Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
जन्तर-मन्तर पर एक आन्दोलन उपजता है। युवा, वृद्ध, स्त्री, पुरुष, अमीर, ग़रीब सब एक बूढ़ी काया में तन्त्र के सुधार की उम्मीद देखने लगते हैं। कोई राजनैतिक आधार नहीं, कोई प्रोपेगेंडा नहीं, कोई ग्लैमर नहीं… पीछे बैनर पर महात्मा गांधी का भव्य चित्र, आगे श्वेत वसन धारी अन्ना हजारे, माइक पर जनता को आंदोलन का अर्थ समझाते कुमार विश्वास और अनशनकारी के साथ बैठे अरविंद केजरीवाल तथा मनीष सिसोदिया।
कांग्रेस शासन के अहंकार से त्रस्त मीडिया ने अपने सारे कैमरे जन्तर-मन्तर की ओर घुमा दिए। एक शब्द यकायक पूरे देश में आग की तरह फैल गया – ‘जनलोकपाल’। जिस तरह की तहरीरें हुईं, उनसे जन-समर्थन का आकार बढ़ता गया। जिसे देखो वही ‘मैं भी अन्ना’ की टोपी लगाए जन्तर-मन्तर की ओर बढ़ चला।
उधर दस वर्ष से सत्ता पर क़ाबिज़ कांग्रेस की मनमानियों का विरोध करनेवाले बुद्धिजीवी तथा सामाजिक व्यक्तित्व भी आंदोलन के मंच पर आ पहुँचे। शांतिभूषण, प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, आशुतोष, किरण बेदी और न जाने कितने ही लोकप्रिय चेहरे आन्दोलन के मंच पर दिखने लगे। जनता का सैलाब उमड़ रहा था। ‘जनलोकपाल’ बिल गीत, संगीत, नुक्कड़ नाटक, नारेबाज़ी, कविता पर सवार होकर पूरे माहौल पर छा गया था।
कांग्रेस के तत्कालीन विरोधी राजनेताओं ने भी इस मंच पर चढ़ने की कोशिश की, लेकिन आंदोलन की कोर कमेटी ने किसी भी राजनैतिक व्यक्तित्व को मंच पर चढ़ने की अनुमति नहीं दी। इस निर्णय के कारण उमा भारती और ओमप्रकाश चौटाला सरीखे जनप्रतिनिधियों को आंदोलन तक पहुँच कर बैरंग वापस लौटना पड़ा।
इस निर्णय से जनता का विश्वास और बढ़ा। मीडिया ने इस निर्णय को ख़ूब हाइलाइट किया और जन्तर-मन्तर पर जनता की सूनामी आ गयी।
सबको यक़ीन हो गया कि यह ‘जनलोकपाल बिल’ भारतीय तन्त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की इति कर देगा। उन दिनों अचानक से जनता में भी ईमानदारी के अंकुर फूटने लगे थे। मैंने देखा कि जो लोग सौ-पचास रुपये ले-देकर निकल लेने के अभ्यस्त थे, उन्होंने भी चालान होने पर बाक़ायदा चालान भरना शुरू कर दिया था। यह सब देखकर महसूस हुआ कि यदि सिस्टम का करप्शन दूर हो जाए तो जनता स्वतः नियमों का सम्मान करने लगती है।
जो लोग भारत की जनता को भ्रष्टाचारी कहकर ‘इस देश का कुछ नहीं हो सकता’ टाइप के डायलॉग बोलते हैं, उन्हें मैं यह बात पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि राजनीति, ब्यूरोक्रेसी और उद्योगों के आधार पर पनप रहे मध्यस्थों को छोड़ दें तो बाक़ी जनता को किसी भी प्रकार के नियम का उल्लंघन करने में कोई रुचि नहीं है। यदि जनता आश्वस्त हो कि उसके टैक्स का पैसा स्विस बैंकों के आंकड़ों में तब्दील नहीं होगा या राजनैतिक हित साधने के लिए प्रकारांतर से वोट ख़रीदने का अस्त्र न बनेगा तो उसे टैक्स देने में कोई आपत्ति नहीं होगी। इसलिए जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार के लपेटे में जनता को समान रूप से शामिल करता है, वह परिस्थिति को सुलझाने और समझने की बजाय पीड़ित को दोषी सिद्ध करने में अधिक विश्वास रखता है।
अन्ना आंदोलन के समय जनता की उम्मीदें जाग उठी थीं और ‘सिविल सोसाइटी’ नामक अवधारणा पुनः अस्तित्व में आई थी। जेपी आंदोलन के बाद जनता का ऐसा संगठित रूप पहली बार दिखाई दिया था। मुझे अच्छी तरह याद है, उन दिनों अन्ना की हर हरक़त सरकारी तंत्र की नींद उड़ा देती थी।
इसी अवसर का लाभ उठाकर बाबा रामदेव ने भी काले धन के खि़लाफ़ मोर्चा खोल दिया। रामलीला मैदान में पहुँचने का आह्वान हुआ और बाबा रामदेव जब दिल्ली हवाईअड्डे पर उतरे तो पाँच-पाँच कैबिनेट मिनिस्टर उनकी मनुहार के लिए एयरपोर्ट पर हाथ बांधे खड़े थे।
उधर अन्ना आंदोलन जनलोकपाल की हठ पर अड़ा था। रामलीला मैदान में आधी रात को लाठीचार्ज हुआ और बाबा का आंदोलन कुचल दिया गया। इधर कई दौर की बातचीत के बाद भी सरकार और अन्ना आंदोलन के मध्य कोई सहमति नहीं बनी तो एक दिन मीटिंग के बाद तत्कालीन कानून मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने मीडिया के सामने झुंझलाकर कहा कि – ‘चुनाव लड़ें ना, बिल बनाना है तो चुनाव लड़कर सरकार में आओ और बनवा लो बिल।’
इससे पूर्व राजनेताओं को मंच न दिए जाने के मुआमले में अरविन्द केजरीवाल अन्ना के मंच से यह घोषणा कर बैठे थे कि न तो हम किसी राजनैतिक दल को अपने मंच पर आने देंगे और न ही राजनीति में पदार्पण करेंगे। लेकिन सिब्बल की चुनौती के बाद कोर कमेटी में यह सुगबुगाहट होने लगी थी कि राजनैतिक पार्टी बनाई जावे या नहीं।
एक धड़ा कहता था कि इतने बड़े जन-समर्थन को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव लड़ना सभी का अधिकार है और अच्छे चरित्र के लोगों को राजनीति में सक्रिय होना भी चाहिए। उधर, दूसरे पक्ष का यह मानना था कि यदि हमने राजनीति में पदार्पण किया तो यह आंदोलन भी पिछले आंदोलनों की भाँति अपने सत्व का चुम्बकत्व खो देगा। सिविल सोसाइटी की अवधारणा ध्वस्त हो जाएगी और भविष्य में जनता ऐसे जन-आंदोलनों से जुड़ने से पहले हज़ार बार विचार करेगी।
इस दूसरे पक्ष में स्वयं अन्ना हजारे भी शामिल थे। दिल्ली का चुनाव सामने था और आंदोलनकारियों को बहुत जल्दी कोई बड़ा निर्णय लेना था। इस स्थिति में राजनीति में जाने के समर्थकों ने अन्ना की बात को अनदेखा करके ‘आम आदमी पार्टी’ की घोषणा कर दी।
जिस कोर कमेटी ने राजनेताओं को आंदोलन का मंच नहीं लेने दिया था, वही कोर कमेटी आंदोलन का मंच छोड़कर राजनीति के अखाड़े में दाँव लगाने लगे। अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास, संजय सिंह, योगेन्द्र यादव और तमाम चेहरे जनसभाएँ करके वोट जुटाने में लग गए।
किरण बेदी सरीखे व्यक्तित्व अन्ना के समर्थन में राजनैतिक पार्टी से दूर रहे और केजरीवाल आदि की राजनैतिक महत्वाकांक्षा की भर-भर निंदा करने लगे।
आंदोलन पार्श्व में चला गया और राजनीति की बिसात बिछ गयी। आम आदमी पार्टी का कुछ लोग मखौल बनाने लगे और कुछ इसे उम्मीद की किरण कहकर समर्थन में आ जुटे।
प्रारम्भिक स्थिति यह थी कि पार्टी के पास चुनाव लड़ने के लिए कुल सत्तर प्रत्याशी नहीं थे। ‘जो मिला उसे टिकट दे दिया’ -की नीति पर प्रत्याशी घोषित किये गए। उधर भारतीय जनता पार्टी ने उन्हीं किरण बेदी को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित कर दिया, जो राजनीति में उतरने पर केजरीवाल की निंदा कर रही थीं।
देश का राजनैतिक परिप्रेक्ष्य बदल गया। कांग्रेस का बड़ा किला यकायक ध्वस्त होने लगा। शीला दीक्षित जैसी सफल राजनेत्री कांग्रेस की अहमन्यता की भेंट चढ़ गयी और दिल्ली विधानसभा से कांग्रेस ग़ायब हो गयी। उधर केन्द्र की कांग्रेस सरकार भी लोकनिंद्य हुई और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता ने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर सुशोभित कर दिया।
राजनीति का चरित्र पूरी तरह बदल गया। इसके बाद राजनैतिक बैनर्स का रंग-रूप बदलने लगा। भारतीय जनता पार्टी के पोस्टर्स से अटल-आडवाणी युग समाप्त हो गया और दिल्ली की गद्दी पर बैठे केजरीवाल ने अपने साथियों से एक-एक करके किनारा कर लिया। जो पार्टी से बाहर जाता, वही केजरीवाल को महत्वाकांक्षी बताकर आलोचना करता।
कुछ जो ज़्यादा आहत हुए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में ठीया बना लिया। कुछ येन-केन-प्रकारेण राजनीति में बने रहने के लिए कुछ-कुछ उछलकूद करते रहते हैं।
जन्तर मन्तर पर जो पौधा बोया गया था, उसके एक-एक पत्ते को झाड़ दिया गया और जिन अन्ना को आगे रखकर आन्दोलन खड़ा किया गया, वे पिछले कुछ वर्षों से अदृश्य हैं। बाबा रामदेव राजनैतिक गतिविधियों से लोकप्रियता बटोरकर पतंजलि के प्रोडक्ट्स के व्यापार को शानदार तरीके से चला रहे हैं। कंपनियों की ख़रीद-फ़रोख़्त करके उन्होंने अपने टर्न ओवर को आश्चर्यजनक रूप से बढ़ा लिया है। उनसे आजकल कोई कालेधन संबंधी उनके दावों पर प्रश्न करता है तो वे उसको कहते हैं कि ‘मेरी पूँछ पाड़ ले!’
इधर आंदोलन के प्रभाव से बनी पार्टी ने पंजाब में भारी सफलता प्राप्त की और नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री भगवंत मान ने यह आदेश पारित किया है कि पंजाब के सरकारी दफ्तरों में अब सरदार भगतसिंह और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की ही तस्वीर लगाई जाएगी। महाराज रणजीत सिंह, महात्मा गांधी और विवेकानन्द के चित्र सरकारी दफ्तरों से हटा दिए गए हैं। इस निर्णय से यह सिद्ध होता है कि राजनीति में श्रद्धा तथा सम्मान भी गणित की पुस्तकों के अनुसार तय किया जाता है।
महात्मा गांधी की तस्वीर अन्ना आंदोलन की आखि़री याद थी। उसे हटाकर पंजाब सरकार ने यह बता दिया है कि जिसके नाम पर जितने समय तक समर्थन मिलेगा, उसकी तस्वीर उतने समय तक मुस्कुराती रहेगी।
सबके अपने-अपने मार्गदर्शक मंडल हैं… सबके अपने अपने रालेगण सिद्धि हैं और सबके अपने-अपने महात्मा गांधी हैं। सबके अपने आदर्श हैं और सबकी अपनी राजनीति है… जनता कुछ पूछे तो कह दिया जाएगा – ‘जा मेरी पूँछ पाड़ ले।’
✍️ चिराग़ जैन
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शिव, जहाँ जीवन और मृत्यु दोनों के लिए समभाव है। शिव, जहाँ मनुष्य, पशु, भूत, गण, स्त्री, पुरुष, देव, दैत्य, सुर, असुर, सृजन, ध्वंस… सब कुछ स्वीकार है। जहाँ कुछ हेय नहीं है। जहाँ किसी नकार के लिए कोई स्थान नहीं है। जहाँ सब स्वीकृत हैं। जो सबके हैं। जहाँ मानव तन पर गजमुख भी स्वीकृत है और जीवित देह पर चिता भस्म से भी परहेज नहीं है।
कण्ठ में हलाहल और भोग में धतूरा, आसन में मृगछौना और जटाओं में गंगा, भुज पर भुजंग और गले में विषधर, हाथ में त्रिशूल और मस्तक पर रजनीश… अहा क्या अकल्पनीय स्वरूप है यह। त्रिपुण्ड, त्रिनेत्र, डमरू… कुछ भी तो ऐसा नहीं जिसका किसी अन्य से कोई सीधा सम्बन्ध स्थापित हो सके। सब एक दूसरे के धुर विरुद्ध। लेकिन शिव पर आकर सब एक-दूसरे के पूरक हो जाते हैं।
क्रुद्ध हुए तो ताण्डव का सृजन हो गया। आवेश की राह पकड़ी तो उसके अंत में गणेश का निर्माण हो गया। शोकग्रस्त हुए तो शक्तिपीठ प्रतिष्ठापित हो गए। और प्रसन्न हुए तो देव-मनुष्य तो दूर, भूत-पिशाच तक आह्लादित हो उठे।
किसी का ‘स्वीकार’ इतना विराट हो जावे तो उसका ‘महादेव’ हो जाना तय हो जाता है। यह स्वीकार इतना विराट है कि विषपान के लिए भी नकार नहीं है। यह स्वीकार इतना दिव्य है कि चिताभस्म भी अपावन नहीं है। यह स्वीकार इतना महान है कि नन्दी बैल से लेकर कार्तिकेय तक सब एक परिवार के सदस्य हैं। यह स्वीकार इतना निडर है रुद्राक्ष के कंगन से लेकर मुण्डमाल तक कुछ भी अजीब नहीं लगता।
काठमांडू में पशुपतिनाथ मन्दिर में शिव के इसी वैराट्य को जी भर भोगा। बागमती नदी के तट पर चिता जल रही थी। जीवन के ध्वंस की घोषणा करता धुआं ऊपर उठा आता था और पशुपतिनाथ मंदिर के पूर्वी द्वार के सम्मुख किसी की दुआओं की अगरबत्ती से उठते धुएँ की लकीर चिता के धुएँ में जाकर विलीन हुए जा रहा था। आह… लोक और परलोक का ऐसा विलय मैंने पहली बार देखा।
दृश्य देखकर मन अवाक हो गया। न आह शेष थी न अहो! क्षणांश के लिए दृष्टि धूम्रविलय के इस महासत्य से सम्मोहित हो गयी थी। विचार और चिंतन का अनवरत उपक्रम यकायक स्थिर हो गया। क्षण भर के लिए ही सही, किन्तु मैं खुली आँखों से ध्यान की उस अवस्था पर पहुँच गया था जहाँ तक विचार का शोर-शराबा नहीं पहुँचता… जहाँ केवल साक्षीभाव शेष रह जाता है। चिता… दुआ… और धुआँ! पूरी सृष्टि का सार इस दृश्य में समाहित था।
पशुपतिनाथ मंदिर में विग्रह स्वरूप शिवलिंग के ऊपर चौमुखी शिव विद्यमान हैं। गर्भगृह की चारों दिशाओं में चार द्वार हैं। पूर्वी द्वार बागमती नदी की ओर खुलता है, जहाँ मसान में शवदाह होता है और नदी के पार पिण्डदान तथा इसी प्रकार के अन्य कर्मकाण्ड सम्पन्न किये जाते हैं। इस श्मशान में जहाँ दाह से पूर्व शवों को स्नान कराया जाता है उसके सामने मंदिर जैसे तीन शिखर बने हुए हैं। इन शिखरों का सबसे ऊँचा हिस्सा भी मंदिर की पूर्वी मुंडेर से बारह-पंद्रह फीट नीचे है। पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन करने के बाद जो श्रद्धालु इस मुंडेर तक आते हैं, उनका मानना है कि ये मंदिर-शिखर लक्ष्मीयन्त्र हैं। मंदिर की मुंडेर से इस यंत्र पर सिक्का फेंका जाए और वह यंत्र पर ही टिक जाए तो इसका अर्थ है कि लक्ष्मी ने आपकी भेंट स्वीकार कर ली है।
संपन्नता की आस में सैंकड़ों लोग सिक्का फेंकते हैं लेकिन अधिकतर सिक्के शिखर से टकराकर नीचे मसान में जा गिरते हैं। मुझे याद है एक बार शाम के समय नीचे मसान में स्नानोंपरांत एक शव रखा था और ऊपर से लक्ष्मी की आकांक्षा में फेंका गया सिक्का उस व्यक्ति के सिर पर लगा जिसने उस शव को मुखाग्नि देने के लिए सिर मुण्डवाया था। मैं ऊँचाई से उसके चेहरे पर आए भाव पूरी तरह तो नहीं पढ़ सका किन्तु उनमें घृणा के साथ कुछ नैराश्य अवश्य था। …इस दृश्य को देखकर मन विचलित हुआ। मृत्यु के सम्मुख लक्ष्मी की आकांक्षा रखकर सिक्का फेंकते लोग श्रद्धालु कम, निष्ठुर ज़्यादा लगे।
मंदिर के उत्तर में माँ अन्नपूर्णा विद्यमान हैं। पश्चिमी द्वार के सम्मुख नन्दी अपने भव्य रूप में विराज रहे हैं और दक्षिण द्वार पर उन्मत्त भैरव का मंदिर है। भैरव का इतना रौद्र रूप मैंने अन्यत्र नहीं देखा।
परिसर में अन्य भी छोटे-छोटे बिम्ब तथा मन्दिर हैं। केदारनाथ, वासुकी, महालक्ष्मी और न जाने कितने ही आराध्य पशुपतिनाथ के साहचर्य में उपस्थित हैं।
लम्बी-लम्बी लाइनें लगी थीं। शनिवार होने का कारण उस दिन मन्दिर में अपार भीड़ थी। अगरबत्ती, धूपबत्ती और दीपक बालकर लोग एक नियत स्थान पर नारियल फोड़ते और फूल व प्रसाद की टोकरी लेकर लम्बी प्रतीक्षा के बाद किसी न किसी द्वार तक पहुँचते थे। पुजारी उनका प्रसाद महादेव तक पहुँचाता था और दर्शनार्थी चेहरे पर एक विजय स्मित लिए लौट आते।
नेपाली काष्ठ शैली में बना भव्य मंदिर अपने वास्तु से भी मन मोह लेता है। मुख्य प्रांगण के बाहर संन्यासी बैठे मिल जाते हैं। कभी-कभी कुछ अघोरी भी दिखाई दे जाते हैं। शिव तो सबके हैं ना। निर्धन और धनवान सभी समान रूप से भोले के दर्शनों की प्यास लिए यहाँ पहुँचते हैं। एक बड़े से चौबारे में लोग कबूतरों को चुग्गा डालते हैं। सेल्फी, फोटोग्राफी, विडियोशूट जैसे कार्य भी यहीं सम्पन्न होते हैं।
इस परिसर से बाहर एक बड़ा-सा बाज़ार है, जहाँ रुद्राक्ष और शालिग्राम की अनेक दुकानें हैं। नेपाल में रुद्राक्ष ख़ूब होता है। और शालिग्राम तो विश्वभर में मिलता ही नेपाल की काली गण्डक नदी में है।
मैं बाज़ार में खड़ा था और मसान देखकर आया था। जीवन का अन्तिम सत्य मसान में पसरा हुआ था। परिसर के मध्य में स्वयं शिव विराजित थे। और पूरे परिसर में आस्था से लेकर मानुष तक सब सुंदर ही सुंदर था। आज मैं समझ सका कि सत्यं-शिवं-सुन्दरं का वास्तविक अर्थ क्या है।
✍️ चिराग़ जैन
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शऊर हो तो नश्तर से भी गुदगुदी की जा सकती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ख़ुश होते तो आँख चमकती
मन हँसता तो देह दमकती
डर लगता तो दिल की धड़कन
ख़ुद चेहरे तक आन धमकती
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे
हाथ-पैर हिलते-डुलते हैं, पर मन में उत्साह नहीं है
साँसें आती हैं, जाती हैं पर जीने की चाह नहीं है
कैसी है ये हालत समझो
इसकी आज हक़ीक़त समझो
ये काया की आदत भर है
इसको ही जीवन मत समझो
बिन छत की दीवारें हैं ये, कैसे इन्हें मकान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे
शब्द उगलना नित्य क्रिया है, मन कह पाना स्वर्गिक सुख है
कानों में जो शोर भरा है, उसमें केवल सत्य प्रमुख है
मेघ घिरे हैं, वृष्टि नदारद
आँख खुली हैं दृष्टि नदारद
जिसके भीतर मन टूटा हो
उसके हित यह सृष्टि नदारद
दो हाथों से छूने को ही क्या सच का अनुमान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
मुस्काना उसको कहते हैं, जिससे तन-मन खिल-खिल जाए
जीवन, जिसमें मन दीपक हो, रोम-रोम तक झिलमिल आए
कुंजगली अभिराम नहीं है
गोकुल है, घनश्याम नहीं है
उन महलों में सन्नाटा है
जिन महलों में राम नहीं है
जिसमें कोरी भौतिकता हो, उसको कब तक ज्ञान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
✍️ चिराग़ जैन
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दिल्ली से उड़कर डिब्रूगढ़ एयरपोर्ट पर लैंड किया तो जहाज की खिड़कियों पर पानी की बून्दों ने चित्रकारी कर दी थी। बाहर झाँकने पर एहसास हुआ कि यहाँ दिल्ली जैसी गर्मी का नामो-निशान नहीं है, बल्कि बादलों की मेहरबानी से मौसम गुलाबी नमी से महक उठा है।
हवाई अड्डे से बाहर निकलने तक हमें अगले ही दिन की वापसी के निर्णय पर पछतावा हो रहा था। द्वार पर आयोजकगण स्वागत के लिए तैयार खड़े थे। हवाई अड्डे से शहर की ओर बढ़े तो चाय के बागानों की ख़ूबसूरती और ख़ुशगवार मौसम की हरितिमा आँखों के रास्ते मन में आक्सीजन भर रही थी।
डिब्रूगढ़ शहर की मुख्य सड़क के बीचोबीच ट्रेनलाइन बिछी हुई है। लाइन के एक ओर ट्रैफिक चलता है और दूसरी ओर छोटे-छोटे लेकिन ख़ूबसूरत घर हैं। आम और रुद्राक्ष के पेड़ों पर आया हुआ बौर माहौल के हरेपन को और आकर्षक बना रहा है। हवा की आर्द्रता के कारण प्रत्येक वृक्ष के तने और शाखाओं पर छोटी लताओं जैसे कुछ शैवाल उग आए हैं, जिनसे हर पेड़ की लकड़ी ने हरी चूनरी से अपना तन ढँक लिया है। इस श्यामला प्रकृति को गाड़ी की खिड़की से अपनी आँखों में भरता हुआ मन अघाता ही न था कि गाड़ी अचानक मुख्य सड़क छोड़कर एक गली में मुड़ गयी और पार्किंग में खड़ी हो गयी।
आयोजक हमें गाड़ी से उतारकर एक बांध की सीढ़ियां चढ़ने लगा। ज्यों ही हमने अंतिम सीढ़ी पार की तो हम एक ऐसे स्थान पर पहुँच गये जहाँ से हमारे और क्षितिज के मध्य जल ही जल दिखाई देता था। यह ब्रह्मपुत्र का वैभव था। अथाह जलराशि का मार्ग बना यह महानद अब से पूर्व केवल चित्रों में ही देखा था। एकाध बार गुवाहाटी में इसके दर्शन हुए लेकिन हर बार शाम के धुंधलके में ही इसके दर्शन हुए इसलिए इसकी भव्यता का सही अनुमान न हो सका था। आज अनेक देशों से गुज़रने वाले ब्रह्मपुत्र के साक्षात्कार का सौभाग्य मिल रहा था। नदी के विशाल पाट को लेकर जितनी कल्पनाएँ की जा सकती थीं, सब छोटी पड़ रही थीं।
कुछ देर इस दृश्य का भोग करके हम वापस गंतव्य की ओर बढ़ चले। साथ चल रही ट्रेन लाइन का डेड एन्ड आ गया। आयोजक ने बताया कि इसके आगे रेलमार्ग समाप्त हो जाता है। ठीक इस डेड एन्ड के सामने डिब्रूगढ़ जिमखाना क्लब था।
चेकइन करने का बाद भोजन आदि करके हमने एक घण्टा विश्राम किया। बारिश की हल्की फुहारें अनवरत जारी थीं। शाम को तिनसुखिया से कुछ मित्र मिलने आ गये और फिर कवि-सम्मेलन के लिए बुलावा आया गया। सवा आठ बजे से सवा दस बजे तक लगातार ठहाकों और तालियों का लास्य हुआ। तकनीक का सुफल यह था कि जिस शहर में मैं पहली बार गया था, वहाँ भी श्रोतादीर्घा से कविताओं की फरमाइश आ रही थी। आयोजकों ने हमें बताया कि इस क्लब में इतनी बड़ी संख्या में श्रोता पहली बार आए हैं और इतनी देर तक पहली बार कोई कार्यक्रम चला है। हमने भी हँसते हुए उन्हें बताया कि हमने भी बहुत दिन बाद इतना लम्बा-लम्बा काव्यपाठ किया है।
एक ओर अरुण जी सेल्फियों से घिरे हुए थे, दूसरी ओर मेरे साथ भी फ़ोटो खिंचवाने वाले पर्याप्त संख्या में जुटे हुए थे। थोड़ी-सी देर का यह सेलिब्रिटिज़्म जीने के बाद हम अपने कमरे में आकर सोने की तैयारी करने लगे।
सामने खिड़की के शेड से टपकती पानी की बून्दों और शेड पर पड़ती बारिश के संगीत से माहौल रूमानी हो चला था। बरसाती रात के गहरे अंधेरे में दूर किसी हैलोजन पिलर पर झिलमिलाती बरखा से रूसी उपन्यासों की फीलिंग आ रही थी।
इस बरसाती ख़ुशबू को आँखों से भोगते हुए न जाने कब आँख लग गयी। सुबह अलार्म ने बताया कि हवाई अड्डे का जहाज हमारे मूड की परवाह किये बिना उड़ सकता है। अरुण जी ने नाश्ता ऑर्डर किया और हम दोनों जल्दी-जल्दी तैयार होकर हवाईअड्डे पहुँचे।
अभी अड़तीस हज़ार फीट की ऊँचाई पर मेरे दाहिनी ओर हिमालय का वैराट्य बाँहें फैलाए खड़ा है। सूर्य की किरणों ने हिमशिखरों को चूमकर गुलाबी कर दिया है। बादलों की अनेक परतों को पार कर हिमगिरि के उत्तुंग शिखर ऊपर निकल आए हैं। ऐसा जान पड़ता है, मानो कोई लजीला किशोर उचक-उचक कर अपनी प्रियतमा रश्मियों को देखने की कोशिश कर रहा है। प्रकृति की इस असीम अनुभूति में मैं इंडिगो के जहाज की खिड़की वाली सीट पर बैठा मनुष्य के बौने सामर्थ्य को अनुभूत करते हुए विज्ञान की कोशिशों का धन्यवाद कर रहा हूँ।
✍️ चिराग़ जैन
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सनातन संस्कृति की सबसे ख़ूबसूरत बात यही है कि यहाँ भक्त और भगवान के मध्य जो बातचीत होती है, वह केवल भक्तिरस तक ही सीमित नहीं है। बल्कि उसमें काव्य के अन्य सभी रसों की सृष्टि सम्भव है।
विश्व के अन्य किसी धर्म में यह चमत्कार सम्भव नहीं है। किसी अन्य धर्म के आराध्य की होली खेलते, रास रचाते, गोपियों के वस्त्र चुराते, जूठे बेर खाते आप कल्पना नहीं कर पाएंगे। किसी अन्य धर्म के पास ठिठोली करता ईश्वर नहीं मिलेगा। किसी अन्य धर्म का आराध्य हनुमान की तरह अशोक वाटिका उजाड़ कर किसी पेड़ से फल तोड़कर खाने लगे तो यह उसके व्यक्तित्व को सूट नहीं करेगा।
यह सब केवल सनातन परम्परा में संभव है। यहाँ ईश्वर को जीवन के प्रत्येक क्षण में सम्मिलित किया गया है। सनातन परम्परा ईश्वर को किसी धर्मस्थल विशेष तक सीमित करने की पक्षधर नहीं है। यहाँ तो ईश्वर को साथ लेकर घूमने का रिवाज़ है।
घर में विराजमान लड्डू गोपाल बाक़ायदा घर के सदस्य की तरह रहते हैं। वे परिवार के साथ उठते हैं, सोते हैं, खाते-पीते हैं, नहाते हैं और घूमने भी जाते हैं। वे नाराज़ भी होते हैं और मानते भी हैं। पारलौकिक से ऐसा लौकिक संबंध अन्यत्र कहीं सम्भव नहीं है।
यही कारण है कि हमारा ईश्वर हमारे साथ हँसता है। खिलखिलाकर हँसता हुआ ईश्वर अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। यह केवल हमारे पास सम्भव है।
माँ अनुसूया के पालने में त्रिदेव के खेलने की घटना इस बात की प्रमाण है कि सनातन परंपरा का ईश्वर वात्सल्य का सम्मान करता है। जसुमति मैया से झूठ बोलता कन्हैया ईश्वर के वात्सल्यबोध का परिचायक है। शबरी के जूठे बेर खाते राम और विदुरानी के हाथों से केले के छिलके खाते कृष्ण प्रेम की प्रतीति के उदाहरण हैं। रास रचाते कृष्ण संयोग सिंगार के प्रतिमान हैं और विकल होकर वन्य-वनस्पति से सीता का पता पूछते राम वियोग शृंगार के प्रतीक हैं। रुक्मणि के कृष्ण सदेह प्रेम की स्वीकारोक्ति हैं और मीरा के गिरिधर विदेह प्रेम के बिम्ब हैं। प्रह्लाद की आस्था पर खम्भ से उत्पन्न नृसिंह जब अपने नख से हिरण्यकश्यप का वध करते हैं तो भयानक रस साकार हो उठता है, और सती के आत्मदाह से क्रुद्ध शिव जब ताण्डव करते हैं तो रौद्र रस की सर्जना होती है। वामन अवतार में राजा बलि की समस्त सम्पदा नाप लेने वाले ईश्वर ने अद्भुत रस का उदाहरण प्रस्तुत किया। आँसुओं से सुदामा के चरण पखारते कृष्ण करुणरस का निमित्त हैं और नारद को हरिमुख देकर परिहास का पात्र बनाने वाले विष्णु हास्यरस की स्वीकृति हैं। युद्धक्षेत्र में भी उग्र न होकर संयत रहनेवाले राम शान्तरस का प्रमाण बन गए हैं।
सनातन परंपरा का ईश्वर जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में हमारे साथ हो सकता है। यही कारण है कि विवाह के लिए सजती दुल्हन को गौरी का स्वरूप मानकर उसकी पूजा की जाती है और बारातियों को शिव के गण मानकर गारी गायी जाती है। कन्या के पिता को जनक मानकर गीत गाने का चलन आज भी हमारे समाज में है।
हमने ईश्वर की अनुभूति के ताने को दिनचर्या के बाने के साथ ऐसे बुन दिया है कि गर्भाधान से लेकर अंतिम संस्कार तक हर जगह किसी न किसी पौराणिक सन्दर्भ का प्रतीक मानकर जीव को ईश्वर के समतुल्य मान लिया जाता है।
अन्य लगभग सभी धर्मों की कट्टरता या अदृश्य कट्टरता ने उनके ईश्वर को केवल धर्मस्थलों तक सीमित कर दिया है। यही कारण है कि उनके ईश्वर के साथ केवल भक्ति का सम्बंध बनता है। प्रेम, क्रोध, वात्सल्य और हास-परिहास के संबंध की कल्पना तक नहीं की जा सकती। ऐसा कुछ करते ही उनकी भावनाएँ आहत हो जाती हैं। ऐसा कुछ करते ही वे असहिष्णु हो जाते हैं।
लेकिन सनातन परम्परा में यह सब कुछ सम्भव था। इसीलिए हमारे यहाँ ईश्वर को प्रतीक मानकर ख़ूब काव्य रचा गया। यदि हमारे यहाँ भी कट्टरता का रोग होता तो कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करनेवाले सूरदास को सूली पर चढ़ा दिया गया होता। कृष्ण की प्रेम लीलाओं का चित्रण करनेवाले रसखान की गर्दन काट दी गयी होती। बिलखते हुए राम से परिचय करानेवाले तुलसी लोकनिंद्य हो चुके होते। शिव की बारात का बखान करनेवाले पुराण निषिद्ध हो चुके होते।
यह सनातन परम्परा का ही कनवास है कि यहाँ नारद मुनि के हास्यबोध और परशुराम तथा दुर्वासा सरीखे क्रोधित ऋषियों की कथा एक साथ स्वीकार्य है। जहाँ इंद्र तक को उसकी ग़लती का एहसास कराने के लिए कृष्ण गौवर्द्धन उठाने से नहीं हिचकते। गौवर्द्धन की घटना ईश्वर की ओर से मनुष्यता को यह संदेश देती है कि देवराज होने से ही कोई हमेशा सही सिद्ध होने का अधिकारी नहीं बन जाता।
शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा करनेवाले कृष्ण जिस धर्म के पास हैं, उनको यदि ऐसा लगने लगे कि कोई बात, कोई परिहास, कोई उपालम्भ, कोई तर्क, कोई चर्चा उनके ईश्वर का अपमान कर सकती है तो यह उनकी नासमझी से अधिक कुछ नहीं है।
ईश्वर तो मान-अपमान से काफ़ी दूर निकल गया है। वह भक्त के निश्छल अपनत्व का छोर पकड़कर कठौती तक चला आता है। यह अपनत्व किसी भी भाव से पूर्ण हो सकता है। यहाँ तो शत्रुभाव से ईश्वर का स्मरण करने वाले रावण और कंस तक को तारने का रिवाज़ रहा है।
इसलिए इन दिनों जो लोग ईश्वर के सम्मान के ठेकेदार बने घूम रहे हैं, उनको स्मरण हो कि जब तक कट्टरता से बचा हुआ है तब तक सनातन धर्म का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता; और बाक़ी रही ईश्वर के सम्मान की बात तो उसकी चिंता ईश्वर पर छोड़ दें।
✍️ चिराग़ जैन