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काश हम समझ सकें!

हर इक मर्यादा के उस पार न हो जाएँ
इक रोज़ कहीं हम सब, बीमार न हो जाएँ

लाइक्स और कमेंट्स बटोरने की ललक सोशल मीडिया यूज़र्स से जो न करवा दे, वही कम है। इस होड़ में किसी की चरित्र हत्या होती हो, तो होती रहे; किसी की जीवन भर की साधना पर कालिख़ पुतती हो तो पुत जाये; किसी का जीवन बर्बाद होता हो तो हो जाये; किसी का परिवार नष्ट होता हो तो हो जाये; हमें तो बस इससे मतलब है कि हमारी पोस्ट की रीच कितनी हुई!
और पढ़नेवाले भी इतनी जल्दबाज़ी में रहते हैं कि लिखनेवाले की बात का पूर्णार्थ और भावार्थ ग्रहण किये बिना ही लाइक ठोककर आगे बढ़ जाते हैं। कुछ लोग तो पढ़ने की जेहमत भी नहीं उठाते और हर पोस्ट को लाइक करते हुए अभियान की तरह फेसबुक का दौरा करते हैं। इस प्रवृत्ति के कारण सोशल मीडिया की विश्वसनीयता और नैतिकता लगभग ध्वंस हो चली है।
इण्डियन आइडियल नामक एक रिएलिटी शो में श्री संतोष आनन्द जी को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया तो संतोष जी के अनुभव तथा जीवन यात्रा को सुनकर लोगों की आँखें भर आईं। इस भावुकता में नेहा कक्कड़ ने संतोष जी को पाँच लाख रुपये की राशि ‘भेंट’ करने की पेशकश की तो संतोष जी ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि ‘मैं बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति हूँ इसलिए यह राशि स्वीकार नहीं कर सकता।’ इस पर नेहा ने रुंधे हुए गले से कहा कि मैं आपकी पोती हूँ और आप मेरी ख़ुशी के लिए यह राशि स्वीकार करें।
इस घटना को कुछ लाइक-लोलुपों ने यह कहकर फेसबुक पर पोस्ट किया कि ‘इतना मशहूर गीतकार भीख मांगकर गुज़ारा कर रहा है।’
उफ़, इस एक शब्द ने नेहा कक्कड़ के वात्सल्य और संतोष आनंद जी के स्वाभिमान; दोनों को गाली दी। हमें याद है जब संतोष जी के परिवार पर सबसे बड़ा दुःख टूटा था तब भी हमने संतोष जी को टूटते हुए नहीं देखा। अपने जवान बेटे की श्रद्धांजलि सभा में जब संतोष जी ने माइक थामा तो उनके बूढ़े जिस्म के सम्मुख उनका आत्मविश्वास तथा उनका जीवट सूर्य की तरह दमक रहा था। जिन संतोष आनंद का जीवन हिम्मत और स्वाभिमान के लिए अलंकृत होना चाहिए उनके जीवन को दया की कहानी बनाने का कुप्रयास किसी पाप से कम नहीं है।
कलाकार समाज की धरोहर भी होता है और उत्तरदायित्व भी। कलाकार समाज के एकाकी क्षणों का सम्बल होता है। कलाकार किसी व्यक्ति के भीतर चल रहे घमासान में उसके आत्मबल की ढाल होता है। न जाने कब, कौन-सी कविता, किसी मनुष्य को आत्मघात से बचा लाती है। न जाने कब कौन-सी पंक्ति किसी मनुष्य को अपराधी होने से रोक लेती है। न जाने कब कौन-सा संगीत भीतर ही भीतर घुट रहे मनुष्य को अभिव्यक्त होने में सहायता कर देता है।
कला की यह सामाजिक उपयोगिता समझनेवाले लोग कलाकारों का सम्मान करते हैं। इन अनुभवों से गुज़रे हुए लोग जब अपने प्रिय कलाकार को कोई राशि अर्पित करते हैं तो वह ‘भीख’ नहीं, ‘भेंट’ कहलाती है। सड़क किनारे ठण्ड में ठिठुर रहे किसी निर्धन के प्रति करुणा से भरकर उसे चादर या कम्बल ओढ़ाने में और अपने पिता को दुःशाला ओढ़ाने में जो अन्तर है; वही अन्तर ‘भीख’ और ‘भेंट’ में है।
सोशल मीडिया की जल्दबाज़ प्रवृत्ति से किसी के स्वाभिमान पर कैसा वज्रपात होता है; काश यह बात लोग समझ सकें।
किसी की निजता को बदनाम करके अपने पेज की रीच बढ़ाना कितना घातक चलन है; काश यह बात लोग समझ सकें।
काश यह बात लोग समझ सकें कि शब्दों के घाव कभी नहीं भरते। काश, कुछ भी लिख देने से पहले यह बात लोग समझ सकें कि संन्यास लेकर भी सम्राट अशोक अपने हाथों मारे गये लोगों को जीवित नहीं कर सके थे।

✍️ चिराग़ जैन

किसान आंदोलन, सरकार और कोविड

आज भारतीय शासन-तंत्र के प्रति श्रद्धा उमड़ रही है। इतने बड़े देश को सही से चलाने के लिये हर समस्या का समाधान खोजने चले तो सिस्टम के पसीने छूट जायेंगे, इसीलिये इसका श्रेष्ठ उपचार यह है कि जो आपके पास समस्या लेकर आये उसे किसी और समस्या में उलझा दो। इससे उसकी समस्या का समाधान नहीं होगा, लेकिन नयी समस्या में उलझते ही वह मूल समस्या को भूल ज़रूर जायेगा।
आप अदालत में कोई मुक़द्दमा दर्ज कराओ, अदालत आपको प्रक्रियाओं और औपचारिकताओं के ऐसे जंजाल में उलझा देंगी कि अपनी मूल पीड़ा को बयान करना आपको याद ही नहीं रहेगा। इससे लाभ यह है कि जब आप किसी अन्याय अथवा उत्पीड़न के शिकार होते हैं तो थाने और कचहरी की उलझनों से मिलनेवाले कष्ट की मात्रा का आप कार्यवाहियों से मिलनेवाले कष्टों की मात्रा से तुलनात्मक अध्ययन करते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जिसने आपके साथ बुरा किया है, उसे ईश्वर एक दिन दण्ड देगा। इससे मनुष्य में ईश्वर के प्रति आस्था पुष्ट होती है।
इसी शानदार विधि से सरकार ने किसानों के आन्दोलन को डील किया। जो किसान कृषि बिल वापस लेने की मांग लेकर घर से चले थे, उनको सरकार ने बताया कि बिल पर चर्चा तब करेंगे जब दिल्ली आकर हमसे बात करोगे। अब किसानों को दिल्ली में घुसना, कृषि बिल वापस लेने की मांग से ज़्यादा ज़रूरी लगने लगा। पूरे देश का ध्यान इस पर केंद्रित हो गया है कि किसान दिल्ली में घुस पाएंगे या नहीं। कृषि बिल के औचित्य पर चर्चा करना किसी को महत्त्वपूर्ण लग ही नहीं रहा।
अराजकता को रोकने के लिये राज्य का अराजक हो जाना प्रशंसनीय है। सरकार की मंशा किसानों का अहित नहीं है। वह चाहती है कि मंडी के दाम और मुनाफ़े जैसे भौतिक प्रश्नों से ऊपर उठकर किसान एक दिन अध्यात्म की ओर मुड़ें और ईश्वर पर भरोसा रखते हुए घर लौट जायें।
लाल बहादुर शास्त्री जी ने एक नारा दिया था – ‘जय जवान, जय किसान।’ किसान आंदोलन में इस नारे का जो स्वरूप देखने को मिल रहा है वह आश्चर्यजनक है।
सरकार ने पुलिस के जवानों को निर्देश दिया है कि किसानों को दिल्ली में नहीं घुसने देना है। इस निर्देश का पालन करने के लिये पुलिस के जवान किसानों पर पानी की बौछार कर रहे हैं, आँसू गैस के गोले दागे जा रहे हैं। सीआरपीएफ, पुलिस और रेपिड एक्शन फोर्स मिलकर ‘किसी भी हाल में’ किसानों को राजधानी में घुसने से रोकने के लिये कटिबध्द हैं।
चूँकि भारत एक लोककल्याणकारी गणराज्य है इसलिये सरकार को यह क़दम किसानों की भलाई के लिये उठाना पड़ रहा है। सरकार जानती है कि इतनी बड़ी संख्या में किसान दिल्ली में इकट्ठा होंगे तो इससे कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ सकता है। इसलिये सरकार किसानों को दिल्ली में घुसने से रोक रही है। क्योंकि कोरोना वायरस हरियाणा और पंजाब में जाने से परहेज करता है।
कुछ मूढ़ लोग सरकार से पूछ रहे हैं कि हरियाणा उपचनाव, मध्य प्रदेश उपचुनाव और बिहार विधानसभा चुनाव में कोरोना फैलने का ख़तरा क्यों नहीं था। उन मूर्खों को इतनी-सी बात समझ नहीं आती कि चुनाव लोकतंत्र के लिये सर्वाधिक आवश्यक हैं किन्तु सरकार की नीतियों का विरोध करना लोकतंत्र में अब निषिद्ध हो चुका है।
लोकतंत्र की रक्षार्थ समर्पित पुलिस के जवान, क़ानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये लोकतंत्रात्मक तरीक़े से चुनी गयी सरकार के विरुद्ध सड़क पर उतरे किसानों को रोक रही है तो इसमें क्या ग़लत है।
उधर श्रम सुधार के एजेंडे पर लाखों मजदूर हड़ताल पर हैं लेकिन उनकी कोई ख़ास ख़बर दिखाने का समय मीडिया के पास नहीं है। क्योंकि सारे संवाददाता अभी किसानों को रोकने के लिये की जा रही पुलिस कार्रवाई की कवरेज में व्यस्त हैं। कोविड को लेकर इतनी सतर्कता तो बरतनी ही पड़ेगी कि जनता के बहुत सारे मुद्दों को एक साथ इकट्ठा न होने दिया जाये। मुद्दों में सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर ही कोविड से लड़ा जा सकता है। सरकारों की इस सदाशयता पर किसी तथाकथित बुद्धिजीवी का ध्यान ही नहीं जाता।
दिल्ली सरकार ने कोविड से बचने के लिये मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का चालान दो हज़ार रुपये कर दिया है। बेचारे ग़रीब किसान दिल्ली में इतना महंगा चालान कैसे भरेंगे – इस चिंता के समाधान स्वरूप सरकार ने पुलिस को कहा है कि किसानों को दिल्ली में न घुसने दो ताकि दिल्ली की क्रूर सरकार उनसे दो-दो हज़ार रुपये न वसूल पाये। हमें केंद्र सरकार की इस सहृदयता की सराहना करनी चाहिये।
लाल बहादुर शास्त्री को इस बात का अनुमान भी नहीं रहा होगा कि भविष्य की राजनीति उनके नारे को इतना प्रचारित करेगी। आज अलग-अलग राजनेताओं ने अपनी-अपनी टीम बना ली है। सड़क पर दंगल चल रहा है। एक राजनैतिक दल जवानों को चीयर कर रही है और दूसरा राजनैतिक दल किसानों को। चैनल के स्टूडियो से रनिंग कमेंट्री चल रही है। ‘किसानों का जत्था बॉर्डर की ओर बढ़ा आ रहा है, पुलिस ने पानी की तेज़ बौछार से किसानों में अफरा-तफ़री मचा दी। पानी की बौछार तेज़ होती जा रही है और दर्शक दीर्घा के एक खेमे से ‘जय जवान’ का उद्घोष गूंजने लगा। उधर किसानों ने पानी की बौछार को पछाड़ते हुए बैरिगेट उठाकर फेंक दिये और पुलिस के जवानों पर पत्थरबाज़ी करनी शुरू कर दी। बैरिगेट के हवा में उठते ही दर्शक दीर्घा के दूसरे खेमे में जोश आ गया और वहाँ ‘जय किसान’ का नारा गूंजने लगा। अब पुलिस का पलड़ा भारी… अब किसान का पलड़ा भारी… दंगल रोमांचक होता हुआ… दर्शक दीर्घा में जोश बढ़ता हुआ… अब जय जवान के नारे गूंजने लगे… अब जय किसान के नारे गूंजने लगे…
दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर जो आँसू गैस के गोले चले उनके कारण लोकतंत्र और लाल बहादुर शास्त्री, दोनों की आँखों से आँसू बह रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन

बात-बात पर बदलें मापदण्ड

हैदराबाद में पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया। इस घटना पर एक तबक़ा पुलिस को साधुवाद देते हुए यह तर्क दे रहा था कि न्याय व्यवस्था की विफलता के कारण पुलिस का यह क़दम तर्कसंगत है। यह शाबासी इस बात की भी गवाही दे रही थी कि यह एनकाउंटर एक वेल प्लैन्ड इंसिडेंट था।
विकास दुबे एनकाउंटर केस में भी लगभग यही तर्क दिये गये और उन बधाई संदेशों में उत्तर प्रदेश सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा से यह प्रतिध्वित हो रहा था कि पुलिस सरकार के निर्देश पर काम कर रही थी और सरकार में शेरदिल व्यक्ति बैठा है इसलिये अपराधी को ऑन द स्पॉट निपटाया जा सका।
किन्तु हाथरस काण्ड में पुलिस द्वारा किये गये अर्द्धरात्रि शवदाह में पुलिस की ग़लती बताकर सरकार ने कुछ पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया। सरकार ने उस परिवार को मुआवज़ा और सरकारी नौकरी दी जिसने कथित रूप से अपनी ही बेटी की हत्या करके उसका आरोप कुछ ‘बेचारे’ बेगुनाहों पर मढ़ दिया।
सलमान ख़ान को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई और चंद घण्टों की भागदौड़ में ही उस ऊँची अदालत ने उसको बरी कर दिया, जिसमें अपील दर्ज कराने में महीनों गुज़र जाते हैं। उस समय यह तर्क दिया गया कि समाजोपयोगी व्यक्ति होने के नाते सलमान ख़ान की रिहाई तर्कसंगत है।
सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में उसी समाजोपयोगी व्यक्ति सलमान ख़ान के चरित्र को फ़िल्म जगत् का सबसे बड़ा माफिया, नेपोटिज़्म का पोषक और न जाने किन-किन अलंकारों से सुसज्जित किया गया।
कंगना राणावत के दफ़्तर पर बुलडोजर चला, तब बताया गया कि राज्य सरकार सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके निजी द्वेष निकाल रही है। अर्णब गोस्वामी को जेल हुई तो बताया गया कि राज्य सरकार ने पुलिस के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई है। निचली अदालत ने अर्णब गोस्वामी की जमानत रद्द की तो पता चला कि न्यायपालिका राज्य सरकार के इशारे पर काम कर रही है। फिर अदालती कार्रवाई की धीमी गति के नियम को तोड़कर कछुआ, खरगोश की तरह दौड़ा और ताबड़तोड़ अर्णब भैया की जमानत ऊँची अदालत से मंज़ूर हो गयी। हम सुप्रीम कोर्ट के प्रति कृतज्ञता से भर गये। हमने न्याय व्यवस्था की तारीफ़ों के पुल बांध दिये।

काफ़ी कन्फ्यूज़न क्रिएट हो गया है। समझ नहीं आ रहा कि-
1) वास्तव में हमारी न्याय व्यवस्था नपुंसक है या महान है?
2) यदि न्यायालय समाजोपयोगी व्यक्ति की पहचान करने में सक्षम है तो फिर न्याय की मूर्ति की आँखों पर पट्टी बांधने के पीछे क्या उद्देश्य है?
3) विकास दुबे के एनकाउंटर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बधाइयाँ क्यों मिलती हैं? फिर हाथरस में पुलिसवाले क्यों सस्पेंड होते हैं?
4) पुलिस द्वारा क़ानून की धज्जियाँ उड़ाकर एनकाउंटर करना कैसे उचित है?
5) यदि निचली अदालत राज्य सरकार के इशारे पर चल सकती है तो ऊँची अदालतें केंद्र सरकार के इशारे पर क्यों नहीं चल सकतीं?
6) हैदराबाद, कानपुर और हाथरस में पुलिस की मनमानी जस्टिफाइड है, तो मुम्बई में पुलिस की मनमानी अन्याय कैसे है?
7) यदि महाराष्ट्र की राज्य सरकार सरकारी विभागों और संवैधानिक संस्थाओं का प्रयोग अपने हित में कर सकती है तो अन्य प्रदेशों की सरकारें और केंद्र में बैठी सरकारें ऐसा क्यों नहीं कर सकती?
और सबसे महत्वपूर्ण जिज्ञासा- यदि हर बार, हर घटना पर मापदंड बदल जाने हैं तो हमारे देश में लिखित संविधान की व्यवस्था क्यों है?

मैं इस देश के लोकतंत्र से इतनी सी अपेक्षा करता हूँ कि हमारे लिखित संविधान से ऊपर कोई भी न हो। यदि समाज में कोई विकृति व्याप्त हो तो हमारे चुने हुए प्रतिनिधि देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठकर उस विकृति के समाधान हेतु लिखित संविधान में आवश्यक परिवर्तन करें और न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक का तमाम तंत्र उसी लिखित संविधान के अनुरूप आचरण करके लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखें। इसके इतर व्यवस्था को जिस भी तरीके से चलाया जायेगा उसका प्रत्यक्ष शिकार भले ही अर्णब हो, कंगना हो या रिया हो… लेकिन परोक्ष रूप से उसका हर वार लोकतंत्र की आत्मा पर ही होगा।

✍️ चिराग़ जैन

सुना है…

सुना है, कुछ वर्ष पूर्व मुम्बई में कोई परिवार, एक पत्रकार को दोषी ठहरा कर आत्मघात कर गया। मुम्बई पुलिस ने मुआमले की तफ़्तीश की और बिना किसी पर आरोप सिद्ध किये, मुआमला बन्द हो गया।
सुना है, इस बीच मुम्बई में बैठी सरकार के साथ दिल्ली में बैठी सरकार का झगड़ा हो गया। परिवार बँटा तो घर के बर्तनों से लेकर चाटुकारों तक को बाँट लिया गया।
सुना है, इस मांडवाली में उक्त पत्रकार दिल्ली वाली सरकार के हिस्से आ गया और उसने मुम्बई वाली सरकार के खि़लाफ़ ख़ूब ज़हर उगला।
सुना है, मुम्बई सरकार ने उक्त पत्रकार को उसकी औक़ात याद दिलाने के लिये आत्महत्या वाले उस मुआमले को फिर से खुलवा दिया और उस पत्रकार को गिरफ़्तार करवा लिया।
सुना है, इस देश में पुलिस जनता के लिये काम करती है।
सुना है, इस देश में पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है।
सुना है, इस देश में न्यायपालिका भी है।
सुना है, इस देश में जनता का शासन है।
सुना है, आत्महत्या करने वाले परिवार ने भी ऐसी कई बातें सुन रखी थीं।
✍️ चिराग़ जैन

एक अदद मनुष्य का सवाल है

दो दिन पहले हिसार की ख़बर थी कि एक व्यापारी को उसकी कार में ज़िन्दा जला दिया। अब करौली की ख़बर है कि मन्दिर के पुजारी को ज़िन्दा जला दिया।
हे ईश्वर! पाशविकता का यह पथ आखि़र किस मन्ज़िल तक ले जायेगा हमारे समाज को। मैंने बचपन में एक महिला को आग की लपटों में घिरे हुए सड़क पर दौड़ते देखा है। (वह एक दुर्घटना थी, जिसमें खाना बनाती महिला की साड़ी ने अंगीठी से आँच पकड़ ली थी) लेकिन उस महिला की चीख़ें आज भी मेरे दिल को दहला देती हैं। मैं महीनों ठीक से सो न सका था।
पीड़ा, भय, निराशा और करुणा से गुँथी वह चीख़ जब भी याद आती है तो मन विह्वल हो उठता है। मैं कल्पना कर रहा हूँ कि उस चीख़ में आक्रोश और घृणा भी मिल जाये, तो उससे तो सारा ब्रह्मांड काँप जाता होगा। फिर ऐसे कौन लोग हैं जिनके ज़मीर इनके प्रभाव से अनछुए रह जाते हैं!
इस घटना पर भी राजनीति और प्रशासन अपनी-अपनी फेस सेविंग से ज़्यादा कुछ न करेंगे, लेकिन इस आग की राख से यह प्रश्न पुनः उठ खड़ा हुआ है कि हम कौन से समाज का निर्माण करने में व्यस्त हैं? हम किस सभ्यता को पोसने में बेसुध हुए जा रहे हैं? हिन्दू-मुस्लिम; सवर्ण-दलित; ब्राह्मण-मीणा …और कितने विभक्त होंगे हम। कल ब्राह्मणों में भी शैव-वैष्णव होने लगेगा। आखि़र कहाँ जाकर अन्त होगा इस अभिशाप का?
करौली की घटना को ब्राह्मण बनाम मीणा का रंग दिया जा रहा है। हद्द है, हम उस समाज की स्थापना क्यों नहीं करते जिसमें पीड़ित और अपराधी दोनों को ही केवल मनुष्यता की कचहरी में खड़ा किया जाये! एक मीणा के अपराध से पूरा मीणा समाज अपराधी कैसे हो गया?
इस हिसाब से तो देश का प्रत्येक व्यक्ति अपराधी है। सामान्यीकरण की इसी प्रवृत्ति की आँच पर राजनीति अपनी रोटियाँ सेंकती है। ‘मरने वाला आदमी था क्या यही क़ाफ़ी नहीं!’ यही हमने हाथरस में किया और यही करौली में।
जातियों के इस वर्गसंघर्ष से देश को बचाने के लिये समाज में मुरझाती जा रही मानवता के बीजों को संरक्षित करना होगा ताकि अपराध करनेवाले को इस बात का डर रहे कि यदि वह अपराध करके घर लौटेगा तो अपने मुहल्ले में रहनेवाले मनुष्यों से आँखें कैसे मिलायेगा?

✍️ चिराग़ जैन

दुर्घटना : एक अवसर

एक फिल्मी सितारे ने अपने घर में फाँसी लगा ली। ख़बर सुनकर देश सन्न रह गया, लेकिन एक विशेष वर्ग ने उसके फिल्मी क़िरदार को लेकर उसे अपने धर्म का विरोधी घोषित किया और उसकी मृत्यु पर शोक न करने के संदेश सोशल मीडिया पर लिखे।
बाद में दो दलों के राजनैतिक हित टकराए और उस आत्महत्या को हत्या कहकर मुद्दे को हवा दी गई। कोरोना को ढाल बनाकर दूसरी स्टेट के पुलिस अधिकारी को क्वेरेन्टीन कर दिया गया। फिर सीबीआई, फिर नारकोटिक्स, फिर रिया की गिरफ़्तारी, फिर कंगना राणावत, फिर पूरे बॉलीवुड का ड्रग्स एंगल, फिर बॉलीवुड को उत्तर प्रदेश लाने की बात! पोस्टमार्टम रपट पर संदेह करके पोस्टमार्टम रपट का पोस्टमार्टम कराया गया। जिन्होंने सुशांत को अपने धर्म का विरोधी बताया था, उन्होंने ही बिहार में सुशांत राजपूत के चित्र दिखाकर वोट मांगे। और इतने सब ड्रामे के बाद सीबीआई को आत्महत्या के एंगल से जाँच करने के लिए नियुक्त किया गया।
कहीं कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटती है तो राजनीति की आँखों में आँसू नहीं, चमक आती है। उत्तर प्रदेश में बलात्कार हो तो भाजपा विरोधी राजनीतिज्ञ ख़ुश हो गए कि योगी सरकार को घेरने का मौक़ा मिल गया। अलवर में बलात्कार हो गया तो भाजपा ने राहत की साँस ली कि अब जब कोई हाथरस की बीन बजाएगा तो हम अलवर का नगाड़ा पीट कर उसकी आवाज़ को दबा देंगे।
विश्वास कीजिये, ये सब घटनाएँ राजनीति के लिये ‘अवसर’ से अधिक कुछ नहीं हैं। आज पाँच पुलिसवाले सस्पेंड कर दिए गए, ताकि हम सरकार की वाहवाही कर सकें। हम यह कभी नहीं समझेंगे कि जब तक राजनीति के रिमोट पर उंगली नहीं लगती, तब तक न तो पुलिस हिलती है न ही प्रशासन! डीएम का निलंबन भी हो जाए तो रिमोट पर उंगलियाँ तो वही रहेंगी।
इस हंगामे के बीच हम पुलिस के रवैये पर इतने फोकस्ड हो गए हैं कि अपराधियों पर किसी का ध्यान ही नहीं है। और यह वही पुलिस है जिसकी गाड़ी पलटने पर हुए एनकाउंटर की घटना पर उसके गुण गाए जा रहे थे। उन्नाव हो या जयपुर; दिल्ली हो या मुम्बई; राजनीति, मुद्दों की खरपतवार में सत्ता का फल ढूंढ ही लेती है।
हमारा दुर्भाग्य यह है कि जब ये सब राजनैतिक दल खरपतवार में घुसकर सत्ता का फल ढूंढ रहे होते हैं तब हम यह भ्रम पाल लेते हैं कि ये खेत को खरपतवार से मुक्त करने के लिए मेहनत कर रहे हैं। यह इनकी आपसी खेल भावना है कि हारनेवाला भी कभी यह भेद नहीं खोलता कि खेत में दरअस्ल हुआ क्या था।
जनता, इस राजनैतिक खिलवाड़ के लिए आपस में दुश्मनी पालने की बजाय, यदि केवल मौन रहना भी शुरू कर दे तो राजनीति के हाथों देश का छला जाना बंद हो जाएगा। क्योंकि जब जनता आपस में लड़ने लगती है, तो राजनीति के पासों की आवाज़ सुनाई नहीं देती।

✍️ चिराग़ जैन

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