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हिन्दी भाषा

जिन ध्वनियों में सबसे पहले मैंने अपनों को पहचाना
गड्ड-मड्ड होकर जो सबसे पहले कानों से टकराईं
जिनमें लाड लड़ाकर माँ ने मुझे कलेजे से चिपकाया
जिनमें बुआ बलैया लेकर अस्पताल में भी इतराई
जिन ध्वनियों की हर स्वर-लहरी में अवलम्बन आशा का है
उन ध्वनियों का इक-इक अक्षर केवल हिन्दी भाषा का है

जिस भाषा के स्वर, बचपन में मेरे बहुत घनिष्ठ हो गए
जिस भाषा के व्यंजन, तुतली बोली में स्वादिष्ट हो गए
जब उसको लिखना सीखा तो अ अनार की पूँछ बना दी
ढ का पेट बड़ा कर डाला, क और ल की मूँछ बना दी
इतने पर भी कभी न जिसमें बादल घिरा निराशा का है
इतना बड़ा कलेजा शायद केवल हिन्दी भाषा का है

जब भावों में प्रीत सजी थी, अलकों में इक आस भरी थी
तब धड़कन ने काग़ज़ पर आ देवनागरी देह धरी थी
पीर, हर्ष, उल्लास, हताशा, भय, संदेह, समर्पण, आशा
हर उलझन के लिए शब्द है, कितनी धनी हमारी भाषा
जैसा रिश्ता दीपक-बाती, बादल और पिपासा का है
वैसा रिश्ता अभिव्यक्ति से मेरी हिन्दी भाषा का है

✍️ चिराग़ जैन

पुनरागमन

आज मुद्दत बाद
मेरा गीत मेरे द्वार आया

बात में उसकी कहीं कोई परायापन नहीं था
और मेरी याद से भी थी नदारद हर शिक़ायत
ठीक पहले सी सहजता थी हमारे बीच लेकिन
आँख की इक कोर पर थी सहज होने की क़वायद
आज ख़ुद से मैं उसे ख़ुद को छिपाते देख पाया

आज से पहले उसे छूना हुआ सौ बार लेकिन
आज उसका ग़ैर हो जाना रड़क कर चुभ रहा था
बस रहा था आज भी दिल में उसी के मैं मगर अब
इस बसावट में किसी का डर धड़क कर चुभ रहा था
आज उसका खिलखिलाना एक पल को कँपकँपाया

आज पहली बार था संवाद सपनों से अछूता
आज पहली बार मिलने का बहाना ढूंढना था
आज पहली बार बातें ख़त्म होती दीखती थीं
आज पहली बार बातों में ज़माना ढूंढना था
आज का अख़बार पहली बार अपने बीच पाया
✍️ चिराग़ जैन

विचार और मूर्त

दिल की ज़मीन पर जो इक बीज पड़ गया है
हर हाल में फलेगा, ये सृष्टि का नियम है
कोई विचार मन में, आकर ठहर गया तो
जन्मों-जनम पलेगा, ये सृष्टि का नियम है

सुख-दुख के चंद पल हैं, जीवन जिसे हैं कहते
युग-युग के चक्करों में, बिन बात फँसते रहते
अज्ञानवश जो अपना गुलशन उजड़ गया है
वो ध्यान से खिलेगा, ये सृष्टि का नियम है

अन्तस् में हो गया जब, विश्वास का उजाला
अमृत बना दिया था, मीरा ने विष का प्याला
वरदान में न रखना, संकोच और शंका
विश्वास से मिलेगा, ये सृष्टि का नियम है

ये स्वर्ग-नर्क की सब, चर्चा उधार की है
जिस पर जहाँ टिका है, ताक़त विचार की है
मस्तिष्क में उपज कर, जो सोच में पला है
सच में वही घटेगा, ये सृष्टि का नियम है

✍️ चिराग़ जैन

ठौर ना पाया

कौन कहता है नदी सागर को प्यारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी

टूटकर बिखरी कहीं जब भी, तभी झरना बना
पत्थरों ने गोद में लेकर कहा- ‘मरना मना’
सिर झुकाकर बढ़ चली पर चाल भारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी

घाट तक पहुँची, उलझकर रह गयी संसार में
गाँव-गलियों, मरघटों, नहरों, नलों, घर-बार में
उफ़, बिना मतलब ही खेतों की उधारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी

बांध ने बंदी बनाया, शहर ने शोषण किया
कर्मकाण्डों ने लहू लेकर भरण-पोषण किया
कारख़ानों ने छुआ, घातक बिमारी हो गयी
ठौर ना पाया मिठासों में तो खारी हो गयी

✍️ चिराग़ जैन

शादी संकट

ये जो शादी है ना सनम हाय इसमें झंझट बड़ा है
दो रोज़ का है मज़ा फिर सबको रोना पड़ा है

यूं तो मेरा पड़ा नहीं था कभी ग़मों से पाला
शादी की इस दुर्घटना को मैंने कितना टाला
अच्छी पत्नी की चाहत में विश्व भ्रमण कर डाला
आखि़र इक दिन इक कन्या ने पहना दी जयमाला
ऐसा उतरा मेरा ख़ुमार, फिर आज तक ना चढ़ा है

जो होता है चाट पकौड़ी, तले-भुने का आदी
मूंग दाल की खिचड़ी उसको कर जाती है बादी
बीवी की झिकझिक ने मेरी सुख की नींद उड़ा दी
सब हंसते हैं मुझ पर बेटा, और कराले शादी
मेरी खुल न पाती ज़ुबां, यहां उसका ताला जड़ा है

मैं कहता हूं पूरब को चल वो पश्चिम को दौड़े
मैं कमरे का फैन चलाउं तो वो कंबल ओढ़े
ना तो मेरे साथ चले और ना ही मुझको छोड़े
जिसने ये कुण्डली मिलाई उसके निकलें फोड़े
मेरी पत्नी से मेरा छत्तीस का आंकड़ा है

क्वारा हो तो कर सकता है रोज़ नवेली सैटिंग
शीला, मुन्नी सबसे करता रहता घंटों चौटिंग
ईलू-ईलू, इश्क़-मुहब्बत, मूवी-पिकनिक-डेटिंग
शादी होते ही बंदे की गिर जाती है रेटिंग

क्वारे थे तो वृंदावन में नाचे ता-था-थैया
चौन की बंसी, हंसी-ठिठोली, मीठी जमना मैया
गांव की गोरी, माखनचोरी, गोपी, ग्वाले, गैया
शादी होते ही पचड़ों में फँस गए कृष्ण कन्हैया

यहां न जाओ, वहां न जाओ- कोई न इतना टोके
क्वारों के जीवन में चलते मस्त हवा के झोंके
जैसे चाहे सो सकते हैं आड़े-तिरछे होके
एक ज़रा सा सुख मिलता है, इतना सब कुछ खो के

कितना भी समझा ले दुनिया, नहीं समझता कोई
जिसके पैरों पड़ी बिवाई, पीर जानता सोई
बिन बिस्तर की नींद भली या चादर नीर भिगोई
जिल्लत के जीवन से बेहतर सूनी पड़ी रसोई
इस देश का हर युवा, क्यों ख़ुदकुशी पर अड़ा है

✍️ चिराग़ जैन

लफंडर-लबाड़ी

चाहती है अगर प्यार जारी रहे
मैं लफ़ंडर रहूँ, तू लबाड़ी रहे
एक ही शर्त पर है ये मुमकिन अगर
मैं कुँआरा रहूँ, तू कुँआरी रहे

घर-गृहस्थी के पचड़ों से बचकर रहें
तो मुहब्बत का नुक़सान टल जाएगा
हो गई चिल्ल-पौं बालकों की शुरू
तो हमारा दिवाला निकल जाएगा
आशिकी के लिए है ज़रूरी बहुत
पाँव हल्के रहें, जेब भारी रहे

जब कभी कोई मुझको छिछोरा कहे
तू तभी थोड़ी-थोड़ी छिछोरी बने
मैं तेरे प्यार में कुछ जुगाड़ू बनूं
तू मेरे इश्क़ में कुछ टपोरी बने
मैं मुहल्ले में रिक्शा चलाता फिरूं
तू मेरी फिक्स सिंगल सवारी रहे

लड़कियां देखकर सोचते हैं सभी
इनसे शादी करें या मुहब्बत करें
साल में एक दो गिफ़्ट देते रहें
या कि हर रोज़ की मोल आफ़त करें
पाव भर बेर से काम चल जाए तो
क्या ज़रूरी है आंगन में झाड़ी रहे

हो ज़रूरी अगर ब्याह करना तुझे
तो किसी और के नाम हो जाइयो
मैं जमूरे सा चुपचाप तकता रहूँ
तू बंदरिया सी गुमनाम हो जाइयो
फिर मेरी डुगडुगी पर मटक लीजियो
जब कभी घर से बाहर मदारी रहे

प्रेमिका के लिए मुस्कुराते रहे
और पत्नी से हम नकचढ़े हो गए
वाइफ ने टच किया, बाल चिपके रहे
प्रेमिका ने छुआ तो खड़े हो गए
प्रेमिका एक एडवांस पेमेंट है
और पत्नी हमेशा उधारी रहे

✍️ चिराग़ जैन

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