Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
सीमित संसाधनों में असीमित सुख भोगने का साधन है- प्रेम। भौतिकता और नैतिकता; इन दोनों की कुण्डली से मुक्त होकर निस्पृह विचरण का निमित्त है- प्रेम। क्रोध, मान, माया और लोभ -इन चारों से रहित होकर निश्छल हो जाने की अनुभूति है- प्रेम। अमूर्त को देख लेने की कला है- प्रेम।
प्रेम के पथ पर भाव ही भाव हैं; वहाँ अभाव जैसा कुछ है ही नहीं। यही कारण है कि जिसने प्रेम को जिया वह भावुक हो उठा। जिसने प्रेम को भोगा, वह आनन्दित हो गया। जिसने प्रेम को सुना, वह मौन हो गया। यही मौन प्रेम की गहनतम अनुभूति का पाथेय है।
जिसने सर्वश्रेष्ठ को सुन लिया, उसे उसमें अपनी आवाज़ मिलाने का ध्यान ही नहीं आ सकता। मुँह में गुड़ की डली घुल जावे, फिर कौन मूर्ख उसका स्वाद बताने में रस नष्ट करेगा! हाँ, उसके मुखमण्डल की भंगिमा का आलोक देखकर अन्यान्य लोग उसे अभिव्यक्त करने का अनुमान अवश्य लगाते हैं। लेकिन यह केवल अनुमान भर है।
प्रेम की अनुभूति तो पूर्णता की अनुभूति है। वहाँ कोई उद्देश्य शेष रह ही नहीं जाता। यश-अपयश; स्वीकृति-अस्वीकृति.. ये सब उस अनुभूति से पूर्व के चिंतन मात्र हैं। जिसने पा लिया; वह तो घुल गया उसमें। हम इधर बैठे अनुमान लगाते रह गए। जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैंठ… वह तो गहरे पानी पैंठ गया। और हम बावरे किनारे बैठकर लिखते रह गये कविता। बूझते रह गये पहेलियाँ। गढ़ते रह गये परिभाषा।
मीरा तो विलीन हो गयी। और हम इस पहेली में उलझे रह गये कि उसकी गुनगुनाहट ‘भक्ति’ है या ‘शृंगार’। सूर तो बिना आँखों के उसे देखकर निहाल हो लिये और हम उनकी रचनाओं में उसे ढूंढते रह गये। कबीर ने कुछ लिखा थोड़े ही। वह तो बावरा-सा उससे बतियाते हुए बड़बड़ाता रहा। और हमने उस बड़बड़ाहट को लिखकर दावा कर दिया कि हमने कबीर को सहेज लिया।
यह सब हमारा अंधविश्वास है। प्रेम की अनुभूति हम तक कभी आयी है तो हमने उसे अपनी व्यस्तताओं की चादर से ढँक दिया है। ऐसा नहीं है कि हमने प्रेम को जिया नहीं है। हमारे सम्मुख भी ऐसे अवसर अवश्य आए हैं कि प्रेम का अथाह सागर बाँहें फैलाये हमें समेटने को द्वार तक चलकर आया। लेकिन इस क्षण किसी ने बताया कि तुम पागल हो गये हो, और हमने पैर पीछे हटा लिये। यही तो अवसर था पागल हो जाने का। लेकिन हमें तो किसी ने समझाया और हम समझ गये… हम जैसे समझने को तैयार ही बैठे थे। …उफ़! यही समझना तो ख़तरनाक हो गया। इसी अवसर पर तो बुल्लेशाह हो जाने की ज़रूरत थी। …बुल्ले नू समझावण आइयां, बहना तें परजाइयां।
अच्छा हुआ कि बुल्लेशाह नहीं समझे। समझ जाते तो गये थे काम से। उन्होंने उस क्षण में अपने प्रेम की गोद में बैठकर बेफ़िक्री का उद्घोष कर दिया- ‘बुल्ला की जाणा मैं कौन?’ इस क्षण में समझानेवाले से उसकी पहचान नहीं पूछनी होती। यह क्षण तो ख़ुद को तलाशने का क्षण है। और जब प्रेम हमें चारों ओर से घेर ले तो बेफ़िक्री से गा उठो- ‘रब्ब दीआं बेपरवाहियाँ।’
बुल्लेशाह बहनों और परजाइयों की बात समझना तो चाहता है, लेकिन वो उस बुल्लेशाह को पहचान नहीं पा रहा है जिसे उनकी बात समझ आ सके। यहाँ, जहाँ वह पहुँच गया है, वहाँ बहुत सारे बुल्लेशाह हैं। बल्कि यूँ कहें कि सारे ही बुल्लेशाह हैं। बिल्कुल एक जैसे। यहाँ कोई दूसरा है ही नहीं। इसलिए इनमें से आपकी बात समझनेवाला बुल्लेशाह ढूंढा नहीं जा सकता। क्योंकि वहाँ तो सब एक ही हैं। …प्रेम गली अति साँकरी या में दो न समाय। फिर तो सभी अंतर मिट जाते हैं। स्त्री-पुरुष; जाति-धर्म; देह-विदेह; भक्त-भगवान सब एक हो जाते हैं। फिर कृष्ण, राधा के वस्त्र पहनकर नाच सकते हैं। फिर भगवान भी भक्त के पीछे दौड़ सकते हैं… पीछे-पीछे हरि फिरें।
यह सब शब्दातीत है। यह सब अमूर्त है। यह सब निराकार है। जाति, कुल, गोत्र, लाभ, हानि, नियम, युग, देश, धर्म… सबकी सीमाओं के पार। और इसे पाने के लिये कहीं जाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। यह तो ठीक वहीं तक चलकर आता है, जहाँ आप उपस्थित हैं। कहीं जाकर या कहीं होकर, इसे पा लेने की बातें कोरी अफ़वाह हैं।
यह इतना सहज है कि इसके अनुमान भर पर जो साहित्य रचा गया, उससे रस के अजस्र स्रोत फूट पड़े। प्रेम की समस्त कविताएँ इस अकथ अनुभूति का अनुमान भर हैं। यूँ समझ लो कि मिर्ज़ा के विश्वास पर चेनाब की धार में उतरने वाली सोहनी पार हो गयी और हम उसके कच्चे घड़े के साथ डूब गये। महसूस करो, कि जब उस डूबने की कथा में हमें इतना रस मिल रहा है तो जो पार हो गयी, उसको क्या मिला होगा!
हम तब से अब तक कहते फिर रहे हैं कि सोहनी कच्चे घड़े के भरोसे चेनाब में उतर गयी और डूब गयी। यह हमारी आँखों के द्वारा बोला गया झूठ है। भला घड़े के भरोसे कोई चढ़ती नदी की धार में उतरता है। ये नदी की धार, ये कच्चा घड़ा और ये डूबती हुई सोहनी… ये सब हमारी आँखों द्वारा फैलाई गई अफ़वाह हैं। नदी कहीं बाहर थी ही नहीं। नदी तो सोहनी के भीतर थी। उत्ताल तरंगों के ज्वार का वेग। प्रेम का अथाह सागर सोहनी के मन में लहरा उठा होगा। …इस सागर से पार उतरने के लिए कच्चे घड़े की नहीं, पक्के विश्वास की आवश्यकता होती है। उस दिन उस पार मौजूद मिर्ज़ा की आँखों में वह विश्वास दिखा होगा सोहनी को, और एक बार यह विश्वास दिख जावे, फिर घड़ा फूट सकता है, लेकिन विश्वास नहीं टूट सकता। प्रेम का विश्वास अनब्रेकेबल होता है। पूरा ब्रह्मांड थर्रा उठे तो भी प्रेम के विश्वास का पाँव नहीं हिल सकता।
इसीलिए सोहनी को डूबते देखकर जो साहित्य रचा गया उसे पढ़ने कभी न तो सोहनी आई, न महिवाल। वो तो उतर गये पार। और हम टूटे घड़े के टुकड़े उठाकर साहित्य रचते रह गये। ‘बाणोच्छिष्टम् जगत्सर्वम्’ -संस्कृत की इस उक्ति को जब मैंने पढ़ा तब समझ न सका था। लेकिन जब मैंने बाणभट्ट का साहित्य पढ़ा तो इसका अर्थ ज्ञात हुआ। आज यही उक्ति मैं प्रेम के संदर्भ में कहता हूँ- ‘प्रेमोच्छिष्टम् सरस सर्वम्!’ जो भी कुछ सरस है, वह प्रेम की जूठन है। मूल स्रोत तो कहीं पुण्डरीक की प्रतीक्षा में बसा हुआ है। वह तो कादम्बरी के सौंदर्य में बिंधा धरा है। और हम पत्रलेखा-सी परिचारिका की भाँति प्रयासरत हैं।
लेकिन यह प्रयास भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। प्रेम की ये कविताएँ भी किसी-किसी क्षण आपके भीतर स्थित अनुभूति की इस कुंडलिनी को जागृत कर सकती हैं। इन्हीं प्रयासों में कभी कोई देवल आशीष लिख बैठता है कि ‘मैंने धरती को दुलराया, तुमने अम्बर चूम लिया।’ यह साधारण पंक्ति नहीं है। यह लहरों में समाती किसी सोहनी के उस पार उतर जाने की गवाही का प्रयास है। इन्हीं प्रयासों में कभी कोई महादेवी वर्मा कह लेती हैं कि ‘जो तुम आ जाते एक बार, कितनी करुणा, कितने संदेश, पथ में बिछ जाते बन पराग’ -यह पंक्ति भी साधारण नहीं है। यह शबरी की प्रतीक्षा में व्याप्त राम के विश्वास की मुहर है। यह उस एक क्षण की यूएसपी है, जिसके लिए कोई जीवन भर बेर चुन-चुनकर प्रतीक्षा कर लेता है।
इन्हीं प्रयासों में माया गोविंद लिख पाती हैं कि ‘आशाएँ अलख जगाती हैं, बीमार कल्पना के द्वारे।’ -यह पंक्ति प्रेम की अनुभूति का कुछ अधिक स्पष्ट झरोखा है। कल्पना की बीमारी को भाँपकर आशाओं की अलख देखने में कवयित्री सफल हुई हैं। प्रेम के महीन परत को उघाड़कर देख लेने में कवयित्री सफल हुई हैं।
यह परत शृंगार की रचनाओं में ही उघड़ पाए… ऐसा कतई आवश्यक नहीं है। यह कहीं भी सामने आ जाती है। क्षण मात्र के लिए जब ‘वह तोड़ती पत्थर’ में भी यह परत उघड़ती दिखाई देती है तो इसको जीनेवाले निराला की आँखें यकायक लाल होते हुए भीग जाती हैं। लेकिन ‘सरोज-स्मृति’ के निराला की आँखें यकायक लाल नहीं होतीं, उनके अश्रुओं का रंग धीरे-धीरे गुलाबी होता है और फिर उनका मन नीला पड़ जाता है।
पर ये सभी रंग जिस इंद्रधनुष से फूट रहे हैं, वह सतरंगा इन्द्रधनु प्रेम के क्षितिज पर ही उभरता है। जिस रचनाकार ने एक बार इस क्षितिज पर टकटकी लगा दी, उसके लिये फिर रस की कोई कमी न रही। कल्पना के पंख लगाकर स्वयं को विहग कर लेना जिसने सीख लिया, उसी को प्रेम का विहंगम दृश्य देखना नसीब हो सका। फिर मेघदूत का यक्ष अपने चारों ओर विस्तृत प्रकृति में प्रिया के दर्शन कर पाता है। फिर मेघ के हाथों संदेशा भेजा जा सकता है। फिर वाल्मीकि आश्रम में बैठकर यह अनुमान किया जा सकता है कि द्रोणाचल से फूटते झरनों का दृश्य कैसा रहा होगा। फिर कलयुग में बैठकर यह भाँपा जा सकता है कि वाटिका में राम से नयन मिलने पर सीता कैसे लजा गयी होंगी। फिर बेर की कँटीली झाड़ियों से जूठी मिठास सहेजकर प्रेम के अपूर्व बिम्ब रचे जा सकते हैं। फिर विदुरानी खाद्य और अखाद्य का भेद भूल सकती हैं।
फिर हवा के स्पर्श से कँपकँपाती पाँखुरी की आवाज़ स्पष्ट सुनाई देने लगती है। फिर किसी मीठी याद में गड़ा तिनका बरसों बाद भी कविता की याद में चुभ सकता है। फिर देवता के गुनाह में भी पारलौकिक प्रेम के दर्शन किये जा सकते हैं। फिर सब कुछ देखा जा सकता है। फिर सब कुछ जाना जा सकता है।
हज़ार कवि प्रेम के इस मार्ग पर चलते हैं तो उनमें से कोई एकाध ही देह के पार पहुँचकर प्रेम-वैभव तक पहुँचने वाली राह को स्पर्श कर पाते हैं। और इस राह को स्पर्श करने वाले हज़ारों कवियों में कोई एकाध ही विदेह के भी पार पहुँचकर प्रेम को स्पर्श करने में सफल होता है। और ये एकाध ही कबीर, मीरा, सूर, बुल्लेशाह होकर अपनी अनुभूतियों की गूंज से युग-युग तक प्रेम का स्मरण कराते रहते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
‘रमेश मुस्कान’ -यह किसी व्यक्ति का नहीं, एक प्रवृत्ति का नाम है। ज़िन्दगी उन्हें कितनी ही सैड सिचुएशन दे, वे उसको ठहाके की ओर मोड़कर उसका ‘दी एन्ड’ करने में माहिर हैं।
कई बार कुछ लोगों को देखकर ऐसा लगता है कि इनके जीवन में कोई चुनौती, कोई परेशानी है ही नहीं। लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इन लोगों की आँखों का निचला हिस्सा ढेर सारा पानी रोके हुए है। निरंतर ठहाके लगाकर ये लोग अपनी अलकों के बांध से उस पानी को रोके रखने में सफल हो जाते हैं।
इनके ठहाके इतने प्रभावी इसलिए होते हैं कि इनमें बनावट की कोई गुंजाइश नहीं होती। हँसने के लिए मनुष्य का अतिरिक्त बुद्धिमान होना आवश्यक है। यदि आपमें लतीफ़ा समझने जितनी बुद्धि न हो तो लतीफ़ा आपके होंठों पर हँसी रखने की बजाय पेशानी पर परेशानी रख देगा।
ज़िन्दगी भी हमें हर घड़ी लतीफ़ा सुना रही होती है। मुझ जैसे मूर्ख लोगों को वह लतीफ़ा समझ नहीं आता और मैं उसे समझने की जुगत में परेशान दिखने लगता हूँ। बाद में जब परिस्थिति बीत जाती है तब मैं उसी बात पर ख़ूब हँसता हूँ, जिसने मुझे कभी परेशान किया था। रमेश मुस्कान सरीखे लोगों का आई-क्यू लेवल इतना हाई है कि ये ज़िन्दगी के लतीफ़े को झटपट समझ लेते हैं और हमेशा ज़िन्दगी के साथ खिलखिलाते हुए पाए जाते हैं।
कुछ वर्ष पहले रमेश मुस्कान का भयंकर एक्सीडेंट हुआ। टक्कर इतनी भयावह थी कि एक टांग की हड्डी दल बदलकर कूल्हे की हड्डी में घुस गयी। डॉक्टर साहब ने भूलवश एनेस्थीसिया की दवा का असर पूरी तरह होने से पहले ही सर्जरी शुरू कर दी। दर्द की इस चरम सिचुएशन में डॉक्टर को अपने होशो-हवास की इत्तला देने की बजाय ये ऋषिकेश मुखर्जी इस बात की प्रतीक्षा करते रहे कि डॉक्टर को हँसाने का अवसर कब मिलेगा। कुछ समय बाद डॉक्टर साहब किसी बात से परेशान होकर अपने सहायक पर झल्लाने लगे। रमेश जी झट से बोल उठे- ‘डॉक्टर साहब, मैं कुछ हेल्प कर दूँ?’
एक क्षण के लिए डॉक्टर सन्न रह गया और फिर दोबारा एनेस्थीसिया लगवाकर सर्जरी को आगे बढ़ाया। लेकिन इस एक पंक्ति ने ऑपरेशन थियेटर के सारे तनाव को छू-मंतर कर दिया।
आर्थिक चुनौती हो या व्यावसायिक चुनौती; रमेश मुस्कान हर स्थिति में मस्त रहने की कला जानते हैं। उनके साथ वक़्त गुज़ारना किसी पैट्रोल पम्प पर अपनी ऊर्जा का टैंक फुल कराने जैसा अनुभव है। उनकी सलाह हमेशा लाजवाब होती है क्योंकि वे चश्मा आँखों पर नहीं, माथे पर लगाए फिरते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
‘सत्ता का खेल तो चलेगा। सरकारें आएंगी-जाएंगी। पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतन्त्र अमर रहना चाहिए। क्या आज के समय में ये कठिन काम नहीं हो गया है? ये चर्चा तो आज समाप्त हो जाएगी। मगर कल से जो अध्याय शुरू होगा, उस अध्याय पर थोड़ा ग़ौर करने की ज़रूरत है। ये कटुता बढ़ना नहीं चाहिए।’ -पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के ये शब्द आज भी रह-रहकर हमारे कानों में गूंजते हैं।
सोशल मीडिया के इस दौर में वितण्डावाद का जो ताण्डव हम दिन-प्रतिदिन देख रहे हैं, उसके अंत में हमारे पास कटुता के अतिरिक्त कुछ शेष न रह जाएगा। राजनैतिक दलों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर जिस तरह से एक पूरी पीढ़ी की सोच को सीमित करने का प्रयास किया है, वह पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के स्वर में वर्णित ‘लोकतंत्र’ की परिकल्पना के विपरीत आचरण का मार्ग है। मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि यह प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक राजनैतिक दल की है।
रामायण ने हमें सिखाया है कि शत्रु जिस द्वार से आक्रमण करेगा, समाधान भी उसी द्वार से आएगा। यही कारण है कि लक्ष्मण मूर्च्छित हुए तो वैद्य सुषेण भी उसी लंका से उपचार के लिए आए, जिससे मेघनाद आया था।
यदि हम आज से ही सोशल मीडिया का प्रयोग करते समय कुछ बातों का पालन करना प्रारंभ करें तो शायद इस माध्यम का प्रयोग करके प्रोपेगैंडा करने वाली सभी एजेंसियाँ हतोत्साहित होंगी। फिर देशहित की बात करने पर जब कोई आप पर तंज करेगा कि आप राजनैतिक माहौल सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं; तो आप उसे बता सकेंगे कि हम अफवाह के उस तंत्र की जड़ खोद रहे हैं, जिसकी डालियों पर सामाजिक विघटन के फल लगते हैं।
1. यदि जन-सामान्य की समस्या से जुड़ी अथवा लोकतंत्र की समालोचना से संबंधित किसी पोस्ट को अमुक राजनैतिक दल का ‘विरोध’ सिद्ध करने का प्रयास किया जाए तो ऐसे कमेंट्स को इग्नोर करेंगे। उन्हें उत्तर देते ही आप उन्हें सफल कर देंगे क्योंकि उनका उद्देश्य ही यह है कि आप विषय को भूलकर स्वयं को निष्पक्ष साबित करने में व्यस्त हो जाएँ।
2. अश्लील, अभद्र तथा असंसदीय शब्दावली का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को (भले ही वह आपकी पोस्ट के समर्थन में हो) तुरंत ब्लॉक करेंगे।
3. किसी भी सम्प्रदाय की आड़ में कट्टरता, अराजकता और हिंसा का समर्थन करनेवाले व्यक्ति की पोस्ट/कमेंट को इग्नोर करेंगे।
4. उन फेक प्रोफाइल्स की पहचान करके उन्हें अपनी मित्रता सूची से बाहर करेंगे, जिनका निर्माण ही किसी दल अथवा विचारधारा के प्रचार हेतु किया गया है। ध्यान से देखने पर आप समझ जाएंगे कि ऐसी प्रोफाइल्स पर डीपी से लेकर वॉल तक कहीं भी प्रोफ़ाइल होल्डर की पहचान नहीं मिलती। इनकी वॉल पर या तो डीपी चेंज नोटिफिकेशन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा या फिर राजनैतिक दलों के प्रोपेगेंडा पेज से शेयर करके लाई गई पोस्ट्स होंगी। ये ही वो प्रोफाइल्स हैं जिनके दम पर राजनैतिक दल अफवाह और झूठ फैलाने तथा मुद्दों से भटकाने में सफल होते हैं।
5. किसी भी राजनेता के निजी जीवन में प्रवेश करके उसकी चरित्र हत्या को ‘आलोचना’ का नाम देने वाली पोस्ट से दूरी बनाए रखेंगे। क्योंकि किसी की निजता का सम्मान न किया गया तो भविष्य में कोई भी समाज के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं करेगा।
6. किसी राजनेता का नाम बिगाड़कर, या उसे फेंकू, तड़ीपार, पप्पू, टोंटीचोर आदि नाम से संबोधित करनेवालों को दूर से प्रणाम करेंगे क्योंकि इनके पास कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक समझ नहीं है, ये लोग सुनी-सुनाई अभद्रता से विषय को भटकाना चाहते हैं।
7. किसी भी राजनेता की बीमारी, चोट, कद-काठी, लिंग, जाति, धर्म, रंग, चेहरा-मोहरा और बोली का उपहास करके मूल विषय को भटकाने के प्रयासों से सावधान रहेंगे क्योंकि हमें राजनेताओं से जनता का नेतृत्व करवाना है, उनसे पारिवारिक सम्बंध नहीं जोड़ना है।
8. टीवी डिबेट में अलग-अलग राजनैतिक दलों के प्रवक्ता जिन जुमलों से बहस को नष्ट कर देते हैं, उन जुमलों से अपनी पोस्ट्स और कमेंट बॉक्स को बचाएंगे।
9. वर्तमान अथवा भविष्य के प्रश्न को इतिहास, जाति अथवा सम्प्रदाय पर अटकाकर नष्ट करने वालों को उत्तर देने में ऊर्जा ध्वंस नहीं करेंगे।
10. फेसबुक पर कुछ भी लिखने से पूर्व यह विचार अवश्य करेंगे कि इससे किसी प्रकार से मनुष्यता अथवा लोकतंत्र तो आहत नहीं हो रहा।
ये नियम यदि हमने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से पालन करने आरम्भ कर दिए तो मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि आप बहुत जल्दी ही अपने समाज को सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाए जा रहे वितण्डों से मुक्ति होता देखेंगे।
और एक अंतिम बात- अपने रक्त संबंधों; पारिवारिक मित्रों; सहकर्मियों; सहयात्रियों अथवा संबंधियों से चर्चा करते समय यदि अपने पक्ष और संबंध में से किसी एक को चुनना पड़े तो संबंध को बचाएंगे क्योंकि जो हमारे अपने हैं, वो आज नहीं तो कल हमारे साथ अवश्य खड़े होंगे।
भारत एक ऐसा उपवन है जहाँ अलग-अलग रंग के फूल खिलते हैं। हमें उन व्यापारियों की कोई ज़रूरत नहीं है, जो फूलों को डालियों से अलग करके बाज़ार में बेच दें। हमें तो वह माली चाहिए जो अलग-अलग रंग के फूलों को करीने से लगाकर बगीचे की सुंदरता बढ़ा सके।
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✍️ चिराग़ जैन
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भारतीय जनता पार्टी के चुनावी चाणक्य बाक़ायदा मीडिया के सामने बैठक बुलाकर यह बताते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का वोट अपनी ओर मिलाने के लिए वे जाट नेताओं को माना रहे हैं।
बहुजन समाज पार्टी घोषणा करके दलितों की पार्टी होने का दावा करती है। एआईएमएम घोषित करती है कि वह मुसलमानों की पार्टी है। शिवसेना डंके की चोट पर ख़ुद को हिन्दू समाज की पार्टी बताती है। शिरोमणि अकाली दल के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि वह सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है।
और यह सब तब जबकि हमारे यहाँ संवैधानिक रूप से धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर कोई राजनैतिक दल गठित नहीं किया जा सकता।
आज जब दिल्ली में जाटों की मनुहार चल रही थी तो उस पंचायत में भाग लेने के लिए माननीय गृहमंत्री जी गणतन्त्र दिवस की परेड से सीधे वहाँ पधारे थे। बाद में टीवी चौनल्स पर जाट नेता सर-ए-आम बता रहे थे कि जाट किस दल को वोट देंगे। और यह सब तब जबकि हमारा संविधान हमें बताता है कि भारत में गुप्त मतदान प्रणाली है और किसी भी मतदाता पर न तो किसी को मत देने के लिए दबाव बनाया जा सकता है न ही उससे पूछा जा सकता है कि वह अपने मताधिकार का प्रयोग किसके पक्ष में करेगा!
इन सब विरोधाभासों को देखता हूँ तो समझ आता है कि भारतीय लोकतंत्र एक ऐसा ढकोसला बनकर रह गया है जिसकी गरिमा को तार-तार करने में पूरा तंत्र समान रूप से सक्रिय है। सभी राजनैतिक दल भारतीय लोकतंत्र को बाल पकड़कर घसीटते हुए जुआघर में लाते हैं और बारी-बारी से उसका चीरहरण करते हैं। बस अंतर इतना है कि जब एक पक्ष चीरहरण कर रहा होता है तो दूसरा पक्ष पांडवों के कपड़े पहन लेता है और जब दूसरा पक्ष चीरहरण में संलग्न होता है तो पहला पक्ष लपक के उसके कपड़े लपेटकर नैतिक होने का अभिनय करने लगता है।
लोकतंत्र बेचारा ईश्वर से गुहार लगाता है। बीस-तीस वर्ष की गुहार के बाद ईश्वर तो नहीं आता लेकिन ईश्वर का गेट-अप पहनकर कोई आता है और दोनों पक्षों को तितर-बितर करके ख़ुद चीरहरण करने लगता है। सभागार में बैठे राजा से लोकतंत्र इसलिए कुछ नहीं कह पाता, क्योंकि राजा की आँखों पर लोकतंत्र ने ख़ुद अपने हाथों से पट्टी बांधी है।
सभा में कुछ विदुर भी हैं। जो इस चीरहरण पर दोनों पक्षों से प्रश्न करता है। लेकिन दोनों पक्ष चीरहरण की अनैतिकता पर उत्तर देने की बजाय विदुर से प्रतिप्रश्न करते हैं कि जब उस पक्ष वाले चीरहरण कर रहे थे तब तुम कहाँ थे?
विदुर बताता है कि मैं उनसे भी प्रश्न कर रहा था। लेकिन वे उसकी बात नहीं मानते और उसके प्रत्येक प्रश्न पर प्रतिप्रश्न उछाल कर उसे लोलक की भाँति इधर-से-उधर दौड़ाते रहते हैं।
इस भागदौड़ से परेशान होकर कभी-कभी विदुर किसी एक पक्ष के साथ चीरहरण में शामिल हो जाता है और जो विदुर ऐसा नहीं कर पाता वह इस गुत्थी को सुलझाने में उलझ जाता है कि दोनों में से कौन सा पक्ष अधिक बेहतर है। वह जिसने एक ही झटके में लोकतंत्र को निर्वस्त्र कर दिया, या फिर वह जिसने तड़पा-तड़पा के हलाल स्टाइल में कपड़े उतारे।
आज गणतंत्र दिवस के दिन यह लिखते हुए मेरे भीतर एक सिहरन हो रही है कि इस देश के गणतंत्र पर राजनीति का घुन लग चुका है। बेशर्मी और ढिठाई से दल बदलने वाले लोग; अपनी कही हुई बात से पलट जाने वाले लोग; जिसे गाली दें, स्वार्थ के लिए उसके गले लग जाने वाले लोग; जिसकी उंगली पकड़ कर चले, उसे लात मारने वाले लोग; रंगे सियारों की तरह अपने मुंह में तिनके ठूस कर मौक़ा मिलते ही हुआ-हुआ करने वाले लोगों में से भारतीय समाज का भविष्य तलाश पाना लगभग असंभव हो चुका है।
चुनाव के इस भौंडे नाटक के बीच भारतीय जनमानस के भविष्य पर कालिख पोती जा रही है। लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि यदि एक व्यक्ति भी इस लेख से यह समझ सका कि जिन राजनैतिक सियारों के स्वर में स्वर मिलाकर हम अपने आंगन में विष बो रहे हैं, उनका न हो हमारे धर्म से कोई सरोकार है, न हमारे वंशजों से, न हमारे भविष्य से और न ही हमसे; तो मुझे लगेगा कि अभी इस राष्ट्र की राजनीति को यह भय दिखाया जा सकता है कि जनता का विवेक अभी मरा नहीं है।
© चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
वोटिंग के दिन उंगली पर जो स्याही का निशान बनता है, वही निशान एक दिन लोकतन्त्र का राजतिलक सिद्ध होगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji
चाहे झूठ बोल के, चाहे भेद खोल के
लेते आना, टिकट लेते आना
तुम साइकिल पर पर चढ़ जाना
इक टोपी लाल लगाना
थोड़ा डण्ड पेल के
थोड़ा दण्ड़ झेल के
लेते आना
टिकट लेते आना
तुम कमल का फूल खिलाना
पूरे भगवा रंग जाना
जय श्री राम बोल के
जट श्री श्याम बोल के
लेते आना
टिकट लेते आना
तुम बिन मतलब ही लड़ना
पंजे की उंगली पकड़ना
बिंदी साथ लेके
चूड़ी हाथ ले के
लेते आना
टिकट लेते आना
जनता की बात न करना
असली मुद्दों से बचना
कभी जेब फाड़ के
कभी झोला झाड़ के
लेते आना
टिकट लेते आना
✍️ चिराग़ जैन