Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
अकथ वेदना करती होगी रह-रहकर परिहास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास
धीर धरो मैया वैदेही
अनगिन झेले कष्ट भले ही
मृग आकर्षण में अंकुर थे
स्वर्ण नगर की पीड़ा के ही
पल भर का सम्मोहन लाया जीवन भर का त्रास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास
हर इक सुविधा द्वार पड़ी थी
प्राण बिना इक देह खड़ी थी
माँ सीता की आँखें नम थीं
पर उर्मिल की पीर बड़ी थी
भीतर-भीतर घुलकर सींचा प्रियतम का विश्वास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास
अश्रु बहाने पर अंकुश था
पीर जताने पर अंकुश था
अगन सेज पर इक लक्कड़ को
धधक बताने पर अंकुश था
वरना सबको हो जाएगा, पीड़ा का आभास
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास
हमें बताया रामायण ने
भीषण पाप किया रावण ने
किन्तु देह की पर्णकुटी से
जिसका हरण किया लक्ष्मण ने
उस बेचारी ने कब की थी कंचन मृग की आस
उर्मिल ने बिन कारण भोगा महलों में वनवास
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
आपाधापी की राहों पर सुस्ताने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है
शिक़वे और शिक़ायत कर ली
हिम्मत और हिमाक़त कर ली
यश-अपयश का दौर हुआ है
ज़हर सरीखा कौर हुआ है
नफ़रत का हर पाठ पढ़ा है
बदले का हर ज्वार चढ़ा है
मस्तक पर अवसाद रखा है
अपशब्दों का स्वाद चखा है
छल-बल की हर रीत दिखी है
देहरी चढ़ती जीत दिखी है
अब दुश्मन के आगे जाकर, झुक जाने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है
उत्सव देखे, वैभव देखा
यौवन देखा, शैशव देखा
जयकारों का रोर सुना है
तारीफ़ों का शोर सुना है
स्वागत देखे, वंदन देखे
कितने ही अभिनन्दन देखे
फूलों संवरीं राहें देखीं
स्वागत करतीं बांहें देखीं
यश की हर इक सहेली देखी
पसरी रिक्त हथेली देखीं
हर आपाधापी को तजकर, चुक जाने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है
इच्छाओं को शिष्ट कर लिया
पूरा जीवन क्लिष्ट कर लिया
तन जागा तो स्वप्न नरारद
हल निकले तो प्रश्न नदारद
झुकना चाहा अहम अड़ गए
रुकना चाहा क़दम बढ़ गए
ढेरों नियम, अगिन सीमाएँ
खंडहर थोथी परिभाषाएँ
कारण मिला अधर फैलाये
कारण मिला नयन भर आए
कभी-कभी बिन कारण भी तो मुस्काने का मन होता है
चलते-चलते ऊब गया हूँ, रुक जाने का मन होता है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
सरगम गाने वाली वीणा
किसको अपनी पीर सुनाएँ
ऊपर अनगिन फूल खिले हैं
जिनकी देह सुगंध बिखेरे
भीतर जड़ में गंधियाते हैं
पत्तों की लाशों के डेरे
जितनी बढ़ती उमस जड़ों की
उतने फूल महकते जाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
कलकल करती जिस धारा की
घाटों पर पूजा होती है
वो निश्छल नदिया बेचारी
उद्गम पर रिस-रिस रोती है
अंत, गरजता खारापन है
आदि, गलन से ग्रसित शिलाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
असुरों के संहारक राजा
कोपभवन से हार गए हैं
दुनिया का मन जीत लिया पर
अंतर्मन से हार गए हैं
घर की चैखट पर टूटी हैं
कितनी अपराजेय ध्वजाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
तुमको राष्ट्र अधिक प्यारा था, या फिर अपनी भीष्म प्रतिज्ञा?
अम्बा की अनुनय ठुकराई, गुरु-आज्ञा भी रास न आई
निज नियमों से न्याय किया पर, अम्बा के ठहरे अन्यायी
बिन आमंत्रण काशी जाकर
बीच स्वयंवर शौर्य दिखाकर
अम्बा को हर कर लाए, फिर
छोड़ दिया परिणय ठुकराकर
एक नियम की रक्षा के हित, शेष नियम भी भूल न जाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
दुःशासन ने सीमा लांघी, दुंदुभि गूंजी प्रलय-समर की
एक तरफ़ थी भीष्म प्रतिज्ञा, एक तरफ़ मर्यादा घर की
तब भी तुमको लाज न आई
तब भी देह नहीं थर्राई
कुरुकुल की सब आन लुटाकर
तुमने झूठी शान बचाई
कुलवधुओं का आँचल से अब, अपनी सूरत को न छुपाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
ठीक कथानक रच सकता था, रक्त-समर भी बच सकता था
और तुम्हारा वचन भुलाना, इतिहासों को पच सकता था
अधर हिला भी सकते थे तुम
भृकुटि तना भी सकते थे तुम
किसमें क्षमता है शासन की
ये समझा भी सकते थे तुम
युग का चेहरा काला करके, अपने श्वेत वसन दमकाओ!
भीष्म पितामह ये बतलाओ!
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जब दिवाकर की तपिश के दाह से भयभीत होंगे
तब अंधेरे तिलमिलाकर रश्मियों से वैर लेंगे
जो भरी बरसात में भीगे हुए ठिठुरे फिरेंगे
वे अधम भोली बया की बस्तियों से वैर लेंगे
मंत्र-जप की साधना का सत्व जब संभव न होगा
तब करेंगे ढोंग इक पाखण्ड का चोगा पहन कर
जो जला बैठे स्वयं के हाथ समिधा चोरने में
प्रश्न लेकर वे खड़े हैं भक्ति के पावन हवन पर
मृत्यु के प्रख्यात सच को जब नहीं झुठला सकेंगे
तब अघोरी बेसहारा अरथियों से वैर लेंगे
कृष्ण जब षड्यंत्र के आमंत्रणों को भाँप लेंगे
तब विदुर के साग में कमियाँ निकालेगा सुयोधन
जब समर में जीतने की शक्ति पर संदेह होगा
रात में सोते हुओं को फूँक डालेगा सुयोधन
जो सुदर्शन से पराजित हो गए हर एक रण में
वे मधुर सरगम सुनाती वंशियों से वैर लेंगे
वृक्ष के तन पर नहीं चल पाएगा वश कोई जिसका
वो हवा सूखे हुए पत्ते हिलाकर ख़ुश रहेगी
योग्यता जिसमें न हो अट्टालिकाओं के परस की
वो लपट कुछ फूस के छप्पर जलाकर ख़ुश रहेगी
जो झखोरे सामधेनी को नहीं धमका सकेंगे
वे किन्हीं जलदीपकों की बातियों से वैर लेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
उमंग, शौर्य, शक्ति का अनन्त नित्यकोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
त्रिभुज, स्वरद, पणव सुसज्ज झल्लरी की गूंज है
सुरों की दिव्य देह ताल वल्लरी की मूँज है
महोत्सवों में बाँसुरी की तान का विधान है
समर समय में शंख के स्वरों का शौर्यगान है
समर्पणों को तूर्य की ध्वनि का पारितोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
नागांग, घोषदण्ड और आनकों का लास्य है
मृदङ्ग का वितान और गोमुखों का भाष्य है
हृदय धरा पे भूप, सोनभद्र का प्रवाह है
तिलंग-उदय-अजेय से शिथिल क्षणों का दाह है
अमर, अकंप, अप्रतिम, अथक, अजर, अदोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
ये श्रीनिवास सुब्बु के करों का घोषदण्ड है
ये दाते, बापुराव का प्रचण्ड शक्ति खण्ड है
किरण, तिलक-कामोद सम सृजन का दिव्य क्षेत्र है
ये केशवः की तर्जनी है शंकरः का नेत्र है
ये मेघ घोष, ब्रह्म घोष और सिंह घोष है
ये संस्कृति का घोष है, ये भारती का घोष है
✍️ चिराग़ जैन