Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
हर दिशा में विष घुला है
मृत्यु का फाटक खुला है
इक धुँआ-सा हर किसी के
प्राण लेने पर तुला है
साँस ले पाना कठिन है, घुट रहा है दम
नीलकंठी हो गए हैं हम
हम ज़हर के घूँट को ही श्वास कहने पर विवश हैं
ज़िन्दगी पर हो रहे आघात सहने पर विवश हैं
श्वास भी छलने लगी है
पुतलियाँ जलने लगी हैं
इस हलाहल से रुधिर की
वीथियाँ गलने लगी हैं
उम्र आदम जातियों की हो रही है कम
नीलकंठी हो गए हैं हम
पेड़-पौधों के नयन का स्वप्न तोड़ा है शहर ने
हर सरोवर, हर नदी का मन निचोड़ा है शहर ने
अब हवा तक बेच खाई
भेंट ईश्वर की लुटाई
श्वास की बाज़ी लगाकर
कौन-सी सुविधा जुटाई
जो सहायक थे, उन्हीं से हो गए निर्मम
नीलकंठी हो गए हैं हम
लोभ की मथनी चलाई, नाम मंथन का लिया है
सत्य है हमने समूची सृष्टि का दोहन किया है
देवता नाराज़ हैं सब
यंत्र धोखेबाज़ हैं सब
छिन चुके वरदान सारे
किस क़दर मोहताज हैं सब
हद हुई है पार, बाग़ी हो गया मौसम
नीलकंठी हो गए हैं हम
अब प्रकृति के देवता को पूज लेंगे तो बचेंगे
जो मिटाया है उसे फिर से रचेंगे तो बचेंगे
साज हैं पर स्वर नहीं हैं
राह है रहबर नहीं हैं
विष पचाकर जी सकेंगे
हम कोई शंकर नहीं हैं
रुद्र का आह्वान कर लें, द्वार पर है यम
नीलकंठी हो गए हैं हम
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सब बातों पर ध्यान न देना
हर निंदा को कान न देना
इक पल की इच्छा पूरी कर
इक युग को अपमान न देना
धोबी ने कब आकर पूछा हाल अकेले राम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का
जग की निंदा से चिंतित हो, कोख जने को तज दोगे क्या
रश्मिरथी के उज्ज्वल पथ पर, मन भर पीड़ा रच दोगे क्या
वह पग-पग अपमान सहेगा जीवन भर चुपचाप दहेगा
किसके पापों से पीड़ित है इस सच से अनजान रहेगा
कुन्ती का मन दुःख झेलेगा, इस भीषण संग्राम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का
माता का आदेश सुना तो भिक्षा सम बाँटी पांचाली
अपनी चूक निभाने भर को, उस बेचारी को दी गाली
एक कथन को नहीं सुधारा इक नारी के मन को मारा
फिर उसका भी बीच सभा में वेश्या कहकर नाम पुकारा
इस पल में ही बीज पड़ा था, कुल के पूर्णविराम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का
कैकयी की हठ पूरी करके, ख़ुशियों को जंगल मत भेजो
झूठी शान दिखाना छोड़ो, जीवन भर का हर्ष सहेजो
कोई लौटे नाक कटाकर कोई मारे ध्यान बँटाकर
पूरा कुल अर्पण मत करना इक पल का आवेश दिखाकर
शूर्पनखा से कारण पूछो, लंका के परिणाम का
जो जीवन भर की पीड़ा दे, वो निर्णय किस काम का
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सारे ही सुख थे बगिया में, फिर क्यों तुमने पीर चुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है
क्या तुमने भी महसूसा है, एकाकी हो जाना जग में
क्या तुमने जी भर भोगा है, सब अपने खो जाना जग में
क्या तुमने भी भावुकता को लुट कर मरते देख लिया है
क्या तुमने भी अपनेपन का रंग उतरते देख लिया है
क्या तुमने भी जान लिया है अपने ही घर में शकुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है
सच बतलाओ क्या तुमने भी चेहरा देखा है रिश्तों का
मुरझाने के बाद कभी क्या सेहरा देखा है रिश्तों का
क्या तुमने भी हर उत्सव के अगले पल सन्नाटा झेला
दिल के व्यापारों का दुनिया की मंडी में घाटा झेला
कोमलता की देह धुने बिन किन कंधों की शॉल बुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सपनों की आँखें पथराईं
हिम्मत की पाँखें कुम्हलाईं
संघर्षों की तेज पवन ने
प्राणों की शाखें दहलाईं
इन सारे झंझावातों से लोहा लिया ज़मीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
राजतिलक की शुभ वेला में राघव को वनवास मिला
स्वर्ण जड़ित आभूषण उतरे, जंगल का संत्रास मिला
लक्ष्मण, वैदेही, रघुराई
और न कोई संग सहाई
इतनी पीर सही तीनों ने
विधिना की आँखें भर आईं
फिर भी कब आँसू छलकाए, पुरुषोत्तम रघुबीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
किष्किंधा के द्वार खुले थे, किन्तु न नगर प्रवेश किया
निज अनुशासन की सीमा में, जीवन सकल निवेश किया
रघुकुल रीति सदा चलि आई
प्राण जाएँ पर वचन न जाई
दशकंधर से लंका जीती
और विभीषण को लौटाई
तीरों से कब मोह किया है, वीरों के तूणीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
हर चर्चा का सार बने हैं, जन-जन के अभिवादन हैं
आशा का आधार बने हैं, हर सम्भव के साधन हैं
केवट ने ली जो उतराई
शबरी जो झोली भर लाई
जो पूंजी जोड़ी रघुपति ने
उसकी चमक युगों पर छाई
सबकी दौलत ओछी कर दी, राघव की जागीर ने
अमृत सोख लिया रावण का राघव के इक तीर ने
✍️ चिराग़ जैन
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जिसकी छाया में आँगन ने अपना हर त्यौहार मनाया
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है
जिसके फूलों की ख़ुश्बू ने घर का हर कोना महकाया
उसके सूखे पत्तों पर झल्लाना एक रिवाज़ रहा है
जिस नदिया ने जीवन सींचा, वो बरसातों में अखरेगी
बारिश का मौसम बीता तो, छतरी हमको बोझ लगेगी
जिन अपनों के बिन जी पाना इक पल भी दूभर लगता है
जब वे अपने मर जाते हैं, तब उनसे ही डर लगता है
ऋतुओं के संग आँख बदलना, सबका सहज मिजाज़ रहा है
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है
प्यास न हो तो पानी भूले, भूख न हो तो रोटी भूले
मन से बचपन बीत गया तो, व्यर्थ लगे सावन के झूले
बचपन में कुछ खेल-खिलौने, यौवन में दिल का नज़राना
फिर घर भर की ज़िम्मेदारी, फिर बिन कष्ट सहे मर जाना
जितनी देर ज़रूरत जिसकी, उतनी देर लिहाज रहा है
जब उस पर पतझर आया तो, घर उससे नाराज़ रहा है
मन के छोटे से झोले में सब कुछ ढोना नामुम्किन है
यादों की डोरी में सबके नाम पिरोना नामुम्किन है
जिससे जितनी साँसें महकी, उससे उतनी प्रीत रही है
रात अंधेरा, भोर उजाला, ये ही जग की रीत रही है
जैसा है अंजाम किसी का कब वैसा आगाज़ रहा है
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
कविता को आसान बनाकर जन-जन तक पहुँचाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले
मेले, गाँव, गली, चौबारे, संसद, देश, विदेश विचरते
चिंता की त्यौरी पिघलाकर, ओंठों पर मुस्कानें धरते
एक ठहाके के जादू से पीड़ा को ग़ायब कर देते
हर अंधियारे की झोली में आशा का सूरज धर देते
नयन भिगोकर लिखने वाले, हँसते-हँसते गाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले
जब पापी ने दुःसाहस कर भारत माँ पर आँख उठाई
हमने शोणित में साहस का ज्वार उठाती कविता गाई
हमने आगे बढ़कर टोका शासन की हर मनमानी को
हमने सच का दर्पण सौंपा सत्ता की खींचातानी को
यौवन को सरसाने वाले, उत्सव रोज़ मनाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले
जैसे श्रोता हों, कविता का वैसा रूप बना लेते हैं
नवरस की मथनी से मथकर, मन तक रस छलका देते हैं
कविता, गीत, लतीफ़े, जुमले, हम हर शस्त्र चला लेते हैं
जिस शैली में सुनना चाहो, उस शैली में गा लेते हैं
कानों के दरवाज़े घुसकर, सीधे मन पर छाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले
✍️ चिराग़ जैन