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रात के अंधेरे में

सुना है कि चिरैया के नुचे हुए पंखों को उसके घोंसले की मिट्टी नसीब न हो सकी। रात के अंधेरे में घरवालों को घर में बन्द करके पुलिस ने बिटिया की चिता जला दी। उसकी मिट्टी से लिपटकर रो लेने का भी अधिकार न मिल सका लाचार परिवार को।
सुनते हैं, इस देश में कोई असुरक्षित महसूस करे तो पुलिस उसे सुरक्षा देती है। लेकिन अपने आंगन की निरपराध चिरैया का दाह संस्कार करने का अधिकार मांगनेवाले परिवार से पुलिस को न जाने कौन-सी असुरक्षा महसूस हुई होगी। जेल में बन्द दुर्दांत अपराधी के परिवार में कोई मौत हो जाए तो उसे भी अंतिम संस्कार में शामिल होने की छूट मिल जाती है, लेकिन यह क्या था कि परिवार में मौत होने पर निरपराध परिवार को घर में क़ैद करके अंतिम संस्कार किया गया। हो सकता है कि अव्यवस्था को रोकने के लिये प्रशासन को यह आवश्यक जान पड़ा हो, किन्तु मनुष्यता के लिए यह कृत्य उस अपराध से कम नहीं था, जिसके कारण उस आंगन की चहक मातम में बदल गई।
इंद्रजीत की मृत्यु के बाद श्रीराम ने पुत्र के अंतिम संस्कार तक युद्ध विराम की घोषणा करके शोकग्रस्त शत्रु को जो अभय दिया था, कल रात हाथरस में उस परम्परा की चिता जल गई।
इस देश का तंत्र एक आमूल-चूल परिवर्तन की बाट जोह रहा है। स्पष्ट शब्दों में सुन लीजिए, क़ानून की आँखों में धूल झोंकने पर आप जिसकी पीठ थपथपाएंगे, वह एक दिन आपकी आँखों में धूल ज़रूर झोंकेगा। इसलिए, अच्छा अथवा बुरा, सशक्त अथवा कमज़ोर; जो भी लिखित संविधान हमारे पास है; उसका मखौल बनाने की इजाज़त किसी को नहीं मिलनी चाहिए; फिर चाहे वह पुलिस हो या अपराधी!
एक बेटी कल रात मिट्टी हो गई। जाओ चिरैया, तुम्हारे पोर-पोर पर हुए घाव किसी पोस्टमार्टम रपट में कम या ज़्यादा दर्ज हो जाएंगे; लेकिन तुम्हारी आत्मा पर जो खरोंचें पड़ी हैं उनकी सिसकी लिखने के लिए कोई पोथी पूरी न पड़ेगी। अब हम तुम्हारी जाति पर चर्चा करके तुम्हारे मनुष्य होने के अधिकार का हनन करेंगे; अब हमारा तंत्र तुम्हारे बयान बदलने की कहानियाँ गढ़कर तुम्हारे प्रति उपजी संवेदनाओं पर आरी चलाएगा। अच्छा हुआ बिटिया, तुमने आँखें मूंद लीं, वरना इस देश में न्याय की तलाश में तुम्हें यह तंत्र बार-बार वह हादसा दोहराता हुआ दिखता।

✍️ चिराग़ जैन

बलात्कार की जड़ें

बलात्कारी कहीं आसमान से नहीं आते। हम जैसे ही सामान्य दिखनेवाले लोग होते हैं, ये वीभत्स अपराधी। स्त्री सुरक्षा को लेकर जो कुछ बातें बनाई जाती हैं, उनकी निस्सारता हर बार उघड़कर सामने आती है। हमारे यहाँ रात-बेरात लड़कियों को अकेली जाने पर मनाही थी। लेकिन निर्भया काण्ड से पता चला कि किसी का साथ होना भी काम नहीं आता। बुलन्दशहर कांड में तो पिता के सामने माँ-बेटी को एक साथ रौंदा गया।
अब रात और दिन का भी कोई अर्थ नहीं रहा। हवस ने अब घड़ी देखना बन्द कर दिया है। बलात्कारी भी शेष समाज की तरह अमीर-ग़रीब, शिक्षित-अशिक्षित, अगड़े-पिछड़े, हिन्दू-मुस्लिम कई प्रकार के होते हैं। अमीर बलात्कारी यकायक किसी को खेत में जाकर दबोचने से परहेज करता है। वह बाक़ायदा आर्थिक, सामाजिक अथवा अन्य किसी प्रकार का दबाव बनाकर लड़की के साथ इत्मीनान से सालों तक बलात्कार कर सकता है। जबकि ग़रीब बलात्कारी के पास न तो ऐसा कोई लोभ होता है, न धैर्य। इसलिए वह मौक़ा देखते ही वीभत्स होने में यक़ीन करता है।
कुछ विशेष किस्म के बलात्कारी घर से यह सोचकर नहीं निकलते कि उन्हें बलात्कार करना है। वे तो बस हाथ आये अवसर का लाभ उठाते हुए कभी लड़की की छातियाँ मसलते दिखते हैं तो कभी दंगों या बलवों का लाभ उठाकर लूटपाट के साथ बलात्कार भी कर देते हैं। यह सब इतना अचानक घटित होता है कि न तो बलात्कारी को पुलिस की वर्दी बदलने का वक़्त मिलता है, न ही किसी धर्म विशेष का पटका गले में से उतारने की सुधि रहती है। शायद बलवों में विरोधी धर्म की बहन-बेटियों की आबरू लूटना वीरता माना जाता हो। अन्यथा किसी धर्म की रक्षार्थ निकले जत्थों में एक न एक व्यक्ति तो इस कर्म का विरोध करने के लिए आगे ज़रूर आता।
हर दुर्दांत कांड के बाद हम सरकार से कड़े कानूनों की मांग कर बैठते हैं। सरकारें भी अपनी राजनीति बचाने के लिए क़ानून बना देती हैं, लेकिन जब भी कोई लड़की अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अथवा किसी से अन्य बदला लेने के लिए इन कानूनों का दुरुपयोग कर रही होती है, तब वह किसी नए बलात्कार की नींव रख रही होती है। जब-जब इन कानूनों का दुरुपयोग होता है तब-तब समाज ऐसी घटनाओं के प्रति संवेदनहीन होता जाता है।
हैदराबाद, बुलंदशहर, कानपुर, हाथरस, अलवर, दिल्ली, गुवाहाटी… ये सब शहर ऐसी घटनाओं पर शर्मिंदा होकर अपनी बेटियों के आगे लज्जित हो चुके हैं। कॉलेज परिसर से लेकर खेत-खलिहानों तक और न्याय के मंदिर से लेकर धर्म के मंदिरों तक इस अपराध ने पैर पसारे हैं। यौन-कुंठित नपुंसकता जब पौरुष का भरम पाल लेती है, तब बलात्कार होता है। अत्याधुनिक बनने की होड़ जब ‘ओपन माइंडेड कल्चर’ की आड़ में असभ्य शब्दावली को सामान्य मानने लगती है, तब बलात्कार होता है।
स्कूल से निकलती बच्चियों से लेकर कचरा बीनती अधेड़ तक; तीन महीने नई नवजात से लेकर 80 वर्ष की वृद्धा तक, असुरक्षा के इस अभिशाप को झेलती हैं। मतलब साफ़ है, बलात्कार किसी शारीरिक सुख की प्राप्ति का ज़रिया नहीं, बल्कि पाशविक प्रवृत्ति के मुखर हो जाने का परिणाम है। और इस प्रवृत्ति को खाद-पानी देने में समाज का प्रत्येक वर्ग समान अपराधी है।
हम सबको अपने समाज में पनप रही इस पशुता को अपने-अपने स्तर पर नष्ट करना होगा, क्योंकि तंत्र से अपेक्षा रखकर हम अब तक कई बेटियों की ज़िंदगी बर्बाद कर चुके हैं।

✍️ चिराग़ जैन

वधस्थल में है लोकतंत्र

सोशल मीडिया पर एक पार्टी विशेष के नेताजी पर कोई टिप्पणी की जाए अथवा कोई प्रश्न पूछा जाए तो यकायक कमेंट बॉक्स गालियों से भरने लगता है। इन गालीबाज़ों की प्रोफाइल देखें तो अधिकतर ने अपनी प्रोफाइल पर किसी धर्मविशेष अथवा दलविशेष के समर्थन की घोषणा कर रखी होती है।
इस घोषणा के तमगे से सजी प्रोफ़ाइलधारी जब अश्लील, भद्दी और असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं, तो उससे उस धर्म अथवा दल की छवि पर क्या प्रभाव पड़ेगा -इस विषय पर कोई इसलिए नहीं बोलना चाहता क्योंकि राजनीति को यह बात समझ आ गई है कि इस देश से लोकतंत्र का दौर समाप्त होने जा रहा है और ‘बाहुबल’ के आधार पर वह तानाशाही व्याप्त हो रही ह,ै जिसे सभ्य भाषा में गुंडागर्दी कहा जाता है। और गुंडागर्दी के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करनेवाले सभ्य नागरिकों की नहीं, बल्कि अराजक, असभ्य और बर्बर मवालियों की आवश्यकता होती है।
मुम्बई में व्यंग्य-चित्र फॉरवर्ड करने पर एक दल विशेष के कार्यकर्ताओं द्वारा एक वरिष्ठ नागरिक की पिटाई की घटना उसी विषबेल का पहला फल है जो पूरे देश में एक राष्ट्रीय पार्टी ने अब तक बोई है। भीड़ की आड़ में निजी दुश्मनी निकालने की परंपरा, मॉब लिंचिंग की गलियों से गुज़रते हुए अब सरेआम गुंडागर्दी की शक्ल ले चुकी है।
कंगना रनौत के मुद्दे पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार की राजनैतिक तनातनी का विकृततम रूप यह है कि एक राजनैतिक दल अपने मुखपत्र में साफ़-साफ़ लिखता है कि कंगना रनौत ने पानी में रहकर मगरमच्छ से वैर किया है।
उफ़्फ़! क्या यही लोकतंत्र की भाषा है। समाचार पत्र के माध्यम से सरेआम धमकी देने के लिए क्या कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। हम रिया, कंगना, सुशांत के कंधे पर रखी राजनैतिक बंदूकों के डिजाइन पर मुग्ध होकर यह क्यों नहीं देख पा रहे हैं कि सिस्टम की विफलताओं का लाभ उठाकर इन राजनैतिक बंदूकों से लोकतंत्र की हत्या की जा रही है।
भाजपा, शिवसेना, कांग्रेस, टीएमसी, जद …ये सब वेदियाँ तभी तक पूज्य हैं जब तक लोकतंत्र का मंदिर सलामत रह सकेगा। हम किसी भी राजनैतिक विचारधारा से प्रभावित हों, लेकिन लोकतंत्र की जड़ों में मट्ठा डालनेवालों का विरोध करते समय उस विचारधारा के परिचय पत्र का बचाव नहीं करना चाहिए।
भारत की मूल प्रवृत्ति लोकतंत्रात्मक है। यदि लोकतंत्र ध्वस्त हुआ तो कुछ न बच सकेगा। सत्ता का विरोध करनेवालों पर अचानक भिन्न-भिन्न धाराएँ लगने लगती हैं। क्यों भई! इस देश के सिस्टम को शर्म से मर नहीं जाना चाहिए कि मुंबई जैसे शहर में कंगना रनौत जैसी प्रसिद्ध हस्ती ने ग़ैरकानूनी निर्माण कर रखा था और उस पर एक्शन तब हुआ जब उसने सत्ता का विरोध किया। क्या हमारी एजेंसियों को अपने नाकारापन पर शर्म नहीं आनी चाहिए कि मुंबई फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोग ड्रग्स का सेवन करते हैं और उसकी खुशबू तक एजेंसियों को तब तक नहीं आती जब तक रिया चक्रवर्ती को गिरफ़्तार करने के बाकी सब रास्ते बंद नहीं हो गए।
शर्मनाक स्थिति तक आ चुका है हमारा सिस्टम और वधस्थल में लाकर बांध दिया गया है हमारा लोकतंत्र। अपनी-अपनी राजनैतिक निष्ठाएँ त्यागकर यदि लोकतंत्र के पक्ष में चेतना नहीं आई तो हमारे महान देश के भविष्य पर गहरा अंधकार पसर जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

पत्रकारिता का अंधा युग

जिस पत्रकारिता ने आदर्श, सिद्धांत, जनहित, सच और क्रांति जैसे शब्दों को अर्थ प्रदान किये, वही आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। सुनते हैं कि देश में जब कभी विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के स्तम्भ जर्जर हुए हैं, तब-तब अकेले इस एक स्तम्भ ने लोकतंत्र के ढाँचे को बचाए रखा है। ‘जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’ जैसे जुमलों से सुसज्जित पत्रकारिता आज ‘दलाली’ की गाली झेलने पर विवश है। गणेश शंकर विद्यार्थी और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे कलमकारों के वंशज आज जनता से पिट रहे हैं और गालियाँ खा रहे हैं।
ग़ुलामी के दिनों में अंग्रेज सरकार की नाक में दम करनेवाली पत्रकारिता; आपातकाल में इंदिरा सरकार के खि़लाफ़ काले पन्ने पोतने वाली पत्रकारिता आज इतनी लाचार और जर्जर हो गई है कि नैतिकता और आदर्श तो दूर, अपने पेशे के मूलभूत नियमों का निर्वाह करने में भी असमर्थ सिद्ध हो रही है।
कभी पत्रकारों को इस बात का अभिमान होता था कि उनकी स्टोरी पर आज संसद में सवाल पूछा गया। कभी संपादक इस बात पर इतराते थे कि उनका अख़बार आज संसद में लहराया गया। कभी राजनीति को इससे फ़र्क़ पड़ता था कि अख़बार उनके विषय में क्या लिख रहे हैं। लेकिन आज राजनीति ने लोकतंत्र के वाचडॉग को स्ट्रीट डॉग जितना महत्व देना भी बंद कर दिया है। जो जनता पत्रकारों को अपनी आखि़री उम्मीद मानती थी, वह आज पत्रकारों को मारने पर उतारू है।
टीआरपी की अंधी दौड़ ने सुंदरियों को एंकर बनाने की जो मुहिम शुरू की थी वह आज चैनल वॉर तक आ पहुँची है। कभी अख़बार पढ़कर राजनीति की दिशा तय की जाती थी, लेकिन आज राजनीति का मूड देखकर ख़बरें बनाई जा रही हैं। चैनल के एंकर किसी आततायी आक्रमणकारी की तरह अराजकता की हद्द को लांघकर ख़बरें पढ़ रहे हैं। सड़क पर खड़ा पत्रकार हाँफ-हाँफ कर पीटूसी कर रहा है। बहस में माँ-बहन की गालियाँ ऑन एयर जाने लगी हैं।
क्या यही वह न्यूज़ एंकरिंग है जिसकी बुनियाद सुरेन्द्र प्रताप सिंह सरीखे संवेदनशील मनुष्य ने रखी थी। अख़बारों ने बाज़ार का लेप इतना ज़्यादा लगा लिया है कि अख़बार की आत्मा कहा जाने वाला सम्पादकीय पृष्ठ हाशिये पर चला गया है। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में नम्बर वन की ऐसी होड़ है कि बलात्कार और अपराध की ख़बरों को चटपटा बनाने के लिए मनुष्यता को चूल्हे की आँच में झोंकना आम हो गया है।
कभी जनमत की देवी कही जाने वाली पत्रकारिता आज उद्योगपतियों की रखैल और हुक्मरानों की दासी हो चली है। हिंदी फिल्मों में भी जिस पत्रकारिता की बेईमानी के सीन दिखाने में हिचकिचाहट बनी रही है, वह आज बिना सेंसर की ‘सी क्लास’ फिल्मों से भी ज़्यादा नीचे उतर आई है।
ख़बरों से खेलने और स्क्रीन भरने के कौशल से टीआरपी के आँकड़े जुटाते पत्रकार अगर इस वक़्त में ठहरकर अपने अस्तित्व की चिंता न कर सके तो यह स्थिति और भी भयावह हो जाएगी। कुर्सी से उछल-उछलकर टीआरपी बटोरते एंकर यह विचार करें कि जिनका काम जनता को बौद्धिक ख़ुराक़ देना था, वे आज घृणा मिश्रित उपहास के पात्र बनते जा रहे हैं।
धन अर्जित करना कोई अपराध नहीं है, लेकिन धन की इस भूख में जनहित को भेंट चढ़ा देना न तो नैतिकता है, न ही समझदारी। आज राजनैतिक दलों की और अपने अन्नदाता उद्योगपतियों के हस्तक्षेप के कारण यह स्थिति तो आ ही चुकी है कि सत्ताधारी दल की मर्ज़ी के बिना स्टोरी तो क्या टिपर चलाने की भी हैसियत किसी चैनल की नहीं है। इस स्थिति का प्रतिकार न किया गया तो सत्ता के स्वार्थ और जनता की घृणा के मध्य पत्रकारों की हालत यह होगी कि फ़ख़्र से गाड़ी पर ‘प्रेस’ का स्टिकर चिपकानेवाले व्हाइट कॉलर जर्नलिस्ट्स को यह बताते हुए शर्म आएगी कि वे मीडिया से हैं।

✍️ चिराग़ जैन

हम अराजक हो रहे हैं

अराजकता किसी भी स्थिति में समाधान के पथ का पाथेय नहीं हो सकती। प्रतिशोध से कभी शांति नहीं आती। कबीलाई संस्कृति में, जब न्याय हेतु कोई अधिकृत व्यवस्था नहीं थी, तब प्रतिशोध-दर-प्रतिशोध ही होता रहता होगा। किन्तु जब सामाजिक व्यवस्था के लिए एक तंत्र की निर्मिति हो गई है, तो उस पूरी व्यवस्था को धता बतानेवाले लोग लोकतंत्र की जड़ों में मट्ठा डाल रहे हैं।
यदि न्याय व्यवस्था में ख़ामियाँ हैं, तो उनको दूर करने के प्रयास किये जाएँ, यदि पुलिस व्यवस्था में कोई दोष है तो उसे ठीक करने के तरीके अपनाए जाएँ। यदि सभी अपना न्याय स्वयं करने लगे, तो हम वापिस आदिम युग की ओर लौटने लगेंगे। और अबकी बार यह आदिम युग और भी अधिक भयावह होगा, क्योंकि अबकी बार हम अत्याधुनिक तकनीक से युक्त होंगे।
‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ कहकर राजनीति ने 1984, 1992, 2002 और 2019 जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं पर लीपापोती इसलिए की क्योंकि इन सबके पीछे राजनीति के अपने-अपने गणित थे। इस देश के लोकतंत्र की जड़ें अब धरती छोड़ रही हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से बाक़ायदा लॉबी बनाकर समाज में घृणा के बीज बोए जा रहे हैं।
जिस माध्यम को सामाजिक-जुड़ाव के लिए निर्मित किया गया था, वही आज समाज के बीच गहरी-गहरी खाइयाँ बना रहा है। हर एक शख़्स किसी न किसी का ‘घोर समर्थक’ अथवा ‘घोर विरोधी’ बना घूम रहा है। गाली-गलौज, अपमान, अभद्रता आम बात हो गई है।
इस स्थिति का लाभ उठाकर कोई भी किसी धर्म के महापुरुष को अपमानित करने की पोस्ट डालता है और उस महापुरुष के अनुयायी भड़क उठते हैं। अराजक हो जाते हैं। हिंसक हो उठते हैं। आगज़नी करते हैं। …उन्हें लगता है कि वे बदला ले रहे हैं; जबकि वास्तव में वे अपने महापुरुष का अपमान करनेवाले का सहयोग कर रहे होते हैं। चिंगारी लगानेवाला शख़्स आपको अधीर, असभ्य, अशिष्ट, अराजक और असामाजिक सिद्ध करना चाहता था। आपने हिंसक होकर उसका उद्देश्य पूर्ण कर दिया।
अब आपके महापुरुष उस व्यक्ति के कारण नहीं, बल्कि आपके कारण अपमानित हो रहे हैं। थोड़ा-सा समझने की ज़रूरत है कि क्या हमारे प्रवर्तक, हमारा धर्म, हमारी जाति और हमारे पुरखों के प्रभाव की जड़ें इतनी कमज़ोर हैं कि किसी के एक ट्वीट से वे प्रभावित होंगीं? जिन्होंने सिर्फ अपने आचरण से समाज को बदलकर दिखा दिया, उनकी कीर्ति का अपमान करने की क्षमता किसमें होगी?
समाज ने जिसको पत्थर मारे हैं, वह युग के पटल का शिलालेख बन गया। समाज ने जिसको विष दिया उसकी कीर्ति अमर हो गई। समाज ने जिसका बहिष्कार किया वह घर-घर में स्थापित हो गया। हमारे महापुरुष इतने कमज़ोर नहीं हैं कि पत्थरों से अपमानित हो जाएंगे। जिन्होंने पत्थरों को छूकर इंसान बना दिया हम उन्हें पत्थरों तक ही क्यों सीमित रखना चाहते हैं?
राम, कृष्ण, जीसस, महावीर, बुद्ध, पैग़म्बर, नानक… ये सब मनुष्यता के मानस में विद्यमान न हो सके, तो इनके स्मारकों का कोई मोल नहीं होगा। मस्जिद से निकलकर हिंसक होनेवाला शख़्स पैग़म्बर का सबसे बड़ा अपराधी है। मंदिर से निकलकर अराजक होने वाला शख़्स राम का सबसे बड़ा दुश्मन है।
और हाँ, जो पत्थर मारता है, उसका नाम किसी को नहीं पता होता; लेकिन जिसको पत्थर मारे जाते हैं, उसके हस्ताक्षर समय की हथेली पर अंकित होते हैं।
मौत ने ईसा को शोहरत की बुलन्दी बख़्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ानेवाले
✍️ चिराग़ जैन

मानवता को श्रद्धांजलि

ऋषि कपूर के निधन पर कुछ लोगों ने उन्हें हिन्दू विरोधी कहकर उनको श्रद्धांजलि देनेवालों को लानत भेजी। अमित शाह जी के कोविड संक्रमित होने पर भी कुछ संवेदनहीन लोगों ने नंगा नाच किया। राहत इंदौरी जी के निधन पर भी इस प्रवृत्ति को मुखर होते देखा।
यह किस समाज की स्थापना कर रहे हैं हम लोग? मतभेद को घृणा के किस मुकाम तक ले आए हैं हम? देर तक विचार किया, तो समझ आया कि जिस देश में धर्म अथवा जाति के आधार पर बने किसी राजनैतिक दल को संविधान में वैध नहीं माना जाता, उस देश की पूरी राजनीति धर्म और जाति के आधार पर समाज में घृणा फैलाने में सफल हो गई है।
विश्वास कीजिये, राजनीति का सिर्फ़ एक ही धर्म होता है और वह है सत्ता। इस धर्म के निर्वाह के लिए आध्यात्मिक मूल्यों से लेकर विचारधारा तक सबकी बलि चढ़ाई जा सकती है। जो आपसे आपके हिन्दू होने या मुस्लिम होने की दुहाई देकर वोट मांग रहा है, जो आपको दलित या सवर्ण होने का वास्ता देकर वोट मांग रहा है, वह किसी भी स्थिति में देश को समग्र विकास के पथ पर नहीं ले जा सकेगा।
राजनीति ने हमें विधर्मियों की घृणा से इतना लबरेज कर दिया है कि हम अपने ही धर्म के संस्कार भूल गए। ‘चाहे मय्यत हो किसी की, बढ़ के कंधा दीजिये, रंजिशें अपनी जगह, इंसानियत अपनी जगह’ – यह बात तो हमारी मनुष्यता की पक्षधर जान पड़ती है, इस बात ने तो कभी कहीं कोई दंगा नहीं करवाया! फिर हम इसको कैसे भूल गए?
मेघनाद की मृत्यु के उपरांत उसके शव को ससम्मान उसके परिजनों तक पहुँचानेवाले राम; अपनी पत्नी के अपहृता रावण तक कि मृत्यु को अपमानित न करने वाले राम; शत्रु की मूर्च्छा का उपचार करनेवाले सुषेण; शाप देने वाले श्रवण कुमार के माता-पिता की अंत्येष्टि करनेवाले दशरथ ….क्या कुछ भी याद नहीं रहा हमें। अभी तो राम मंदिर के शिलान्यास की ईंट भी ढंग से नहीं जमी कि हमने राम के समस्त आचरण से मुँह फेर लिया।
अनजाने शव को भी ससम्मान पंचतत्व में विलीन करनेवाले इस देश की संवेदनाएँ इतनी भौंथरी कैसे हो गईं भाई!
हमें क्यों नहीं समझ आता कि अनजाने ही जिन दलों के एजेंट बनकर हम आपस का व्यवहार कलुषित कर रहे हैं, उनके लिए हमारा धार्मिक मनोबल केवल वोट जुटाने का एक ज़रिया भर है। जिन विचारधाराओं के पीछे हम अपने अड़ोस-पड़ोस के लोगों से घृणा कर रहे हैं चुनाव का बाद सत्ता का जोड़-तोड़ के लिए उन विचारधाराओं का बलात्कार करने से पहले, हमसे एक बार पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा जाता।
मैं यहाँ उस हर दल की बात कर रहा हूँ जो ख़ुद को दक्षिणपंथी, वामपंथी, सेक्यूलर या अन्य किसी भी तमगे से नवाज़ने का ढोल पीटते हैं। यदि इनके पास सिद्धांत, नैतिकता या विचार जैसा कोई शब्द होता तो मूर्ति को फिजूलखर्च कहनेवाले आज ब्राह्मणों का वोट पाने के लिए मूर्ति बनवाने की घोषणा न कर रहे होते। यदि ये विचार के ही प्रति समर्पित होते तो वामपंथी दल राजग में कभी न रहे होते। कश्मीर में वह सरकार कभी न बनी होती जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
लेकिन इस सबके लिए राजनीति ही दोषी नहीं है। हम भी तो परशुराम की मूर्ति देखते ही उन नेताओं की पिछली करतूतें भूल जाने में माहिर हैं। हम भी तो राहुल गांधी का जनेऊ देखकर उसके धर्म पर बुलेटिनों में बहस करने लगते हैं।
हमें क्या लेना-देना, तुम्हारे धर्म से। तुम जनेऊ पहनो या न पहनो। तुम टोपी लगाओ या न लगाओ। तुमने चाय बेची या शोरूम चलाया… इस सबसे हमें क्या मतलब! हमें तो यह बताओ कि देश कैसे चलाओगे? हमें तो यह बताओ कि न्याय व्यवस्था कैसे सुधरेगी? हमें तो यह आश्वस्ति चाहिए कि हमारे वोट का दुरुपयोग तो नहीं करोगे?
किसी भी दल में सारी अच्छाइयाँ नहीं हो सकतीं। इसीलिए सभी दलों की थोड़ी-थोड़ी अच्छाई के दम पर लोकतंत्र की गाड़ी चलती रहती है। लेकिन आजकल लगभग सभी दलों में एक बुराई ज़रूर घर कर रही है कि किसी धार्मिक मुद्दे को उछाल दो तो जनता आपस में लड़कर ख़ुश रहती है। इस बुराई के लिए केवल जनता ज़िम्मेदार है। और जनता ही इस कैंसर से देश की राजनीति को मुक्त कर सकती है।
अब हम मृत्यु पर भी गाली-गलौज करने लगे हैं। कम से कम अब तो दो मिनिट का मौन रखकर इस मरती हुई मानवता को श्रद्धांजलि देने का प्रयास करें।

✍️ चिराग़ जैन

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