बेमआनी
बहुत दिन से इंतज़ार था
एक ख़ास यात्रा का
मुश्क़िल से हाथ आया
यात्रा का अवसर
घर से निकला
उत्साह से आपूरित
कुछ ही दूर पहुँचा
कि मोबाइल पर
एस एम एस आया-
“सुनो! जल्दी आना…”
…और मुझे बेमआनी लगने लगी
हर उपलब्धि।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
बहुत दिन से इंतज़ार था
एक ख़ास यात्रा का
मुश्क़िल से हाथ आया
यात्रा का अवसर
घर से निकला
उत्साह से आपूरित
कुछ ही दूर पहुँचा
कि मोबाइल पर
एस एम एस आया-
“सुनो! जल्दी आना…”
…और मुझे बेमआनी लगने लगी
हर उपलब्धि।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
जब से
डाउनलोड की है
तुम्हारे नाम की फाइल
बार-बार हैंग होता है
दिल का सिस्टम
…शायद
कोई वायरस था
फाइल में।
जिसने सबसे पहले
डी-एक्टिवेट किया
ब्रेन का एंटी-वायरस
और फिर
करप्ट कर दिया
ऑपरेटिंग सिस्टम
स्लो कर दी
रैम भी!
…शायद
इंस्टाॅल करनी पड़ेगी
नई विंडो!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
हर रात
मैं बुनता था इक ख़्वाब
और फिर
उसको अधूरा छोड़
चुपचाप सो जाता था
कि कभी तुम्हारे साथ
साकार करूंगा
ख़्वाब में उभरा
ये ख़ूबसूरत लम्हा…
एक-एक करके
जाने कितने ही सपने
इकट्ठे हो गए
मेरे तकिए के नीचे।
आज जब सोने लगा मैं
बिना संजोए कोई ख़्वाब
तो अचानक
मेरे सामने खड़े हो गए
सैंकड़ों अधूरे ख़्वाब
तकिए के नीचे से निकलकर।
सबकी भंगिमा में मौजूद था
एक ही प्रश्न-
“अब हमारा क्या होगा?”
मैंने कहा-
“काश ये निर्णय
मेरे वश में होता!”
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
बहुत उपजाऊ है
मेरे दिल की मिट्टी।
पनप जाता है
हर बीज
आसानी से।
बहुत आसानी से
फूट पड़ता है अंकुर,
बहुत आसानी से
द्विदल होता है बीज,
…लाल-लाल कोंपलें
……ताज़ा हरापन।
कभी ओस नहाई पत्तियाँ
तो कभी
गुपचुप बतियाती
डालियाँ।
कुछ पौधों पर
आ जाता है
बौर भी…
…लेकिन किसी डाल ने
कभी नहीं किया
फल का शृंगार…!
…शायद
कोई टोटका कर देता है
मेरी हरियाली पर!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
बहुत समझदार हो तुम
जब कभी
उदासी का आँचल ओढ़कर
जवान होने लगता है
मेरा कोई दर्द
तो चुपचाप
बिना किसी शोर-शराबे के
‘कंधा देकर’
पहुँचा आते हो उसे वहाँ
…जहाँ से
लौट नहीं पाया कोई
आज तक।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
तुम्हारी अनुपस्थिति में
राह भटक जाती हैं
अभिव्यक्तियाँ!
अक्सर ऐसा होता है
कि उपलब्धि मिलने पर
होठों पर मुस्कान लिए
मेरी निग़ाह तलाशती है
इक चेहरा
अपने आस-पास।
और जब
विफल होने लगती है तलाश
तो झट से
आँखों की कोरों पर
आ ठहरती है
अधरों की मुस्कान।
और दु:ख की घड़ियों में
तुम्हें आसपास न पाकर
मुस्कुराकर रह जाते हैं होंठ!
✍️ चिराग़ जैन