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डॉ प्रवीण शुक्ल

सही और ग़लत के पैमाने से आगे यह बहुत महत्त्वपूर्ण होता है कि आप अपने विचारों को कितनी शिद्दत से अभिव्यक्त करते हैं। और इस पैमाने पर मुझे डॉ प्रवीण शुक्ल हमेशा अव्वल दिखाई देते हैं।
ऊर्जा का न जाने कौन सा इंजेक्शन लगाकर आए हैं कि थकान और आलस्य पर हमेशा के लिए विजय प्राप्त किए बैठे हैं। स्मरण शक्ति ऐसी कि सभागार में बैठे 500 लोगों में से 400 का नाम उन्हें याद होता है। पारिवारिक इतने कि जिनका नाम होता है उनकी पूरी पारिवारिक पृष्टभूमि का संज्ञान होता है।
एक साथ हज़ारों लोगों के बीच से गुज़र जाएँ तो एक भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि प्रवीण जी ने हमें देखा तक नहीं, और एक भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि उन्होंने मुझे देखकर अनदेखा कर दिया।
जिसका फोन आ जाए उसने सुबह फेसबुक पर क्या लिखा है, यह वे शब्दशः बताने लगते हैं। दिन में 10 सामाजिक समारोह हों तो वे प्रत्येक में उपस्थिति दर्ज कराते हैं, फिर चाहे वे सभी कार्यक्रम NCR के अलग अलग छोर पर क्यों न हों।
और इस पर भी आश्चर्य यह कि इतनी व्यस्तता के बावजूद, वे न तो कभी फोन पर बात करते समय किसी जल्दबाज़ी में रहते हैं, न ही किसी कार्यक्रम में मंच पर बोलते समय उनके हाव-भाव अगले कार्यक्रम में पहुँचने की उतावली की सूचना देते हैं।
इतनी सारी सामाजिकता निभाते हुए भी वे कभी अनुपलब्ध नहीं होते। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि प्रवीण शुक्ल एक अकेला आदमी नहीं है, बल्कि एक जैसे दिखने वाले, एक जैसा बोलने वाले, एक जैसा सोचने वाले पंद्रह- बीस लोगों का समूह है। इनमें से एक व्यक्ति दिन भर फोन पर बात करता रहता है, एक व्यक्ति दिन भर सोशल मीडिया पर एक्टिव रहता है, कम से कम तीन व्यक्ति दिन भर सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। एक व्यक्ति स्कूल का प्रशासन देखता है, एक व्यक्ति अपने परिवार-रिश्तेदारों के हर उत्तरदायित्व को पूर्ण करने में संलग्न है, एक व्यक्ति कवि सम्मेलन बुक करता है, एक व्यक्ति मंच पर कविता पढ़ता है, एक व्यक्ति हास्य कविता लिखता है, एक ग़ज़ल कहता है, एक अतुकांत कविताएँ लिखता है और एक व्यक्ति साहित्य प्रेमी मंडल के भव्य आयोजन करता है। किसी तांत्रिक सिद्धि से इन पंद्रह-बीस लोगों की चेतना और स्नायु को परस्पर जोड़ दिया गया है।
प्रवीण शुक्ल एक मनुष्य नहीं हैं, बल्कि प्रबंधन के विद्यार्थियों के लिए शोध के विषय हैं। पौने छह फीट का एक ही आदमी इतने सारे काम एक ही काया में रहते हुए कैसे कर सकता है, इसका उदाहरण हैं प्रवीण शुक्ल।
मैंने कभी उन्हें शारीरिक व्याधि की शिकायत करते नहीं देखा। कभी किसी और के लिए तनाव उत्पन्न करते भी उन्हें नहीं देखा। मुस्कराहट उनके चेहरे पर कवच-कुंडल की तरह जुड़ी हुई है। हर क्षण सतर्क रहते हुए भी धैर्य और सहजता बनाए रखने में सिद्धहस्त डॉ प्रवीण शुक्ल का आज जन्मदिन है।
मैं उनके संपूर्ण व्यक्तित्व को जन्मदिन की ढेर सारी बधाई देता हूँ। और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि इस अति-सक्रिय व्यक्तित्व की बहुआयामी प्रतिभा की ऊर्जा इसी तरह अक्षुण्ण बनी रहे।

✍️ चिराग़ जैन

आकलन और आलोचना

जो लोग कला फ़िल्मों के मापदण्ड से सी-ग्रेड सिनेमा का आकलन करने निकले हैं, उनकी बुद्धि किसी का आकलन करने के लिए सक्षम नहीं है।
वे आलोचना करने के प्रयास में विद्रूपता को प्रचारित कर रहे होते हैं और उन्हें आभास भी नहीं होता कि वे क्या पाप कर रहे हैं। सिद्धांत तो यह है कि जिसे लुप्त करना हो उसकी चर्चा बंद कर दो। किन्तु गंदगी की चर्चा न करने की चर्चा इतनी हो जाती है कि गंदगी का आकार बढ़ने लगता है।
धीरे-धीरे इस चर्चा में रस आने लगता है। फिर यह दंभ जागता है कि, “ये साले क्या अश्लीलता दिखाएंगे, हम चाहें तो इनसे ज़्यादा अश्लीलता कर सकते हैं।’ ऐसा कहते-कहते हम एक दिन चाह लेते हैं और अश्लीलता करने लगते हैं।
सात्विक प्रतिभा कला फिल्म की तरह चर्चा से बाहर अपनी साधना करती रहती है और सी-ग्रेड सिनेमा पीवीआर से लेकर ओटीटी तक पैर पसारने लगता है।

आश्रमों में रहकर कला की साधना करने वाले कुछ लोग कला के भौंडे पाखण्ड के दम पर उठती इमारतों को देखकर झल्लाने लगते हैं। नंगेपन को ‘आर्ट’ और नैतिक निर्लज्जता को ‘स्टारडम’ कहनेवालों के प्रति क्रोध से भरकर कला के शुद्ध साधक अपनी सृजनात्मक ऊर्जा को विद्रूपता के विरुद्ध व्यय करने लगते हैं।

…और यही तो विद्रूपता चाहती थी।

इसलिए उसकी चर्चा न करें जो आपको पसंद नहीं है। उस बिरवे को अपनी अनुशंसा का पोषण दें, जिसकी सुगंध आपको सुख देती है। धूल के बवंडर में उड़कर आपकी आँख में जा गिरे करकट से विचलित होकर आँखें बंद होना स्वाभाविक है किन्तु बिलबिलाकर, आँखें मसलते हुए पूरे बवंडर को गाली मत दीजिए क्योंकि वायु के इस वेग में तमाम करकट के साथ कुछ हरे पत्ते भी उपस्थित हैं जो अभी भी सुगंध के अस्तित्व को बचाने की कोशिश में बवंडर के प्रचंड वेग से असहाय जूझ रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

विनीत चौहान

सामाजिक व्यवहार में मैच्योरिटी की परिभाषा तलाशता हूँ तो पाता हूँ कि सही और ग़लत का निर्धारण करने से पहले अपने व्यक्तिगत लाभ और हानि का आकलन करने की क्षमता को मैच्योरिटी कहते हैं। यद्यपि यह परिभाषा मैंने स्वयं गढ़ी है, तथापि मैच्योर कहे जानेवाले अधिकतम लोगों को मैंने इस परिभाषा पर खरा उतरते देखा है। मेरा निजी मत यह है कि इस परिभाषा की परवाह न करते हुए सहज आचरण करनेवाले लोग अधिक निश्छल, अधिक प्यारे और अधिक जेनुइन होते हैं। सामान्य भाषा में इनके लिए एक विशेष शब्द प्रयुक्त किया जाता है जो ‘मूर्ख’ शब्द का निकटतम पर्यायवाची है।
मुझे ऐसे तथाकथित मूर्ख अधिक नैतिक और अधिक निस्पृह लगते हैं। मैं अपने ख़ुद के आचरण में इस ‘मूर्खता’ को कई बार आसानी से खोज लेता हूँ। यह सत्य है कि एमैच्योरिटी सामाजिक दृष्टि से असफलता की ओर ले जाती दिखाई देती है लेकिन मुझे ऐसे लोग तथाकथित ‘मैच्योर’ लोगों से अधिक बहादुर लगते हैं।
ऐसे ही एक एमैच्योर व्यक्ति हैं श्री विनीत चौहान। किसी भी घटना पर त्वरित प्रतिक्रिया के साथ तैयार। लाभ-हानि का गणित लगाने का अवसर ख़ुद को ही नहीं देते। लड़ते हैं तो पूरी ऊर्जा से, क्योंकि जिस बात के लिए लड़ रहे होते हैं उसको अपने अन्तःकरण से ‘सच’ मान चुके होते हैं। जिसे अपना कह देते हैं, वह यदि उनसे छल भी कर रहा हो तो उसका छल बहुत देर में देख पाते हैं, क्योंकि अपने पूरे अन्तःकरण से उसे अपना मान चुके होते हैं। भावुक इतने कि संवेदना की किसी पंक्ति के पूरा होने से पहले ही आँखों में आँसू डबडबाने लगते हैं। मैंने अनेक अवसरों पर किसी पुरानी याद का संस्मरण सुनाते-सुनाते उनका गला रुंधते देखा है।
आज इस पारदर्शी व्यक्तित्व का जन्मदिन है। हिंदी कवि-सम्मेलन जगत् में मैच्योर लोगों की भीड़ के बीच जिन चंद किरदारों की संगत से मन खिल उठता है, उनमें विनीत जी एक हैं। विनीत जी अलवर से हैं और अलवर मेरी ननिहाल है, इस रिश्ते से मैं उन्हें ‘मामा’ कहकर संबोधित करता हूँ। मामा को ज्यों-ज्यों करीब से देखा, त्यों-त्यों समझ आया कि ‘हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी’ का अर्थ सकारात्मक भी हो सकता है। कितने ही किस्से हैं, जहाँ मामा का व्यक्तित्व अपने ही किसी पुराने व्यवहार के ठीक विपरीत दिखाई देने लगा।
किसी की पीड़ा पर बिलख पड़नेवाला शख़्स जब दुर्घटना में क्षत-विक्षत कविमित्रों को गाड़ी से बाहर निकालने के लिए गाड़ी के शीशे तोड़ता है तो उसके वज्रहृदयी होने के प्रमाण मिलते हैं। किसी की अनैतिकता पर क्रुद्ध हो जानेवाले विनीत चौहान जब किसी की विवशता का विश्लेषण करते हैं तो ऐसा लगता है ज्यों कोई करुण रस का कवि संवेदना की परतों को स्पर्श करना चाह रहा हो। जिनका मन भर आदर करते हैं, उनको भी यदि कहीं ग़लत पाते हैं तो उनसे जी भर कर लड़ लेते हैं।
विनीत चौहान का स्वभाव एक ऐसे संवेदनशील मनुष्य का उदाहरण है, जो मैच्योर सहगामियों के साथ रहकर भी अपनी निस्पृह प्रतिक्रियाओं को मैच्योर बनाने की न तो कभी इच्छा पाल सका, न ही ऐसी कोई आवश्यकता महसूस कर सका।
दोस्ती कैसे निभाई जाती है और दोस्त को साधिकार कैसे टोका जाता है, इस बात को समझना हो तो विनीत चौहान के अपनत्व के दायरे में प्रवेश करके देखिए!
✍️ चिराग़ जैन

जामनगर में कुछ छूट गया है…

3 मई को जामनगर स्थित रिलायंस टाउनशिप के कवि सम्मेलन के लिए घर से निकला। दिल्ली से राजकोट और राजकोट से जामनगर। इस यात्रा के सहयात्री बने प्रिय गजेन्द्र प्रियांशु।
गजेन्द्र के साथ बतियाते हुए अवधी बोली का सहज लालित्य रसवृद्धि कर देता है। व्यवहार में गाँव की ठसक और प्रवृत्ति में विद्यमान कबीर ने गजेन्द्र के व्यक्तित्व को सत्यप्रेमियों के लिए आकर्षक बना दिया है। प्रशंसा लोलुपों के लिए ऐसे मनुष्यों की संगत खीझकारक सिद्ध होती है।
साहित्य और साहित्यिकों की चर्चा का रसास्वादन करते हम दोनों के कूपे का द्वार दिल्ली कैंट पर बंद हुआ तो सीधे राजकोट जंक्शन पर खुला।
राजकोट में जलेबी और फाफड़े का कलेवा ग्रहण करते हुए हम दोनों जामनगर पहुँचे। आयोजन मंडल की ओर से दीपक दवे जी हमारे गेट पास लिए टाउनशिप के द्वार पर तैयार खड़े थे। उनका अनुकरण करते हुए हम उस परिसर में प्रविष्ट हुए जो पिछले दिनों अम्बानी परिवार के वैवाहिक उत्सव के सन्दर्भ में पूरी दुनिया मे वायरल हो चुका था। शानदार बागबानी, बेहतरीन साफ़- सफाई, आलीशान साज-सज्जा और अनुशासित बाशिंदों से वातावरण में सकारात्मकता पसरी हुई थी।
हमारे पहुँचने के लगभग दो घंटे के भीतर मुंबई से दिनेश बावरा जी और सूरत से सोनल जैन भी रिलायंस टाउनशिप स्थित गेस्ट हाउस पहुँच गए। गर्मी बहुत अधिक थी, सो चारों कवि दोपहर का भोजन करके विश्राम करने चले गए। शाम 6:00 बजे हम चारों तैयार होकर रिसेप्शन पर पहुँच गए। दीपक दवे जी ने अपने सुव्यवस्थित आतिथ्य के अंतर्गत हमें कार्यक्रम स्थल पर जाने से पूर्व टाउनशिप स्थित मंदिर परिसर के दर्शन का सुझाव दिया।
सोनल चहक कर बोलीं, अरे यहाँ तो वैली ऑफ गॉड भी बनाई है ना! दीपक जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, जी हाँ, वहीं चलने की बात कर रहा हूँ।
मन में कौतूहल और आँखों में चमक लिए हम गाड़ियों में सवार हो गए। दीपक जी बहुत मन से हमें टाउनशिप के विषय में बता रहे थे। गाड़ी के दाहिनी ओर इशारा करते हुए दीपक जी बोले, यह पक्षियों के लिए आरक्षित स्थान है। यहाँ एंट्री रेस्ट्रिक्टिड है। मैं खिड़की के उस पार उस दिशा में देखने लगा कि तभी हमारी गाड़ी बाएं हाथ पर मुड़कर एक पार्किंग एरिया में रुक गई। गाड़ी से उतरते ही कानों में मोर, कोयल और चिड़ियों के स्वर भर गए। मैंने दीपक जी से कहा, जिन पक्षियों के क्षेत्र में प्रवेश सीमित है उनका कलरव तो दीवारें लांघकर हमारे कानों में घुसा आ रहा है। दीपक जी ने ठहाका लगाकर कहा, इस पर तो कोई नियंत्रण नहीं किया जा सकता भाईसाहब।
अब बारी थी वैली ऑफ गॉड देखने की। सीढ़ियां चढ़कर मंदिर के सम्मुख उपस्थित हुए तो चारों ओर ईश्वर विद्यमान था। सामने मंदिर की वेदी में बाँसुरीवाले कन्हैया अपनी राधिका के साथ रासमुद्रा में सुशोभित थे तो बाहर प्रांगण के एक सिरे पर वक्रतुण्ड महाकाय गणपति विराजमान थे। सामने कन्हैया, दूसरे छोर पर बप्पा और इसके ठीक मध्य में बप्पा के पप्पा. काले रंग का विराट शिवलिंग और उसके सम्मुख पंचांग प्रणाम रत नन्दी महाराज।
पूरा परिसर विशालकाय वृक्षों से सजा हुआ है। लम्बी लम्बी शाखाएँ वृक्षों की भुजाओं का आभास करवाती हुई आसमान और धरती के मध्य छायादार हरियाली बिछा रही हैं। इन शाखाओं पर हज़ारों छोटी-बड़ी घंटियाँ, लाखों रुद्राक्ष और कौड़ी से बनी लम्बी-लम्बी लटकनें लगवाई गई हैं। किसी वृक्ष पर हज़ारों नारियल बंधे हैं तो किसी दरख्त ने हज़ारों मन्नत वाली चुन्नियाँ ओढ़ी हुई हैं। कहीं पूरा तना मोली-कलावे से सिंगर उठा है तो कहीं लाखों चूड़ियों ने शाखाओं की कलाइयों को लाद दिया है।
जिधर देखो उधर ही विराट की छवि उपस्थित है। फव्वारे, यज्ञशाला… सब कुछ बैकुण्ठ सरीखा। रास्ते के एक और एक विशाल वटवृक्ष नीचे काठ से बने गोपाल चैन की बंसी बजाते दिखते हैं। थोड़ी आगे बढ़ने पर रामभक्ति में लीन वज्र अंगी हनुमान मंझीरे बजा रहे हैं। जिधर देखो उधर ही कोई न कोई देवी या देवता उपस्थित हैं।
एक बरामदे जैसे ढांचे के ऊपर लगभग पंद्रह फीट लंबा मोर बनाया गया है, जिसका रूप इतना लावण्ययुक्त है कि वास्तव का मोर भी इससे ईर्ष्या कर उठे। मुख्य द्वार पर एक विशालकाय घंटा टँका हुआ है। यत्र-तत्र छोटे बड़े देवालय हैं।
वैकुण्ठ की परिकल्पना का अब तक बना शायद सर्वाधिक निकटतम अनुमान है यह वैली ऑफ गॉड।
घड़ी दौड़ रही थी और मन ठहर गया था। मैं इस अलौकिक वातावरण को आँखों में भर लेना चाहता था। दिन का साम्राज्य अब रात के आगोश में खो रहा था। मन्दिर परिसर में हज़ारों दीपक और बल्ब जगमगा उठे थे। मूल वेदी के सामने मंत्र, शंखध्वनि और आरती गूंज रही थी।
दीपक जी ने इस आध्यात्मिक मोहपाश से बाहर निकालने के लिए हमें याद दिलाया कि आयोजन स्थल पर श्रोता प्रतीक्षा कर रहे हैं।
हम ‘कर्म ही पूजा है’ के सिद्धांत का पालन करते हुए स्टेज पर पहुँचे। लगभग 1200-1500 श्रोताओं का हुजूम रात साढ़े दस बजे तक ठहाकों, तालियों और संवेदना की तरंगों में गोते लगाता रहा। 1 बजे हमें जामनगर से ट्रेन पकड़नी थी। शीघ्रता पूर्वक रात्रिभोज करके मेरी देह सौराष्ट्र एक्सप्रेस की एक बर्थ पर आ लेटी है। मन काष्ठ-कन्हैया के चरणों में कहीं छूट गया है।
ईश्वर ने चाहा तो फिर कभी लौटूंगा ईश्वर की घाटी से अपना मन वापिस लेने।

– चिराग़ जैन

अरुण जैमिनी: एक नाम नहीं, एक किरदार

“छोड़ ना यार, क्या फरक पड़ता है।” -यह वाक्य कोरा तकियाक़लाम ही नहीं, अपितु अरुण जी के जीवन का मूल सिद्धान्त भी है। जीवन की बड़ी से बड़ी भँवर से भी वे इसी एक वाक्य की डोर थामकर किनारे आ लगते हैं। पहले मुझे ऐसा लगता था कि वे दूसरों की समस्या को छोटा समझते हैं, इसीलिए सामनेवाले की परिस्थिति और तनाव के पहाड़ को अपने इस एक वाक्य से छोटा साबित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन बाद में मैंने देखा कि वे ख़ुद की समस्याओं को भी अपने इसी एक वाक्य से छोटा साबित कर देते हैं।
उन्हें जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगता है अपना कम्फर्ट ज़ोन। इसीलिए ज्यों ही उनके कम्फर्ट ज़ोन में कोई तनाव प्रवेश करने लगता है तो वे ‘किसी भी कीमत पर’ उससे अपने कम्फर्ट को सुरक्षित निकाल लाते हैं। अपने कम्फर्ट ज़ोन की रक्षा के लिए वे धन, सिद्धान्त, यश, लाभ और एक सीमा के बाद सम्बन्ध तक से मोहभंग कर लेते हैं। कई बार मुझे उनके मापदण्ड बदलने पर बहुत आश्चर्य होता था, लेकिन अब महसूस होता है कि समय की किसी एक इकाई में किसी एक मापदण्ड की अनदेखी कर देने से यदि आप एक लम्बी अवधि के तनाव से मुक्त हो जाते हैं, तो यह सौदा खरा कहा जा सकता है, बशर्त उसका उद्देश्य किसी को धोखा देना न हो।

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अरुण जैमिनी जी से पहली बार मैं उस कवि-सम्मेलन में मिला था, जो एक श्रोता और कवि, दोनों रूपों में मेरा पहला कवि-सम्मेलन था। उसके बाद उनके कवि-सम्मेलनीय कद के कारण आगे से बढ़कर उनसे सम्पर्क बढ़ाने में संकोच होता रहा। लेकिन उनका व्यक्तित्व और उनके चेहरे की कांति मुझे हमेशा आकृष्ट करती थी। कई वर्ष तक मैं उनके अस्तित्व को दूर से ही देखता रहा, फिर न जाने कब वे मित्र हो गए; न जाने कब उन्होंने मेरे संकोच की दीवार गिराकर अपनत्व का सूत्र बांध लिया।
मुझे जहाँ तक याद है, वर्ष 2011 में जब मैंने जम्मू में नौकरी की थी, तब अरुण जी से मेरा रिश्ता सुदृढ़ होने लगा। 2012 में जब नौकरी छोड़कर आया, तो वह स्थिति जन्मी कि हम दिन में कम से कम एक बार बात ज़रूर करते थे। तब से अब तक यह क्रम अनवरत ज़ारी है। जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख… सब कुछ हम परस्पर साझा कर लेते हैं।
मेरी सर्जरी के दौरान उन्होंने जिस शिद्दत से मित्रता निर्वहन किया, वह मैं कभी नहीं भूल पाता। मुझे याद है कि जब मेदांता में वे मुझसे मिलने आए तो मैंने कहा कि मेरे कारण सब परेशान हो रहे हैं। इस पर वे भावुक होकर बोले – ‘अर तू जो सबके लिए परेशान होता है हमेशा!’

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अरुण जी के साथ एक बात ख़ास है, वो ये कि वे एक बार में एक ही काम करते हैं। और जो काम करते हैं, उसे पूरी शिद्दत से करते हैं। जैसे उन्हें एक बार यह बात समझ आ गई कि कवि-सम्मेलन समिति के अधिवेशन में सबको गले में आईकार्ड ज़रूर लटकाना है तो इसके बाद वे मुख्य अतिथि को भी बिना कार्ड के अधिवेशन हाॅल में एंट्री नहीं करने देंगे। काम महत्वपूर्ण है या नहीं, ये अलग बात है, लेकिन अगर उसकी ड्यूटी अरुण जैमिनी ने ली है तो वह होगा ज़रूर। अपने हिस्से काम वे उतना ही लेते हैं, जितना वे कर सकें। और अरुण जी कितना काम कर सकते हैं, ये उन्हें जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन जितना काम वे करते हैं, उसमें कोई कमी नहीं निकल सकती।
जून 2023 में मेरी और मनीषा की शादी थी। मैंने कहा, चाचा, अबकी बार मुझे अधिवेशन की तैयारी से मुक्त कर दो। अरुण जी का डायरेक्ट जवाब था, शादी में तैने क्या करना है। सब हो जाएगा। मैंने कहा, ‘भाईसाहब सबको निमंत्रण भेजना है, सारी तैयारी करनी है…।’ उन्होंने पूरी ज़िम्मेदारी उठाते हुए कहा- ‘तेरी शादी में कवियों के निमंत्रण की ज़िम्मेदारी मेरी।’ उन्होंने इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी ले ली तो मुझे थोड़ा सहारा मिला। मैंने हर वर्ष की तरह पूरा समय लगाकर जोधपुर अधिवेशन सम्पन्न किया। और कवि-परिवार से इतर सबको निमन्त्रण के लिए व्यवस्थित रूप से सूची बनाकर विवाह का निमन्त्रण भी भेजता रहा। 25 जून को विवाह का रिसेप्शन था। समय से पहले अरुण जी और भाभी आयोजन स्थल पर उपस्थित थे। कवि-परिवार भी प्र्याप्त संख्या में उपस्थित था, लेकिन अनेक महत्वपूर्ण नाम दिखाई नहीं दिये। …मैंने अरुण जी से कुछ लोगों के न आने का कारण पूछा तो पता लगा कि अरुण जी ने कवियों के व्हाट्सएप ग्रुप पर सबको सामूहिक निमंत्रण दे दिया था कि चिराग़ और मनीषा के ब्याह में सभी आमंत्रित हैं, चिराग़ बहुत व्यस्त है, अलग से निमंत्रण का इंतज़ार न करें।’
अब जो-जो उस ग्रुप में था, वो-वो निमंत्रित हो गया और जो जो उस ग्रुप में नहीं था, वो आज तक मुझे ताना देता है। …मुझे अरुण जी की इस हरक़त पर क्रोध नहीं आया क्योंकि मैंने देखा है कि वे अपने घर के ब्याह-टेलों में भी कवि-समाज को निमंत्रित करने का ‘दायित्व’ ऐसे ही निभाते हैं।

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उनका किरदार उनकी सादगी से पोषित होता है। पंच और डांस को रोकने में वे हमेशा असमर्थ रहे हैं। मुझे याद है एक बार गौरव शर्मा और मैं काठमांडू के एक कार्यक्रम में थे। अरुण जी को इसी कार्यक्रम में कहीं और से आना था, तो वे दो घण्टे बाद होटल पहुँचे। होटल पहुँचने पर गौरव ने उन्हें बताया कि चाचा, चिराग़ ने रास्ते में मुझे बहुत शानदार गीत सुनाया।
गौरव की बात सुनकर चाचा के चेहरे पर भय मिश्रित आश्चर्य तैर गया। आँखें बड़ी हो गईं, फिर धीमे स्वर में गौरव से पूछा- इतनी देर में इसने गीत भी सुना दिया।
गौरव उनके व्यंग्य को समझकर झट से रुआँसा होकर बोला- ‘हाँ चाचा, एक नहीं तीन-तीन।’
अरुण जी ने चेहरा लाल करके मुझसे कहा- ‘साले, इन्हीं हरकतों से एक दिन तू अपने सारे दोस्त खो देगा।’
ठहाके का ऐसा निर्माण होता मैं पहली बार देख रहा था।

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कुल मिलाकर, तनाव से रहित जीवन जीने का जीवन्त उदाहरण है मेरा चाचा। आज ये सारी बातें इसलिए याद आ रही हैं क्योंकि आज चाचा का जन्मदिन है और चाचा अमरीका में है। अगर भारत में होते तो इतना लम्बा लेख लिखने का समय ही नहीं देते।
हैप्पी बर्थडे चाचा… लव यू।
✍️ चिराग़ जैन

माहेश्वर तिवारी: गीत का उदाहरण

एक सम्पूर्ण गीत को यदि मनुष्य बना दिया जाए तो उसका आचार-व्यवहार लगभग माहेश्वर दा जैसा होगा। संवेदना में डूबकर तरल हो उठी आँखें उनके गीतकार नहीं, ‘गीतमयी’ होने का प्रमाण थीं। आज वे आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।
मृदु वाणी किसे कहते हैं, इसका उदाहरण आज हमसे छिन गया। सौम्य व्यक्तित्व कैसा होता है; इसका सबसे सटीक दर्शन आज लुप्त हो गया। निश्छल मुस्कान का एक बिम्ब आज अलभ हो गया। गीतकार को कैसा होना चाहिए- इसका उत्तर देने के लिए दृष्टि तर्जनी का पीछा करते हुए जिस मनुष्य पर जाकर ठहरती थी वह मनुष्य आज परलोक सिधार गया।
अपनी सृजन प्रतिभा के वैभव को भोगते हुए भी अंतर्मुखी होने से चेहरा कितना सुदर्शन हो उठता है- यह अब केवल तस्वीर में ही देखा जा सकेगा।
आधुनिकता के किसी बिम्ब में करवट लेते गीत को चुनकर शब्दाकार करने का लुत्फ़ किस संतुष्टि को जन्म देता है- इसका अब केवल अनुमान लगाया जा सकेगा।
गीत के नए साधकों के सौभाग्य से आज गीत का एक जीवंत गुरुकुल मिट गया। माहेश्वर जी के देहावसान ने आज मुझे एक बार फिर इस एहसास से भर दिया है कि लौकिक व्यस्तता की टुच्ची आड़ में सृजन के जिन अलौकिक देवदूतों की संगत से स्वयं को वंचित कर रहा हूँ, उनके व्यक्तित्व की सुगंध दोबारा नसीब नहीं होगी।
मुरादाबाद से गुज़रते हुए अब हर बार एक टीस हरी हो जाएगी।
विदा दद्दू!

✍️ चिराग़ जैन

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