Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जो सबके अपराध टटोलें
मीठे पानी में विष घोलें
जो जल से जल-जल जाते हैं
जब बोलें कड़वा ही बोलें
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं
दर्पण में उनका चेहरा है, उस पर भौंहें तान रहे हैं
हर युग में कान्हा जन्मे हैं, हर युग में शिशुपाल हुए हैं
जिस धरती पर बुद्ध चले थे, उस पर अंगुलिमाल हुए हैं
दशरथ ने मर कर समझाया, अनुचित के आगे मत झुकना
जब-जब कोपभवन की मानी, तब-तब युग बदहाल हुए हैं
कभी सुदर्शन से समझाए
कभी समर्पण के पथ आए
तम के चेले कभी, कहीं भी
सत के आगे टिक ना पाए
सच का जीवित रहना तय है, इसके बहुत प्रमाण रहे हैं
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं
ईर्ष्या ढूंढ रही है कमियाँ, प्रतिभा बस बढ़ती जाती है
तिनके तकते रह जाते हैं, और लता चढ़ती जाती है
बिन समझे कहने वालों ने, माटी सनी हथेली देखी
लेकिन लगन उसी माटी से, अमृत घट गढ़ती जाती है
अपनों को दुत्कार चुके हैं
यश-वैभव सब हार चुके हैं
एक ज़रा सी ज़िद्द के आगे
पूरा कुल संहार चुके हैं
ख़ुद के हित का ज्ञान नहीं है, कहने को विद्वान रहे हैं
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सीप से अधखुले ये अधर मत हिला
नैन की पाँखुरी खोल कर बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर
ये प्रणय साधना का सुफल है प्रिये
एक पल भी मिलन का न बर्बाद हो
नैन से, बैन से, देह से, नेह से
जिस तरह हो सके, आज संवाद हो
मौन रहकर समय मत गँवा बावरी
इस घड़ी को तू अनमोल कर, बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर
आज की रात जो कुछ कहा जाएगा
वो सुखद याद में दर्ज हो जाएगा
लाज की बात मानी अगर आज तो
ज़िन्दगी पर बहुत कर्ज़ हो जाएगा
सब नियम भूल जा, हर झिझक छोड़ दे
आज मत सोच, मत तोल कर बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर
सेज पर साज सा बज उठा देख ले
चूनरी जो तेरी सरसराने लगी
चूड़ियों ने खनक कर इशारा किया
और पायल तराने सुनाने लगी
कान की बालियों ने कहा कान में
आज की रात दिल खोल कर बात कर
शब्द के व्यंजनों की ज़रूरत नहीं
श्वास की चाशनी घोल कर बात कर
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
भाग्य की सारी लकीरें, मोड़ने की राह में हूँ
मैं अभी दिन-रात केवल, एक ही परवाह में हूँ
इस समर के बीच में ही
तुम अचानक छूट मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना
ग्रहदशा बिगड़ी हुई है, इसलिए कुछ अस्त हूँ मैं
पीर को गाता नहीं हूँ, ये न समझो मस्त हूँ मैं
बस किसी दुर्भाग्य के अंधे कुएँ में आ गिरा हूँ
बस इसी अंधे कुएँ को भेदने में व्यस्त हूँ मैं
तुम कहीं इस व्यस्तता से
त्रस्त होकर रूठ मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना
यह प्रतीक्षा का मरुस्थल, तप रहा है, जानता हूँ
एक पत्थर मौन मुझको जप रहा है, जानता हूँ
जानता हूँ उठ रहा है प्रश्नचिन्हों का बवंडर
और तुम्हारा मन निरन्तर कँप रहा है जानता हूँ
इस बवंडर में बिखर कर
स्वप्न सारे लूट मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना
चाहतों की बढ़ रही चिंघाड़ में उतरा हुआ हूँ
विष भरे काँटे चुभे हैं, झाड़ में उतरा हुआ हूँ
दृष्टि तुम पर है, नदी का वेग बढ़ता जा रहा है
बस तुम्हारे ही भरोसे बाढ़ में उतरा हुआ हूँ
अब किसी कच्चे घड़े सम
बीच धारा, फूट मत जाना
सब्र रखना, टूट मत जाना
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
कोई ईसी के झाड़ा लगाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए
ओ ज़रा शेषन सा ओझा बुलाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए
इसको नोटिस, उसको नोटिस, असर नहीं है कोई
जाति-धर्म के जुमले उछले, भारत माता रोई
संविधान के कहे मुताबिक द्वंद नहीं हो पाया
आज तलक भी नमो प्रसारण बन्द नहीं हो पाया
इसके हाथों में संटी थमाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए
सारे ही दल करते फिरते हैं अपनी मनमानी
वोटर को धमकी देने की सबने मन में ठानी
कहीं कोई प्रत्याशी ही अनुशासन तोड़ रहा है
सब सहकर भी चुप है ये ईसी है या अडवाणी
इसके कमरे की घण्टी बजाओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए
हर प्रत्याशी की हसरत को अच्छी तरह टटोले
कोई भले किसी दल का हो सबका चिट्ठा खोले
ईसी जी के अनुशासन का डंडा हर दल पर हो
ईवीएम से अपना पत्ता कट जाने का डर हो
ज़रा सख्ती से वोटिंग कराओ
ये काहे मनमोहन हुआ जाए
✍️ चिराग़ जैन
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जिन डेरों ने उत्सव पूरा था रैना के आँचल में
भोर उन्हीं डेरों पर इक वीराना पाती है
अंधियारे में जीवन सबका रंग-रंगीला लगता है
पहली किरण उदासी का अफ़साना पाती है
जिनके बिन हर महफ़िल का सिंगार अधूरा होता है
उन फूलों का गुच्छा सुबह केवल घूरा होता है
जिसके दम पर महफ़िल अपना सिर ऊँचा कर लेती है
वो सब कुछ सुबह होने तक चूरा-चूरा होता है
झूठे रंग उतर जाते हैं रात गुज़रने से पहले
भोर महज सच का बदरंग ख़ज़ाना पाती है
साज पड़े होते हैं लेकिन सुर थक कर सो जाते हैं
देह पड़ी रह जाती है और प्राण कहीं खो जाते हैं
जिनका आकर्षण था उनसे दिल घबराने लगता है
जश्न सुबह की क्यारी में इक सन्नाटा बो जाते हैं
रात जवानी की बाँहों में रास रचाती फिरती है
और सुबह रंगरलियों से उकताना पाती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
चाहे कितनी देह सँवारें
चाहे जैसे रूप निखारें
चाहे कितनी गन्ध उड़ाएं
चाहे गुलशन को महकाएं
लेकिन इतना तय है इक दिन, इस डाली से झर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं
सारा नूर हवा होता है, तन भी कुम्हलाने लगता है
जिस सूरज ने प्राण भरे थे, वो ही झुलसाने लगता है
जिन झोंकों के छूने पर हम, ख़ुद पर इतराते फिरते थे
उन झोंकों के छूने से भी, ये मन घबराने लगता है
कुछ पल के मेहमान सभी हैं, फिर सब अपने घर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं
इस क्यारी ने जाने कितने फूलों का खिलना देखा है
रस की चाहत में भँवरों के पंखों का छिलना देखा है
इस बगिया को इन फूलों का रूप लुभा पाएगा कैसे
इस बगिया ने सुंदरता का मिट्टी में मिलना देखा है
इसको है मालूम सभी के इक दिन रंग उतर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं
इसका नूर दिनों ने देखा, उसके हिस्से रातें आईं
कुछ वनफूलों के हिस्से बस, आँसू की बरसातें आईं
हम सब लोगों का ही जीवन, केवल क़िस्मत का खेला है
कुछ को माली ने दुलराया, कुछ के हिस्से घातें आईं
हम सारे ही लोग यहाँ बस कुछ दिन जीकर मर जाने हैं
आख़िर फूल बिखर जाने हैं
✍️ चिराग़ जैन