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आषाढ़ के दो दिन

एक वर्ष पूर्ण हो गया। आज ही के दिन सुबह दस बजे अपने घर को और घर के दरवाज़े पर खड़ी माँ को जी भरकर निहारने के बाद मैं अस्पताल पहुँच गया था। मेदांता के एक बेड पर मेरा नाम लिख दिया गया था। हाथ पर एक पट्टा बांध दिया गया था, जिसके रहते अस्पताल की अनुमति के बिना सशरीर उस परिसर से बाहर निकलना सम्भव नहीं था।
डॉ अनिल भान ने मेरी रिपोर्ट्स देखकर अगले ही दिन ऑपरेशन करने का निर्णय लिया। अगले दिन ऑपरेशन हो जाए इसके लिए अच्छी-ख़ासी रक़म एडवान्स जमा करनी थी। उस पर भी तकनीक का तुर्रा ये कि अस्पताल केवल क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ही राशि स्वीकार करता था। लाखों रुपये यकायक क्रेडिट कार्डस से भुगतान करने के लिए मेरा परिवार एक-एक संपर्क को फोन करने में जुट गया।
अस्पताल प्रशासन को अनुभव था कि जिसका मरीज़ जीवन-मृत्यु के बीच जूझ रहा हो वह पैसा जुटा ही लेगा। सो, परिवारवालों को उनके संघर्ष के भरोसे छोड़कर मेरी आवश्यक जाँच कराने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। व्हीलचेयर पर बैठकर मैं विभाग दर विभाग भटकता रहा। हाथों में इतनी बार सूई चुभ चुकी थी कि अब दर्द होना बंद हो गया था।
परिवार का जो सदस्य मेरे साथ इस परीक्षण-पर्यटन में उपस्थित होता, वह बाहर चल रही आर्थिक कवायद को छुपाने का भरसक प्रयास करता लेकिन भय से भीगी आँखों में उत्पन्न झुंझलाहट में मैं वह सब पढ़ पा रहा था।
मेरी दोनों बहनों और बहनोई ने धरती-अम्बर एक करके रात 2 बजे तक अस्पताल की पेमेंट क्लियर कर दी। इस संघर्ष से पार पाकर जब छोटी बहन मेरे पास आई तो मुझे एंजियोग्राफी के लिए ले जाया जा रहा था। सुबह जिस भाई को स्मार्ट कपड़ों में भर्ती कराया था उसे अस्पताल के ढीले ढाले कपड़ों में नलियों से घिरा देखकर उसके चेहरे का रंग उतर गया। मुझसे नज़रें मिलीं तो अलक तक चढ़ आए आँसू को भीतर धकेलने की हिम्मत दिखाते हुए बोली- ‘सब फिट हो गया, डॉक्टर ने कहा है कल ऑपरेट हो जाएगा। सारे टेस्ट परफेक्ट हैं।’
मैं भी अपने हिस्से का अभिनय करता हुआ हामी भरकर एंजियोग्राफी के लिए चल पड़ा। सुबह से उपवास पर था, और उस पर परीक्षण की भागदौड़ के कारण सामने खड़ी मृत्यु से भयभीत होने की फुर्सत ही नहीं मिली।
जब भी कोई नर्स या डॉक्टर इंजेक्शन लेकर आता तो मैं ‘मंटो’ की ‘खोल दो’ कहानी याद करके हँसते हुए दोनों हाथ आगे कर देता था। अस्पताल के भीतर समय का भान ग़ायब हो गया था।
थकान जब तनाव से लिपट कर सो रही थी, तब मुझे यह सोचने की मोहलत मिली कि शायद अपना सफ़र यहीं तक का था। यह बात सोचकर घबराने ही वाला था कि किसी ने कान में कहा- ‘मूर्ख, विचलित क्यों होता है। यही तो विवेक की परीक्षा है। विपरीत परिस्थिति में सहज रह सके तभी तो पता चलेगा कि स्थितप्रज्ञ क्या होता है।’ नज़र घुमाकर देखा तो कमरे में कोई नहीं था। शायद मैं ख़ुद से बात कर रहा था।
‘समस्या को स्वीकार कर लेना समाधान की ओर पहला क़दम है। जो होगा देखा जाएगा, तू बस इस पूरी प्रक्रिया को साक्षीभाव से देख। अगर जिवित बच गया तो यह अनुभव तेरे सृजन को प्रभावी बना देगा।’
मैंने आँख खोली तो नीले कपड़े पहने एक नर्स अपनी पूरी जान लगाकर मेरे हाथ पर एक पट्टी कस रही थी। कलाई पर जहाँ एंजियोग्राफी का कट लगा था, उस हिस्से पर बिटाडीन जैसी कोई दवाई पुती हुई थी और एक सख़्त-सी चीज़ से कटी हुई नस को दबाकर बहुत टाइट पट्टी बांध दी गई थी। वह सख़्त चीज़ लगातार हाथ को पीड़ा पहुँचा रही थी। पीड़ा का अभ्यास करते हुए जाने कब मुझे नींद आ गई। सुबह आँख खुली तो पूरी कलाई पर नील पड़ गया था। समान्य स्थिति में इतना गहरा नील दिखता तो चिन्ता हो जाती, लेकिन अब एक बड़ी समस्या सामने थी इसलिए इस नील से कोई भय उत्पन्न नहीं हुआ।
कलाई लगातार दुःख रही थी। लेकिन मैं इस प्रक्रिया के अधिकतम कष्ट को स्वीकार कर चुका था, सो यह पीड़ा मेरी भंगिमा को प्रभावित नहीं कर पा रही थी। मुझे समझ आ गया था कि यह जो कुछ हो रहा है इसका न तो कारण मैं हूँ, न ही इसका निवारण मेरे पास है। इसलिए क्षोभ, करुणा, पीड़ा जैसा कोई भाव मुझे स्पर्श नहीं कर पाता था। सृजन का भरपूर सुख भोगा था इसलिए जीवन से कोई शिक़ायत भी नहीं थी। वैभव और सांसारिक कष्ट ख़ूब भोगे थे इसलिए कोई अधूरी इच्छा भी याद नहीं आ रही थी। माता-पिता के बुढ़ापे को सोचकर पलकें भीगी ज़रूर, लेकिन अपनी बहनों के समर्पण और विश्वास का सम्मान रखने के लिए नयन कोर को आँसू के भार से बचाए रखा।
बच्चे याद आए तो भी मन को यह कहकर समझा लिया कि वे अपनी ‘माँ’ के संरक्षण में हैं, इसलिए मेरा अभाव झेल जाएंगे।
मेरी दोनों बहनें और बहनोई मुझे यमराज से छीन लाने की सावित्री साधना कर रहे थे। माँ घर पर रहकर इस संशय से जूझते हुए सबका खाना बनाकर भेजती रही और पिताजी मेरी तरह निःशब्द होकर इस घड़ी के बीत जाने की बाट जोहते रहे।
नर्स ने बताया, पेशेंट को सर्जरी के लिए ले जाना है। जो बहनें इस घड़ी के लिए कल रात तक पैसा जुटा रही थीं, उनका मौन चीख पड़ा। कुछ ही मिनिट बाद मैं सब अपनों से दूर प्री-ओटी में था। यहाँ एक बार फिर ब्लड प्रेशर और स्ट्रेस लेवल की जाँच की गई। रिपोर्ट का हर आँकड़ा परफेक्ट था। मेरी देह और मेरा मानस शल्यक्रिया के लिए तैयार था।
एनेस्थीसिया के डॉक्टर ने मुझे पहचान लिया। वह टीवी पर मुझे देख चुका था। उसने बातचीत करनी शुरू की और मेरी सहजता को और निश्चिंत कर दिया।
मुझे व्हीलचेयर पर बैठकर ऑपरेशन थियेटर तक चलने को कहा गया लेकिन मैंने अनुरोध करके अपने पैरों पर चलकर जाना चाहा। हल्की सी ना-नुकर के बाद डॉक्टर ने मेरा अनुरोध मान लिया। ऐसा मैंने इसलिए किया क्योंकि मैं इस महत्वपूर्ण सफ़र को अपने पैरों से तय करना चाहता था।
मुझे अच्छी तरह याद है, ओटी की ओर जाते समय डॉ भान ने एक दरवाज़े में से झाँककर कहा था- ‘चलो कवि जी, आपसे दिल खोलकर मिलते हैं।’
मुझे उनका हास्यबोध अच्छा लगा। ओटी में स्ट्रेचर पर लेटते ही डॉक्टर्स की एक फौज ने मेरे स्ट्रेचर को घेर लिया। सब तेज़ी से अपने अपने काम में जुट गए। मेरे शरीर पर अलग-अलग नलियाँ लगने लगीं, तरह-तरह की मशीनों से मुझे जोड़ दिया गया। मेरठ के एक डॉक्टर साहब ने मुझसे कविता सुनाने का आग्रह किया। मैं थोड़ा घबराया हुआ था सो उन डॉक्टर साहब की शक्ल देखने लगा। वे मेरी मनोदशा भाँप गए और बोले, चलो मैं सुनाता हूँ। उन्होंने रश्मिरथी का शांतिपर्व पढ़ने की शुरुआत की। …सह धूप घाम पानी पत्थर …पाण्डव आए कुछ और निखर …मेरा भय विलुप्त हो गया। मुझे लगा कि यह शल्यक्रिया मृत्यु की ओर नहीं ब्लकि एक निखरे हुए जीवन की ओर ले जा रही है। मेरी मनोदशा सकारात्मक हो गई।
क्षण भर में मैंने महसूस किया कि देशभर में मेरे अपने मेरे जीवन की दुआ कर रहे हैं। सुरेन्द्र जी, अरुण जी, मनीषा, प्रवीन, देवदत्त, सुष्मीत, पँवार जी… इन सबसे तो मेरी बात हुई थी। सभी की आवाज़ में स्नेहसिक्त चिंता थी। जब इतने सारे लोग चिन्ता करने के लिए उपस्थित हैं तो मैं क्यों चिन्ता करूँ। मैंने रश्मिरथी के पाठ में अपना स्वर मिला दिया। …मुझमें विलीन झंकार सकल …मुझमें लय है संसार सकल …अमरत्व फूलता है मुझमें …तभी मेरी काया में सूई चुभी और मेरी चेतना लुप्त हो गयी।
इसके बाद किसी ने मेरे गाल थपथपाते हुए मेरा नाम पुकारा। मैंने आँखें खोलीं तो नाक, मुँह और पेट में अलग-अलग तरह की नलियाँ लगी थीं। गाल थपथपाने वाले व्यक्ति ने पूछा- ‘कुछ पिछला याद है?’ मैंने वेंटिलेटर लगे गले से बोलने का प्रयास किया- ‘सब कुछ।’
डॉक्टर- ‘कुछ ऐसा याद करो, जो बचपन में पढ़ा हो।’
मैं- ‘जटाटवीगलज्ज्वल प्रवाहपावितस्थले…’
‘मेमोरी ओके!’ -डॉक्टर ने बीच में ही टोक दिया।

डॉक्टर के चेहरे के एक्सप्रेशन बता रहे थे कि युद्ध जीता जा चुका है, अब ये नलियाँ हटाने की साधना करनी है।
अब तक बाहर खड़े रहकर मेरी मृत्यु से लड़ रहे मेरे अपने आईसीयू के द्वार तक आ पहुँचे थे। मैं उन सबकी हँसती हुई आँखों में वो सारा दर्द देख पा रहा था, जो मेरे दिल की चीर-फाड़ के समय एनेस्थीसिया की ओट में छिप गया था।
एक महीने बाद जब घर लौटा तो घर में घुसते ही मैं बिलखकर रो पड़ा था। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था कि इस घर में मैं सही-सलामत लौट आया हूँ।
अब वही भागदौड़, वही व्यस्तता, वही आपाधापी फिर से जीवन का हिस्सा बन गई है। इस एक वर्ष में मैंने हर उस दुआ का आभार व्यक्त किया है जो उस समय मेरे जीवन यज्ञ की समिधा बनने को तैयार थी।
अब जब कभी कोई संकट मेरे पास आना चाहता है, तो मैं उसे 6-7 जुलाई 2021 की कहानी सुनाकर ठहाका लगाता हूँ कि कहीं और जा बे, मैं तेरे अब्बा से मिल चुका हूँ!

✍️ चिराग़ जैन

कविता की नयी पौध

मुझे प्यार करनेवालों का कहना है कि मैं बहुत अच्छा लिखता हूँ। सुनकर अच्छा लगता है। मेरे अपनों का मानना है कि मैं सबसे अच्छा लिखता हूँ। सुनकर आश्वस्ति होती है कि मेरे पास मुझे ‘अपना’ माननेवाले ख़ूब लोग हैं। मेरे पाठकों का कहना है कि मुझ जैसा कोई नहीं लिख सकता। सुनकर एक मीठा-सा अहंकार उपजता है।
इस अहंकार में जब मैं अन्य ‘अच्छा लिखनेवालों’ की वॉल पर जाता हूँ तो मेरे भीतर उपजता अहंकार का अंकुर क्षण भर में सूख जाता है। आयु में मुझसे दस-बारह वर्ष कम रहकर भी कुछ लोग इतना श्रेष्ठ लेखन करते हैं कि कई बार अपना समस्त लेखन निरर्थक जान पड़ता है।
पिछले दिनों फेसबुक पर संजू शब्दिता को पढ़ा। उनकी वॉल विचार के खोजियों के लिए ख़ज़ाना हाथ लगने जैसा अनुभव है। हर पोस्ट में दो मिसरे हैं और हर मिसरे में आपको सुखद आश्चर्यबोध से भर देने का सामर्थ्य है। चूँकि मैं सर्वज्ञ नहीं हूँ अतः यह तो नहीं लिख सकता कि वे इस दौर की सर्वश्रेष्ठ शायरा हैं, लेकिन इतना अवश्य लिख सकता हूँ कि किसी विचार को जिस नज़रिए से संजू ग़ज़ल तक लाती हैं, वैसा नज़रिया मेरे संज्ञान में अन्यत्र कहीं नहीं मिला। पीड़ा की ख़ुद्दारी और निर्वेद की स्थिति तक दार्शनिक होती हुई इनकी शायरी बड़े-बड़े सुख़नवरों के लिए सोच के नये रास्ते खोलती है। ईमानदारी से कहूँ तो संजू शब्दिता वे पहली लेखिका हैं, जिनके कुछ अशआर से मुझे ईर्ष्या हुई कि काश यह बात मैंने कही होती।
उधर एक रचित दीक्षित हैं। ये शख़्स इस दौर का औघड़ है। कबीर जैसा बेलाग। मन के भीतर जो बात, जिस शब्दावली में उतरती है; उसे जस का तस काग़ज़ पर उतार देता है। तेवर ऐसा कि उसकी छोटी सी कविता बिना म्यान के नश्तर की तरह सीधे अवधान के आर-पार हो जाती है। नैतिकता और सामाजिकता की रस्म निभाती मान्यताएँ यकायक मनुष्यता की एक सपाटबयानी के आगे बौनी सिद्ध हो जाती हैं। बहुत समय बाद रचित के रूप में एक ऐसा कवि पढ़ने को मिला है, जो जन-मान्यता के अनुरूप नहीं मन-मान्यता के अनुरूप शब्द गढ़ता है।
एक नन्हीं-सी बालिका है इति शिवहरे। भाषा के जिस मुहावरे से स्वयं भाषाविद पल्ला झाड़ चुके थे, उस प्रांजल शब्दावली को बहते पानी की रवानी बना देती है अपने गीत में। उसे पढ़ता हूँ तो अनुभूत कर पाता हूँ कि क्लिष्ट शब्दावली से रसास्वादन करनेवाला मेरे भीतर का पाठक इस समय में कहीं पूर्ण तृप्त हो सकता है तो वह इति की लेखनी है। फोन पर बात की तो पाया कि उसकी आवाज़ ने अभी बचपन की देहरी पार नहीं की है लेकिन उसकी शब्दावली प्रौढ़ता की भी दूसरी पीढ़ी के पार पहुँच गयी है। इति को पढ़कर हमेशा यही दुआ की है कि काश ईश्वर समाज के भाषा संस्कार को इस योग्य बनाए कि इस बच्ची को अपनी भाषा का सरलीकरण करके साहित्य रचने पर विवश न होना पड़े।
एक स्वधा रवीन्द्र जी हैं। उनकी लेखनी से साक्षात्कार किया तो एकाध गीत तक तो ऐसा लगा कि हाँ, हो गया होगा किसी पुण्य के फल से कोई एकाध गीत। लेकिन ज्यों-ज्यों स्क्रोल करता गया… मन किसी अदृश्य शिकंजे में जकड़ता चला गया। भाव की ऐसी तरलता कि गीत यकायक पढ़नेवाले के चेहरे की भंगिमा से अठखेलियाँ करने लगे। अलक, भृकुटि, ओष्ठ-अन्त, नथुने, कण्ठ, नयनकोर… एक-एक अंग-उपांग उनके गीत की भावभूमि के पर्यटन पर निकल जाए। वे अक्सर मुझे ‘बालक’ कहकर संबोधित करती हैं। लेकिन उन्हें पढ़कर लगता है कि उन पर सरस्वती की जितनी कृपा है उसके अनुरूप उनका यह संबोधन ही मुझे वाग्देवी से कुछ आशीष दिला देता होगा।
एक वाशु पाण्डेय। शायरी करता है। ग़ज़ल के व्याकरण और कथ्य दोनों को पूरी शिद्दत से साधता हुआ यह नौजवान ज़िन्दगी में सर्वाधिक मुहब्बत क़लम से ही करता है। उससे कभी बतियाने की कोशिश करेंगे तो उसकी हर बात में शायरी मिल जाएगी। जज़्बा ऐसा कि जैसे एक दिन पूरे ज़माने को अपने जैसा बनाकर ही दम लेगा। तबीयत ये कि जो बात हमारे दिल में आ गयी उसे ठीक वैसे ही न कहा तो काहे के शायर। वाशु के ढेर सारे अशआर कब मेरी बातचीत को प्रभावी बनाने के काम आने लगे… मुझे पता ही नहीं चला। उसकी शायरी को पढ़ते हुए ऐसा कई बार लगा है कि इस उम्र में ये हाल है तो दस-बीस साल बाद ये लड़का क्या करेगा!
आप भी कभी फ़ुर्सत निकालकर इन सबको पढ़ लें और फिर मुझे बताएँ कि इनमें से किसी के विषय में ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर तो नहीं लिख दिया। तब तक मैं अपने अहंकार को ध्वस्त करने के लिए क़लम के और सितारों की तलाश जारी रखूंगा।

✍️ चिराग़ जैन

जनरल विपिन रावत की शहादत

भारतीय शौर्य का शीर्ष लहूलुहान है। एक उड़न-खटोले के ध्वंस ने माँ भारती की गोद को छलनी कर दिया। मृत्यु का यह क्रूर ताण्डव एक क्षण में दर्जन भर शेरों को मिट्टी बना गया।
यह दुर्घटना देश को ठगे जाने के एहसास से भर गयी है। ऐसा लग रहा है कि जिन वृक्षों को सींचकर जेठ की धूप के लिए घना किया जा रहा था, उन्हें यकायक पूस का पाला मार गया। जिन्होंने अपने जीवन का दाँव लगाकर देश को सुरक्षित रखने की शपथ उठाई थी, वे अनमोल जीवन बिना कारण ही ख़र्च हो गये। जिनके कन्धों पर देश की सुरक्षा की पालकी रखकर हम निश्चिंत थे, वे अचानक कन्धों पर सवार हो गए।
देव पर चढ़ने जा रहे मोतियों को मार्ग में ही कोई कौआ चुग गया। यह घटना पुलवामा की याद ताज़ा कर गयी है। जो देश की सुरक्षा के उत्तरदायी हैं, उनकी सुरक्षा का दायित्व किस पर है -यह प्रश्न फिर से मुँह उठाकर खड़ा हो गया है।
रावत साहब! आपका यह सेल्यूट स्वीकार नहीं हो पा रहा है। आप वीरों को लेकर स्वर्ग चले गए हैं और हम जीवित विजेता की तरह ठगे खड़े हैं। समस्याओं की शरशैया पर पड़े भीष्म की बिंधी हुई देह में दर्जन भर तीर और उतर गये हैं। वीरप्रसूता भारती की कोख कभी बांझ तो नहीं होती लेकिन जब भी उसका कोई लाल ‘ऐसे’ काल के गाल में समाता है तो उसका कलेजा ज़रूर फटता है।
यद्यपि यह शोक का समय है, तथापि घर के बुजुर्गों की एक सीख याद आ रही है कि यात्रा के समय धन को अलग-अलग जेबों में बाँटकर रखना चाहिए, ताकि कोई गिरहकट यदि जेब काट ले तो भी किसी न किसी जेब में घर लौटने का किराया बचा रह जाए।
ट्विटर और फेसबुक पर इस महाशोक के लिए सम्वेदनाओं की धारा बह रही है। इस बार कोई उत्तरदायी नहीं है तो सम्वेदना व्यक्त करनेवालों के आचरण में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रद्रोह के चिह्न तलाशे जा रहे हैं। मुझे लगता है कि राष्ट्रप्रेम के नारों के बीच, मौन ओढ़कर सो चुके इन मंत्रों को कुछ देर के लिए यह आश्वस्ति तो दी ही जानी चाहिए कि अपने-अपने वाद में जकड़े उनके देशवासी किसी अवसर को तो अपनी आवाज़ ऊँची करने का अवसर मानने से परहेज कर लेते हैं।
हर किसी की मृत्यु को राजनैतिक कहासुनी का अवसर माननेवालों को कुछ समय के लिए ही सही लेकिन मौन होकर माँ भारती के आँसुओं की आवाज़ सुनने का धैर्य जुटाना सीखना होगा।
✍️ चिराग़ जैन

बुजुर्गों का रुआब

अभी घर से निकला। एक बुज़ुर्ग महिला सड़क किनारे एक ट्री-गार्ड को पकड़कर खड़ी थी। उन्हें शायद किसी सोसाइटी में जाना था लेकिन बिना सहारे के चलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं और ट्री-गार्ड को पकड़े हुए आते-जाते लोगों की ओर कातर दृष्टि से निहार रही थीं।
सोसाइटी के बाहर इस समय बहुत तो नहीं, लेकिन थोड़ी चहल-पहल भी थी। पर अपनी-अपनी व्यस्तता लादे वहाँ से गुज़रनेवाला कोई शख़्स रुककर उस वृद्धा की सहायता न कर सका।
मैं फोन पर ऊबरवाले से कॉर्डिनेट कर रहा था। एक बार मैं भी अपनी कैब पकड़ने के चक्कर में उस कातर दृष्टि को अनदेखा करने की हिम्मत जुटा गया, लेकिन दो-तीन क़दम ही बढ़कर मुझे पलटना पड़ा।
मैंने उनकी ओर हाथ बढाते हुए धीरे से पूछा- ‘आंटी, कहीं छोड़ दूँ?’
उन्होंने मेरा वाक्य पूरा होने से पहले ही मेरी हथेली थाम ली और ट्री-गार्ड छोड़कर मेरी ओर बढ़ आईं। सामनेवाली सोसाइटी के गेट पर गार्ड ने उनका हाथ मेरे हाथ से अपने हाथ में लिया और मुझे कहा कि मैं अम्मा को घर छोड़ दूंगा, आप जाइये।
मैंने वृद्धा की ओर देखा तो उनके चेहरे की घबराहट एक आश्वस्ति में तब्दील हो चुकी थी। मैं आकर अपनी कैब में बैठ गया और सोचने लगा कि क्या कभी वह दुनिया वापस आएगी जब बुजुर्गों को सहायता के लिए कातर दृष्टि की नहीं, आवाज़ के रुआब का प्रयोग करना होगा।
मैंने यह घटना इसलिए नहीं लिखी कि मुझे स्वयं को महान सिद्ध करना है, बल्कि मैं अपने उन दो क़दमों के लिए स्वयं से मुख़ातिब हूँ, जो मैं अपनी व्यस्तता का बहाना करके बढ़ा चुका था।
हम सब अपनी व्यस्तताएँ ओढ़े हुए मनुष्यता की कातर दृष्टि से दो क़दम आगे बढ़ चुके हैं। यदि यहाँ से हम नहीं पलटे तो मनुष्यता किसी सड़क किनारे यूँ ही खड़ी रह जाएगी!
✍️ चिराग़ जैन

अनवरत साधना

कवि-सम्मेलन करते हुए दो दशक बीत गये, इन दो दशकों में जिन लोगों को पूंजी की तरह कमाया, उनमें से एक नाम है श्री अमीरचन्द जी का। यह नाम मेरे जीवन में एक ऐसा अध्याय है, जिससे मैंने समर्पित होकर अनवरत साधनारत रहना सीखा। क्रोध तथा मान-अपमान के चिन्तन से विलग रहते हुए अनवरत सामाजिक जीवन कैसे जिया जाता है, यह मैंने अमीरचन्द जी से सीखा।
उनके साथ बिताये हर पल में मैं किसी पाठशाला से गुज़रने जैसा महसूस करता रहा। आज अचानक मेरे जीवन की यह जीवन्त पाठशाला हमेशा के लिये बन्द हो गयी। उफ़! यह अहसास ही कितना हृदय-विदारक है कि अब अमीरचन्द जी कभी नहीं मिलेंगे। खाने की टेबल से लेकर प्रवास तक, उनके पास सुनाने के लिए हमेशा कोई न कोई क़िस्सा ज़रूर होता था। उस क़िस्से की भूमिका बनाते हुए वे एक ब्लॉग का ज़िक्र करते थे कि मेरा एक ब्लॉग है, ‘मेरा गाँव मेरा देश’…. एक दिन मैंने इंटरनेट पर ख़ूब सर्च किया लेकिन मुझे अमीरचन्द जी का ऐसा कोई ब्लॉग नहीं मिला। बाद में पता चला कि जब कोई बैठक या बातचीत विषय से भटकने लगती थी, तो उसे वापस विषय पर लाने के लिए वे इस काल्पनिक ब्लॉग का सहारा लेते थे। ऐसा कोई ब्लॉग न कभी था, न होगा। और जिन क़िस्सों को वे सुनाते थे, वे वहीं उपजकर वहीं समाप्त भी हो जाते थे।
अनुभवों का एक पूरा ग्रंथ थे अमीरचन्द जी। सुबह, दोपहर, रात… हमेशा कार्यरत। जैसे ज़िन्दगी के एक-एक पल को सदुपयोग कर लेने की शर्त लगा रखी हो। …अब वे निष्क्रिय हैं।
उन्हें याद करते हुए आज आँखें भीग गयी हैं। अनेक विषयों पर मेरा उनसे मतभेद रहता था, लेकिन फिर भी वे किसी श्रेष्ठ अभिभावक की तरह हमेशा मुझे अपने साथ कर लेते थे। मैं कभी उन्हें बता ही नहीं पाया कि मैं उनसे प्रेम भी करता हूँ और सम्मान भी।
मई-जून के बाद से उनसे मिला नहीं था…. और अब कभी मिल भी नहीं पाऊंगा।
आज डॉ. संध्या गर्ग की एक क्षणिका अमीरचन्द जी सरीखे व्यक्तित्व पर सटीक जान पड़ती है-
किसी ने बताया
कि आज शाम को
उन्होंने अन्तिम साँस ली
मैंने सोचा-
‘चलो,
उन्होंने साँस तो ली।’
✍️ चिराग़ जैन

दिल खोलकर…

अपने रोग का संज्ञान होने से लेकर अब तक की यात्रा में जो कुछ जीवन सीखने का अवसर मिला, उसके लिए यह सारा कष्ट बड़ा मोल नहीं है। पहली बार पता लगा कि लोगों की धूर्तता ही नहीं, बल्कि उनकी सहृदयता पर भी एक आवरण चढ़ा होता है, जो ऐसे ही समय में अनावृत होता है।
मोर्चे पर खड़े सिपाही को दुनिया बिल्कुल अलग रंग की दिखने लगती है। उसके लिए लोगों की मान्यता के अर्थ बदल जाते हैं। और लोगों की भी उसके प्रति धारणाएँ बदल जाती हैं।
मैंने पिछले एक महीने में इन अनुभूतियों को गहरे तक महसूस किया है। दुःख-सुख, अच्छे-बुरे, नैतिक-अनैतिक के आकलन से परे सब कुछ आश्चर्यबोध से युक्त था। पीड़ा का उद्वेग मन को सतह से कुछ नीचे अवश्य ले जाता है; बस इसी स्थान पर सतह की मरीचिका अदृश्य होने लगती है। इस स्थान पर पहुँचकर जब सतह पर किसी को सतही आचरण करते देखो तो उसके कलापों को देखकर क्षोभ नहीं, आनंद होता है।
एक छोटा-मोटा सा तुरीयावस्था योगी मन के भीतर बैठा ‘तमाशा-ए-अहले-करम’ देखता रहता है। उसे पता है कि दुआ और ढिंढोरे का कोई आपसी मेल नहीं है। वह समझता है कि भीगी हुई कोरों के होंठों का रंग मुस्कानी होता है। वह जानता है कि ‘जल्दी आ जा यार’ जैसा वाक्य बोलते हुए मुस्कुराहट कितना सारा दर्द एक साथ छिपा लेती है।
उस रात, जब मुझे ऑपरेशन थियेटर में ले जाया जा रहा था तब मैं यह समझ पा रहा था कि यहाँ से कहानी आगे न बढ़ी तो इसी को इतिश्री मानना होगा। यद्यपि एक रात पहले एंजियोग्राफी में ऐसा ही ऑपरेशन थियेटर देख चुका था लेकिन फिर भी उस रात का एहसास थोड़ा विशेष था।
कुछ डॉक्टर्स मुझे पहचानने लगे थे, सो ऑपरेशन की तैयारियों के दौरान वहीं एक डॉक्टर ने दिनकर की रश्मिरथी शुरू कर दी। मैंने भी ऑपरेशन टेबल पर लेटे-लेते छोटा-मोटा काव्यपाठ किया।
अचानक दाहिने हाथ में थोड़ा मोटा इंजेक्शन लगने जैसा अनुभव हुआ और उसके बाद मुझे सुनाई दिया कि कोई मेरे गाल पर चपत लगाकर ‘चिराग़ जैन… चिराग़ जैन’ बोल रहा था। मेरी आँखें न खुल सकीं थीं लेकिन मैं महसूस कर पा रहा था कि मेरी नाक और गले में से नलियाँ गयी हुई हैं, मुझे बहुत भयंकर प्यास लगी है और कोई बेचैन होकर मुझसे मेरा नाम पूछ रहा है। ढेर सारी ऊर्जा बटोरकर मैंने अपना नाम बताया तो पूछनेवाले के स्वर में हर्ष घुल गया।
उसने मुझसे पूछा- ‘तुम्हें कुछ याद है?’ …मैंने कुछ शास्त्रीय कविताओं के अंश दोहराकर स्वयं को आश्वस्त किया।
उसने कहा, ग्रेट। ऑपरेशन बढ़िया हुआ। अब हम वेंटिलेटर निकालेंगे। थोड़ा दर्द होगा, बर्दाश्त करना। जब तक मैं कुछ समझ पाता तब तक उस व्यक्ति ने गले में घुसी हुई नली को अच्छे से हिलाकर बाहर खींच दिया। प्यास से बेचैन कण्ठ में यह घर्षण एक आह में घुटकर रह गया। मैं पानी को तरसता रहा लेकिन तीन-चार घण्टे तक होंठ गीले करने से ज़्यादा पानी मेरे लिए उचित नहीं था।
उस क्षण से अब तक लगातार समझ रहा हूँ कि उस रात रश्मिरथी के पाठ के बाद क्या हुआ होगा। पेट में से चार-पाँच जगह नलियाँ गयी हुई थीं, जो डॉक्टर्स ने एक-एक करके धीरे-धीरे निकालीं। कल जब टाँके काटे गये तो एक बार मोक्ष जैसी अनुभूति हुई। यद्यपि इतने बड़े परिवर्तन को स्वीकार करने में देह को अभी कुछ सप्ताह लगेंगे, लेकिन यह महसूस होने लगा है कि खानपान और मान्यताओं के स्तर पर मैं मैंने एक सविवेक मस्तिष्क के साथ सद्यजात होने का अनुभव पा लिया है।

✍️ चिराग़ जैन

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