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ज़िन्दगी का आख़िरी ईवेंट

आदमी की ज़िन्दगी ईवेंट मेनेजमेंट है
मौत उसकी ज़िन्दगी का आख़िरी ईवेंट है

जिस्म इक होटल है जिसमें रूह इक टेनेंट है
साँस इस होटल में रहने के लिए बस रेंट है

साँस रहने तक जियोगे, ये तो एग्रीमेंट है
किस तरह जीना है अब ये आपका टैलेंट है

हर बशर इक चमचमाती कार जैसा है हुज़ूर
कुछ के इंजन में ख़राबी, कुछ के ऊपर डेंट है

जो मिले, जैसा मिले, जब भी मिले, स्वीकार कर
टेंपरेरी ज़िन्दगी में कौन परमानेंट है

✍️ चिराग़ जैन

प्यादे बदल गए

कल तक हुजूर दिखते थे सादे, बदल गए
हालात बदलते ही इरादे बदल गए
शतरंज की बिसात पर जो तेज़ चले थे
देखो वज़ीर में वही प्यादे बदल गए

✍️ चिराग़ जैन

कोई खिलने पे आ जाए तो

महीना जून का है तिश्नगी हद से गुज़रती है
ज़मीं दो बून्द पानी के लिए भी आह भरती है
ख़ुदाया तल्ख़ हैं तेवर हवाओं के मग़र फिर भी
कोई खिलने पे आ जाए तो हर डाली सँवरती है

✍️ चिराग़ जैन

सच कहने पर रोक

कहने की सुविधा दिलवाई जाएगी
सच कहने पर रोक लगाई जाएगी

पागल हाथी की जंगली चिंघाड़ों से
बंसी की आवाज दबाई जाएगी

पहले मुद्दों से तो ध्यान हटाने दो
फिर शायद तस्वीर हटाई जाएगी

साहब मरहम लेकर आते ही होंगे
तब तक सबको चोट खिलाई जाएगी

जनता दंगों में फाके करती होगी
हाकिम के घर खीर बनाई जाएगी

✍️ चिराग़ जैन

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