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डर लगता है

सूप पर
अनाज उछालती माँ
डाँट देती थी मुझे
जब मैं कोशिश करता था
उछलते अनाज को
छू लेने की।

डाल पर बैठी चिड़िया
फुर्र से उड़ जाती थी
जब मैं उचकता था
उसे छूने के लिए।

कई बार मन करता है
तुमको छूने का।

लेकिन डर लगता है
कहीं तुम अनाज न निकलो!
कहीं तुम चिड़िया न निकलो!

✍️ चिराग़ जैन

भीगा मन

झमाझम बारिश
दिल्ली यूनिवर्सिटी कैम्पस
भीगते हुए लड़के-लड़कियाँ
लटों से फिसल कर टपकती बूंदें
फर्राटे से पानी उछालती गाड़ियाँ
मस्ती में किलकारता यौवन
मोटर-बाइक पर आलिंगनबद्ध प्रेम
ग्वाॅयर हाॅल कैंटीन की मैगी
चाय की चुस्कियाँ
काॅलेज-डेज़ की यादें
किसी पुराने परिचित से मुलाक़ात।

…और भीगे मन की
भीगी-सी आवाज़
…चल, भीगते हैं यार।

✍️ चिराग़ जैन

बामियान के घाव

बहुत भयानक सपना था
साक्षात् बुद्ध सामने थे
…लहूलुहान।

उनके पीछे एक भीड़ थी
…पूरी भीड़।

हताश से महावीर
परास्त से गांधी
और शर्मिंदा से पैग़म्बर
किसी गहरे सदमे से सन्न राम
किसी आशंका से त्रस्त कृष्ण
और
ख़ुद से नज़रें चुराते अम्बेडकर।

सब थे
…पर बदहवास।

सबके जिस्म छलनी थे
ज़ख़्म ही ज़ख़्म
हाँ, बुद्ध के ज़ख़्म कुछ ताज़ा थे

भयंकर मंज़र था
साँस तक का शोर नहीं था
तभी सन्नाटे में
टप्प से टपकी
लहू की एक बूंद।

…बस सपना टूट गया
बाॅलकनी में
अख़बार आकर गिरा था
…टप्प से।

✍️ चिराग़ जैन

विकास की बाढ़

बहुत दिन बीते
शहर ने डुबो दी थी
एक नदी
विकास की बाढ़ में।

आज जमुना किनारे आया
तो लगा
कि उतर गई है
विकास की बाढ़

फिर से
बाहर निकल आई है
आदमियों में डूबी
…जमुना।

✍️ चिराग़ जैन

राॅयल्टी

प्रेम
जीवन का याचक नहीं
ख़ुशियों का सौदागर है।

मुनाफ़ाख़ोर नहीं है प्रेम
एक पल की
ख़ुशी के बदले
एक ही पल लेगा
हमारे जीवन से

फिर हम
जीवन भर
प्रसन्न रहें
उस पल की
स्मृतियों में।

प्रेम
कभी नहीं आएगा
स्मृतियों की
राॅयल्टी मांगने।

✍️ चिराग़ जैन

रेशम है कविता

रेशम है कविता
झट से फिसल जाती है
उंगलियों को चूमती हुई।

थाम लेते हैं इसे
जीवन के
खुरदरे अनुभव।

दर्द रिसता तो होगा।
पीर बहती तो होगी।

कौन जाने
क्या ज़्यादा दुखदायी है
दर्द का रिसना
या रेशम का फिसलना?

…डर लगता है
गुलाबी छुअन से।

रेशम का कसता फंदा
सहला भर जाता है
खुरदरे अनुभवों को।
✍️ चिराग़ जैन

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