Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
तुमने कड़वे शब्द कहे हैं, कैसे इस सच को झुठलाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
वाणी कड़वी, मन खट्टा है और कसैला रूप-लवण है
किस आसन पर रख पाओगी, प्यार भरा जो मीठा क्षण है
कण-कण में विष व्याप्त हुआ है, किस कण पर अमृत टपकाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
आँखों में अब तक ताज़ा है, प्रेम सुसज्जित पत्र तुम्हारा
पर कानों में गूँज रहा है, अपशब्दों का सत्र तुम्हारा
पाती पढ़-पढ़ मुस्काता हूँ, वाणी सुन-सुन बुझता जाऊँ
समझ नहीं आता इस इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
गहरी खाई में ला पटका, तुमने मेरे मन-पर्वत को
सारी रात पढ़ा है मैंने, प्रेम सुधा में भीगे ख़त को
अपने हाथों से उस ख़त का कोई कोना फाड़ न पाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
तुमको पीड़ा पहुँचाने का, मैं भी अगर इरादा रखता
तो भी वाणी पर संयम की, थोड़ी तो मर्यादा रखता
अंतर्मन पर घाव हुए हैं, कैसे इनकी टीस भुलाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
कष्ट हुआ हो तो तुम मुझसे झगड़ा कर के रो सकती हो
मैं ये सोच नहीं सकता तुम तुम इतनी कड़वी हो सकती हो
अब मैं ख़ुद भी चाहूँगा तो, तुम तक शायद लौट न पाऊँ
समझ नहीं आता इस पर आश्चर्य करूँ या शोक मनाऊँ
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
बूंद भर जल नहीं दो भले तुम मुझे
दीखते ही रहो बस घड़ों की तरह
क्या हुआ गर कभी प्यास बाकी रही
ज़िन्दगी चुक गई आस बाकी रही
जिन ज़मीनों की अरदास बाकी रही
खोखली हो गई बीहड़ों की तरह
मंडियों में सजाया हुआ नेह हूँ
मैं शपथ में बसा एक संदेह हूँ
वक़्त के हाथ जर्जर हुई देह हूँ
बस लिपटते रहो चीथड़ों की तरह
वैभवों का बिखरता हुआ कक्ष हूँ
इक वृहन्नल के आगे खड़ा लक्ष हूँ
आँधियों का सताया हुआ वृक्ष हूँ
तुम बरसते रहो कंकड़ों की तरह
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सिर्फ दिखावे भर के सारे उत्सव मेले हैं
सब अपने-अपने जीवन में निपट अकेले हैं
अपनेपन का नाम सुना है, शक्ल नहीं देखी
रिश्तों पर मिटने वालों की नस्ल नहीं देखी
बाहर से ख़ुश हैं पर भीतर बहुत झमेले हैं
वैभवशाली दिखने की इक होड़ लगी है रे
जर्जरता भी बाहर से बेजोड़ लगी है रे
हीरे बनकर घूम रहे मिट्टी के ढेले हैं
बेमतलब की प्रीत, ठिठोली पीछे छूट गई
मन से मन तक जाने वाली डोरी टूट गई
कौन बताए किसको किसने क्या दुःख झेले हैं
जिनसे अपनापन चाहा उनसे सम्मान मिला
संबंधों की नब्ज़ छुई तो मन बेजान मिला
वाणी पर है शहद दिलों में सिर्फ करेले हैं
क्या संबंधों वाले सारे किस्से झूठे थे
या सचमुच पिछली पीढ़ी के लोग अनूठे थे
क्या अब भी दुनिया में वैसे कुछ अलबेले हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
प्यार ने लांघ दीं वक़्त की सरहदें
और सारे नियम देखते रह गए
इश्क़ हम पर ठहाके लगाता रहा
हम मुहब्बत के ग़म देखते रह गए
लोक-परलोक की धारणा से परे
शबरियों की प्रतीक्षा अटल ही रही
लोग कहते हैं राधा वियोगिन बनी
कृष्ण से पूछिये वो सफल ही रही
प्रेम से मृत्यु का भय पराजित हुआ
स्तब्ध से मौन यम देखते रह गए
एक कच्चे घड़े पर भरोसा किए
सोहनी तेज़ धारा में ग़ुम हो गई
कैस दर-दर भटकता रहा उम्र भर
और लैला सहारा में ग़ुम हो गई
रूह का आसमां में मिलन हो गया
जिस्म धरती पे हम देखते रह गए
कोई तो इस ज़माने को समझाइये
क़ायदे बावरों को सिखाता रहा
जो दीवाने हुए प्रेम के पान से
उनको विष के पियाले पिलाता रहा
प्रेम विषपान करके अमर हो गया
सारे ज़ुल्मो-सितम देखते रह गए
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सिर्फ अपने किसी स्वार्थ को साधने
मैं दिखावा कभी भी न कर पाउँगा
मैं ग़लत को ग़लत ही कहूँगा सदा
झूठ बोला कभी तो बिखर जाउँगा
बस किसी एक झूठी ख़ुशी के लिए
भ्रम तुम्हें सौंप दूँ ज़िन्दगी के लिए
सत्य तो सत्य ही है सभी के लिए
अब बुरा होउंगा कल सँवर जाउंगा
आज कर्तव्य गर ये निभाऊँ नहीं
भ्रम तुम्हारा अगर तोड़ पाऊँ नहीं
और ख़ुद से नज़र मैं मिलाऊँ मैं
कुछ ठिकाना नहीं फिर किधर जाउंगा
यूँ अगर आज रिश्ता निभाना पड़े
हर किसी बात पर सिर झुकाना पड़े
सच समझते हुए मुँह चुराना पड़े
तन जियेगा मगर मन से मर जाऊंगा
आज तुमको अगर पा लिया झूठ से
दोस्ती का दिखावा किया झूठ से
गर तुम्हें आज बहला लिया झूठ से
देखना एक दिन मैं मुकर जाऊंगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
जबसे कुर्सी पाई जी, मोदी कैसे खेलें होली
ऐसी आफ़त आई जी, मोदी कैसे खेलें होली
फ्यूज़ उड़ा कर गए केजरी दिल्ली ली हथियाई
उधर जाट सब फेल कर गए पानी की सप्लाई
धोती ना धुल पाई जी
मोदी कैसे खेलें होली
रास चल रहा जेएनयू में बिना डरे बिन सहमे
उधर कूद गए रविशंकर जी स्वयं कालिया दह में
रोई जमुना माई जी
मोदी कैसे खेलें होली
ड्रीम गर्ल तो साफ कर रही मथुरा वाला पानी
और मिनिस्टर बन बैठी है गुजरातन ईरानी
ख़ुद की दूर लुगाई जी
मोदी कैसे खेलें होली
बचपन बीता हाथ उठाए केतलिया का हत्था
और बुढ़ापे में निरखत हैं जेटलिया का मत्था
यूँ ही उमर गंवाई जी
मोदी कैसे खेलें होली
तीन राज्य तो गँवा चुका है अमित शाह का फंडा
अब डंके की चोट बज रहा आरएसएस का डंडा
लुटिया रहे डुबाई जी
मोदी कैसे खेलें होली
गठबंधन ने बीजेपी से पटना हथिया लीना
धीरे धीरे सिकुड़ रहा है छप्पन इंची सीना
गैया काम न आई जी
मोदी कैसे खेलें होली
दिल्ली वाले वोट बैंक पर पड़ा विपक्षी डाका
हरियाणा को ले बैठेंगे इक दिन खट्टर काका
घाटी ले गई ताई जी
मोदी कैसे खेलें होली
विजय माल्या लेकर भागे पैसा नंबर वन का
अब भी सपना देख रहे हो क्या तुम काले धन का
कैसे करें उगाही जी
मोदी कैसे खेलें होली
धर्म कर्म की बाजारों में ऐसी तैसी हैगी
रविशंकर जी कल्चर बेचें, रामदेव जी मैगी
फैशन राधा माई जी
मोदी कैसे खेलें होली
✍️ चिराग़ जैन