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अनुनय

बिन मतलब का अहम् कभी जब
बिन मतलब जिद से टकराया
ऐसा भीषण गर्जन गूंजा
संबंधों का दिल घबराया
स्नेह सहमकर स्तब्ध हुआ था
प्रेम घरौंदा ध्वस्त हुआ था
छितराए सुख के सब बादल, लुप्त हुईं स्नेहिल बौछारें
विश्वासों की उर्वर भू पर, उभरीं अनगिन शुष्क दरारें

मन में उपजे एक अहम् ने परिचय की अनदेखी कर दी
जिन पर था अधिकार उन्होंने अनुनय की अनदेखी कर दी
वैरी सा व्यवहार हुआ है
हृदय विराजित भद्र जनों का
राह बनाती पतवारों से
खुद ही लड़ बैठी है नौका
क्लेश सुखों को लील चुका है
द्वेष हृदय को कील चुका है
जो सम्बन्ध नहीं डिग पाए, दुनिया भर के आघातों से
वे दो टूक हुए क्षण भर में, कुबड़ी दासी की बातों से
प्रतिशोधों के आकर्षण ने परिणय की अनदेखी कर दी
जिन पर था अधिकार उन्होंने अनुनय की अनदेखी कर दी

इतना ज़्यादा मान मिला है
पल भर में घिर आए रण को
याद नहीं कर पाया कोई
साथ बिताए मोहक क्षण को
कोई साधन काम न आया
संशय ने सिंहासन पाया
दिल का अवध उजाड़ हुआ है, अपनापन जा बैठा वन में
दशरथ श्वास नहीं ले पाए, महलों के एकाकीपन में
एक चुभन ने यादों के संग्रहालय की अनदेखी कर दी
जिन पर था अधिकार उन्होंने अनुनय की अनदेखी कर दी

✍️ चिराग़ जैन

मेह-निमंत्रण

ओ रे बदरा बरस
बन के सावन सरस
राह धरती ने कबसे तकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की

हल ने काटी चिकौटी बहुत
पर धरा में नमी ही न थी
ख़ूब टपका पसीना मगर
प्यास में कुछ कमी ही न थी
प्रश्न बढ़ते रहे
हल सिसकते रहे
एड़ियाँ फट गईं खेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की

हिमशिखर का धवल कारवां
कौन जाने कहाँ लुट गया
पर्वतों पर लकीरें बनीं
और झरनों का दम घुँट गया
स्रोत सूखे सभी
घाट रूखे अभी
हर नदी हो गई रेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की

गीत बरखा नहाने चला
तो पसीना-पसीना हुआ
प्रीत जिस डाल पर झूलती
उसका हर पात झीना हुआ
गुलमुहर झर चुका
नीम का सर झुका
हाय मुरझा गई केतकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की

जब तू आया तेरी राह में
घास का इक गलीचा सजा
मेंढ़कों ने धमक छेड़ दी
पत्तियों पर तराना बजा
फूल के संग झरी
नीम ने रसभरी
इक निम्बोली तुझे भेंट की
प्यास तू ही बुझा जेठ की

✍️ चिराग़ जैन

आतंकवाद का दंश

इस कदर नफ़रत बढ़ी है, हो गये त्योहार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल

ईद को डर है, वजू की हौद में तेज़ाब ना हो
शाम की मजलिस कहीं बस दो घड़ी का ख़्वाब ना हो
रह नहीं जाएँ नयी नस्लें मिठासों से नदीदी
दे न दे कोई क़फ़न की शक्ल में इस बार ईदी
मस्जिदों की सीढ़ियाँ ज़ख़्मी हैं, कुल बाज़ा घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल

सावनी उत्सव सभी दहशत के रंगों में रंगे हैं
जिस जगह झूला पड़ा था, अब वहाँ मातम टंगे हैं
तीज पर बाबुल के घर का रास्ता मुश्किल कटा है
जिस डगर आएगी लाडो, उस डगर कल बम फटा है
भाई-बहनों का कलाई पर सँवरता प्यार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल

आयतों की आड़ में गोली चली रमज़ान रोया
स्वर्ण मंदिर में बहा खूँ, शौर्य का बलिदान रोया
मौत का तांडव मिला है, धर्मगुरुओं के दरों पर
सब पे शासन की तमन्ना छा गई गिरजाघरों पर
शस्त्र से सब शास्त्र आहत, स्वार्थ से अवतार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल

आपसी सद्भाव इतना हो कि नफ़रत टिक न पाये
फूल का बाज़ार यूँ पनपे कि असला बिक न पाये
ज़ख़्म को मरहम मिला तो दम घुँटेगा दहशतों का
आदमीयत ही पढ़ेगी फ़ातिहा इन नफ़रतों का
काश मानवता दरिंदों को करे इक बार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल

✍️ चिराग़ जैन

अविनय

जो अकारण ही किसी अपमान के भागी बने हैं
हो न हो उनसे किसी सम्मान की अविनय हुई है
जो बिना चाहे पतन-पथ पर चले आए अचानक
उन अभागों से किसी उत्थान की अविनय हुई है

थी अतुल क्षमता विजय की, पर पराजय का रहा डर
सामने गांडीवधारी थे, तभी रथचक्र जर्जर
यदि अचानक मार्ग बदले लक्ष्य को बढ़ता हुआ शर
स्पष्ट इंगित है कहीं संधान की अविनय हुई है

भाग्य से हारे हुए, मस्तक पकड़ जो रो रहे हैं
सम्पदा से रिक्त होकर खंडहर में सो रहे हैं
जो विवशता के किसी अभिशाप को ढोता रहा हो
उस तपस्वी से किसी वरदान की अविनय हुई है

न्याय का पलड़ा कुतर्कों से प्रभावित हो गया हो
तंत्र सारा चाटुकारों को समर्पित हो गया हो
सत्य जिनका मूढ़ताओं से पराजित हो गया हो
वो समझ जाएँ किसी विद्वान की अविनय हुई है

जो ज़रूरत पर सभी के अजनबी दृग्कोण देखे
चीख जिसकी व्यर्थ जाए, सृष्टि सारी मौन देखे
जो स्वयं निष्ठुर रहा हो, पीर उसकी कौन देखे
स्पष्ट है उससे स्वयं भगवान की अविनय हुई है

✍️ चिराग़ जैन

मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं

मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं
मुझ पर रस्मों का ज़ोर नहीं
मेरे सपनों को बांध सके
ऐसी दुनिया में डोर नहीं

कोमल हूँ कन्यापूजन में
चण्डी हूँ दुष्टों से रण में
जब ठान लिया तो मिला दिया
धरती को अम्बर से क्षण में
मुश्किल की कोई भी आंधी
मुझको सकती झकझोर नहीं

मेरे सपनों का देश अलग
मेरा ख़ुद का परिवेश अलग
सारी दुनिया की बात अलग
मेरे मन का संदेश अलग
कुछ भी सुनकर चुप रह जाऊँ
ऐसा अब होगा और नहीं

अर्पण की घड़ी अगर आई
अपना सर्वस्व लुटा दूंगी
धोखे से छलना चाहोगे
भारी विध्वंस मचा दूंगी
हर पल कोमल भी नहीं मगर
हर पल को बहुत कठोर नहीं

आँखों में सपना पलता है
दिल हिरण चैकड़ी भरता है
क़दमों में बिजली सी तेज़ी
मन में बेहद चंचलता है
मैं दौड़ जिसे छू नहीं सकूं
ऐसा तो कोई छोर नहीं

✍️ चिराग़ जैन

क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी

क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के
क्या तुम ख़ुद तक लौट सकोगी
अपनेपन की बाग़ छोड़ के

मेरे संदेशों की दस्तक
तुम सुनकर भी ध्यान नहीं दो
मेरे स्वर के आकर्षण को
अपने मन में मान नहीं दो
नदिया, नदिया ही रहती है
चाहे निकले धार मोड़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के

तुम प्रतिबंध लगा सकती हो
सब तकनीकी संचारों पे
लेकिन कैसे रोक लगेगी
अंतर्मन वाली तारों पे
क्या हिचकी को रोक सकोगी
इक झूठी मुस्कान ओढ़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के

संबंधों में खटपट होगी
मन बेचारा पीर सहेगा
किंतु कहीं संवाद रुका तो
हर अपनापन मौन रहेगा
दिल दुखने पर ऐसे चीखो
चुप्पी चल दे राह छोड़ के
क्या तुम सचमुच ख़ुश रह लोगी
संबंधों के तार तोड़ के

✍️ चिराग़ जैन

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