बुढ़ापे की चिंताओं में
कर्म निर्भर रहा बाजुओं पर मगर
हाथ उलझे रहे भाग्य रेखाओं में
ज़िन्दगी मौत की राह तकती रही
मौत जीवन से बचती-बचाती रही

✍️ चिराग़ जैन

भारत की तस्वीर

भारत की आज तस्वीर जो बनी हुई है
उसमें पुरानी हर रीत का भी रंग है
हल्दीघाटी वाली एक हार की कसक भी है
पोरस की स्वाभिमानी जीत का भी रंग है
चंद्रगुप्त मौर्य वाले साहस का नूर भी है
चाणक्य शिखा की कूटनीति का भी रंग है
झाँसी वाले शौर्य की कहानी तलवार पे है
पीठ पर ममता की प्रीत का भी रंग है

भारत की वीणा पे जो सरगम गूंजती है
उसमें वीणा के हर तार का भी योग है
क्रांति के बारूदों के धमाकों की धमक भी है
शांति का व मान-मनुहार का भी योग है
तलहट में छिपे खज़ानों की खनक भी है
अभिशाप झेलते बिहार का भी योग है
काम की प्रभावना की अजंता-एलोरा भी है
राम-कृष्ण योग के विचार का भी योग है

बरखा में नृत्यमग्न मोर अनिवार्य है तो
मोर की नमी से भरी कोर भी ज़रूरी है
तुंग हिमगिरि की विशालता आवश्यक है
सागर की गर्जना का रोर भी ज़रूरी है
अवध की सुरमई शाम अनिवार्य है तो
काशी के किनारों वाली भोर भी ज़रूरी है
देश की अखण्डता को पूर्ण करने के लिए
भारती का एक-एक पोर भी ज़रूरी है

✍️ चिराग़ जैन

रेशम है कविता

रेशम है कविता
झट से फिसल जाती है
उंगलियों को चूमती हुई।

थाम लेते हैं इसे
जीवन के
खुरदरे अनुभव।

दर्द रिसता तो होगा।
पीर बहती तो होगी।

कौन जाने
क्या ज़्यादा दुखदायी है
दर्द का रिसना
या रेशम का फिसलना?

…डर लगता है
गुलाबी छुअन से।

रेशम का कसता फंदा
सहला भर जाता है
खुरदरे अनुभवों को।
✍️ चिराग़ जैन

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