+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

शिक़ायत करना मना है

दशकों तक परिश्रम करके तंत्र ने जनता को इतना सहनशील बनाया है कि लाख परेशानियाँ सहकर भी जनता शिक़ायत करने से परहेज करे। हम गाहे-बगाहे सत्ता और राजनीति को कोसते हैं। टेलिविज़न के सामने बैठकर राजनेताओं को भ्रष्ट कह लेते हैं; लेकिन हमारे सामने कुर्सी पर बैठा क्लर्क सामने खड़ी जनता को इंतज़ार करने के लिये छोड़कर फोन पर इश्क़ फरमा रहा होता है और हम उसे टोकने की जेहमत नहीं उठाते। खिड़की के उस पार बैठी महिला बराबरवाली महिला से कुरकुरी भिंडी की रेसिपी समझ रही होती है और हम खिड़की के इस पार खड़े भिंडी पक जाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
अब तो हमारी सहनशीलता का इतना विकास हो चुका है कि निजी सेवाक्षेत्र, जो ‘क्लाइन्ट सेटिस्फेक्शन फर्स्ट’ जैसे सिद्धांतों के साथ काम करता था, वह भी अब हमें क्लाइंट नहीं, जनता समझने लगा है। वे भी जान गये हैं कि इन्हें परेशान करके कभी कोई नुक़सान नहीं होगा; क्योंकि जब कोई ख़ुद को क्लाइंट समझकर हमसे हमारी ख़राब सर्विस की शिकायत करेगा तब उसके पीछे हमारी उसी ख़ामी को झेल रहे सैंकडों लोग जनता की तरह मौन खड़े रहेंगे। उस समय बर्दाश्त करनेवालों के अनुपात में प्रतिक्रिया करनेवाला वह बेचारा अल्पमत में होने के कारण तर्कों के साथ हार जायेगा और ख़ामोश खड़े रहकर तमाशा देखनेवाले बहुमत के साथ जीत जायेंगे। इन जीते हुए लोगों में से अनेक मन ही मन उस प्रतिक्रियावादी का सम्मान करेंगे, कुछ उसे झगड़ालू और कलेशी कहेंगे, कुछ उस पर हँसेंगे और वह एक अकेला भी धीरे-धीरे सहनशील जनता की भीड़ में शामिल हो जायेगा।
पिछले दिनों एक निजी एयरलाइंस में क्रू के किसी दुर्व्यवहार का विरोध करने पर एक प्रतिक्रियावादी को पूरे क्रू ने जहाज से उतरते ही ज़मीन पर गिरा-गिराकर पीटा, पर शेष जनता चुपचाप देखती रही। निजी कंपनियाँ ‘कंपनी पॉलिसी’ के नाम पर आपकी किसी भी समस्या का समाधान करने से पल्ला झाड़ लेती हैं और आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते क्योंकि उनकी शिक़ायत लेकर आप जहाँ जाएंगे, उन थानों और न्यायालयों में आप पहले ही ‘जनता’ सिद्ध हो चुके हैं। वहाँ आपको दुर्व्यवहार और प्रतीक्षा करवाने में तंत्र को कोई आपत्ति नहीं होती, क्योंकि जब इन संस्थाओं में ऐसा चलन शुरू हुआ होगा तब भी मौन रहनेवाले ऐसे ही प्रतिक्रिया करनेवालों पर हँसे होंगे।
‘कौन पचड़े में पड़े’; ‘अपना काम बनता…’ और ‘हमें क्या लेना-देना’ जैसे जुमले बोलनेवाले लोग जब सिस्टम की ख़ामियों का रोना रोते हैं तब ऐसा लगता है जैसे कोई बलात्कारी भेड़िया, स्त्रियों की सुरक्षा का भाषण दे रहा हो। सरकारी नीतियों में सुधार के सपने देखनेवालों को यह समझना होगा कि अच्छी या बुरी, जो भी वर्तमान नीतियाँ हैं, उनके क्रियान्वयन का ज़िम्मा उसी व्यक्ति का है, जो टेबल के उस तरफ़ बैठा फोन पर चौपाल जमा रहा है। यदि उसके इस आचरण पर उसे टोका न गया तो उसकी ख़ामी सरकार को कभी नहीं दिखाई देगी, क्योंकि सरकार के सामने वह कभी लापरवाही नहीं करता।
इस देश में रोज़ लाखों लोग सिस्टम के सामने लाचार खड़े रहते हैं और करोड़ों लोग राजनीति को कोसने में व्यस्त रहते हैं। इस देश में भारत के लोककल्याणकारी राज्य होने का संविधानी दावा रोज़ सैंकड़ों मौत मरता है लेकिन हम मान बैठे हैं कि केवल राजनीति को गाली देकर ही अपने साथ हुए अन्याय की भड़ास निकालना उचित है, क्योंकि अन्याय करनेवाले को डायरेक्ट कुछ कहा तो वह हमारे काम को और मुश्किल कर देगा।

✍️ चिराग़ जैन

व्यवस्थित अव्यवस्था

सिस्टम… यह एक ऐसा शब्द है, जो किसी भी भारतीय भाषा में अनूदित होकर प्रपंच बन जाता है। ईश्वर को जब सृष्टि का सर्वाधिक दीन प्राणी बनाना था, तो उसने भारतीय सिस्टम में फँसा मनुष्य बना डाला।
हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है; इसलिए हमारा सिस्टम भी अपनी गिरफ़्त में आए सभी नागरिकों को समान रूप से प्रताड़ित करता है।
इस सिस्टम में सबसे ऊपर है, विधायिका। स्कूली किताबों ने विधायिका के विषय में यह अफ़वाह फैलाई है कि विधायिका क़ानून बनाती है। जैसे ही स्कूल की आदर्शवादी रामचरितमानस से निकलकर मनुष्य व्यवहारिकता की महाभारत बाँचता है तो उसे समझ आ जाता है कि विधायिका को सामान्य भाषा में राजनीति कहा जाता है और उसका केवल एक ही काम है- चुनाव जीतना। इस काम में राजनीति अपना जी, और नागरिकों की जान भी दाँव पर लगाने से नहीं चूकती।
संसद में क़ानून बनाने से लेकर सड़क पर भाषण देने तक और हँसने-रोने से लेकर उठने-बैठने और यहाँ तक कि जीने-मरने तक का एक ही लक्ष्य होता है, चुनाव जीतना। जिस कार्य से चुनाव जीता जा सके, उसे करने में राजनीति कभी पीछे नहीं रहती। फिर वह कार्य किसी को जीवन देने का हो या किसी का जीवन लेने का। राजनेता चुनाव जीतने के लिए ही दंगा शुरू करवाते हैं और फिर चुनाव जीतने के लिए ही दंगा बन्द भी करवाते हैं। टीवी डिबेट में गाली-गलौज से लेकर अपने-आप पर जूते-चप्पल फिंकवाने में भी इन्हें कोई परहेज नहीं होता। चुनाव जीतने के लिए ही बयान दिये जाते हैं और चुनाव जीतने के लिए ही उन बयानों से पलटा जाता है। नेता उपलब्ध है अर्थात् उसे वोट चाहिए और नेता व्यस्त है, अर्थात् उसे वोट मिल चुका है। चुनाव जीतने की इस मारामारी में जनता के दुःख-दर्द की सुधि लेने की फुर्सत किस कम्बख़्त के पास है?
अतएव, हे पार्थ! किताबों में लिखी लोकतंत्र की परिभाषाओं से भ्रमित न होओ। लोकतंत्र में तुम्हारी देह की स्थिति एक उंगली से अधिक नहीं है। यदि वोट देने के बाद उस उंगली का प्रयोग करने का विचार भी मन में आया तो यह व्यवस्था तुम्हारी शेष देह को जीते जी ही नारकीय कष्टों से अवगत करा देगी और फिर तुम युग की समाप्ति तक अपनी आत्मा पर अपनी देह का बोझ लादे हुए जीवित रहोगे। चूँकि सिस्टम की आत्मा होती ही नहीं है इसलिए उसकी आत्मा कभी मरती भी नहीं है। और जनता की आत्मा महाराज कुंभकर्ण के सिंहासन पर पैर पसारकर सोई हुई है।
विधायिका के इस विराट स्वरूप को जानने के पश्चात भारतीय नागरिक के मन में न्यायपालिका के स्वरूप को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। चूँकि न्यायपालिका किसी के साथ भेदभाव नहीं करती अतः अपने द्वार पर आनेवाले सभी मुक़द्दमों को समान रूप से लटकाती है। काग़ज़ और औपचारिकताओं के भीषण जंजाल में फँसे न्यायालय की लय विलंबित प्रवृत्ति की है। इसलिए न्यायालय में एक बार प्रवेश करते ही मनुष्य के जीवन में ठहराव-सा आ जाता है। छह महीने प्रतीक्षा करने के बाद एक तारीख़ आती है, उस तारीख़ पर कई घण्टे प्रतीक्षा करने के बाद प्रार्थी को अपने मामले का नाम सुनाई देता है। बंदा इस आवाज़ को सुनने की ठीक से ख़ुशी भी नहीं मना पाता, कि तब तक दूसरे मामले की आवाज़ लग जाती है। लटके हुए मुँह को लेकर प्रार्थी कोर्ट के बाहर आता है तो वक़ील अगली तारीख़ नोट करवाकर उससे अपने परिश्रम का मेहनताना वसूलने की भूमिका बनाने लगते हैं। घुटन भरे इन न्यायालयों के पास पीड़ित के लिए केवल टूटन है, जिसे बटोरने का लिए लोग अखण्ड ज्योत से भी अधिक निष्ठावान बनकर माननीय न्यायालय में हर तारीख़ पर उपस्थित रहने के लिए विवश हैं। स्वाधीनता के बाद से अब तक किसी न्यायाधीश ने ‘न्याय’ को समय पर उपस्थित होने के समन जारी किए होते तो कदाचित न्याय व्यवस्था की ओर उम्मीद से देखती करोड़ों आँखें पथरा न गई होतीं।
विधायिका से जर्जर हुई देह और न्याय की प्रतीक्षा में पथराई हुई आँखों के साथ भी यदि किसी नागरिक में साँस बच जाएँ, तो उसके लिए लोकतंत्र में कार्यपालिका की पर्याप्त व्यवस्था है। यह कार्यपालिका सुरसा माई के मुख की भाँति असीम है। वायुमण्डल में जहाँ-जहाँ तक वायु है वहाँ-वहाँ तक कार्यपालिका है। यह कार्यपालिका विधायिका द्वारा बनाए गए विधान के आधार पर नागरिकों से ‘प्रत्यक्ष कर’ वसूल करती है। अपराध रोकने में इसकी कोई रुचि नहीं है, अपितु इसका पूर्ण विश्वास है कि अपराध मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति का अंग है, इसलिए यह हर नागरिक को अपराधी मानते हुए उससे अभद्र तथा अपमानजनक व्यवहार करती है। क्लर्क से लेकर हवलदार तक और अधिकारी से लेकर चौकीदार तक; सब व्यवस्थित रूप से जनता को यह समझाते रहते हैं कि सिस्टम से उलझने की भूल मत कर बैठना… क्योंकि लोकतंत्र में तंत्र से अधिक महत्वपूर्ण तो लोक भी नहीं होता।
हमने अपने बुजुर्गों से शायद कभी नहीं पूछा, लेकिन अगर हमारी पीढ़ियों ने हमसे इस सिस्टम के इस हाल का कारण पूछ लिया, तो उस समय हमारी ख़ामोशी हमें ख़ुद को भीतर तक बेन्ध जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

पाठक से लेखक बनने तक का सफ़र

हिन्दी साहित्य में दो क़िस्म के पाठक होते हैं। पहली श्रेणी है प्रशंसक पाठकों की। वे सोशल मीडिया पर खाता बनाते ही टटोल-टटोल कर लेखकों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं। फिर उनकी हर पोस्ट को देखते ही उसके नीचे कुछ निश्चित शब्दयुग्म पेस्ट करके निकल लेते हैं। इस सबमें ये इतने व्यस्त होते हैं कि इन्हें रचनाएँ पढ़ने की भी फुर्सत नहीं मिल पाती। सुबह उठते ही वे पेंडिंग फाइल्स की तरह रचनाओं पर हस्ताक्षर करने बैठ जाते हैं। ‘वाह’; ‘अद्भुत’; ‘कालजयी’; ‘क़माल’; ‘लाजवाब’ और ‘निःशब्द’ जैसे अनेक शब्द इनके क्लिपबोर्ड पर हमेशा तैयार रहते हैं। इस प्रवृत्ति को देखते हुए फेसबुक ने ‘मान गए गुरु’; ‘सुपर’; ‘यू आर बेस्ट’ और ‘ब्यूटीफुल’ जैसे डिजिटल प्रशंसाक्षरों के एनिमेशन भी बना दिए हैं।
इस श्रेणी के पाठकों ने अनेक कानितकरों को तेंदुलकर होने का भ्रम पलवाया है। लेकिन इनसे भी ख़तरनाक़ होते हैं दूसरी क़िस्म के पाठक। ये भी फेसबुक पर प्रकट होते ही बाक़ायदा रचनाकारों को टटोलते हैं। लेकिन ये प्रथम दिवस से यह माने बैठे होते हैं कि यदि तुलसीदास जी ने मानस की प्रूफ रीडिंग इनसे कराई होती तो मानस आज ब्रह्मांड स्तरीय रचना बन गयी होती।
हर रचना पर प्रतिक्रिया देने की ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ इन्होंने भी उठा रखी होती है। किन्तु ये प्रथम श्रेणी के पाठकों की तरह आलस्य में बिना पढ़े रचना के नीचे अपनी टिप्पणी नहीं लिखते; बल्कि ये तब तक किसी रचना को पढ़ते हैं जब तक इनके भीतर का नामवर जागकर उस रचना से लंबी टिप्पणी तैयार न कर ले। एक बात तय है, इनकी टिप्पणी का सामान्यता एक स्थायी भाव होता है कि तुम बिना बात के कवि/लेखक बने डोल रहे हो और इस जनभावना में अपना स्वर मिलाकर मैं अपने भीतर के रामविलास शर्मा का गला नहीं घोंट सकता।
मेघनाद के निकुम्बरा यज्ञ की भाँति जब इनकी कठिन साधना को भंग करने इनके भीतर स्वयं लेखक बन जाने के वानर कुलबुलाने लगते हैं तब ये अपनी समस्त सृजनात्मक नेगिटीविटी का गट्ठड़ बनाकर मंचीय कवियों अथवा लेखकों के आचरण अथवा जीवन पर कुछ लिखते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि सृजन ‘चाहे कैसा भी हो’ उसके बिम्ब का आकाश रचनाकार की सोच से बड़ा नहीं हो सकता।
फिर अपने लिखे इस ‘कुछ’ की किसी स्थापित साहित्यिक विधा से तुलना करते हुए ये अपनी जंघा पीटने लगते हैं। मांसल जंघा पर हथेली की चपत से जो ध्वनि उत्पन्न होती है उसे ‘घनघोर तालियाँ’ समझकर ये प्रसन्न हो उठते हैं।
इसके बाद इनकी लेखनी यकायक ‘केवट की नौका’ से ‘पुष्पक विमान’ हो जाती है। जिसकी भी पंचवटी में ‘सीता’ सरीखी कोई स्त्री हो, उससे इनका स्वाभाविक वैर हो जाता है।
अब ये दिन भर अपनी शूपर्णखा को त्रिकालसुंदरी घोषित करने के प्रयास में रहते हैं और रात भर सीतायुक्त आंगनों पर पत्थर मारने में व्यस्त रहते हैं। इनके लिखे पर भी वाह-वाह करनेवालों की कभी कमी नहीं होती, क्योंकि प्रथम श्रेणी के पाठकों का क्लिपबोर्ड भी क़ानून की देवी की तरह सबको आँख पर पट्टी बांधकर देखता है।
लेकिन रात में जिन आंगनों पर इनके पत्थर बरसते हैं, उनकी मुस्कुराहटों पर इन निशाचरी खरोंचों के निशान देर तक दिखाई देते हैं।
✍️ चिराग़ जैन

यह देश की पालकी है?

सभी राजनैतिक दल एक साथ मिलकर देश को एक निश्चित दिशा में ले जा रहे हैं। मीडिया वाच डॉग बनकर इस कारवां के पीछे दौड़ रहा है, ताकि देश द्रुतगति से उस दिशा में बढ़ता रहे। जनता अपने भविष्य को दाँव पर लगाकर इस कारवां में जीत-हार तलाश रही है।
यह तय करने की फ़ुरसत किसी के पास नहीं है कि सियासत ने पालकी कहकर अपने कंधों पर जो उठा रखा है, वह कहीं चकडोल तो नहीं है।
जब दर्शक-दीर्घा का उत्साह शांत होने लगता है तो कंधा दे रहा दल, जनता को जनार्दन कहकर संबोधित कर देता है। जनता, मूकदर्शक के पद से इस्तीफा देकर, पुनः शोरगुल करने लगती है। सब स्वयं को कंधा समझकर, देश का बोझ स्वयं पर महसूस करने लगते हैं और किसी न किसी दल का नाम लेकर चिल्लाने लगते हैं।
उत्साह बढ़ने पर कभी-कभार दर्शक-दीर्घा में हंगामा हो जाता है। हंगामे को दंगे में तब्दील करने के लिए दर्शक-दीर्घा में बैठे भावी राजनेता पूरी ऊर्जा झोंक देते हैं। इससे उपजे धर्मयुद्ध में जो शव गिरते हैं, उनका अंतिम संस्कार करने के लिए कारवां में बढ़ रहे कर्णधार, देश का बोझ वहीं छोड़कर दर्शक-दीर्घा में प्रकट होते हैं। अपने-अपने समर्थकों की चिताएँ सजाकर, वे परस्पर विरोधियों की चिताओं पर जाकर दंगा करनेवालों को लताड़ते हैं। इस डाँट-डपट के बीच, जेब से टोटकों की लोई निकालकर, वे वोटों की रोटियाँ भी सेंक लेते हैं।
इस समय उत्तरदायी मीडिया भी मुख्य कारवां का लालच छोड़कर, दर्शक-दीर्घा के इस घटनाक्रम की कवरेज कर रहा होता है।
हंगामा थमते ही देश के मुद्दों, देश की जनता और देश की हालत को वहीं छोड़ते हुए, सभी दल पुनः देश का बोझ लेकर उसी दिशा में बढ़ने लगते हैं। मीडिया पुनः उनके पीछे दौड़ने लगता है। जनता पुनः दर्शक-दीर्घा में बैठकर इसे देश की पालकी समझकर दाँव लगाने लगती है।
✍️ चिराग़ जैन

प्रतिक्रियाहीन लोकतंत्र

देश बहुत विकट परिस्थितियों से गुज़र रहा है। राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं ने हमें मूलभूत आवश्यकताओं को अनदेखा करना सिखा दिया है। न्याय व्यवस्था स्वयं कठघरे में खड़ी है। जनता, अपराधियों से अधिक पुलिस से आक्रांत है। मीडिया, औद्योगिक घरानों की उंगलियों पर नाच रहा है और आद्योगिक घराने सत्तारूढ़ दल के इशारों पर… इस जंजाल में जनहित और लोकतंत्र दोनों मरणासन्न हैं।
सुव्यवस्थित प्रचार के ज़रिये राजनीति ने समाज में परस्पर विद्वेष बो दिया है। जब कोई एक व्यक्ति अपनी किसी समस्या को लेकर नम आँखों से तंत्र की ओर देखता है तब दूसरे लोग उसकी समस्या या उसके आँसुओं को सांत्वना देने की बजाय, उसकी कराह में राजनैतिक अर्थ टटोलने लगते हैं। उसके निवेदन, प्रलाप, उपालम्भ अथवा आक्रोश में किसी दल विशेष का समर्थन या विरोध तलाशने लगते हैं।
राजनीति आपस में लड़ते इन लोगों को देखकर आश्वस्त हो जाती है कि हम कुछ भी करें, जनता हमारा विरोध तब कर सकेगी जब उन्हें आपस में लड़ने से फ़ुर्सत मिलेगी।
जनता गाली देना सीख गयी है। जो व्यक्ति दक्षिणपंथ के पक्ष में बोलेगा, उसे वामपंथियों की गाली खानी पड़ेगी। जो वामपंथ के पक्ष में बोलेगा, उसे दक्षिणपंथियों की गाली खानी पड़ेगी। जो निष्पक्ष होगा, उसे दोनों की गाली खानी पड़ेगी।
दलितों के दम पर बने हुए राजनैतिक संगठन दलितों को यह सोचने का अवसर ही नहीं देंगे कि दलित संगठन का हित होने से दलित समाज का हित होना आवश्यक नहीं है। मुस्लिम समाज के दम पर बने राजनैतिक संगठन इस विषय पर कभी चर्चा ही न करेंगे कि इस्लामिक संगठनों के हित में तन-मन-धन न्यौछावर करने वाले मुसलमानों के जीवन पर किसी इस्लामिक लीडर के मंत्री बन जाने से क्या प्रभाव पड़ा।
राजनीति आपका यूज़ करती है। उसे विवेकशील और जिज्ञासु व्यक्ति पसंद नहीं होता। विवेकशील व्यक्ति राजनेताओं के लिये ख़तरनाक होते हैं। इसलिये आजकल बुद्धिजीवी व्यक्ति का उपहास किया जाने लगा है। बुद्धिजीवी होना किसी अपमान से कम नहीं रह गया है। ठीक इसी प्रकार ज्यों शांतिप्रिय व्यक्ति राजनीति के लिये व्यर्थ है। झगड़े नहीं होंगे तो राजनीति की महत्ता ही समाप्त हो जायेगी। सब लोग चैन से अपनी-अपनी रोटी कमाएंगे, छुटपुट विवाद हुए भी तो सभ्य पुलिस और सुव्यवस्थित न्यायालय में झटपट उनका निपटारा हो जाएगा; यदि ऐसा समाज बन गया तो कोई क्यों राजनेताओं को पूछेगा?
यदि मुसलमान और हिंदुओं के बीच झगड़े न होंगे तो कट्टर हिन्दू नेता और कट्टर मुस्लिम नेताओं की शरण में कोई क्यों जायेगा। इसीलिये साम्प्रदायिक सद्भाव की बात करनेवाला व्यक्ति भी आजकल उपहास का पात्र बन गया है। जो लड़ाए वही योग्य व्यक्ति है। जो झगड़ा शांत कराने का उपक्रम करे, वह तो मूर्ख है।
राजनीति ने समाज का विवेकहरण कर लिया है। पुराने समय में हमारे घर में एक केबल कनेक्शन होता था। जिसमें लगभग सभी चैनल 50, 75, 100 या 150 रुपये में आराम से देखने को मिल जाते थे। घर पर दूसरा टेलिविज़न आये तो उतने पैसों में केबलवाला दोनों टीवी केबलयुक्त कर देता था। कोई चैनल यदि केबल से प्रसारित न हो रहा हो तो केबलवाले से कहकर उसे शुरू करवा लिया जाता था। आंधी, बारिश, बादल जैसी स्थितियों में भी केबल कनेक्शन जारी रहता था। फिर हमें बताया गया कि यह केबलवाला हमें लूट रहा है। यह उन चैनल्स के भी पैसे हमसे वसूल रहा है जो हम नहीं देखते। इसलिये बुद्धिमानी इसमें है कि सेट-टॉप बॉक्स लगवाकर केवल उन चैनल्स का भुगतान किया जाये जो हमें देखने हों। हमें बात अच्छी लगी। हमने प्रारम्भ में स्वेच्छा से सेट-टॉप बॉक्स लगवाये। बाद में सरकार ने सेट-टॉप बॉक्स आवश्यक कर दिये। अब हम केवल उन्हीं चैनल्स का भुगतान करते हैं, जो हम देखते हैं; यह और बात है कि तब हम 100 रुपये में सारे चैनल देखते थे अब तीन-चार सौ रुपये में चुनिंदा चैनल्स देखते हैं। यदि आपने कोई ऐसा चैनल देखना है, जिसका प्रसारण आपके घर पर लगे सेट-टॉप बॉक्स की कम्पनी से नहीं होता है तो आप चाहकर भी उस चैनल को सब्सक्राइब नहीं कर सकते। हाँ, यह लाभ अवश्य हुआ है कि जैसे ही बाहर बादल छाएँ, पुरवा या पछुआ की हिलोर आये अथवा बरखा रानी आपके अंगना में रुनझुन का संगीत बजाए तब आपका टेलिविज़न आपको बता देता है कि टीवी के सामने बैठकर आँखें मत फोड़ो, बाहर जाकर मौसम का लुत्फ़ उठाओ!
यह है राजनीति की विवेकहरण योजना।
प्यारे देशवासियों! राजनीति हमें हिन्दू-मुस्लिम, दलित-सवर्ण, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक, स्त्री-पुरुष, बीपीएल-यूपीएल, शहर-गाँव, कांग्रेसी-भाजपाई और न जाने कितने वर्गों में बाँटकर इस स्थिति तक ले आयी है कि हम अपने हित-अहित के चिंतन से पहले राजनैतिक दलों की स्वार्थ-साधना का चिंतन करने लगे हैं। इस पथ पर न तो हमारे समाज का उत्थान होगा, न ही हमारे लोकतंत्र का..! हम एक बार ठहरकर विचार करें कि कहीं हम अपने आचरण से राजनीति को यह संदेश तो नहीं दे बैठे कि आप निश्चिंत रहें माई-बाप, हमें सब कुछ सहने की आदत है।

✍️ चिराग़ जैन

राजनीति में कार्यकर्ता की सीमाएँ

भारतीय राजनीति, जनता को, मिलकर रहने की प्रेरणा देती है। धर्म, विचार, आदर्श, सिद्धांत और विचारधारा जैसे खिलौनों में उलझकर आपस में द्वेष उत्पन्न करनेवाले लोगों को राजनीति से सीखना चाहिए कि इन सब रास्तों का अस्तित्व वहीं तक है, जहाँ तक गंतव्य दिखाई न देता हो। एक बार गंतव्य दिखाई दे जाये; फिर इन शब्दों को विस्मृत कर देना ही सफल मनुष्य का कर्त्तव्य है। जो मार्ग ईश्वर तक न पहुँचाता हो वह अधर्म है; इसी प्रकार जो सिद्धांत सत्ता तक पहुँचाने में बाधा दे, उसका वध कर देना ही उचित है।
अध्यात्म में जिन्हें स्थितप्रज्ञ कहा गया है, वे वास्तव में राजनीति के गलियारों में ही वास करते हैं। जनता चाहे आपके लिये लड़-लड़कर मर रही हो, कार्यकर्ता चाहे आपके प्रति श्रद्धावान रहकर अपना तन-मन झोंक चुका हो; किन्तु सत्ता पर अधिकार करने के लिये जनता की भावनाओं और कार्यकर्ताओं के समर्पण की बेड़ियों को तोड़ देनेवाला ही वास्तव में शासन के योग्य माना जाता है।
बरसों-बरस मनुवाद को पानी पी-पीकर कोसनेवाले यदि भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर उस समय उत्तर प्रदेश की कुर्सी न हथियाते तो कार्यकर्ताओं की भावना को क्या धरकर चाटते? साँप और नेवले की तरह लड़नेवाले सपाई, अगर बसपाइयों के चरण न पखारते तो लोहिया जी के सिद्धांतों का क्या अचार डालना था?
राजनीति निरंतर हमें अपने आचरण से यह समझाती रहती है कि सफल होनेवाले व्यक्ति सिद्धांतों की पूँछ पकड़कर नहीं चलते, वे तो ‘महाजनो येन गतः स पन्थः’ की नीति पर चलकर सदैव सत्तारूढ़ रहते हैं। नीतीश कुमार जी लालूप्रसाद यादव के साथ गठबंधन करते समय यदि राजद के प्रति कहे गए अपने ही वचनों का स्मरण करने के चक्कर में पड़े होते तो कुर्सी पर ध्यान केंद्रित कैसे करते? ये महान योगी तो वर्तमान में जीते हैं। अर्जुन की तरह उन्हें केवल मंत्रालय की कुर्सी दिखाई देती है; अन्य वस्तुएँ उनकी एकाग्रता से अछूती ही रहती हैं। कल किसको क्या कहा था और कल किसको क्या कहा जायेगा – इन ओछे प्रश्नों में उलझना तो कार्यकर्ता का काम है। इन सबसे ऊपर उठे बिना आप कार्यकर्ता तो हो सकते हो, नेता नहीं।
नेता बनने के लिये तो स्वयं अपनी ही कही हुई बातों से विमोह करना पड़ता है। जिसको गाली दी जा रही है और जो गाली दे रहा है ये दो महाशक्तियाँ जब एकाकार होकर मंच पर गले मिलती हैं तब कहीं जाकर एक सरकार बनती है।
शिवसेना की कट्टरपंथी छवि के समस्त अवगुणों को ‘थोथा देय उड़ाय’ की तरह मन से भुला कर विधायकों की संख्या का सद्गुण ग्रहण करते हुए जब कांग्रेस महाराष्ट्र राज्य की सरकार का निर्माण करने के लिये राज़ी हो जाती है तब कहीं जाकर यह ज्ञात होता है कि राजनीति के हठयोगियों को कितनी कठिन साधना करनी पड़ती है।
राजनेता को जनक की तरह विदेह भी होना पड़ता है। एक ही समय में एक ही पार्टी का केंद्र में समर्थन तथा राज्य में विरोध करने का कार्य बड़े-बड़े योगियों के वश में भी नहीं है। किंतु हमारे राजनेताओं ने यह दूभर कार्य अनेक अवसरों पर कर दिखाया है।
पीडीपी और भाजपा का गठबंधन; राजद और कांग्रेस का गठबंधन; वामपंथ और दक्षिणपंथ का गठबंधन… और न जाने कितने असम्भवप्रायः संयोग बनाकर भारतीय राजनीति ने हमें बार-बार समझाया है कि शत्रु और मित्र केवल चुनावी रैलियों में होते हैं; सदन में यह सब नहीं चलता। जो इन सबमें फँसते हैं वे कभी सदन के दर्शन नहीं कर पाते।
इसलिए हे कार्यकर्ताओ! राजनीति में रोचकता बनाए रखने के लिए ख़ूब लड़ो। जो अभी हमारे साथ नहीं है उसको ख़ूब गालियाँ दो। उसके कच्चे चिट्ठे खोलकर उसे भरे बाज़ार में नंगा करो। जो उसका समर्थक हो उसे अपना शत्रु मानो। उससे मित्रता, रिश्तेदारी और मनुष्यता तक समाप्त कर दो। किन्तु जैसे ही वह हमारे साथ मिल जाए, तुरंत उसका गुणगान करना प्रारंभ करो। उसके ऊपर लगनेवाले भ्रष्टाचार के आरोपों को सिरे से ख़ारिज करो। उसके समर्थक को रिश्तेदार बना लो।
यदि यह सब करते समय तुम्हें हैरानी अथवा परेशानी हो; तुम्हारा ज़मीर तुम्हें धिक्कारने लगे; तुम्हारी आत्मा तुम्हारे हाथ पकड़ ले तो समझ लेना कि तुम्हारा जन्म केवल झण्डे और बिल्ले बाँटने के लिए ही हुआ है; तुम्हारा कार्य केवल पार्टी कार्यालय के बाहर इलेक्शन के बाद भीड़ बनकर नाचने तक सीमित है; तुम्हें मृतज़मीर सिद्धों के ट्वीट को वायरल करने में ही अपनी ऊर्जा लगानी चाहिये क्योंकि राजनेता बनना तुम्हारे वश का रोग नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!