+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

महंगा क्षण

आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया
आज समझ आया चूड़ी बिन
कैसे कंगन जी पाया

जिस पल मथुरा का आकर्षण वृंदावन से ज़्यादा था
कर्तव्यों का मोह किसी को अपनेपन से ज़्यादा था
निर्णय ले बैठा निर्मोही, बिरहन याद नहीं आई
दाँतों ने अधरों को काटा, नयनों में लाली छाई
आज तुम्हारा निर्णय सुनकर
राधा का मन जी आया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया

राघव स्वयं नहीं सक्षम थे, जो सच्चाई कहने में
वैदेही पर क्या बीती थी, वो सच्चाई सहने में
जब लक्ष्मण वन में ले जाकर, सीता को बतलाते हैं
उस पल सिय के मन में क्या क्या, भाव उमड़कर आते हैं
पाँव जमे, आँखें पथराईं
ख़ुद का तर्पण जी आया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी आया

आंधी से मिलकर जब अमुआ, बौर गिराने लगता है
तब सहमी सहमी कोयल का, मन घबराने लगता है
अब समझा जब कोहरे में छुप सूरज को बिसराते हैं
तब इन हरियाले पेड़ों से पत्ते क्यों झड़ जाते हैं
आज अचानक मैं मन ही मन
रूठा सावन जी पाया
आज तुम्हारे कारण ही मैं
इक महंगा क्षण जी पाया

✍️ चिराग़ जैन

पुलवामा

तैने सोता शेर जगाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो
पूरा भारत देश रुलाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

लड़ने के हालात नहीं थे
राही थे, तैनात नहीं थे
मौत उन्हें छू पाई क्योंकि
बंदूकों पर हाथ नहीं थे
उनको धोखे से मरवाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

अब तू देख, उपद्रव होगा
आग उगलता भैरव होगा
अब तक विष पीते आए हैं
अब छाती पर तांडव होगा
तैने तीजा नेत्र खुलाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

रग-रग में ज्वाला भड़की है
जन-जन की बाजू फड़की है
आँसू ने शोले उगले हैं
आँखों मे बिजली कड़की है
तैने अपना काल बुलाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

✍️ चिराग़ जैन

पुलवामा

आँसू भेजे हैं घाटी ने
चिथड़े बीने हैं माटी ने
फिर धोखे से घात किया है
कायरता की परिपाटी ने
अब पापी मतलब समझेगा, धोखे के परिणाम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का

छल का शीश नहीं कट पाया, तो यह रण आश्वस्त न होगा
जब तक न्याय नहीं हो जाता, तब तक सूरज अस्त न होगा
युग-युग का इतिहास खँगालो, पाप पराजित होता आया
लंका जलनी है रावण की, राघव का घर ध्वस्त न होगा
वीरों के तूणीर खुलेंगे
सोए शर ज्वाला उगलेंगे
दुःशासन का लोहू लेकर
पांचाली के केश धुलेंगे
तुमने मार्ग स्वयं खोला है, अपने पूर्णविराम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का

अनुनय की भाषा को शठ ने, रघुवर की दुर्बलता जाना
शिशुपालों ने मधुसूदन में, अपना काल नहीं पहचाना
इतने अवसर मिलने पर भी, हिंसा का पथ छोड़ न पाए
आदत से लाचार हुए हो, ज्यों कोढ़ी का कोढ़ खुजाना
फिर मस्तक पर बल उभरे हैं
कृष्ण सुदर्शन धार खड़े हैं
फिर अर्जुन के नैन झरे हैं
फिर से सारे घाव हरे हैं
फिर से बिलख-बिलख कर रोया, मंदिर अक्षरधाम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का

✍️ चिराग़ जैन

ऋतुराज आया है

बाग की सब क्यारियों के हाथ पीले हो गए हैं
फूल की हर पाँखुरी के ओंठ गीले हो गए हैं
श्वास में सरगम सजाता साज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

साँस में बहकी हवाओं का नशा सा घुल रहा है
प्रीति की बारिश हुई है, ज्ञान सारा धुल रहा है
पर्वतों को खुशबुओं ने प्यार से छू भर लिया है
वज्र सा अड़ियल हिमालय भी अभी हिल-डुल रहा है
ज्ञानियों के ज्ञान से मन बाज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

दल भ्रमर का बूटियों के पास मंडराने लगा है
कोयलों ने गीत गाए, आम बौराने लगा है
ठूठ से लिपटी हुई है एक दीवानी लता तो
बाग का वीरान कोना, बाग कहलाने लगा है
दम्भ होकर प्रेम का मोहताज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

गुनगुनी सी धूप के संग बेल-बूटों का प्रणय है
प्रेमियों को हर नियम के टूट जाने पर अभय है
ठंड से ठिठुरी धरा अंगड़ाइयां लेने लगी है
श्वेत छितरी बदलियों के बीच सूरज का उदय है
मोतियों के थाल में पुखराज आया है
लग रहा है द्वार पर ऋतुराज आया है

✍️ चिराग़ जैन

स्वीकार

पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है
अधखुली-सी इक कली धीरज गँवाकर
पुष्प से प्रतियोगिता पर अड़ गई है

पंखुरी दर पंखुरी खिलना उचित है
डाल ने दिन-रात समझाया कली को
गंध निश्चित ही बिखरनी है हवा में
कौन-सी जल्दी पड़ी है बावली को
होड़ तज कर गंध को सींचो हृदय में
जो बसी भीतर, वही बाहर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

जब तलक संघर्ष है, जीवन तभी तक
राह की कठिनाइयों का मान करना
घुल गया मकरंद जिसका भी हवा में
उस कुसुम के धैर्य का सम्मान करना
साधना पथ पर नहीं विचलित हुआ जो
ख्याति उस इंसान की घर-घर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

मंद बहकर ही नदी सरगम बनेगी
वेग तो तटबंध को ही तोड़ देगा
रूह को महकाएँगी मंथर हवाएँ
और अंधड़ देह को झकझोर देगा
जो नियति की चाल से आगे बढ़ी है
वह कली अल्पायु में ही झर गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

ताप सहकर ही बनेगी वज्र, माटी
फिर भला दहती लपट से रूठना क्या
कर्म का अधिकार ही हमको मिला है
स्वप्न की फिर सर्जना क्या, टूटना क्या
हठ पकड़ बैठा कोई जब भी नियति से
भाग्य की त्यौरी उसी क्षण चढ़ गई है
पुष्प के मकरंद से महकी हवा तो
बन्द कलियों की विकलता बढ़ गई है

✍️ चिराग़ जैन

प्रतीक्षा की गली

प्रेम चलकर आएगा जब तक प्रतीक्षा की गली में
तब तलक संसार भर में प्रीति जीवित रह सकेगी
है समर्पण जब तलक तैयार सब कुछ हारने को
उस घड़ी तक भावना की जीत जीवित रह सकेगी

जब तलक बदली स्वयं बेचैन होकर झर न जाए
तब तलक चातक उसे तकता रहेगा प्यास लेकर
बदलियों की शुष्क लापरवाहियों को क्या पता है
कण्ठ में अटके हुए हैं प्राण इक विश्वास लेकर
मृत्यु से पहले बरस जाओ, पिघल जाओ अगर तुम
तो प्रणयगत साधना की रीति जीवित रह सकेगी

उम्र काटी है शिला ने भी यही विश्वास रखकर
एक दिन मझमें विधाता प्राण भर देंगे परस कर
बेर चख-चख कर कोई शबरी प्रतीक्षारत रही है
इस अभागे प्रेम को स्वीकार लेंगे राम हँसकर
चेतना में प्रीत के अमरत्व का उल्लास भर दो
देह भी हर नियति के विपरीत जीवित रह सकेगी

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!