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एक काॅलम हादसा

कौन सोचे किन चनों के साथ कितना घुन पिसा
जी रही है दामिनी या मर रही महरुन्निसा
आज तो अख़बार की दरकार है केवल यही
सात काॅलम सनसनी और एक काॅलम हादसा

✍️ चिराग़ जैन

शरद पूर्णिमा

घर में आंगन न रहे, खीर के प्याले न रहे
वो अंधेरे नहीं मिलते, वो उजाले न रहे
चांद के पास अभी भी है ख़ज़ाना लेकिन
वो लुटाए तो कहाँ, लूटने वाले न रहे

✍️ चिराग़ जैन

पीड़ा जगनी थी

अन्तस् में पीड़ा जगनी थी, यह निर्धारित था
ठेस अपेक्षा से लगनी थी, यह निर्धारित था
रत्ना तो बस बानक भर थी, पूरे किस्से में
तुलसी को मानस् रचनी थी, यह निर्धारित था

✍️ चिराग़ जैन

मुल्क़ को स्वर्ग बनाने का ख़्वाब

अब इस तरह से अमन ये वतन न पाएगा
सियासती कभी जनता का मन न पाएगा
मुल्क़ को स्वर्ग बनाने का ख़्वाब देख तो लें
मगर सियासती लोगों से बन न पाएगा
✍️ चिराग़ जैन

बहार आई है

पूरे गुलशन की फ़िज़ाओं में ख़ुशी छाई है
हर दिशा नूर न जाने कहां से लाई है
शाख से फूल सजे हैं, कि फूल से शाखें
कुल मिलाकर ये हुआ है कि बहार आई है

✍️ चिराग़ जैन

जलन

बूंद बारिश की उसको छूती है
मन मेरा ज़ार-ज़ार जलता है
मैं उसे प्यार करूं तो बेहतर
और लोगों का प्यार खलता है

✍️ चिराग़ जैन

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