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अलविदा 2021

जब ढलेगा आज का सूरज
तो उसके साथ ही बुझ जाएगी
वो आख़िरी उम्मीद भी
जो साल भर पहले
लगा बैठे थे तुमसे हम सभी।

याद है मुझको
करोड़ों कामनाएं गूंज उठी थीं
सभी मोबाइलों में;
शुभ, मुबारक़ और कितने ही
हसीं अल्फ़ाज़ लिखे थे तुम्हारे साथ

घड़ी के एक-एक सेकेण्ड की आवाज़ पर
उम्मीद का आकार बढ़ता जा रहा था
ठिठुरती रात में
जब रूह तक जमने लगी थी
तुम्हारी पहली आहट को तरसते लोग
सड़कों पर खड़े थे

घड़ी में जिस जगह बारह लिखा था
घड़ी की सबसे छोटी सूई
उस जानिब बहुत धीरे सरकती आ रही थी
बड़ी सूई ज़रा सी तेज़ थी
पर तीसरी दोनों बड़ी-छोटी को मिलवाने की ख़ातिर
कई चक्कर लगाती जा रही थी
मुझे सेकेण्ड की सूई का हर ठुमका
अभी तक याद है अच्छी तरह

बहुत बेचैन थी उस रात ये दुनिया
तुम्हारी इन्तज़ारी में

तुम्हारी राह में जो फूल बिखरे थे
अभी वो ठीक से सूखे नहीं थे
कि तुमने ख़ूबसूरत ख़्वाब सारे तोड़ डाले
तुम्हारे नाम से जो दिन नुमाया थे
उन्हें रोती हुई आँखों का चस्का लग गया था
तुम्हारे कान आहों का नशा करने लगे थे
तुम्हारी एक-एक तारीख़ डाकू की तरह
हर रोज़ दुनिया के कई गौहर चुराती जा रही थी

सुनो, ये जो तुम्हारे कारनामे हैं
उन्हें भूला भी जा सकता नहीं है
और उनकी याद के आगोश में
उम्मीद का दामन पकड़ने से
हमें डर लग रहा है

निगाहें फिर घड़ी पर टिक रही हैं
किसी जादू की गुंजाइश नहीं है
मग़र ये आज पहली बार होगा
कि दुनिया
आने वाले साल की ख़ातिर
भले ख़ुश हो या ना हो
मग़र तुम जा रहे हो
इस ख़ुशी में नाच उठेगा ज़माना।
✍️ चिराग़ जैन

मास्टरजी की ऐसी-तैसी

‘मनसुख’ अपने खेत के एक कोने में पक्षियों के लिए चुग्गा डाल रहा था। उसे ऐसा करते देख गाँव के मास्टरजी ने उसे रोकना चाहा। मनसुख ने मास्टरजी को निष्ठुर, निर्दयी और चिड़िया-विरोधी कहकर अपमानित किया और सारे गाँव में कहता फिरा कि ”मास्टर ‘चुग्गा विरोधी गैंग’ का सरगना है। खाली पड़े खेत में चिड़ियों को चुग्गा डालता हूँ, बेचारी चिड़ियों का पेट भर जाता है। इसमें इस मास्टर का क्या जाता है!”
किसान ने यह बात इतने ज़ोर-शोर से प्रसारित की कि गाँव के कुछ लड़कों ने ‘पंछी करुणा दल’ बनाकर बात को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया।
किसी ने कहा, मास्टर चाहता है कि चुग्गे का अन्न मास्टर को दे दिया जाए। किसी ने कहा कि मास्टर चिड़ियों को समाप्त करके, ख़ुद पूरे आकाश में उड़ना चाहता है। किसी ने कहा कि मास्टर किसान के खेत हड़पने का षड्यंत्र कर रहा है।
मास्टर को देखते ही ‘पंछी करुणा दल’ के लड़के नारा लगाने लगे- ‘हम चिड़ियों के ख़ास हितैषी, मास्टरजी की ऐसी-तैसी।’
इन सब बातों से आहत होकर मास्टरजी ने चुप्पी ओढ़ ली। किसान और गाँव के लड़के मास्टर को जलाने के लिए जेब से पैसा ख़र्च करके मनसुख के खेत में चुग्गा डालने लगे। पंछियो के झुंड के झुंड खेतों पर मंडराने लगे।
बुआई का समय आया तो मनसुख ने चुग्गा डालना बन्द कर दिया और खेत में बीज बोए। पंछियों ने बुआई का एक-एक बीज चुग्गा समझकर चुग लिया। मनसुख को दुःख तो हुआ लेकिन उसे इस बात की ख़ुशी ज़्यादा थी कि मास्टर के बच्चे की हेकड़ी निकल गयी और चुग्गा डालने की परंपरा स्थापित हो गयी।
अगले दिन मनसुख ने फिर बीज बोए। लेकिन अब तक उसकी स्थापित की हुई परम्परा जड़ पकड़ चुकी थी। एक सप्ताह तक किसान रोज़ बुआई करता रहा लेकिन पंछियों को खेत से उड़ाने का साहस न जुटा सका, क्योंकि परम्परा उसी की बोई हुई थी।
अब मनसुख को पंछियों पर क्रोध आने लगा लेकिन ज्यों ही उसने पंछी भगाने के लिए उठने लगा तो देखा कि सामने से ‘पंछी करुणा दल’ के लड़के बोरी भर मक्का लिए चले आ रहे थे। पास आकर बोले, आओ मनसुख भाई, खेत में चुग्गा डालें।
मनसुख निरुत्तर बैठा रहा। लड़के नारा लगाते हुए उसके खेत में चुग्गा डालने लगे। मनसुख का गला रुंध गया, आँखें डबडबा आईं लेकिन कानों में लड़कों की आवाज़ लगातार आ रही थी- ‘…मास्टरजी की ऐसी-तैसी।’

✍️ चिराग़ जैन

चाहत

दिल ऊँचाई पर जाना भी चाहता है
और किसी से बतियाना भी चाहता है

दीवाना है, ज़िंदा है जिसकी खातिर
उसकी खातिर मर जाना भी चाहता है

दिल दे बैठा है जिसके भोलेपन को
उस पगली को समझाना भी चाहता है

मुश्किल है, अंधियारे को रौशन करना
जल जाना तो परवाना भी चाहता है

सूरज रब बन जाता है बरसातों में
हाज़िर भी है, छुप जाना भी चाहता है

✍️ चिराग़ जैन

ओमिक्रोन की राजनीति

देश एक बार फिर दोराहे पर खड़ा हैं। एक ओर खुला राजमार्ग है जिसके दोनों ओर रोटी-पानी के स्रोत हैं लेकिन उसके हर मोड़ पर ‘दुर्घटना’ होने की आशंका भी है। दूसरी ओर वह बंद सड़क है, जो दुर्घटनाओं से तो हमें सुरक्षित कर देगी लेकिन रोज़मर्रा की ज़रूरतों का अभाव इस सुरक्षा का न्यूनतम मूल्य है।
इस दोराहे पर नेतृत्व का एक इशारा पूरे देश की नियति बन जाएगा। धर्मसंकट की इस घड़ी में नेतृत्व के कंधों की ज़िम्मेदारी महसूस की जा सकती है। एक ओर ऐसी सुरक्षा है जिसमें सम्पन्नता तो दूर न्यूनतम संसाधनों का भी अभाव हो जाएगा। और दूसरी ओर ऐसा जोखिम है जिसमें न्यूनतम आवश्यकता ही नहीं, वैभव-विलास तक का अभाव नहीं होगा।
सुबह-शाम एक-दूसरे की आँखों में झाँककर ‘लॉकडाउन लगेगा या नहीं’ -का उत्तर खंगालनेवालों को यह जानना होगा कि यह इतना सामान्य प्रश्न नहीं है, जितना हम समझ रहे हैं। सरकार राजमार्ग की ओर देश को ले जाएगी तो दूसरी लहर का हाहाकार स्मृतियों में उभरकर कान के पर्दे फाड़ देगा और बन्द सड़क की ओर देखने का प्रयास करेगी तो भूख और बेरोज़गारी के अजगर साँस लेना दूभर कर देंगे।
सरकार इस स्थिति में क्या निर्णय लेगी, यह उसके विवेक पर छोड़ना चाहिए लेकिन जनता यह अपेक्षा अवश्य करेगी कि जिस भी दिशा में देश को मोड़ा जाए, नेतृत्व उसके साथ उसी दिशा में चलता दिखाई दे। यदि जनता को बन्द गली में क़ैद करके नेतृत्व राजमार्ग के दोनों ओर बनी सुविधाएँ भोगता दिखा तो बन्द गली की घुटन से जनता के भीतर विस्फोट की आशंका उत्पन्न हो जाएगी और यदि जनता को राजमार्ग पर छोड़कर नेतृत्व ने स्वयं को बंद गली में सुरक्षित कर लेना चाहा तो राजमार्ग पर होनेवाली हर दुर्घटना की चीत्कार नेतृत्व के लिए ऐसी चिंघाड़ बन जाएगी, जिसमें जय-जयकार के नारों का शोर कभी सिर नहीं उठा पाएगा।
चुनाव निश्चित रूप से लोकतंत्र के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन इस बार प्रशासन को चुनाव करना है कि राजनीति की दुकान को बचाना है या उन दुकानों के ग्राहकों को…!
✍️ चिराग़ जैन

शोर

चीखने से
शोर बढ़ता है
सम्बन्ध नहीं।

सुकून की खटिया
बुनी जाती है
सहजता की बाण से;
इसमें प्रयास की गाँठें हों
तो मुक्त नहीं हो सकती नींद
चुभन से!

जताना
और बताना
व्यापार में होना चाहिए
व्यवहार में नहीं।

और प्यार में…
…वहाँ तो
आँखें मिलते ही
फिफ्थ गीयर लग जाता है
धड़कनों में!

ओंठ व्यस्त रहते हैं
कँपकँपाने और मुस्कुराने में।

शब्द और आवाज़
केवल शोर हैं
प्यार की बातचीत में।

✍️ चिराग़ जैन

जनकल्याण की भूल-भुलैया

सरकार सदन में चिल्लाती है कि हम जन-कल्याण करेंगे। विपक्ष भी सदन में चिल्लाता है कि हम जन-कल्याण करवाएंगे। दोनों तरफ़ की आवाज़ें ऊँची होती जाती हैं। शोर-शराबा बढ़ता है तो स्पीकर सदन की कार्रवाई स्थगित कर देते हैं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी आवाज़ लिए सदन के बाहर निकल आते हैं। उन्हें बाहर आता देखकर मीडिया उनके मुँह पर माइक लगा देता है।
पक्ष के प्रतिनिधि माइक देखते ही चिल्लाने लगते हैं। उनको चिल्लाते देखकर विपक्ष भी मीडिया के एकाध माइक लपककर चिल्लाने लगता है। दोनों एक-दूसरे पर अनुशासनहीनता, संवेदनहीनता और जनविरोधी होने का आरोप लगाते हैं। सरकार बताती है कि विपक्ष सदन नहीं चलने दे रहा। विपक्ष बताता है कि सरकार सदन चलाना नहीं चाहती। ख़ूब शोर-शराबा होता है।
दोनों के जन-कल्याण के दावों को सुनकर स्पीकर महोदय दोनों को सदन में बुला लेते हैं। सदन की कार्यवाही शुरू होती है। फिर दोनों तरफ़ के लोग हंगामा करते हैं। फिर सदन स्थगित होता है। फिर मीडिया बाइट लेता है। फिर सदन शुरू होता है… फिर स्थगन… फिर मीडिया… फिर अंदर… फिर बाहर…!
पूरा सत्र बीत जाता है… पूरा कार्यकाल बीत जाता है… पूरे दशक बीत जाते हैं… पूरे युग बीत जाते हैं… विपक्ष सरकार बन जाता है… सरकार विपक्ष में जा बैठती है… अंदर-बाहर के इस खेल में राजनीति का खेत जुतता रहता है… नयी-नयी पार्टियाँ उग आती हैं… कहीं पीपल की डालियाँ कीकरों की गलबहियाँ कर लेती हैं तो कहीं बरगद की कोई डाल अपनी जड़ें जमाकर ख़ुद को बरगद घोषित कर देती हैं… अंदर-बाहर का कार्यक्रम जारी रहता है!
सरकार कहती रहती है कि हम जनकल्याण करके रहेंगे… विपक्ष कहता रहता है तुम्हें जनकल्याण करना ही होगा। जनकल्याण संसद के खम्भों से टेक लगाकर खड़ा-खड़ा ख़ुद स्तम्भ बन चुका है और जनता जब रायसीना के आसपास से निकलती है तो लाल खंभों पर खड़ी एक इमारत की ओर टकटकी लगाकर देखती रहती है। उस समय उसे यह याद ही नहीं रहता कि जितनी देर वह संसद की ओर निहार रही थी, उतनी देर वह गोल-गोल घूम रही थी।
✍️ चिराग़ जैन

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