Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
दुनिया के ऐरे-ग़ैरे फरमानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
रोज़ी-रोटी के पचड़ों में उम्र गँवाने वाले लोग
दिल की भाषा भूल चुके हैं अक्ल चलाने वाले लोग
पैसा-पैसा करते इन नादानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
लानत की कुछ फिक्र नहीं है, तारीफ़ों की चाह नहीं
दुनिया वाले क्या सोचेंगे अब इसकी परवाह नहीं
कभी-कभी आने वाले मेहमानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
एक झलक पर दुनिया को कुर्बान किया जा सकता है
सब कुछ खोकर मिलने का अरमान जिया जा सकता है
दिल की सुनने वाले हम धनवानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
इश्क़ बरसता है तो हर मौसम सावन हो जाता है
प्यार अगर सच्चा हो तो फिर मन पावन हो जाता है
ईटू-मीटू जैसे इन अभियानों से डरते हैं क्या
इश्क़ मुहब्बत वाले भी नुक़सानों से डरते हैं क्या
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
उत्सव की आँखें भीगी हैं, एक घड़ी विपदा लाई
हर उजियारे पर भरी है, एक घड़ी की परछाई
कैसे वर मांगे कैकयी ने, सिंहासन से राम छिने
काया से जीवन छीना है, आशा से आयाम छिने
नगर समूचा वन जैसा है, यश-वैभव वनवासी है
जिसने सबकी ख़ुशियाँ छीनीं, उसके द्वार उदासी है
भोली रानी ख़ुद की करनी, ख़ुद भी मेट नहीं पाई
एक ठहाका पांचाली का पूरे युग पर भार बना
एक वचन ही पूरे युग की चीखों का आधार बना
पुत्र गँवाए, लाज लुटाई, घर छूटा, वनवास सहा
एक ठहाके के बदले में जीवन भर संत्रास सहा
इतने पर भी कब संभव है, उस इक पल की भरपाई
एक घड़ी आवेश न आता, गणपति मानवमुख रहते
एक घड़ी अमृत न छलकता, सूरज-चांद न दुख सहते
एक घड़ी का दंभ न होता, वंश दशानन क्यों खोता
एक घड़ी चौसर टल जाती, युग वीरों पर क्यों रोता
ईश्वर से भी कब टल पाई, एक घड़ी वह दुखदाई
हर उजियारे पर भारी है, एक घड़ी की परछाई
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जब घिरे सवाल तो निदान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
लोग जो परोपकार की मिसाल हो गए
दूसरों का दर्द ओढ़कर निहाल हो गए
उन प्रजातियों का ख़ानदान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
प्रीति की प्रतीतियों में लीन राधिका हुई
प्रेम की हवाओं में विलीन साधिका हुई
ज्ञानवान प्रीति के प्रमाण खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
गौण हो गईं तमाम नीतियाँ ज़मीन पर
सत्य का असर हुआ न न्याय की मशीन पर
सुर्ख़ियों में रोज़ संविधान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
कर्मशील, भाग्यवान से परास्त हो गया
योग युद्ध का बना, तभी नसीब सो गया
तीर हाथ में रहा, कमान खोजते रहे
हर कथा में सत्य के निशान खोजते रहे
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जब समय फंदा कसेगा
भूमि में पहिया धँसेगा
शाप सब पिछले डसेंगे
पार्थ नैतिकता तजेंगे
उस घड़ी तक जूझने का भ्रम निभाना है
सब समय का बारदाना है
नीतियों का ढोंग करतीं, सब सभाएँ मौन होंगी
न्याय की बातें बनातीं मन्त्रणाएँ मौन होंगी
जब प्रणय को भूलकर राघव निरे राजा बनेंगे
तब सिया के गीत गातीं प्रार्थनाएँ मौन होंगी
जो सदा रक्षक रहा हो
पुत्रवत सेवक रहा हो
उस लखन ने ही वनों में छोड़ आना है
सब समय का बारदाना है
द्यूत के उपरांत लज्जित शौर्य का वैभव रहेगा
श्वास ज्वाला में दहकता वीरता का शव रहेगा
व्यूह की रचना करेंगे द्रोण जब भीषण समर में
व्यूह भेदन का पुरोधा पार्थ तब ग़ायब रहेगा
आँख से आँसू झरेंगे
घात सब अपने करेंगे
अर्जुनों को बाद में बदला चुकाना है
सब समय का बारदाना है
ज़िन्दगी के हर मिलन का, हर विरह का क्रम नियत है
बाण की शैया मिलेगी या मधुर रेशम, नियत है
सब नियत है कब कहाँ किसको दबोचेगी पराजय
कब कहाँ उत्सव मनेगा, कब कहाँ मातम नियत है
न्याय का उपहास तय है
राम का वनवास तय है
कैकयी का कोप तो कोरा बहाना है
सब समय का बारदाना है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
हम सब इस कारण ज़िन्दा हैं, शायद मर जाना दूभर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
जब तक सम्भव हो तब तक ये श्वास चलाने को ज़िन्दा हैं
तन को इंधन दे पाएँ, बस भूख मिटाने को ज़िन्दा है
शायद कुछ ऐसा कर जाएँ, दुनिया जिसको याद रखेगी
जीवन भर का जीवन जीकर, फिर मर जाने को ज़िन्दा हैं
कुछ लोगों का तन जर्जर है, कुछ लोगों का मन जर्जर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
सबको ऐसा भ्रम होता है, हम जग में अपवाद बनेंगे
अब तक मौन रही है दुनिया, फिर भी हम संवाद बनेंगे
लेकिन माली जान रहा है, बगिया के हर इक बिरवे को
सब कोंपल बनकर जन्मेंगे, मर जाने पर खाद बनेंगे
कब खिलना है, कब मुरझाना यह भी ऋतुओं पर निर्भर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
सबकी इतनी सी चाहत है, सुख का कुछ सामान जुटा लें
आँख मिली है सपने पालें, कण्ठ मिला है शोर मचा लें
एक ज़रा सी भूल हमारे है को है से थे कर देगी
ऐसे-वैसे जैसे भी हो, हम अपना अस्तित्व बचा लें
उस जीवन पर मुग्ध सभी हैं, जो पहले दिन से नश्वर है
दुनियादारी क्या है, केवल अस्तित्वों का महासमर है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
पतझर का आना निश्चित था
पत्ते झर जाना निश्चित था
हरियाली की आशाओं पर, बादल ने आघात करा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
दुःशासन ने चीर हरा तो ठीक समय आ पहुँचे माधव
भीष्म काल बनकर बरसे तो तोड़ प्रतिज्ञा पहुँचे माधव
एकाकी होकर जूझा अभिमन्यु अकेला षड्यंत्रों से
आस रही होगी उसको भी, माधव के अभिनव तंत्रों से
उसका घिर जाना निश्चित था
भू पर गिर जाना निश्चित था
पर उस दिन जो वीर मरा है, उम्मीदों के साथ मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
जिस रानी ने जर्जर रथ की कील बना दी अपनी उंगली
दशरथ के रथ के पहिये के बीच फँसा दी अपनी उंगली
अंतर कभी नहीं रखती हो जो सौतन की संतानों में
ऐसी रानी रूठ गई तो क्या मांगेगी वरदानों में
राघव को वनवास; असंभव
रघुकुल को संत्रास; असंभव
पहले यह विश्वास मरा है, दशरथ उसके बाद मरा है
आँगन में जो ठूठ खड़ा है, वो सावन के हाथ मरा है
✍️ चिराग़ जैन