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कई बार ऐसा महसूस होता है कि धरती पर हमारा जन्म ही केवल काग़ज़ सम्भालने के लिए हुआ है। आपके पास काग़ज़ हैं, तो सब कुछ है। आपके पास घर है, लेकिन घर के काग़ज़ नहीं हैं तो भले ही आप महल में रह रहे हो, सरकार के लिए आप बेघर हो। लेकिन सड़क पर रहनेवाले बेघर के नाम की, किसी मकान की रजिस्ट्री अगर सरकारी बाबू को मिल गई तो फिर वो लाख सिर पटक ले, उसे बेघर नहीं माना जाएगा।
कोई पैदा हुआ तब माना जाता है, जब उसके पैदा हो जाने का काग़ज़ बरामद हो जाए। ऐसे ही कोई मरा हुआ भी तब माना जाता है जब नगर निगम उसके मरण का दस्तावेजीकरण कर देता है। और ये मरने का काग़ज़ हासिल करने के लिए भी बहुत काग़ज़ लगाने पड़ते हैं। भले ही नगर निगम का पूरा महकमा किसी की शवयात्रा में सशरीर शामिल हुआ हो, भले ही स्वयं यमराज किसी के मरने की गवाही देने उपस्थित हो जाएं, लेकिन काग़ज़ लगाए बिना मरण प्रमाण-पत्र नहीं मिलेगा। उल्टे कोर्ट, यमराज को अपने यमराज होने के कागज़ प्रस्तुत करने का आदेश भी दे सकता है। आखिर हर चीज़ का कोई सिस्टम होता है।
मनुष्य जाति ज्यों-ज्यों विकसित हुई, त्यों-त्यों इन काग़ज़ों को सम्भालनेवाले लोग, पेशे और विभाग भी विकसित हुए। चार्टर्ड अकाउंटेंट, वकील, अभिलेखागार जैसी संज्ञाएं काग़ज़ के महत्व का प्रमाण हैं।
आम आदमी के लिए आवश्यक है कि वह काम से ज्यादा काग़ज़ पर ध्यान दे। आम आदमी हमेशा काग़ज़ों से घबराया रहता है। लेकिन सिस्टम कभी काग़ज़ से नहीं घबराता। उसे अच्छी तरह पता है कि कब कौन सा काग़ज़ मिलना चाहिए और कब कौन सा काग़ज़ नहीं मिलना चाहिए।
आपको बैंक में खाता खोलने के लिए पैन कार्ड, आधार कार्ड, बायोमैट्रिक और गवाही जैसे पर्याप्त काग़ज़ देने पड़ते हैं। फिर भी आप काग़ज़ का महत्व भूल न जाओ, इसलिए बैंक समय-समय पर आपका केवाईसी करता है। इस प्रक्रिया में आप उन्हीं कागज़ों की एक और कॉपी नत्थी करते हैं। बैंक नयी कॉपी को पुराने काग़ज़ से मिलाकर सन्तुष्ट होता है कि उसके कस्टमर का काग़ज़ी चरित्र बिल्कुल नहीं बदला है। इस प्रक्रिया के पूर्ण हुए बिना आप अपने खाते से अपना ही पैसा नहीं निकाल सकते हैं। किन्तु जब आपके साथ कोई डिजिटल फ्रॉड हो जाए तो अपराधी ने आपके खाते से पैसा किस खाते में ट्रांसफर किया। किस जगह से उसे निकाला गया। किस ब्रांच में उसका केवाईसी हुआ, कहाँ उसने साक्षात आकर बायोमैट्रिक किया और किसने उसके अस्तित्व की गवाही दी- पुलिस को ये काग़ज़ नहीं मिलते। अर्थात्‌ आपके खाते में से आपको पैसा निकालना है, तो केवाईसी ज़रूरी है, लेकिन कोई प्रतिभाशाली जेबकतरा आपके बैंक खाते से पैसा बिना केवाईसी के निकाल सकता है।
बीमा एजेंट जब बीमा करने आता है तब वह बीमित व्यक्ति का परिचित होता है। तब उसे किसी काग़ज़ की ज़रूरत नहीं होती। ‘अरे भाईसाहब, मैं बैठा हूँ ना’ और ‘आप फ़िकर मत करो’ जैसे मंत्रोच्चार से वह नागरिक के माथे पर बीमातिलक लगा देता है। लेकिन जैसे ही उस नागरिक को इंश्योरेंस के क्लेम की ज़रूरत पड़ती है, तब अचानक वह परिचित एजेंट ‘सिस्टम’ बन जाता है। और सिस्टम के लिए तो काग़ज़ लगाने ही पड़ते हैं।
किसी नागरिक की छवि आयकर इंस्पेक्टर की आँखों में उतर जाए, तो उसके परदादा ने बचपन में उसे जो चवन्नी दी होती है, उसको भी गैरकानूनी नकद लेनदेन साबित कर दिया जाता है। लेकिन ईमानदारी से टैक्स देने के बाद बचे हुए पैसे हड़पकर, जब कोई बिल्डर घर नहीं देता तो वकीलों को बिल्डर की बेईमानी सिद्ध करने में दस-दस साल लग जाते हैं।
काग़ज़ जब चाहे प्रकट हो जाता है, जब चाहे विलीन हो जाता है। यह काग़ज़ की लीला है। इसलिए आपका पेट भरे या न भरे, काग़ज़ का पेट भरते रहो। क्योंकि रहीम ने कहा है- “रहिमन काग़ज़ राखिए…”
✍️ चिराग़ जैन

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