Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
अपनेपन के बाहुपाश में
धड़कन ने ये शब्द सुनाए-
“अलग-अलग कर्त्तव्य रहें; पर
आपस का अधिकार बहुत है।”
बस इतना-सा प्यार बहुत है
सबकी अपनी-अपनी गति है, सबका अपना-अपना पथ है
सूरज के कुनबे में लेकिन, ना कोई इति है ना अथ है
हम-तुम अगर निकट से गुज़रे, इस अनवरत अथक घुर्णन में
तो आपस में टकराने की, इच्छा जन्म नहीं ले मन में
हम इक-दूजे के होने का कर पाएं सत्कार; बहुत है
बस इतना-सा प्यार बहुत है
उद्गम का हर इक कतरा तो साथ नहीं बहता जीवन भर
साथ नहीं होने का मतलब प्रतिद्वंदी होना कब है पर
पल-पल बनती और बिगड़ती लहर अलग हैं नदी एक है,
जिसमें हम सब तैर रहे हैं, इस युग की वह सदी एक है
अब तुम आगे, अब हम आगे, बहती जाए धार; बहुत है
बस इतना-सा प्यार बहुत है
सब नियमित संवाद कर सकें ऐसा कहीं प्रबंध नहीं है
रोज़-रोज़ मिलना सम्भव हो ऐसा भी अनुबंध नहीं है
पर मिलने का योग बने तो, सुख से खिल उठता वह क्षण हो
भावुक करती मुस्कानें हों, साँसें भरता आलिंगन हो
मुड़कर देखो हर रिश्ते में होठों का विस्तार बहुत है
बस इतना सा प्यार बहुत है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ख़ुश होते तो आँख चमकती
मन हँसता तो देह दमकती
डर लगता तो दिल की धड़कन
ख़ुद चेहरे तक आन धमकती
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे
हाथ-पैर हिलते-डुलते हैं, पर मन में उत्साह नहीं है
साँसें आती हैं, जाती हैं पर जीने की चाह नहीं है
कैसी है ये हालत समझो
इसकी आज हक़ीक़त समझो
ये काया की आदत भर है
इसको ही जीवन मत समझो
बिन छत की दीवारें हैं ये, कैसे इन्हें मकान कहेंगे
क्या आँखों के मुंदने को ही जीवन का अवसान कहेंगे
शब्द उगलना नित्य क्रिया है, मन कह पाना स्वर्गिक सुख है
कानों में जो शोर भरा है, उसमें केवल सत्य प्रमुख है
मेघ घिरे हैं, वृष्टि नदारद
आँख खुली हैं दृष्टि नदारद
जिसके भीतर मन टूटा हो
उसके हित यह सृष्टि नदारद
दो हाथों से छूने को ही क्या सच का अनुमान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
मुस्काना उसको कहते हैं, जिससे तन-मन खिल-खिल जाए
जीवन, जिसमें मन दीपक हो, रोम-रोम तक झिलमिल आए
कुंजगली अभिराम नहीं है
गोकुल है, घनश्याम नहीं है
उन महलों में सन्नाटा है
जिन महलों में राम नहीं है
जिसमें कोरी भौतिकता हो, उसको कब तक ज्ञान कहेंगे
क्या होंठों के खिंच जाने को हम सचमुच मुस्कान कहेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
चल पड़ी ससुराल बिटिया सज-सँवर के
मन बिलखकर रह गया इस पल अचानक
देहरी की आँख नम होने लगी है
मौन रहने लग गयी साँकल अचानक
याद आता है अभी कल ही हमारी
गोद में इक पाँखुरी सी आई थी तुम
बस अभी कल ही कोई साड़ी पहनकर
देखकर दर्पण बहुत इतराई थी तुम
लांघकर बचपन, हुई थी तुम सयानी
याद आने लग गया वो पल अचानक
जो चहकती थी सुबह से शाम घर में
आज वो चिड़िया पराई हो रही है
ख्वाहिशें घूंघट के नीचे छिप गयी हैं
नाज-नखरों की विदाई हो रही है
साध ली सिंदूर ने कलकल समूची
और गुमसुम हो गयी पायल अचानक
लाड़ इक विश्वास के आगे झुका है
भाग्य के हाथों तुम्हारा हाथ है अब
उम्र भर का पुण्य जो कुछ है हमारा
हर क़दम पर वह तुम्हारे साथ है अब
दिल बिना धड़कन, ठिठककर थम गया है
आँख से चोरी हुआ काजल अचानक
सात फेरों का सफ़र पूरा हुआ है
है पराया आज अपनापन हमारा
एक नग अधिकार पीछे रह गया है
घर तुम्हारा, बन गया पीहर तुम्हारा
याद की गठरी टटोले जा रहे हम
हो गई तुम आँख से ओझल अचानक
✍️ चिराग़ जैन
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तो क्या हुआ, अगर जीवन में थोड़ा-सा संत्रास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
जिस काया में गर्भ विराजे उसकी रंगत खो जाती है
अन्न उपजना होता है तो धरती छलनी हो जाती है
जो डाली फलती है उसको बोझा भी ढोना पड़ता है
भोर अगर नम होती है, तो रातों को रोना पड़ता है
पत्ता-पत्ता झरना सीखा, तब जाकर मधुमास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
फूल लदी डालों से जो तूफान भिड़े, वो महक उठे हैं
साजिंदे की उंगली से जो साज छिड़े, वो चहक उठे हैं
जिस राघव ने घर छोड़ा था, उसने पूरा युग जीता है
जिस रानी ने सुख मांगा था, उसका अंतर्मन रीता है
कैकेयी ने तो ख़ुद अपने ही जीवन में वनवास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
खोने को तो पांचाली के पाँच सुतों ने जीवन खोया
लेकिन जो रण में जूझा था युग उसके ही शव पर रोया
काया वज्र बनानी है तो तय मानो, लोहा पीना है
उत्सव के हर इक कारण को एकाकी जीवन जीना है
शबरी ने जीवन भर आँसू भोगे, तब उल्लास लिखा है
जिसने जितनी पीड़ा झेली, उतना ही इतिहास लिखा है
✍️ चिराग़ जैन
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शोर-शराबे में भी दिल की धड़कन सुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ
इस दुनिया के छोटे-छोटे हिस्से घूम रहे हैं
लोग नहीं हैं, दो पैरों पर किस्से घूम रहे हैं
होंठों पर मुस्कान दिखी, मस्तक ग़मगीन दिखे हैं
हर चेहरे को पढ़कर देखो, कितने सीन लिखे हैं
इस सारी सामग्री में से मोती चुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ
देह भले ठहरी है लेकिन मन में चहल-पहल है
मौन धरा है अधरों पर और भीतर कोलाहल है
जिन आँखों में झाँका, उनमें ही संवाद भरा है
जो जितना चुप, उसमें उतना अनहद नाद भरा है
इस सरगम से मैं अपने गीतों की धुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ
मीठी यादों के तकिये पर सिर रखकर सोती है
मन पिघले तो दो आँखों की कोरों को धोती है
ठिठकी हुई खड़ी मिलती है किसी नदी के तीरे
कभी स्वयं ही चलकर आती, मुझ तक धीरे-धीरे
दो शब्दों के बीच जड़ी चुप्पी को सुन लेता हूँ
यूँ कविता बुन लेता हूँ, यूँ कविता बुन लेता हूँ
✍️ चिराग़ जैन
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सूखी हुई नदी के तट पर नौका लेकर आने वाले
जिस कलकल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है
चलते-चलते बहा पसीना, ठहर-ठहर कर नदिया सूखी
तू होता जाता था लथपथ, वो होती जाती थी रूखी
लहर-लहर लहरा-लहरा कर तुझको पास बुलाने वाले
जिस आँचल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है
माना तूने इन राहों पर, दर्द सहा है, चुभन सही है
लेकिन तुझको इंतज़ार की घड़ियों का एहसास नहीं है
अपनी उम्मीदों की नौका, मन्ज़िल तक पहुंचाने वाले
जिस समतल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है
हालातों से लड़ते-लड़ते कितनी नौकाएं टूटी हैं
उनका क्या चर्चा करना है, जिनसे धाराएँ रूठी हैं
इस क्षण का सारा सन्नाटा अपने भीतर पाने वाले
जिस हलचल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है
कौन सही है, कौन ग़लत है -अब इसमें कुछ सार नहीं है
यही अंत है इस किस्से का और अधिक विस्तार नहीं है
सही-ग़लत की उलझी-उलझी गुत्थी को सुलझाने वाले
तू जिस हल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है
इस तट पर जाने कितने ही प्राण पड़े हैं पत्थर होकर
तू भी वापिस ले जाएगा जग में अपनी काया ढोकर
जीवित होने के अभिनय से दुनिया को भरमाने वाले
जिस इक पल को ढूंढ रहा है
अब उसकी कुछ आस नहीं है
✍️ चिराग़ जैन