Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
उठ जा रे
देख सुबह से बरस रहा है रामजी।
….बेमौसम
….झमाझम।
मुझे चिंता हुई
रामलीलाओं का क्या होगा?
और अधबने रावण के पुतले…
…वो तो भीग गए होंगे।
देखने गया
तो पाया
सब कुछ भीग गया था
रामलीला का मंच
रावण का दरबार
ऋष्यमूक पर्वत
दंडक वन
पर्णकुटी
पुष्पक विमान।
…ये क्या किया रामजी
अपनी ही लीला पर
पानी फेर दिया।
और वो अधबना रावण
पानी-पानी…
चीथड़े बन गए थे
उसके नीले, पीले परिधान
छाती तक काली हो गई थी
मूँछों के रंग से
और आँखों को ढँक लिया था
सोने के मुकुट ने बहकर।
वाह रे रावण
त्रेता से कलयुग तक आ गया
लेकिन आँखों पर आज भी
सोने का पर्दा!
लटक गया था रावण का चेहरा
लीला कमेटी के
पदाधिकारियों की तरह।
✍️ चिराग़ जैन
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पीले पड़ चुके सफ़हे पर
लिखी मिली है
केक की रेसिपी
आठवीं क्लास की
एक लड़की की हैंडराइटिंग में।
ऑईल, शुगर, चोको पाउडर…
…वगैरा वगैरा।
साँस में घुल रही है
एक चाॅकलेटी गंध
ऐसा लग रहा है
किसी उंगली पर लगा केक
चाट रहा हूँ मैं।
साथ ही
ये भी महसूस कर रहा हूँ
कि केक से ज़्यादा मीठी है
….उंगली।
✍️ चिराग़ जैन
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सूप पर
अनाज उछालती माँ
डाँट देती थी मुझे
जब मैं कोशिश करता था
उछलते अनाज को
छू लेने की।
डाल पर बैठी चिड़िया
फुर्र से उड़ जाती थी
जब मैं उचकता था
उसे छूने के लिए।
कई बार मन करता है
तुमको छूने का।
लेकिन डर लगता है
कहीं तुम अनाज न निकलो!
कहीं तुम चिड़िया न निकलो!
✍️ चिराग़ जैन
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झमाझम बारिश
दिल्ली यूनिवर्सिटी कैम्पस
भीगते हुए लड़के-लड़कियाँ
लटों से फिसल कर टपकती बूंदें
फर्राटे से पानी उछालती गाड़ियाँ
मस्ती में किलकारता यौवन
मोटर-बाइक पर आलिंगनबद्ध प्रेम
ग्वाॅयर हाॅल कैंटीन की मैगी
चाय की चुस्कियाँ
काॅलेज-डेज़ की यादें
किसी पुराने परिचित से मुलाक़ात।
…और भीगे मन की
भीगी-सी आवाज़
…चल, भीगते हैं यार।
✍️ चिराग़ जैन
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बहुत भयानक सपना था
साक्षात् बुद्ध सामने थे
…लहूलुहान।
उनके पीछे एक भीड़ थी
…पूरी भीड़।
हताश से महावीर
परास्त से गांधी
और शर्मिंदा से पैग़म्बर
किसी गहरे सदमे से सन्न राम
किसी आशंका से त्रस्त कृष्ण
और
ख़ुद से नज़रें चुराते अम्बेडकर।
सब थे
…पर बदहवास।
सबके जिस्म छलनी थे
ज़ख़्म ही ज़ख़्म
हाँ, बुद्ध के ज़ख़्म कुछ ताज़ा थे
भयंकर मंज़र था
साँस तक का शोर नहीं था
तभी सन्नाटे में
टप्प से टपकी
लहू की एक बूंद।
…बस सपना टूट गया
बाॅलकनी में
अख़बार आकर गिरा था
…टप्प से।
✍️ चिराग़ जैन
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बहुत दिन बीते
शहर ने डुबो दी थी
एक नदी
विकास की बाढ़ में।
आज जमुना किनारे आया
तो लगा
कि उतर गई है
विकास की बाढ़
फिर से
बाहर निकल आई है
आदमियों में डूबी
…जमुना।
✍️ चिराग़ जैन