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बोगनवेलिया

सारा शहर
सज उठा है तुमसे
बरसात नहीं हुई
तो भी…

मायावी हो तुम बोगनवेलिया
कभी कतार बाँध कर खड़े हो जाते हो
तेज़ दौड़ती सड़क के दोनों ओर
कभी लिपट जाते हो किसी वृक्ष से
और कभी
ऐसे ही
बस उग आते हो
निरुद्देश्य
जहाँ-तहाँ

तुम ऊँच-नीच नहीं जानते
छोटा-बड़ा भी नहीं
भाषा-धर्म
समझते ही नहीं हो
सेक्यूलर कहीं के!

पसर जाते हो
कहीं भी
कैसे भी

कितने रँग भरे हैं तुममें
आदमी होते
तो रँगभेद के दंगे कराने के काम आते

बाग़ की दीवारों की बाड़ हो तुम
बिछे जाते हो मॉर्निंग वॉक वालों की
हाँफ़ती रफ़्तार के बीच
सूरज चिलचिलाता है
तुम्हारे रँगों के चटकने पर
तुम और गहरा उठते हो
और गहरा जाते हैं तुम्हारे रँग
और भारी हो जाते हैं तुम्हारे बूटे

बचपन में माँ ने बताया था-
“इन फूलों से काग़ज़ बनता है”
तब से लगातार देखता आया हुँ तुम्हें
काग़ज़ बनते
……सूखकर।

कोई नहीं आयेगा कभी
तुम्हारा शुक्रिया अदा करने
हम फ़ॉर ग्रांटेड लेते हैं उन्हें
जो जताना नहीं जानते।

शिक़ायत करो बोगनवेलिया
रूठना सीखो
मुस्कुराहटों के पीछे झाँकती उम्मीदें
हम अन्देखी कर देते हैं बोगनवेलिया
क्योंकि हम बोगनवेलिया नहीं हैं
हम तो इन्सान हैं
…वो भी शहरी!

✍️ चिराग़ जैन

विरोध

देर तक खड़ा
रिरियाता रहा बादल
लेकिन नीम
रूठा ही रहा
न तो पाथेय दिया
निंबोरी का
न ही आंगन सँवारा
नीमपुष्प से।

लेट आए हो ना बदरा
अब भुगतो
भूख सहोगे
तो समझोगे
किसी की प्यास!

✍️ चिराग़ जैन

बरसात की एक सुबह

लाजवाब है आज की सुबह
रात भर
धोया गया है सारा शहर

हर पेड़ को
नहलाया गया है रात भर

उत्सव का
नज़ारा कर रहा हूँ
अपनी बालकॅनी से।

दारू पी है शायद
नीम और पीपल ने।
अभी तक झूम रहे हैं
दोनों याड़ी।

सहजने की फलियाँ
बिछ गई हैं
…मुजरा करने के बाद।

मिट्टी की ख़ुश्बू वाला फ्रेशनर
अभी भी महक रहा है
परिंदे घुस आए हैं
मुफ्त की पार्टी उड़ाने।

एक ख़ूबसूरत-सा अहसास
बौराए जाता है मुझे भी!

✍️ चिराग़ जैन

चाचा-भतीजा और कवि-सम्मेलन

चाचाजी को भतीजों का दस्ता चहिये था नया
अपना अरुण जैमिनी भी इंटरव्यू देने गया

इंटरव्यू में पूछा गया सिर्फ एक सवाल
अरुण ने बना दिया सवाल का बबाल
सवाल था-
“अरुण, यदि तुम लालकिला कवि सम्मेलन में बुलाए जाओगे,
तो कौन सी कविता सुनाओगे?”

अरुण बोला – “चाआजी,
आजकल लालकिले पर कविता सुनाता कौन है,
और जो कविता सुनाए,
उसे लालकिले पर बुलाता कौन है?”

चाआजी को जवाब में मज़ा आया
उन्होंने सवाल आगे बढ़ाया –
“अच्छा अगर किसी गोष्ठी में बुलाए जाओगे तो?”

अरुण बोला- ”गोष्ठी की बात छोड़ दो!
गोष्ठी से आप मेरी प्रतिभा का
अंदाज़ा नहीं लगा पाओगे
क्योंकि आप ठहरे बड़े कवि
कविता के लिए गोष्ठी में थोड़े ही आओगे।
और यदि गोष्ठी में ही जाना पड़े
कविता सुनाने के लिए
तो आपको क्या चाचाजी बनाया है
ऐसी-तैसी कराने के लिए”

अच्छा व्हाट्सएप ग्रुप में जाओगे तो?
व्हाट्सएप ग्रुप का नाम सुनकर
अरुण सीरियस हो गया थोड़ा
बोला- “अजी साहब, आप लोगों ने ग्रुप को
कविता सुनाने लायक ही कहाँ छोड़ा।
ग्रुप तो कविता पर ताली बजाता है
सुनके तो कहीं बाहर से आता है।”

“अरुण तुम्हारे पिताजी भी तो कविता सुनाते हैं”
“जी वो अब केवल अध्यक्ष बनाए जाते हैं।”

तुम्हारा कोई दोस्त है कवि
जी है, महेन्द्र अजनबी
वो कविता सुनाता है
हाँ कोई सुने तो सुना आता है

चाचाजी, आपने भी इस सवाल को खूब धकेला है
लगता है इस बार आपके हाथ में नौचन्दी मेला है

पर कुछ भी हो अब अपना जवाब ले लो
महेन्द्र अजनबी मंच पर जाएगा
और कविता सुनाकर बैठ जाएगा
पर कविता कैसी
अब ये संयोजक की मर्ज़ी, वो कहे जैसी

“अरुण तुमने तो ज़रा-सी बात का बना दिया बबाल”
अरुण बोला, “मुझे तो शुरू से ही पसंद नहीं है ये सवाल
मेरे विचार में आज मंच पर जितनी भी गड़बड़ है
ये कविता ही उसकी जड़ है
अगर उस दिन वाल्मीकि वो एक कविता न सुनाते
तो न मानस लिखी जाती, न राम वन जाते
न लतीफ़े होते न मंच
न लिफाफे होते न प्रपंच

इंटरव्यू का ये हुआ परिणाम
कि आजकल अरुण जैमिनी
हर कार्यक्रम की टीम बनाते हैं
खुद सञ्चालन करते हैं
और चाचाजी से अध्यक्षता करवाते हैं

✍️ चिराग़ जैन

हरसिंगार

तुमसे सिंचित कली
हौले-हौले खिली
चहकी …महकी
इतराने लगी।
हवाओं में
बिखरने लगी उसकी ख़ुश्बू।

…अरे!
तुम रूठ क्यों गए हरसिंगार?
काॅम्प्लेक्स में आ गए हो क्या?
बर्दाश्त न हुई
अपने जने की ख़ुश्बू?
भार लगने लगा
अपना ही अंश?

तुम्हारी तो कीर्ति ही बढ़ाता था!
वरना कौन देखता था तुम्हारी ओर?
तुमने उसे ही गिरा दिया
ज़मीन पर!

देखो कैसा बिछ गया है बेचारा!
अनवरत निहारता
तुम्हारी ओर।

तुम मुँह फेरे खड़े हो!
ठूँठ कहीं के!

✍️ चिराग़ जैन

आग्रह

आग्रह एक जंक्शन है
यहाँ से संबंध
बदल सकता है गाड़ी…

घृणा के लिए भी
घनिष्ठता के लिए भी
विस्तार के लिए
घुटन के लिए भी…

हर जगह की गाड़ी है हुज़ूर
आपको कहाँ का
टिकट चाहिए?

✍️ चिराग़ जैन

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