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दूसरा आयाम

जो प्रतीक्षा आँख में शबरी बसाए जी रही है
वह प्रतीक्षा राम के भी पाँव में निश्चित मिलेगी
धूप जैसी जिस विकलता को सुदामा ने जिया है
वह विकलता द्वारिका की छाँव में निश्चित मिलेगी

जो महल तक आ गयी होगी युगों का न्याय लेने
वह किसी वन में सिसकती इक शिला की आह होगी
जो युगों पहले घटे अन्याय के हित वन गयी है
वह किसी के मौन से पनपी कोई परवाह होगी
एक घटना जो नगर में कंकरी सी चुभ रही है
वह अहल्या के अछूते गाँव में निश्चित मिलेगी

द्रौपदी के चीर में बस द्रौपदी की लाज है क्या
उस अभागे वस्त्र के भीतर समूचा युग ढँका है
चीर लेकर जब स्वयं श्रीकृष्ण दौड़े हस्तिनापुर
तब मुरारी ने जगत् के ध्वंस पर अंकुश रखा है
जो घृणा सबको दिखाई दी सती के आँसुओं में
वह घृणा उस द्यूत के हर दाँव में निश्चित मिलेगी

हर कथानक में कथा का दूसरा आयाम भी है
सिर्फ़ राधा ही नहीं व्याकुल, विकल घनश्याम भी है
अपहृता होकर नहीं पीड़ित अकेली जानकी ही
प्रेम और दायित्व के घावों से पीड़ित राम भी है
धार का अस्तित्व जिस जल पर रहा निर्भर हमेशा
बस उसी जल पर पराश्रित नाव भी निश्चित मिलेगी
✍️ चिराग़ जैन

नवजीवन

सबकी नज़र पीर से सूखी, मेरी नज़र ख़ुशी से नम है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है

क्या सोचा था, शाख कटेगी तो मैं माली को कोसूंगा
जो छिल-छिलकर क़लम बन गयी, मैं उस डाली को कोसूंगा
जिसके दम पर पूरा गुलशन स्वस्थ रहा है, पुष्ट रहा है
क्या सोचा था, इस गुलशन की उस रखवाली को कोसूंगा
कीचड़, मिट्टी, काँट-छँटाई -यह सब उपवन का अनुक्रम है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है

खुरपी का संयोग मिले तो पौधा कुछ कुम्हला जाता है
लेकिन खुरपी के ही हाथों मधुबन में यौवन आता है
जिसकी जड़ ने ज़ख़्म सहे हैं, उसकी फुनगी आली होगी
जो परती से प्रेम करेगा, उस पर क्या ख़ुशहाली होगी
जिस पौधे ने जितना झेला, वह उतना ही सुंदरतम है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है

‘इससे पहले’, ‘इसके पीछे’ – बस इस पल का खेल यही था
पीछे का सब सार यही था, आगे का सब मेल यही था
क्या मैं भी इस पल से डरकर माली पर कुछ प्रश्न उठाता
क्या मैं भी कण जैसा होकर, विधिना को कुछ ढंग सिखाता
आधा उगना, दुगुना उगना, यह सब कितना मनभावन है
जिसको सबने घाव कहा है, वह नवजीवन का उद्गम है
✍️ चिराग़ जैन

स्वयं का प्रसव

ऐसा लगता था सब राहें
अब इसके आगे धूमिल हैं
जो भी है, जितनी भी है; बस
यह ही जीवन की मन्ज़िल है
लेकिन घबराकर हिम्मत की हत्या करना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था

जाने कौन घड़ी, अगले पल जीवन को लाचार बना दे
जाने कौन घड़ी, पल भर में हर भय का उपचार बना दे
हर धड़कन रुक-कर चलती थी, हर आहट मन को छलती थी
दिल पिघला-पिघला जाता था, आँखें रह रहकर गलती थीं
पर जितने हालात डराएं, उतना डरना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था

केवल दो राहें बाक़ी थीं, जूझें; या हथियार गिरा दें
या उम्मीदों को पोषण दें, या डरकर हर दीप बुझा दे
देहरी चढ़कर हार खड़ी थी, अपशकुनों की बरसातें थीं
मेरी और मेरे अपनों की हर धड़कन पर आघातें थीं
ऐसे समय किसी चेहरे का रंग उतरना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था

यदि सब कुछ निर्धारित है, तो धड़कन बढ़ने से क्या होता
यदि सब बदला जा सकता है तो फिर डरने से क्या होता
अपना प्रसव स्वयं करना था, कोई और विकल्प नहीं था
हर इक नस में चीर-फाड़ थी, भय पल भर भी अल्प नहीं था
पीड़ा से अपने ही मन को विचलित करना ठीक नहीं था
जब तक मौत नहीं आ जाती, तब तक मरना ठीक नहीं था
✍️ चिराग़ जैन

यात्रा

अब तक पथ पर फूल बिछे थे
नयन लुभावन चित्र खिंचे थे
अब इक कंकड़ चुभ जाने से, मैं रस्ते को दोष न दूंगा

जिस क्यारी को हाथ लगाया,
उसमें फूल खिले; क्या कम है?
जिस पगडण्डी को अपनाया,
उस पर मीत मिले; क्या कम है?
रेले-मेले, खेल-तमाशे, उत्सव के पल पाये यहाँ से
अब कुछ सन्नाटा छाने से, मैं रस्ते को दोष न दूंगा

झोली भरकर सुख पाया है
चुटकी भर दुःख पर क्या रोना
इस दुःख से सँवरेगा शायद
जीवन का इक सूना कोना
वटवृक्षों की छाँव मिली है, हर धारा पर नाव मिली है
सीने तक पानी आने से, मैं रस्ते को दोष न दूंगा

मेरा काम सफ़र करना है
पथ का निर्धारण उसका है
मैं अपना किरदार जिऊंगा
बाक़ी निर्देशन उसका है
शिखरों को छूने की इच्छा इन राहों ने पूरी की है
थोड़ी साँसें चढ़ जाने से
मैं रस्ते को दोष न दूंगा
✍️ चिराग़ जैन

प्रतीक्षा

कब उगेगा दिन, तुम्हारे आगमन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
कब कोई आकार होगा इस सपन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

मैं युगों से रोज़ लिख-लिखकर संदेशे
बादलों के हाथ भेजे जा रहा हूँ
शुद्धतम जल से चरण धोऊँ तुम्हारे
आँसुओं को भी सहेजे जा रहा हूँ
कब मुझे अवसर मिलेगा आचमन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

‘भोर की पहली किरण पर आओगे तुम’
-रात से हर रात ये ही कह रहा हूँ
सूर्य का उत्साह ठण्डा पड़ रहा है
और मैं भीतर ही भीतर दह रहा हूँ
हँस रहा मुझ पर हर इक तारा गगन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

चौखटों का नूर बुझने लग गया है
देहरी की आँख पथराने लगी है
बेर की हर डाल चुभने लग गयी है
मालती की देह कुम्हलाने लगी है
हो रहा नीरस निरंतर स्वर सृजन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ

कौन जाने एक दिन मेरी कथा का
अंत, शबरी की कथा जैसा रहेगा
या निरन्तर बढ़ रही इस पीर का पथ
सिर्फ़ राधा की व्यथा जैसा रहेगा
बेर हूँ मैं या सुमन हूँ कुंजवन का
मैं बहुत दिन से प्रतीक्षा कर रहा हूँ
✍️ चिराग़ जैन

श्मशानों में चहल-पहल है

सबके एकाकी मन में हैं
जाने कितनी शोक सभाएँ
पीपल के पेड़ों ने पूछा
इतने घण्ट कहाँ लटकाएँ

हर पल पर डर का कब्ज़ा है, हर क्षण पर दहशत के पहरे
घाव दिलों पर इतने गहरे, हँसना भूल चुके हैं चेहरे
आँखें रोकर पूछ रही हैं
कितने आँसू और बहाएँ
पीपल के पेड़ों ने पूछा
इतने घण्ट कहाँ लटकाएँ

कितना भीषण प्रश्न खड़ा है, उत्तर खोज रही हैं सदियाँ
क्रंदन झेल रहे हैं आंगन, तर्पण झेल रही हैं नदियाँ
लहरें रो-रो पूछ रही हैं
इतनी राख कहाँ ले जाएँ
पीपल के पेड़ों ने पूछा
इतने घण्ट कहाँ लटकाएँ

साँसों तक की लाचारी है, तन बेबस है, मन घायल है
बाज़ारों में सन्नाटा है, शमशानों में चहल-पहल है
कितने दिन से भभक रही हैं
ठण्डी होती नहीं चिताएँ
पीपल के पेड़ों ने पूछा
इतने घण्ट कहाँ लटकाएँ
✍️ चिराग़ जैन

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