Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
होली; मनुष्य को भीतर से बाहर तक एकरूप कर देने का त्योहार। होली; अलग-अलग रंगों के एकरंग हो जाने का अवसर। होली; शालीनता और नैतिकता के बोझ को किनारे रखकर कुछ क्षण स्वाभाविक हो जाने का पर्व। होली; सभ्यता के आडम्बर से मुक्त होकर सहजता की धारा में डुबकी लगाने का रिवाज़।
होली के दिन आपमें कृष्ण साकार होते हैं। मैं बचपन से कृष्ण के दैहिक वर्ण का विचार करता रहा हूँ। सुविधा के लिए साँवरे के विग्रह को काले या नीले रंग से दिखाने की परम्परा है किन्तु मैंने अपने आसपास इतना काला या ऐसा नीला रंग किसी मनुष्य की काया का देखा नहीं है।फिर एक दिन होली खेलते समय मुझे अनुभूत हुआ कि गुलाबी, बैंगनी, हरा, लाल, पीला, नीला और भगवा रंग जब स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे में समाहित हो जाते हैं तो इस सम्मिलन से जो अनोखा सा रंग चढ़ता है, वही साँवरे का रंग है। जिसके लिए रंग शास्त्रियों ने कोई नाम तय नहीं किया है। यही साँवरा है। यही कन्हैया है। यही ब्रज का रंग है। यही फागुन का रंग है।
नियम और नीतियों ने नाप-तोलकर जिस मनुष्य को सभ्यता के शोकेस में सजा रखा है, उसको कुछ क्षण के लिए मन से जीने का अवसर देता है, होली का त्योहार। विवशता के रिंग मास्टर ने जिस शेर को सर्कस का जोकर बनाकर छोड़ दिया है, उसे एक बार पूरे सिंहत्व के साथ जंगल में दहाड़ने का मौक़ा देता है होली का पर्व।
नीतियों के इशारे पर किसी मशीन की तरह जिये जा रहे इंसान को एक बार उच्छृंखल होने का निमंत्रण देता है होली का दिन। अपने भीतर घुट रहे पागलपन को बाहर निकाल फेंकने का महोत्सव है होली।
हज़ारों वर्ष तक सभ्यता लपेटे घूम रहे व्यवस्थितों को देखकर शनैः-शनैः हमारा पूरा समाज सभ्यता लपेटकर घूमने लगा। जो पदार्थ कम उपलब्ध हो उसकी क़ीमत बढ़ने लगती है। प्राकृतिक रूप से जी रहे मानव ने जब करीने के परिधान से सज्ज मानव देखे होंगे तो उन जैसा बनने की होड़ लग गई होगी। यह होड़ बहुत ख़तरनाक होती है। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरा समाज सभ्यता ओढ़कर घूमने लगा।
मानव इस हद्द तक सभ्य हो गया कि सभ्यता से ऊब होने लगी। इसलिए ज्यों ही होली पर कोई शंकर जी का बाराती बना बेलौस दिखाई देता है तो हम तुरंत उसकी देखादेखी अपना सभ्यता का आवरण उतार फेंकते हैं।
सभ्य से सभ्य मनुष्य भी जिस क्षण झिझक का खोल तोड़ता है ठीक उसी क्षण वह पूर्णतया प्राकृतिक हो उठता है। शादी-ब्याह में जब नाचने का अवसर आता है तो सभ्यता की झिझक से बंधे लोग किनारे खड़े तरसते रहते हैं और झिझक छोड़कर सहज हुए मनुष्य बेतरतीब नाचने लगते हैं। इस झिझक ने हमें अनेक आनन्दों से वंचित किया है।
होली इस झिझक के खोल से बाहर निकलने का महोत्सव है। चुटकी, रंगबाज़ी, हुड़दंग, ठिठोली, छेड़छाड़, मज़ाक़, गाली-गलौज… ये सब सभ्यता और नैतिकता के व्यामोह को ग़ायब कर देते हैं। हाइजीन-कॉन्शियस लोग जब रंगे हुए हाथों और पुते हुए दाँतों से गुंजिया खाते हैं तो मैनर्स का भूत किसी फटे हुए गुब्बारे-सा ज़मीन पर लोटता दिखाई देता है।
अनावश्यक संबोधनों पर अपनत्व की गालियाँ हावी होने लगती हैं। कल्फ़ लगे कपड़े पहननकर एटिकेट्स के साथ साइलेंटली चलने-फिरने वाले पुतले यकायक भीगे, फटे और रंगे हुए कपड़ों में नाचते हुए सड़कों पर जीवंत हो उठते हैं।
मोबाइल के स्पीकर को होंठों से चिपकाकर न्यूनतम स्वर में बात करने वाले जेंटलमैन अपने गले को लाउडस्पीकर बनाकर जब हो-हल्ला करते हैं तो आवाज़ अपना वास्तविक अर्थ ग्रहण करती है।
होली का यह अवसर हँसने का अवसर होता है। जो दिखे, उस पर हँसी छूट जाती है। और आनन्द यह कि जब हम उस पर हँसने के लिए दाँत निकालते हैं तो हमारे दाँतों की शेड देखकर वह हम पर हँसने लगता है। उसे स्वयं पर हँसते देखकर हम और हँसते हैं।
अपमान, उपहास, बेइज़्ज़ती, इन्सल्ट और ईगो जैसे शब्द इस समय बेमआनी हो जाते हैं। नियमों की क़ैद से मुक्त होकर पूरा वातावरण ठहाके लगाने लगता है। छद्म शालीनता रंगों की बरसात में धुल जाती है। हवा में उड़ता गुलाल बालों के बीच विराजने लगता है तो सिर पर चढ़ चुका ‘लोग क्या कहेंगे’ का भय भाग जाता है।
कदाचित भारत के अतिरिक्त भी कुछ समाज, मनुष्य के भीतर के पागलपन को बाहर निकालने के लिए कोई आयोजन करते हैं; किन्तु संबंधों के भीतर पनप गयी कुंठाओं को उखाड़ फेंकने के लिए होली से बेहतर कोई अन्य अवसर किसी के पास नहीं है।
अगर आपने अब तक होली से परहेज किया है और आज तक स्वयं को इस उत्सव-धारा से अछूता रखा है तो मुट्ठी में अबीर लेकर अपनी ही उंगलियों से ख़ुद के गालों पर लगा लो… आपको ख़ुद से मुहब्बत हो जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Hasya Kavita, Poetry
होली के हुड़दंग में
रंग में भंग पड़ गयी
इधर ठण्डाई गले से नीचे उतरी
उधर भांग सिर पर चढ़ गई
भोले की बूटी ने ऐसा झुमाया
कि हाथ को लात
और सिर को पैर समझ बैठा
चूहा भी ख़ुद को शेर समझ बैठा
नशे की झोंक में लफड़ा बड़ा हो गया
पत्नी के सामने तनकर खड़ा हो गया
पत्नी ने आँखें दिखाई
तो डरने की बजाय अकड़ने लगा भाई
तू क्या समझती है
तेरी आँखों से डर जाऊंगा
तू जो कहेगी, वो कर जाऊंगा
ख़ुद को बड़ी होशियार समझती है
मुझे अनाड़ी, मूरख, गँवार समझती है
अरे, तेरी बेवकूफियों को हज़ारों बार इग्नोर कर चुका हूँ
क्योंकि तुझसे शादी करके
सबसे बड़ी बेवकूफी तो मैं ख़ुद कर चुका हूँ
जब नशा उतरा
तो उसकी दुनिया का पूरा भूगोल डोल गया
लेकिन मन ही मन ख़ुश था
कि नशे में ही सही
एक बार तो पत्नी से सच बोल गया।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
जीत और हार के शोर-शराबे के बाद यकायक राजनैतिक गलियारों में सन्नाटा पसर गया है। जीतनेवाले इतने स्पष्ट बहुमत से जीते हैं कि मीडिया के पोस्ट इलेक्शन अलायंस और हॉर्स ट्रेडिंग जैसे कैप्सूल धरे के धरे रह गये हैं।
यही स्पष्ट बहुमत वर्तमान लोकतंत्र की दरकार है। आरोप-प्रत्यारोप जैसे तमाम हो-हल्ले पर चुनाव परिणाम ने पूर्णविराम लगा दिया है।
इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि अब जीतनेवाले सरकार चलाएँ और बाक़ी सबकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गयी। जो नहीं जीत सके हैं, उनका उत्तरदायित्व अब और अधिक हो गया है। विपक्ष लोकतंत्र को आकार देनेवाली हथेली है। यदि विपक्ष अपना काम ठीक से न करे तो सत्ता के चाक पर घूमती सरकार बेतरतीब आकार लेने लगेगी।
वर्तमान राजनैतिक चर्चाओं में विपक्ष को सरकार का शत्रु मानने की परंपरा चल निकली है, जबकि विपक्ष लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण अंग होते हुए प्रकारांतर से सरकार का हिस्सा ही है।
विपक्ष को यह समझना होगा कि उसकी भूमिका चाक पर घूमती मिट्टी को लोई को आवश्यक छुअन और दबाव से सार्थक आकार देने तक सीमित है। यदि हथेली मिट्टी की लोई को हटाकर स्वयं चाक पर घूमने का प्रयास करेगी तो स्वयं भी घायल होगी और भविष्य के निर्माण को भी ध्वस्त कर देगी।
इसी प्रकार सरकार को भी यह समझना होगा कि तेज़ गति से घूमती लोई पर यदि कोई अंगुली का दबाव महसूस होने लगा है तो इसका अर्थ है कि अब तंत्र के एक निश्चित आकार में ढलने का समय आ गया है।
हथेली मिट्टी से स्वयं को रिप्लेस न करे और मिट्टी हथेली की छुअन से परहेज न करे तो लोकतंत्र के चाक की गति निर्माण का कारण बन जाएगी।
जनता ने विधायिका की नियुक्ति कर दी है। अब इसके बाद जनता का भाजपाई, कांग्रेसी, सपाई, बसपाई, आपिया या अकाली होना समीचीन नहीं है। अब जनता को भी जनता होकर हर जीते हुए प्रत्याशी को अपना प्रतिनिधि मानकर उसे तंत्र के प्रचालन का अधिकार देना होगा। अब हर जीते हुए प्रत्याशी को भी जनता को ‘पाँच वर्ष के लिए अनावश्यक’ समझने की बजाय सर्वाेच्च सत्ता समझते हुए प्रत्येक निर्णय से पूर्व इस सर्वाेच्च सत्ता के प्रति उत्तरदायित्व बोध से युक्त रहना होगा।
-सत्ता को यह मानना होगा कि सवाल पूछनेवाला हर व्यक्ति सरकार का विरोधी नहीं है।
-विपक्ष को यह मानना होगा कि सरकार के प्रत्येक निर्णय का विरोध आवश्यक नहीं है।
-जनता को यह जानना होगा कि विपक्ष के अभाव में कोई भी सत्ता जनता की बात नहीं सुन सकती।
-मीडिया को यह समझना होगा कि हर बुलेटिन में शोर भर देने का नाम पत्रकारिता नहीं है।
-साहित्य को यह स्वीकारना होगा कि नारे, जयकारे, आरती, चालीसा और गाली को कभी साहित्य नहीं कहा जाएगा।
© चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
चल पड़ी ससुराल बिटिया सज-सँवर के
मन बिलखकर रह गया इस पल अचानक
देहरी की आँख नम होने लगी है
मौन रहने लग गयी साँकल अचानक
याद आता है अभी कल ही हमारी
गोद में इक पाँखुरी सी आई थी तुम
बस अभी कल ही कोई साड़ी पहनकर
देखकर दर्पण बहुत इतराई थी तुम
लांघकर बचपन, हुई थी तुम सयानी
याद आने लग गया वो पल अचानक
जो चहकती थी सुबह से शाम घर में
आज वो चिड़िया पराई हो रही है
ख्वाहिशें घूंघट के नीचे छिप गयी हैं
नाज-नखरों की विदाई हो रही है
साध ली सिंदूर ने कलकल समूची
और गुमसुम हो गयी पायल अचानक
लाड़ इक विश्वास के आगे झुका है
भाग्य के हाथों तुम्हारा हाथ है अब
उम्र भर का पुण्य जो कुछ है हमारा
हर क़दम पर वह तुम्हारे साथ है अब
दिल बिना धड़कन, ठिठककर थम गया है
आँख से चोरी हुआ काजल अचानक
सात फेरों का सफ़र पूरा हुआ है
है पराया आज अपनापन हमारा
एक नग अधिकार पीछे रह गया है
घर तुम्हारा, बन गया पीहर तुम्हारा
याद की गठरी टटोले जा रहे हम
हो गई तुम आँख से ओझल अचानक
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
पानी के बतासे, पुचका, गुपचुप, टिकिया और न जाने क्या-क्या नाम हैं इस चटखारे का। हर गली-नुक्कड़ पर कोई चाट का ठेला इस अनोखे व्यंजन के बिना पूरा नहीं होता।
सूजी और आटे की छोटी-छोटी करारी पूरियों को फोड़कर उनमें आलू-चने और सोंठ का मसाला भरकर जब तक गोलगप्पे वाला उसे किसी बर्तन की तरह चटपटे पानी में डुबोकर आपके दोने में रखता है तब तक उस गोलगप्पे जितना ही पानी आपके मुँह में भी आ चुका होता है।
अपनी पूरी क्षमता से मुँह फाड़कर आप इस चटक स्वाद को मुख के भीतर तक ले जाते हैं और फिर बाहर टपकती पानी की बून्द को तेज़ी से भीतर सुड़कते हुए पुचके का पूरा-पूरा आनंद उठाते हैं।
इस क्षण में गोलगप्पे का करारा खोल आपके मुँह में किसी टेस्ट-बम की तरह फट जाता है… उसके भीतर भरा मसाला और पानी सूनामी की तरह आपके टेस्ट-बड्स को सराबोर करने लगता है… आपकी जीभ के अग्रभाग में पानी का तीखापन, पार्श्व में सोंठ की मिठास और जीभ के नीचे इमली और अमचूर की खटास एक साथ ताण्डव करने लगती है। इस महोत्सव की धमक आपके चेहरे को लाल कर देती है और आँखों में एक चटपटी नमी उतर आती है।
शायद विश्व की अन्य कोई भी डिश एक साथ सारे टेस्ट बड्स को इतनी जल्दी एक्टिव नहीं कर पाती। यही कारण है कि हमारे देश में कहीं भी चले जाओ, गोलगप्पे लड़कियों की पहली पसंद हैं। हर चाट के ठेले पर हर उम्र की महिला आपको गोलगप्पाज़ खाती दिख जाएंगी।
पुरुषों को भी गोलगप्पे ख़ूब लुभाते हैं, लेकिन मैं ऐसे कुछ पुरुषों को जानता हूँ जिन्हें बाज़ार में ठेले पर खड़े होकर पुचका खाते संकोच होता है इसलिए वे जब भी किसी विवाह-पार्टी में जाते हैं तो सबसे पहले ‘पानी के बतासे’ का काउंटर लपक लेते हैं।
कुल मिलाकर, गोलगप्पा एक समग्र स्वाद का उदाहरण है। यह गोल होता है और गप्प से न खाएँ तो मुँह के बाहर ही फूट सकता है; इसलिए इसे गोलगप्पा कहा जाता है। मुँह में पहुँच कर यह पुचक कर फूटता है, इसलिए इसे पुचका कहा गया होगा। इसमें पानी भरा जाता है इसलिए इसे पानी का बतासा कह देते होंगे और इसमें सभी स्वाद गुपचुप रहकर यकायक आपके मुख में प्रविष्ट होते हैं, इसलिए इसे गुपचुप कहा जाता होगा।
बहरहाल, गोलगप्पा स्वाद का एक कम्प्लीट पैकेज है। सो, अपनी जीभ के नीचे उफन रहे पानी को दबाने की बजाय बाज़ार जाइये और इतराते हुए कहिए – ‘भैया ट्वेंटी रुपीज़ के गोलगप्पाज़ दे दीज्ये प्लीज़!’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
मुझे प्यार करनेवालों का कहना है कि मैं बहुत अच्छा लिखता हूँ। सुनकर अच्छा लगता है। मेरे अपनों का मानना है कि मैं सबसे अच्छा लिखता हूँ। सुनकर आश्वस्ति होती है कि मेरे पास मुझे ‘अपना’ माननेवाले ख़ूब लोग हैं। मेरे पाठकों का कहना है कि मुझ जैसा कोई नहीं लिख सकता। सुनकर एक मीठा-सा अहंकार उपजता है।
इस अहंकार में जब मैं अन्य ‘अच्छा लिखनेवालों’ की वॉल पर जाता हूँ तो मेरे भीतर उपजता अहंकार का अंकुर क्षण भर में सूख जाता है। आयु में मुझसे दस-बारह वर्ष कम रहकर भी कुछ लोग इतना श्रेष्ठ लेखन करते हैं कि कई बार अपना समस्त लेखन निरर्थक जान पड़ता है।
पिछले दिनों फेसबुक पर संजू शब्दिता को पढ़ा। उनकी वॉल विचार के खोजियों के लिए ख़ज़ाना हाथ लगने जैसा अनुभव है। हर पोस्ट में दो मिसरे हैं और हर मिसरे में आपको सुखद आश्चर्यबोध से भर देने का सामर्थ्य है। चूँकि मैं सर्वज्ञ नहीं हूँ अतः यह तो नहीं लिख सकता कि वे इस दौर की सर्वश्रेष्ठ शायरा हैं, लेकिन इतना अवश्य लिख सकता हूँ कि किसी विचार को जिस नज़रिए से संजू ग़ज़ल तक लाती हैं, वैसा नज़रिया मेरे संज्ञान में अन्यत्र कहीं नहीं मिला। पीड़ा की ख़ुद्दारी और निर्वेद की स्थिति तक दार्शनिक होती हुई इनकी शायरी बड़े-बड़े सुख़नवरों के लिए सोच के नये रास्ते खोलती है। ईमानदारी से कहूँ तो संजू शब्दिता वे पहली लेखिका हैं, जिनके कुछ अशआर से मुझे ईर्ष्या हुई कि काश यह बात मैंने कही होती।
उधर एक रचित दीक्षित हैं। ये शख़्स इस दौर का औघड़ है। कबीर जैसा बेलाग। मन के भीतर जो बात, जिस शब्दावली में उतरती है; उसे जस का तस काग़ज़ पर उतार देता है। तेवर ऐसा कि उसकी छोटी सी कविता बिना म्यान के नश्तर की तरह सीधे अवधान के आर-पार हो जाती है। नैतिकता और सामाजिकता की रस्म निभाती मान्यताएँ यकायक मनुष्यता की एक सपाटबयानी के आगे बौनी सिद्ध हो जाती हैं। बहुत समय बाद रचित के रूप में एक ऐसा कवि पढ़ने को मिला है, जो जन-मान्यता के अनुरूप नहीं मन-मान्यता के अनुरूप शब्द गढ़ता है।
एक नन्हीं-सी बालिका है इति शिवहरे। भाषा के जिस मुहावरे से स्वयं भाषाविद पल्ला झाड़ चुके थे, उस प्रांजल शब्दावली को बहते पानी की रवानी बना देती है अपने गीत में। उसे पढ़ता हूँ तो अनुभूत कर पाता हूँ कि क्लिष्ट शब्दावली से रसास्वादन करनेवाला मेरे भीतर का पाठक इस समय में कहीं पूर्ण तृप्त हो सकता है तो वह इति की लेखनी है। फोन पर बात की तो पाया कि उसकी आवाज़ ने अभी बचपन की देहरी पार नहीं की है लेकिन उसकी शब्दावली प्रौढ़ता की भी दूसरी पीढ़ी के पार पहुँच गयी है। इति को पढ़कर हमेशा यही दुआ की है कि काश ईश्वर समाज के भाषा संस्कार को इस योग्य बनाए कि इस बच्ची को अपनी भाषा का सरलीकरण करके साहित्य रचने पर विवश न होना पड़े।
एक स्वधा रवीन्द्र जी हैं। उनकी लेखनी से साक्षात्कार किया तो एकाध गीत तक तो ऐसा लगा कि हाँ, हो गया होगा किसी पुण्य के फल से कोई एकाध गीत। लेकिन ज्यों-ज्यों स्क्रोल करता गया… मन किसी अदृश्य शिकंजे में जकड़ता चला गया। भाव की ऐसी तरलता कि गीत यकायक पढ़नेवाले के चेहरे की भंगिमा से अठखेलियाँ करने लगे। अलक, भृकुटि, ओष्ठ-अन्त, नथुने, कण्ठ, नयनकोर… एक-एक अंग-उपांग उनके गीत की भावभूमि के पर्यटन पर निकल जाए। वे अक्सर मुझे ‘बालक’ कहकर संबोधित करती हैं। लेकिन उन्हें पढ़कर लगता है कि उन पर सरस्वती की जितनी कृपा है उसके अनुरूप उनका यह संबोधन ही मुझे वाग्देवी से कुछ आशीष दिला देता होगा।
एक वाशु पाण्डेय। शायरी करता है। ग़ज़ल के व्याकरण और कथ्य दोनों को पूरी शिद्दत से साधता हुआ यह नौजवान ज़िन्दगी में सर्वाधिक मुहब्बत क़लम से ही करता है। उससे कभी बतियाने की कोशिश करेंगे तो उसकी हर बात में शायरी मिल जाएगी। जज़्बा ऐसा कि जैसे एक दिन पूरे ज़माने को अपने जैसा बनाकर ही दम लेगा। तबीयत ये कि जो बात हमारे दिल में आ गयी उसे ठीक वैसे ही न कहा तो काहे के शायर। वाशु के ढेर सारे अशआर कब मेरी बातचीत को प्रभावी बनाने के काम आने लगे… मुझे पता ही नहीं चला। उसकी शायरी को पढ़ते हुए ऐसा कई बार लगा है कि इस उम्र में ये हाल है तो दस-बीस साल बाद ये लड़का क्या करेगा!
आप भी कभी फ़ुर्सत निकालकर इन सबको पढ़ लें और फिर मुझे बताएँ कि इनमें से किसी के विषय में ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर तो नहीं लिख दिया। तब तक मैं अपने अहंकार को ध्वस्त करने के लिए क़लम के और सितारों की तलाश जारी रखूंगा।
✍️ चिराग़ जैन