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शर्म आनी चाहिए जनता को

कोरोना की वर्तमान स्थिति भयावह है। जनता को चाहिए कि अपनी सुरक्षा के लिए सरकारी नियमों का पालन करे। बाज़ारों में भीड़ देखकर सरकार को घबराहट होती है। जनता होली जैसे अनावश्यक त्योहारों की आड़ लेकर समारोह करने की सोच रही है। लोग, होली मंगल मिलन जैसे बेहूदे कामों के लिये इकट्ठा हो रहे हैं। शर्म आनी चाहिए इस देश की जनता को। घर पर नहीं रह सकते?
सरकार को मजबूर होकर जनहित में सख्ती करनी पड़ती है। विवश होकर पुलिसवालों को कहना पड़ता है कि जो भी बिना मास्क दिखे उसको धर लो। और भी कुछ नहीं तो रिश्तेदारों के साथ ही होली खेलने चल दोगे! लज्जा नहीं आती? कोरोना से डर नहीं लगता? अरे मूर्खाे, अपनी नहीं तो औरों की जान की ही परवाह कर लो!
इस देश के महान राजनेता अपनी जान पर खेलकर लाखों लोगों की रैलियाँ कर रहे हैं ताकि लोकतंत्र बचा रह सके। कभी सोचा है कि कैसा लगता होगा जब दिल्ली में सोशल डिस्टेंस की सख्त नियमावली लागू करके बंगाल में लाखों लोगों की भीड़ के सामने मास्क हटाकर भाषण झाड़ना पड़ता है। कभी कल्पना की है कि अपनी आत्मा को क्या मुँह दिखाते होंगे बेचारे राजनेता!
महाराष्ट्र में लाखों केस आ गये, लेकिन हमारे राजनेता प्रदेश में गहराए राजनैतिक संकट से जूझने के लिए मंत्रालय, राजभवन, दिल्ली और प्रेस वार्ताओं में भागे फिर रहे हैं। कोरोना की जानलेवा दहशत को ताक पर रखकर, सरकारी गाइडलाइंस को धता बताकर भी कुर्सी की क़वायद में लगे हुए हैं। और तुम बस दो वक़्त की रोटी के लालच में धंधे-पानी पर निकल रहे हो। चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ऐसी नाकारा जनता को।
क्या हो जाएगा अगर स्कूल नहीं खुलेंगे? क्या हो जाएगा अगर दफ़्तरों में काम नहीं होगा? क्या आफ़त आ जाएगी अगर लोग त्योहारों पर एक-दूसरे से नहीं मिलेंगे? कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा अगर होली पर बिटिया के घर गुंजिया लेकर नहीं जा सकोगे? …इन सब टुच्ची बातों की तुलना चुनाव की महत्ता से करते हो?
उधर किसान आफ़त मचाए हुए हैं। इतने साल से अपने खेतों से कमा रहे थे ना! तब कौन से ताजमहल बना लिए तुमने। तब भी तुम फाँसी लगा-लगाकर मर रहे थे। अब सरकार जो कर रही है, उसे करने दो। इतनी हाय-तौबा क्यों? आकर बैठ गए हो दिल्ली बॉर्डर पर। …पड़े रहो। सरकार के पास क्या यही काम है कि तुम्हारा रोना सुनती रहे।
कभी बैठे हो सरकार में? कभी जाना है राजनीति किस चिड़िया का नाम है। सरकार के पास इन सब फालतू बातों के लिए वक़्त नहीं है, उसे चुनाव लड़ना है। चुनाव कोई हँसी-मज़ाक़ नहीं है। यह लोकतंत्र की आत्मा है। अब लोक के रोने-पीटने में लोकतंत्र को तो नहीं इग्नोर कर सकते ना! इसलिए ख़बरदार, अगर होली-वोली जैसे फालतू बहाने लेकर घर से बाहर क़दम निकाला तो!
✍️ चिराग़ जैन

अजीब सवाल है

हमारे यहाँ एक नया चलन चल पड़ा है कि जैसे ही आप कोई पर्व मनाने लगो तो कुछ लोग उसके लिए तर्कहीन प्रश्न उठाते हैं और दूध में खटाई डालकर स्वयं को लीक से हटकर चलता दिखाने की कोशिश में लग जाते हैं।
कल यही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के साथ भी हुआ। जब सब लोग महिलाओं की उपलब्धि, महत्व, क्षमता और प्रतिभा की चर्चा कर रहे थे तब सोशल मीडिया पर लीक से हटकर चलने की होड़ में कुछ लोग हर वर्ष की तरह इस बार भी पूछ रहे थे कि महिला दिवस एक ही दिन क्यों?
अजीब सवाल है यार। हम पूरे वर्ष लक्ष्मी की आकांक्षा करते हैं किंतु दिवाली वर्ष में एक दिन ही क्यों आती है? हम पूरे वर्ष स्वतंत्र रहते हैं किंतु स्वतंत्रता दिवस एक ही दिन क्यों मनाते हैं? हम पूरे वर्ष अपनी बहन के प्रति स्नेहसिक्त रहते हैं किंतु रक्षाबंधन एक ही दिन क्यों मनाते हैं? संतति के शुभ के लिए मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी और पति के सुख की कामना का पर्व करवा चौथ भी वर्ष में एक ही दिन मनाया जाता है! बेटियों के प्रति शुभेच्छा तो पूरे वर्ष रहती है, फिर हरियाली तीज एक ही दिन क्यों मनाई जाती है?
यह अनावश्यक असंतोष की प्रवृत्ति है, जो विवाद उत्पन्न करके उत्सव के उत्साह को भंग करती है। ऐसे सवाल हिन्दी दिवस पर भी उठते हैं। और जो लोग अपनी फेसबुक पर यह प्रश्न लिखकर स्वयं को क्रांतिकारी समझ रहे होते हैं उन्हें इतना भी भान नहीं है कि यह क्रांति इतनी बार हो चुकी है कि अब इससे प्रभाव नहीं, चिढ़ उत्पन्न होती है।
वर्ष के 365 दिन में से एक पूरा दिन जीवन के किसी एक पक्ष अथवा भाव को समर्पित करना ऐसा ही है, ज्यों लंबे सफ़र पर निकलते हुए पैट्रोल पम्प पर रुकना। गाड़ी पैट्रोल पम्प से ऊर्जा ग्रहण कर सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र तय करती है। इस सफ़र में हर क्षण पैट्रोल गाड़ी की गति का कारक भी रहता है। किन्तु सफ़र में हर दस क़दम पर गाड़ी रोककर पैट्रोल का धन्यवाद ज्ञापन नहीं किया जाता।
ये महिला दिवस, ये हिंदी दिवस, ये हरियाली तीज जैसे पर्व वही पैट्रोल पम्प हैं जहाँ रुककर जीवन, किसी सम्बन्ध अथवा जीवनी शक्ति से स्वयं को इतना भर लेता है ताकि उस तत्व के साथ पूरे दमखम के साथ जीवन जिया जा सके।
देह को भोजन की आवश्यकता होती है, अतएव हम दिन में दो-तीन बार डाइनिंग टेबल पर बैठते हैं। अब कोई प्रश्न कर दे कि दस-पंद्रह मिनिट ही क्यों, आप पूरे दिन डाइनिंग टेबल पर क्यों नहीं बैठते? लीक से हटकर चलना हो तो यह विवाद खड़ा करके भोजन का आनन्द धूमिल किया जा सकता है किंतु अंततः इस प्रश्न के लिए ‘मूढ़ता’ से बढ़िया संज्ञा ढूंढ़ पाना असंभव होगा।
हाँ, यदि कोई व्यक्ति अन्न का अपमान करता हो, कोई भोजन को गाली देता हो अथवा दूसरों को भोजन करते देख उन्हें अपशब्द कहता हो तो ऐसे व्यक्ति को एक क्षण भी डायनिंग टेबल पर बैठने का अधिकार नहीं है। ऐसे व्यक्ति को एक कण भी भोजन नहीं मिले इसके लिए वैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। सो ऐसी व्यवस्था हमारे कानून में है। जो व्यक्ति महिलाओं के प्रति आपराधिक सोच रखता हो अथवा महिलाओं के प्रति किसी अपराध में संलग्न हो उसे हमारा न्यायालय दंड देता है।
यदि कहीं किसी महिला के साथ कोई अपराध हुआ हो तो इस हवाले से पूरे विश्व से महिला दिवस का उत्सव तो नहीं छीना जा सकता। किसी महिला ने कोई अपराध कर दिया तो भी महिला दिवस के उत्सव की भर्त्सना करना उचित नहीं हो सकता। किसी भाई ने अपनी बहन की हत्या कर दी, तो पूरे समाज से राखी थोड़े ही छीन ली जाएगी? बल्कि जब-जब रक्षाबंधन का पर्व आएगा तब-तब अपनी बहनों के प्रति किसी विद्वेष से भरे भाइयों के मन का कुछ कलुष धुलेगा ही।
जब-जब हिंदी दिवस आएगा तो सरकारी दफ्तरों में हिंदी में पत्राचार करनेवालों को कुछ नैतिक बल ही मिलेगा। जब-जब महिला दिवस मनाया जाएगा, तब-तब महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी, अश्लील अथवा संकुचित सोच रखने वाले लोगों की नज़रें नीची ही होंगी।
साल में 365 दिन यदि बिखर-बिखरकर लोग महिलाओं के महत्व पर लिखेंगे तो वह छितराई हुई फुहार होगी जिससे कुछ विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा, किन्तु जब एक दिन ये सारी फुहारें एक साथ मिलकर बरसती हैं तो सोच पर जमी धूल और समाज में पड़े कचरे को बहा ले जाती हैं, धरती का मन तृप्त कर देती हैं और फिर पूरे बरस धरती पर हरियाली दिखाई देती है।
✍️ चिराग़ जैन

कुण्ठित के नाम पाती

हे कुण्ठेश!
जिसकी कविता में कमी न निकाल सको, उसकी प्रस्तुति पर प्रश्न खड़े कर दो। जिसकी प्रस्तुति भी परफेक्ट हो, उसकी कविता की विषयवस्तु को कठघरे में घसीट लो। जो इस मोर्चे पर भी अंटे में न आए, उसके चरित्र पर कीचड़ उछाल दो। जिसका चरित्र भी कीचड़ से बच जाए, उसके निजी जीवन की समस्याओं को मिर्च-मसाला लगाकर सार्वजनिक कर दो। जहाँ यह वार भी बेकार जाए, उसकी ड्रेसिंग सेंस और रंग-रूप का मखौल बना लो… कुल मिलाकर हर सफल रचनाकार के लिए कोई न कोई ऐसा तीर ढूंढ ही लाओगे कि उसकी एकाग्रता भंग कर सको। और जिस पर सारे वार बेकार हो जाएँ, उसकी रचनाओं की मात्राएँ गिनने बैठ जाओ।
कितने ठाली हो बे! जो सरल भाषा में कविता सुनाए, उसे सतही कहते हो, और जिसकी भाषा परिष्कृत हो उसे क्लिष्ट कहते हो। किसी मानसिक चिकित्सक को क्यों नहीं दिखा लेते हो यार? इतनी बड़ी परंपरा में कोई एक तो ऐसा होगा, जो सही भी हो और सफल भी हो। कभी फूटे मुँह से उस एक की ही प्रशंसा की होती।
महाभारत में इतने सारे पात्र हैं। एक शिशुपाल से ही इतने प्रभावित क्यों हो गये हो? और भी कुछ नहीं तो शकुनि ही बनकर देख लो। कम से कम उसकी कुण्ठा के मूल में कोई कारण तो था। कर्ण ही बन जाओ, अर्जुन से स्पर्धा करने के लिये अर्जुन को गाली देने की बजाय उसके समकक्ष प्रतिभा जुटाकर उससे सामना होने की प्रतीक्षा तो कर के देखो।
जितना श्रम गाली देने में झोंक कर शिशुपाल बने फिरते हो, उसका दसवां हिस्सा भी गीत लिखने में लगाया होता तो सूरदास बनकर कृष्ण के नाम से मशहूर हो गए होते।
ऋषियों को तंग करनेवाले बाली को ऋष्यमूक पर्वत से तड़ीपार होकर जीवन बिताना पड़ता है। नल-नील ही बन गए होते कि ऋषि के शाप को भी सेतुनिर्माण में वरदान की तरह प्रयोग करना सीखते। लेकिन तुमने तो शपथ उठा रखी है हिरण्यकश्यप बनने की। वरदान की देहरी पर से भी अभिशाप ही उठाने की भीष्म प्रतिज्ञा किये बैठे हो।
याद करो बे! कथाओं ने हमेशा सीता के साथ वनवास स्वीकारा है, कोई भी कथा कभी धोबी के पीछे-पीछे उसके आंगन तक नहीं आयी।
बहुत सुंदर है रे ये बगिया। इसकी क्यारियों में फूल बनकर खिलने का शऊर नहीं सीख सको तो इसके खिले हुए फूलों को टिड्डीदल की तरह नष्ट न करो। क्योंकि जब भी टिड्डियों ने बगीचे पर धावा बोला है तो अंततः टिड्डियों का ही अस्तित्व नष्ट हुआ है। बगीचे का क्या है, वह तो अगले मौसम में फिर खिल उठेगा।

✍️ चिराग़ जैन

शिक़ायत करना मना है

दशकों तक परिश्रम करके तंत्र ने जनता को इतना सहनशील बनाया है कि लाख परेशानियाँ सहकर भी जनता शिक़ायत करने से परहेज करे। हम गाहे-बगाहे सत्ता और राजनीति को कोसते हैं। टेलिविज़न के सामने बैठकर राजनेताओं को भ्रष्ट कह लेते हैं; लेकिन हमारे सामने कुर्सी पर बैठा क्लर्क सामने खड़ी जनता को इंतज़ार करने के लिये छोड़कर फोन पर इश्क़ फरमा रहा होता है और हम उसे टोकने की जेहमत नहीं उठाते। खिड़की के उस पार बैठी महिला बराबरवाली महिला से कुरकुरी भिंडी की रेसिपी समझ रही होती है और हम खिड़की के इस पार खड़े भिंडी पक जाने की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
अब तो हमारी सहनशीलता का इतना विकास हो चुका है कि निजी सेवाक्षेत्र, जो ‘क्लाइन्ट सेटिस्फेक्शन फर्स्ट’ जैसे सिद्धांतों के साथ काम करता था, वह भी अब हमें क्लाइंट नहीं, जनता समझने लगा है। वे भी जान गये हैं कि इन्हें परेशान करके कभी कोई नुक़सान नहीं होगा; क्योंकि जब कोई ख़ुद को क्लाइंट समझकर हमसे हमारी ख़राब सर्विस की शिकायत करेगा तब उसके पीछे हमारी उसी ख़ामी को झेल रहे सैंकडों लोग जनता की तरह मौन खड़े रहेंगे। उस समय बर्दाश्त करनेवालों के अनुपात में प्रतिक्रिया करनेवाला वह बेचारा अल्पमत में होने के कारण तर्कों के साथ हार जायेगा और ख़ामोश खड़े रहकर तमाशा देखनेवाले बहुमत के साथ जीत जायेंगे। इन जीते हुए लोगों में से अनेक मन ही मन उस प्रतिक्रियावादी का सम्मान करेंगे, कुछ उसे झगड़ालू और कलेशी कहेंगे, कुछ उस पर हँसेंगे और वह एक अकेला भी धीरे-धीरे सहनशील जनता की भीड़ में शामिल हो जायेगा।
पिछले दिनों एक निजी एयरलाइंस में क्रू के किसी दुर्व्यवहार का विरोध करने पर एक प्रतिक्रियावादी को पूरे क्रू ने जहाज से उतरते ही ज़मीन पर गिरा-गिराकर पीटा, पर शेष जनता चुपचाप देखती रही। निजी कंपनियाँ ‘कंपनी पॉलिसी’ के नाम पर आपकी किसी भी समस्या का समाधान करने से पल्ला झाड़ लेती हैं और आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते क्योंकि उनकी शिक़ायत लेकर आप जहाँ जाएंगे, उन थानों और न्यायालयों में आप पहले ही ‘जनता’ सिद्ध हो चुके हैं। वहाँ आपको दुर्व्यवहार और प्रतीक्षा करवाने में तंत्र को कोई आपत्ति नहीं होती, क्योंकि जब इन संस्थाओं में ऐसा चलन शुरू हुआ होगा तब भी मौन रहनेवाले ऐसे ही प्रतिक्रिया करनेवालों पर हँसे होंगे।
‘कौन पचड़े में पड़े’; ‘अपना काम बनता…’ और ‘हमें क्या लेना-देना’ जैसे जुमले बोलनेवाले लोग जब सिस्टम की ख़ामियों का रोना रोते हैं तब ऐसा लगता है जैसे कोई बलात्कारी भेड़िया, स्त्रियों की सुरक्षा का भाषण दे रहा हो। सरकारी नीतियों में सुधार के सपने देखनेवालों को यह समझना होगा कि अच्छी या बुरी, जो भी वर्तमान नीतियाँ हैं, उनके क्रियान्वयन का ज़िम्मा उसी व्यक्ति का है, जो टेबल के उस तरफ़ बैठा फोन पर चौपाल जमा रहा है। यदि उसके इस आचरण पर उसे टोका न गया तो उसकी ख़ामी सरकार को कभी नहीं दिखाई देगी, क्योंकि सरकार के सामने वह कभी लापरवाही नहीं करता।
इस देश में रोज़ लाखों लोग सिस्टम के सामने लाचार खड़े रहते हैं और करोड़ों लोग राजनीति को कोसने में व्यस्त रहते हैं। इस देश में भारत के लोककल्याणकारी राज्य होने का संविधानी दावा रोज़ सैंकड़ों मौत मरता है लेकिन हम मान बैठे हैं कि केवल राजनीति को गाली देकर ही अपने साथ हुए अन्याय की भड़ास निकालना उचित है, क्योंकि अन्याय करनेवाले को डायरेक्ट कुछ कहा तो वह हमारे काम को और मुश्किल कर देगा।

✍️ चिराग़ जैन

व्यवस्थित अव्यवस्था

सिस्टम… यह एक ऐसा शब्द है, जो किसी भी भारतीय भाषा में अनूदित होकर प्रपंच बन जाता है। ईश्वर को जब सृष्टि का सर्वाधिक दीन प्राणी बनाना था, तो उसने भारतीय सिस्टम में फँसा मनुष्य बना डाला।
हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है; इसलिए हमारा सिस्टम भी अपनी गिरफ़्त में आए सभी नागरिकों को समान रूप से प्रताड़ित करता है।
इस सिस्टम में सबसे ऊपर है, विधायिका। स्कूली किताबों ने विधायिका के विषय में यह अफ़वाह फैलाई है कि विधायिका क़ानून बनाती है। जैसे ही स्कूल की आदर्शवादी रामचरितमानस से निकलकर मनुष्य व्यवहारिकता की महाभारत बाँचता है तो उसे समझ आ जाता है कि विधायिका को सामान्य भाषा में राजनीति कहा जाता है और उसका केवल एक ही काम है- चुनाव जीतना। इस काम में राजनीति अपना जी, और नागरिकों की जान भी दाँव पर लगाने से नहीं चूकती।
संसद में क़ानून बनाने से लेकर सड़क पर भाषण देने तक और हँसने-रोने से लेकर उठने-बैठने और यहाँ तक कि जीने-मरने तक का एक ही लक्ष्य होता है, चुनाव जीतना। जिस कार्य से चुनाव जीता जा सके, उसे करने में राजनीति कभी पीछे नहीं रहती। फिर वह कार्य किसी को जीवन देने का हो या किसी का जीवन लेने का। राजनेता चुनाव जीतने के लिए ही दंगा शुरू करवाते हैं और फिर चुनाव जीतने के लिए ही दंगा बन्द भी करवाते हैं। टीवी डिबेट में गाली-गलौज से लेकर अपने-आप पर जूते-चप्पल फिंकवाने में भी इन्हें कोई परहेज नहीं होता। चुनाव जीतने के लिए ही बयान दिये जाते हैं और चुनाव जीतने के लिए ही उन बयानों से पलटा जाता है। नेता उपलब्ध है अर्थात् उसे वोट चाहिए और नेता व्यस्त है, अर्थात् उसे वोट मिल चुका है। चुनाव जीतने की इस मारामारी में जनता के दुःख-दर्द की सुधि लेने की फुर्सत किस कम्बख़्त के पास है?
अतएव, हे पार्थ! किताबों में लिखी लोकतंत्र की परिभाषाओं से भ्रमित न होओ। लोकतंत्र में तुम्हारी देह की स्थिति एक उंगली से अधिक नहीं है। यदि वोट देने के बाद उस उंगली का प्रयोग करने का विचार भी मन में आया तो यह व्यवस्था तुम्हारी शेष देह को जीते जी ही नारकीय कष्टों से अवगत करा देगी और फिर तुम युग की समाप्ति तक अपनी आत्मा पर अपनी देह का बोझ लादे हुए जीवित रहोगे। चूँकि सिस्टम की आत्मा होती ही नहीं है इसलिए उसकी आत्मा कभी मरती भी नहीं है। और जनता की आत्मा महाराज कुंभकर्ण के सिंहासन पर पैर पसारकर सोई हुई है।
विधायिका के इस विराट स्वरूप को जानने के पश्चात भारतीय नागरिक के मन में न्यायपालिका के स्वरूप को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। चूँकि न्यायपालिका किसी के साथ भेदभाव नहीं करती अतः अपने द्वार पर आनेवाले सभी मुक़द्दमों को समान रूप से लटकाती है। काग़ज़ और औपचारिकताओं के भीषण जंजाल में फँसे न्यायालय की लय विलंबित प्रवृत्ति की है। इसलिए न्यायालय में एक बार प्रवेश करते ही मनुष्य के जीवन में ठहराव-सा आ जाता है। छह महीने प्रतीक्षा करने के बाद एक तारीख़ आती है, उस तारीख़ पर कई घण्टे प्रतीक्षा करने के बाद प्रार्थी को अपने मामले का नाम सुनाई देता है। बंदा इस आवाज़ को सुनने की ठीक से ख़ुशी भी नहीं मना पाता, कि तब तक दूसरे मामले की आवाज़ लग जाती है। लटके हुए मुँह को लेकर प्रार्थी कोर्ट के बाहर आता है तो वक़ील अगली तारीख़ नोट करवाकर उससे अपने परिश्रम का मेहनताना वसूलने की भूमिका बनाने लगते हैं। घुटन भरे इन न्यायालयों के पास पीड़ित के लिए केवल टूटन है, जिसे बटोरने का लिए लोग अखण्ड ज्योत से भी अधिक निष्ठावान बनकर माननीय न्यायालय में हर तारीख़ पर उपस्थित रहने के लिए विवश हैं। स्वाधीनता के बाद से अब तक किसी न्यायाधीश ने ‘न्याय’ को समय पर उपस्थित होने के समन जारी किए होते तो कदाचित न्याय व्यवस्था की ओर उम्मीद से देखती करोड़ों आँखें पथरा न गई होतीं।
विधायिका से जर्जर हुई देह और न्याय की प्रतीक्षा में पथराई हुई आँखों के साथ भी यदि किसी नागरिक में साँस बच जाएँ, तो उसके लिए लोकतंत्र में कार्यपालिका की पर्याप्त व्यवस्था है। यह कार्यपालिका सुरसा माई के मुख की भाँति असीम है। वायुमण्डल में जहाँ-जहाँ तक वायु है वहाँ-वहाँ तक कार्यपालिका है। यह कार्यपालिका विधायिका द्वारा बनाए गए विधान के आधार पर नागरिकों से ‘प्रत्यक्ष कर’ वसूल करती है। अपराध रोकने में इसकी कोई रुचि नहीं है, अपितु इसका पूर्ण विश्वास है कि अपराध मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति का अंग है, इसलिए यह हर नागरिक को अपराधी मानते हुए उससे अभद्र तथा अपमानजनक व्यवहार करती है। क्लर्क से लेकर हवलदार तक और अधिकारी से लेकर चौकीदार तक; सब व्यवस्थित रूप से जनता को यह समझाते रहते हैं कि सिस्टम से उलझने की भूल मत कर बैठना… क्योंकि लोकतंत्र में तंत्र से अधिक महत्वपूर्ण तो लोक भी नहीं होता।
हमने अपने बुजुर्गों से शायद कभी नहीं पूछा, लेकिन अगर हमारी पीढ़ियों ने हमसे इस सिस्टम के इस हाल का कारण पूछ लिया, तो उस समय हमारी ख़ामोशी हमें ख़ुद को भीतर तक बेन्ध जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

पाठक से लेखक बनने तक का सफ़र

हिन्दी साहित्य में दो क़िस्म के पाठक होते हैं। पहली श्रेणी है प्रशंसक पाठकों की। वे सोशल मीडिया पर खाता बनाते ही टटोल-टटोल कर लेखकों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं। फिर उनकी हर पोस्ट को देखते ही उसके नीचे कुछ निश्चित शब्दयुग्म पेस्ट करके निकल लेते हैं। इस सबमें ये इतने व्यस्त होते हैं कि इन्हें रचनाएँ पढ़ने की भी फुर्सत नहीं मिल पाती। सुबह उठते ही वे पेंडिंग फाइल्स की तरह रचनाओं पर हस्ताक्षर करने बैठ जाते हैं। ‘वाह’; ‘अद्भुत’; ‘कालजयी’; ‘क़माल’; ‘लाजवाब’ और ‘निःशब्द’ जैसे अनेक शब्द इनके क्लिपबोर्ड पर हमेशा तैयार रहते हैं। इस प्रवृत्ति को देखते हुए फेसबुक ने ‘मान गए गुरु’; ‘सुपर’; ‘यू आर बेस्ट’ और ‘ब्यूटीफुल’ जैसे डिजिटल प्रशंसाक्षरों के एनिमेशन भी बना दिए हैं।
इस श्रेणी के पाठकों ने अनेक कानितकरों को तेंदुलकर होने का भ्रम पलवाया है। लेकिन इनसे भी ख़तरनाक़ होते हैं दूसरी क़िस्म के पाठक। ये भी फेसबुक पर प्रकट होते ही बाक़ायदा रचनाकारों को टटोलते हैं। लेकिन ये प्रथम दिवस से यह माने बैठे होते हैं कि यदि तुलसीदास जी ने मानस की प्रूफ रीडिंग इनसे कराई होती तो मानस आज ब्रह्मांड स्तरीय रचना बन गयी होती।
हर रचना पर प्रतिक्रिया देने की ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ इन्होंने भी उठा रखी होती है। किन्तु ये प्रथम श्रेणी के पाठकों की तरह आलस्य में बिना पढ़े रचना के नीचे अपनी टिप्पणी नहीं लिखते; बल्कि ये तब तक किसी रचना को पढ़ते हैं जब तक इनके भीतर का नामवर जागकर उस रचना से लंबी टिप्पणी तैयार न कर ले। एक बात तय है, इनकी टिप्पणी का सामान्यता एक स्थायी भाव होता है कि तुम बिना बात के कवि/लेखक बने डोल रहे हो और इस जनभावना में अपना स्वर मिलाकर मैं अपने भीतर के रामविलास शर्मा का गला नहीं घोंट सकता।
मेघनाद के निकुम्बरा यज्ञ की भाँति जब इनकी कठिन साधना को भंग करने इनके भीतर स्वयं लेखक बन जाने के वानर कुलबुलाने लगते हैं तब ये अपनी समस्त सृजनात्मक नेगिटीविटी का गट्ठड़ बनाकर मंचीय कवियों अथवा लेखकों के आचरण अथवा जीवन पर कुछ लिखते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि सृजन ‘चाहे कैसा भी हो’ उसके बिम्ब का आकाश रचनाकार की सोच से बड़ा नहीं हो सकता।
फिर अपने लिखे इस ‘कुछ’ की किसी स्थापित साहित्यिक विधा से तुलना करते हुए ये अपनी जंघा पीटने लगते हैं। मांसल जंघा पर हथेली की चपत से जो ध्वनि उत्पन्न होती है उसे ‘घनघोर तालियाँ’ समझकर ये प्रसन्न हो उठते हैं।
इसके बाद इनकी लेखनी यकायक ‘केवट की नौका’ से ‘पुष्पक विमान’ हो जाती है। जिसकी भी पंचवटी में ‘सीता’ सरीखी कोई स्त्री हो, उससे इनका स्वाभाविक वैर हो जाता है।
अब ये दिन भर अपनी शूपर्णखा को त्रिकालसुंदरी घोषित करने के प्रयास में रहते हैं और रात भर सीतायुक्त आंगनों पर पत्थर मारने में व्यस्त रहते हैं। इनके लिखे पर भी वाह-वाह करनेवालों की कभी कमी नहीं होती, क्योंकि प्रथम श्रेणी के पाठकों का क्लिपबोर्ड भी क़ानून की देवी की तरह सबको आँख पर पट्टी बांधकर देखता है।
लेकिन रात में जिन आंगनों पर इनके पत्थर बरसते हैं, उनकी मुस्कुराहटों पर इन निशाचरी खरोंचों के निशान देर तक दिखाई देते हैं।
✍️ चिराग़ जैन

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