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आज मुद्दत बाद
मेरा गीत मेरे द्वार आया

बात में उसकी कहीं कोई परायापन नहीं था
और मेरी याद से भी थी नदारद हर शिक़ायत
ठीक पहले सी सहजता थी हमारे बीच लेकिन
आँख की इक कोर पर थी सहज होने की क़वायद
आज ख़ुद से मैं उसे ख़ुद को छिपाते देख पाया

आज से पहले उसे छूना हुआ सौ बार लेकिन
आज उसका ग़ैर हो जाना रड़क कर चुभ रहा था
बस रहा था आज भी दिल में उसी के मैं मगर अब
इस बसावट में किसी का डर धड़क कर चुभ रहा था
आज उसका खिलखिलाना एक पल को कँपकँपाया

आज पहली बार था संवाद सपनों से अछूता
आज पहली बार मिलने का बहाना ढूंढना था
आज पहली बार बातें ख़त्म होती दीखती थीं
आज पहली बार बातों में ज़माना ढूंढना था
आज का अख़बार पहली बार अपने बीच पाया
✍️ चिराग़ जैन

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