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अविश्वास

विलीन नहीं हो पाता है
अविश्वास
कभी भी
किसी भी सम्बन्ध से।

केवल
ढँक लेती हैं उसे
प्रेम, अपनत्व, सौहार्द
और नेह की परतें
…किसी-किसी सम्बन्ध में
…कुछ समय के लिए।

शायद इसीलिए
प्रकट हो जाता है दोबारा
प्रेम का पर्दा गिरते ही!
दृश्य बदलते ही
नेपथ्य से निकल
चला आता है मंच पर

कभी घृणा
तो कभी शत्रुता का
रूप धर कर

….उफ़!
कितने सारे संवाद
याद रहते हैं इसे!!
✍️ चिराग़ जैन

सीधी सी बात

ग़ज़ब है
हर बार ढूंढ़ लाती है
कोई न कोई बहाना
इनकार के लिए।

वही पुरानी बातें
वही पुराने बहाने
वही पुराने हाव-भाव
वही पुराने तौर
और तो और
झेंप, शर्म
और आँखें चुराना भी
जस का तस।

…ये सब तो मैं
फिल्मों में भी
देख चुका हूँ
सैंकड़ों बार।

इतनी बड़ी हो गई
इत्ती-सी बात समझ नहीं आती!

“अरे यार!
मैं प्यार करता हूँ तुझसे
…प्यार।”

✍️ चिराग़ जैन

कहानी

शब्दशः याद है मुझे
डाकू खड्गसिंह
घोड़ा सुल्तान
बाबा भारती
घोड़ा चुराने की धमकी
बाबा का भय
खड्गसिंह की चाल
ग़रीब का वेष बनाना
घोड़ा छीनना
बाबा का उसे टोकना…

सुनो! इस घटना का ज़िक्र
किसी से मत करना
वरना लोग छोड़ देंगे
मजबूरों की सहायता करना।

यहाँ तक की कहानी
रोज़ देखता हूँ अपने आसपास
कभी खड्गसिंह बनकर
कभी बाबा भारती बनकर।

लेकिन इसके आगे
न तो कभी
कोई खड्गसिंह आया
मेरे अस्तबल में घोड़ा बांधने
न मैं ही जा पाया
किसी बाबा भारती का
सुल्तान लौटाने।

✍️ चिराग़ जैन

नई कविता

अजीब सी
पशोपेश में रहता हूँ आजकल

तुम
और कविता
दोनों ही मांगती हैं वक़्त!

मैं घण्टों बतियाता हूँ
तुमसे
और भीतर ही भीतर
घुटती रहती है कविता।

आज अचानक
पूछ लिया तुमने-
“क्या बात है
बहुत दिनों से
कोई
नई कविता नहीं सुनाई?”

मैंने कहा-
“कल सुनाऊंगा।
आज ही किसी ने
दिल दुखाया है।”

✍️ चिराग़ जैन

अलसाए झरोखों से

पल-पल भारी होती पलकों के
अलसाए झरोखों से
पढ़ ही लेता हूँ
देर रात
मोबाइल स्क्रीन पर आया
तुम्हारा नाम!

करवट बदलकर
निंदियारी आँखें
पहुँच ही जाती हैं
उंगलियों के सहारे
इनबाॅक्स तक!

…देर तक पढ़ता हूँ
मैसेज में लिखे
दो छोटे-छोटे शब्द।

भुजपाश में जकड़े
तकिए पर
ठुड्डी टिकाकर
मुस्कुराने लगते हैं मेरे होंठ!

और पलकों के भीतर
इतराने लगती हो तुम!

✍️ चिराग़ जैन

फ़र्क

इतना-सा फ़र्क है
अंधियार और उजियारे में…

…कि अंधियारा
हाथों में उठाकर
किसी को
भेंट नहीं किया जा सकता!

…कि अंधियार को
हाथों में समेटने के लिए
मुट्ठी बंद करनी होती है

और उजियारा
अंजुरी बना देता है
हथेलियों को!

…कि अंधियारा
सीमित करता है
और उजियारा
सीमाओं पर छा जाता है
असीम होकर।

✍️ चिराग़ जैन

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